VVI Class 12 Sociology Chapter 6 Notes In Hindi सांस्कृतिक विविधता की चुनौतियाँ

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VVI Class 12 Sociology Chapter 6 Notes In Hindi सांस्कृतिक विविधता की चुनौतियाँ

Class12th 
Chapter Nameसांस्कृतिक विविधता की चुनौतियाँ
Chapter numberChapter 6
Book NCERT
SubjectSociology
Medium Hindi
Study MaterialsNotes & Questions answer
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सांस्कृतिक विविधता की चुनौतियाँ


भारत एक सांस्कृतिक विविधता वाला देश है क्योंकि यहाँ पर विभिन्न धर्म, जाति और भाषा बोलने वाले लोग रहते हैं जिनकी अपनी अलग-अलग संस्कृति होती है। संस्कृति में विविधता होते हुए भी यहाँ पर विविधता में एकता की विशेषता पायी जाती है। सांस्कृतिक विविधता के समक्ष विभिन्न चुनौतियाँ भी सामने आती हैं। इन चुनौतियों का कुशलतापूर्वक सामना किया जाता है।

‘विविधता’ शब्द असमानताओं के बजाय अन्तरों पर बल देता है। जब हम यह कहते हैं कि भारत एक महान सांस्कृतिक विविधता वाला राष्ट्र है तो हमारा तात्पर्य यह होता है कि यहाँ अनेक प्रकार के सामाजिक समूह एवं समुदाय निवास करते हैं। यह समुदाय सांस्कृतिक चिह्नों

जैसे- भाषा, धर्म, पंथ प्रजाति या जाति द्वारा परिभाषित किए जाते हैं। जब यह विविध समुदाय भी किसी बड़े सत्व जैसे एक राष्ट्र का भाग होते हैं, तब उनके बीच प्रतिस्पर्धा या संघर्ष के कारण कठिनाइयाँ उत्पन्न हो सकती हैं।

इसी कारण से सांस्कृतिक विविधता कठोर चुनौतियों प्रस्तुत कर सकती हैं। कठिनाइयाँ इस तथ्य से भी उत्पन्न होती है कि सांस्कृतिक पहचानें बहुत प्रबल होती हैं, वे तीव्र भावावेशों को भड़का सकती हैं और अक्सर बड़ी संख्या में लोगों को एकजुट कर देती हैं। कभी-कभी सांस्कृतिक अंतरों के साथ-साथ आर्थिक और सामाजिक असमानताएँ भी जुड़ जाती हैं और तब स्थिति और भी जटिल हो जाती है। 

VVI Class 12 Sociology Chapter 6 Notes In Hindi सांस्कृतिक विविधता की चुनौतियाँ

एक समुदाय द्वारा भुगती जा रही असमानताओं या अन्यायों को दूर करने के लिए किए गए उपाय दूसरे समुदायों में उनके प्रति विरोध को भड़का सकते हैं। स्थिति उस समय और भी बिगड़ जाती है जब नदी, जल, रोजगार के अवसर पा सरकारी धनराशियों जैसे दुर्लभ संसाधनों के बँटवारे का सवाल खड़ा होता है।

हमारे देश में सांस्कृतिक विविधता के कारण विभिन्न समस्याएँ और चुनौतियाँ भी सामने आती हैं। । जैसे क्षेत्रवाद, साम्प्रदायिकता तथा जातीयता की समस्याएँ हमारे देश में सदा वर्तमान रही हैं। इन समस्याओं का समाधान करने के लिए समय-समय पर प्रयास होते रहे हैं। फिर भी – ये चुनौतियाँ अभी भी सामने मौजूद हैं। 

परिणामस्वरूप हमारे देश को इससे समय-समय पर हानि उठानी पड़ती है जिससे देश का आर्थिक विकास करने में वाचा उत्पन्न होती है। सामुदायिक पहचान जन्म तथा उससे संबंधित होने के भाव पर आधारित होती है, न कि किसी अर्जित योग्यता या उपलब्धि के आधार पर किसी समुदाय में जन्म लेने के लिए हमें कुछ नहीं करना होता। 

लोग उन समुदायों से संबंधित होकर अत्यंत सुरक्षित एवं संतुष्ट महसूस करते हैं जिनमें उनकी सदस्यता पूरी तरह अकस्मात् होती है। सामुदायिक संबंधों के बढ़ते हुए और परस्पर व्यापी दायरे ही हमारी दुनिया को सार्थकता प्रदान करते हैं व हमें एक पहचान देते हैं। प्रदत्त पहचानों और सामुदायिक भावनाओं की एक दूसरी विशेषता यह होती है कि वे सर्वव्यापी होती हैं। 



प्रत्येक व्यक्ति की एक मातृभूमि होती है, एक मातृभाषा होती है। हम सब अपनी-अपनी पहचानों के प्रति समान रूप से प्रतिबद्ध एवं वफादार होते हैं। विवाद का प्रत्येक पक्ष सामने वाले पक्ष को शत्रु मानते हुए घृणा की दृष्टि से देखता है और उसमें अपने पक्ष के गुणों को और विरोधी पक्ष के दुर्गुणों को बढ़ा-चढ़ाकर कहने की प्रवृत्ति होती है। 

प्रत्येक पक्ष का यह विश्वास होता है कि हम सच्चे हैं और परमेश्वर हमारे साथ है। यह एक सामाजिक तथ्य है कि कोई भी देश या समूह अपने नागरिकों या सदस्यों को अन्याय, असत्य के लिए संघर्ष करने को प्रोत्साहित नहीं करता अर्थात् प्रत्येक देश या समूह हमेशा सत्य, न्याय, समानता के लिए ही लड़ता है। 

दक्षिण अफ्रीका में जहाँ गोरे अल्पसंख्यक सत्ता में रहे और स्थानीय काले बहुसंख्यकों के प्रति अत्याचार करते रहे। ब्रिटेन में भी इस विषय पर सार्वजनिक चर्चा होती रही है कि क्या राष्ट्र उपनिवेशवाद और दास-प्रथा को बढ़ावा देने में अपनी भूमिका के लिए क्षमा माँगे । राष्ट्र वैसे तो एक तरह का बड़े स्तर का समुदाय ही होता है। यह समुदायों से मिलकर बना समुदाय ही होता है। राष्ट्र के सदस्य एक ही राजनीतिक सामूहिकता का हिस्सा बनने की इच्छा रखते हैं। 

राजनीतिक एकता की यह इच्छा स्वयं को एक राज्य बनाने की आकांक्षा के रूप में अभिव्यक्त करती है। मैक्स वेबर की सुप्रसिद्ध परिभाषा के अनुसार, “राज्य एक ऐसा निकाय होता है जो एक विशेष क्षेत्र में विधिसम्मत अधिकार का सफलतापूर्ण दावा करता है।” हम ऐसे राष्ट्रों का वर्णन कर सकते हैं जिनकी स्थापना साझे-धर्म, भाषा, नृजातीयता के आधार पर की गई है। 

प्रत्येक संभव कसौटी के लिए अनेक अपवाद और विरोधी उदाहरण पाए जाते हैं। राष्ट्र का अंतर या मेद बताने वाली सबसे नजदीकी कसौटी राज्य है। हाल के समय में राष्ट्र और राज्य के बीच ‘एकैक’ संबंध है। दोहरी नागरिकता संबंधी कानून एक अलग उदाहरण प्रस्तुत करता है। ये कानून किसी राज्य-विशेष के नागरिकों को एक ही समय में एक-दूसरे राज्य का नागरिक बनने की इजाजत देते हैं। 

राष्ट्र एक ऐसा समुदाय है जो अपना राज्य प्राप्त करने में सफल हो गया है जिस प्रकार आज भावी अथवा आकांक्षी राष्ट्रीयताएं अपना राज्य बनाने के लिए अधिकाधिक प्रयत्नशील हैं। राजनीतिक वैधता के प्रमुख स्रोतों के रूप में लोकतंत्र और राष्ट्रवाद की स्थापना एक विशिष्ट लक्षण है। 

राज्यों को राष्ट्र की उतनी ही या उससे भी अधिक आवश्यकता होती है जितनी की राष्ट्रों को राज्यों की आत्मसातीकरण को बढ़ावा देने वाली नीतियों का उद्देश्य सभी नागरिकों को एक समान सांस्कृतिक मूल्यों और मानकों को अपनाने के लिए मजबूर या राजी करना है। यह मूल्य तथा मानक आमतौर पर संपूर्ण रूप से प्रभावशाली समूह के होते हैं। समाज में अन्य अप्रभावशाली अथवा अधीनस्थ बनाए गए समूहों से यह आशा अथवा अपेक्षा की जाती है कि वे अपने सांस्कृतिक मूल्यों को छोड़ दें।

एकीकरण को बढ़ावा देने वाली नीतियाँ शैली को दृष्टि से तो अलग होती हैं, पर उनका उद्देश्य भिन्न नहीं होता। समुदाय के किसी विशिष्ट रूप और राज्य के आधुनिक रूप के बीच कोई संबंध होना आवश्यक नहीं है। सामुदायिक पहचान के बहुत से आधारों में से एक आधार राष्ट्र को स्वरूप प्रदान कर सकता है। सामुदायिक पहचान के बहुत से आधारों में से एक आधार राष्ट्र-निर्माण के आधार के रूप में कार्य कर सकती है। इसलिए पहले से विद्यमान राज्य सभी प्रकार की सामुदायिक पहचानों को खतरनाक प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखते हैं।

भारतीय राष्ट्र-राज्य सामाजिक तथा सांस्कृतिक दृष्टि से विश्व के सर्वाधिक विविधतापूर्ण देशों में से एक है। जनसंख्या की दृष्टि से इसका दूसरा स्थान है। यहाँ के सौ करोड़ से ज्यादा लोग भिन्न-भिन्न भाषाएँ और बोलियाँ बोलते हैं। इन भाषाओं में से 18 भाषाओं को आधिकारिक रूप से मान्यता देकर उन्हें संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान दिया गया है। 

इस प्रकार उन्हें विधिक प्रतिष्ठा की गारंटी दी गई है। सामुदायिक पहचानों के साथ राष्ट्र-राज्यों के संबंधों की दृष्टि से भारत की स्थिति न तो आत्मसातीकरणवादी और न ही एकीकरणवादी की है। हालांकि राष्ट्रीय एकीकरण को राज्य की नीति में लगातार महत्त्वपूर्ण स्थान दिया जा रहा है, परन्तु इसका उस रूप में एकीकरणवादी नहीं रहा। अंतर्राष्ट्रीय मानकों की दृष्टि से मापा जाए तो अल्पसंख्यक धर्मों को अत्यन्त प्रबल संवैधानिक सुरक्षा प्रदान की गई है।

भारत में क्षेत्रवाद भारत की भाषाओं, संस्कृतियों, जनजातियों और धर्मों की विविधता के कारण पाया जाता है। भारतीय संघवाद इन क्षेत्रीय भावुकताओं को समायोजित करने वाला एक साधन है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारतीय राज्य ने ब्रिटिश भारतीय व्यवस्था को ही अपनाए रखा जिसके अंतर्गत भारत बड़े-बड़े प्रांतों में बँटा हुआ था। 

ब्रिटिश भारतीय सरकार द्वारा प्रत्यक्ष रूप से प्रशासित प्रेसीडेंसियों और प्रांतों के अलावा संपूर्ण भारत में अनेक देशी राजाओं की सियासतें या राजवाड़े थे। इनमें मैसूर, कश्मीर व बड़ौदा के देशी राज्य बड़े थे। इस प्रकार, धर्म ने नहीं बल्कि भाषा ने क्षेत्रीय तथा जनजातीय पहचान के साथ मिलकर भारत में नृजातीय राष्ट्रीय पहचान बनाने के लिए एक अत्यंत सशक्त साधन का काम किया है। 

उदाहरण के लिए सन् 2000 में तीन नए राज्यों अर्थात् छत्तीसगढ़, उत्तरांचल और झारखंड के निर्माण में भाषा ने कोई प्रमुख भूमिका अदा नहीं की, बल्कि जनजातीय पहचान, भाषा और पारिस्थितिकी पर आधारित नृजातीयता ने मिलकर तीव्र क्षेत्रीयता को आधार प्रदान किया, जिसके परिणामस्वरूप नए राज्यों की स्थापना हुई। भारत में कार्य राज्यों तथा केन्द्रों की व्यक्तियों को परिभाषित करने वाले

संवैधानिक उपबंधों द्वारा किया जाता है। भारत के संविधान में शासन संबंधी विषयों या कार्यो की सूची होती है जिनकी जिम्मेदारी खासतौर पर राज्य या केन्द्र की होती है। इसके साथ ही अन्य क्षेत्रों की सूची भी दी गई है जहाँ दोनों को ही कार्य संचालन की अनुमति है जिनके बारे में राज्य और केन्द्र दोनों ही कार्य कर सकते हैं। राज्य विधानमंडल संसद के उपरि सदन, राज्य सभा के गठन को निर्धारित करते हैं।

कुल मिलाकर संघीय प्रणाली अच्छी तरह चलती रही है। उदारीकरण के युग से ही बढ़ती हुई अंतर-क्षेत्रीय आर्थिक एवं आधारभूत ढाँचे से संबंधित समानताएँ नीति-निर्माताओं, राजनीतिज्ञों और विद्वानों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। आर्थिक विकास में निजी पूँजी निवेश को अधिक बड़ी भूमिका सौंपी हुई है, इसलिए क्षेत्रीय मदृष्टि के तत्वों को कम महत्त्व मिला है।

भारतीय राष्ट्रवाद में प्रभावशाली प्रवृत्ति समावेशात्मक और लोकतंत्रात्मक दृष्टि द्वारा चिन्हित की। इस दृष्टि को समावेशात्मक इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इसमें विविधता और बहुलता मान्यता दी जाती रही है और लोकतंत्रात्मक इसलिए है, क्योंकि यह भेदभाव और अपवर्जन नकारती है और एक न्यायपूर्ण एवं सामचिन (उचित) समाज की स्थापना करती है।

‘लोग’ दको अपवर्जक दृष्टि से, धर्म, नृजातीय, प्रजाति या जाति द्वारा परिभाषित किसी विशेष समूह प्रसंग से नहीं देखा गया है। मानवतावादी विचारों ने भारतीय राष्ट्रवादियों को प्रभावित किया और अपवर्जनात्मक राष्ट्रवाद के कुरूप पक्षों पर महात्मा गाँधी और रवींद्रनाथ टैगोर जैसे अग्रणी महानुभावों द्वारा व्यापक रूप से टीका-टिप्पणी की गई।

समावेशात्मक राष्ट्रवाद को प्रभावी बनाने के लिए तत्संबंधी विचारधारा को संविधान में स्थान देना पड़ा। इसका कारण है – जैसा कि ( अनुभाग 6.1 में) पहले ही चर्चा की जा चुकी है, नभावशाली समूह में यह मानकर चलने की अत्यंत प्रबल प्रवृत्ति होती है कि उनकी संस्कृति या भाषा अथवा धर्म राष्ट्र राज्य की संस्कृति, भाषा या धर्म के समान है। 

किंतु एक मजबूत और लोकतंत्रात्मक राष्ट्र के लिए सभी समूहों और विशेष रूप से अल्पसंख्यक समूहों के अधिकारों को सुनिश्चित करने वाले संवैधानिक प्रावधानों की आवश्यकता होती है। अल्पसंख्यकों की परिभाषा के बारे में एक संक्षिप्त चर्चा हमें एक सबल, संयुक्त और लोकतंत्रात्मक राष्ट्र के लिए अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के महत्त्व को समझने में सक्षम बनाती है।

अल्पसंख्यक समूहों की धारणा का समाजशास्त्र में व्यापक रूप से प्रयोग किया जाता है एवं इसका सिर्फ एक संख्यात्मक विशिष्टता के अलावा और ज्यादा महत्त्व है। इसमें आमतौर पर असुविधा या हानि का कुछ भाव निहित है। अतः विशेषाधिकारों प्राप्त अल्पसंख्यकों जैसे- अत्यंत धनवान लोगों को आमतौर पर अल्पसंख्यक नहीं कहा जा सकता; जैसे-‘विशेषाधिकार प्राप्त -अल्पसंख्यक’।

जब ‘अल्पसंख्यक’ शब्द का प्रयोग विशेषक के बिना किया जाता है तो सामान्यतः इसका अभिप्राय अपेक्षाकृत छोटे लेकिन साथ ही सुविधा वंचित समूह से होता है। अल्पसंख्यक शब्द का समाजशास्त्रीय भाव यह भी है कि अल्पसंख्यक वर्ग के सदस्य एक सामूहिकता का निर्माण करते हैं।

हालाँकि कुछ ऐसे असामान्य उदाहरण भी लिए जा सकते हैं जहाँ कोई अल्पसंख्यक समूह किसी एक अर्थ में तो सुविधा वंचित कहा जा सकता है; लेकिन दूसरे अर्थ में नहीं इसलिए उदाहरण के लिए, पारसियों या सिखों जैसे धार्मिक अल्पसंख्यक वर्ग आर्थिक दृष्टि से अपेक्षाकृत सम्पन्न हो सकते हैं, लेकिन वे फिर भी सांस्कृतिक अर्थ में सुविधा वंचित हो सकते हैं, क्योंकि हिंदुओं की विशाल जनसंख्या की तुलना में उनकी संख्या कम है। 

बहुसंख्यक वर्ग के जनसांख्यिकीय प्रभुत्व के कारण धार्मिक अथवा सांस्कृतिक अल्पसंख्यकों को विशेष संरक्षण की आवश्यकता होती है। लोकतंत्रात्मक राजनीति में संख्यात्मक बहुमत को चुनावों के जरिए राजनीतिक शक्ति संपरिवर्तित कर लेना सदा संभव होता है। 

इसका अर्थ यह हुआ कि धार्मिक अथवा सांस्कृतिक अल्पसंख्यक वर्ग राजनीतिक दृष्टि से कमजोर होते हैं, भले ही उनकी आर्थिक या सामाजिक स्थिति कैसी भी हो। उन्हें यह जोखिम तो उठानी ही होगी कि बहुसंख्यक समुदाय राजनीतिक शक्ति को हथिया लेगा और उनकी धार्मिक या सांस्कृतिक संस्थाओं को दबाने के लिए राजतंत्र का दुरुपयोग करेगा और अंततोगत्वा उन्हें अपनी अलग पहचान छोड़ देने के लिए मजबूर कर देगा।


CLASS 12 NCERT SOLUTION IN ENGLISHCLASS12 NCERT SOLUTION IN HINDI
Historyइतिहास
Geography भूगोल
Political science राजनीति विज्ञान
English SubjectResult
Hindi SubjectHistory answer keys

रोजमर्रा की भाषा में ‘सांप्रदायिकता या संप्रदायवाद’ का अर्थ है-धार्मिक पहचान पर आधारित आक्रमक उग्रवाद उग्रवाद, अपने आप में ऐसी अभिवृत्ति है जो अपने समूह को ही  वैध या श्रेष्ठ समूह मानती है और अन्य समूहों को निम्न, अवैध अथवा विरोधी समझती है। इसी बात को और सरल शब्दों में कहें तो सांप्रदायिकता एक आक्रामक राजनीतिक विचारधारा है जो धर्म से जुड़ी होती है। 

यह एक अनूठा भारतीय अथवा शायद एशियाई अर्थ है जो साधारण अंग्रेजी शब्द के भाव से भिन्न है। अंग्रेजी भाषा में ‘कम्युनल (Communal) शब्द का अर्थ है व्यक्ति की बजाय समुदाय (यानी कम्युनिटी) या सामूहिकता से जुड़ा हुआ (व्यक्ति, भाव, विचार आदि)। अंग्रेजी अर्थ तटस्थ है, जबकि दक्षिण एशियाई अर्थ प्रबल रूप से आवेशित है। इस आवेश को सकारात्मक दृष्टि से देखा जा सकता है। यदि देखने वाला सांप्रदायिकता के प्रति से भी, यदि देखने वाला इसका विरोधी हो।

सहानुभूति रखता हो अथवा नकारात्मक दृष्टि इस बात पर बल देना जरूरी है कि सांप्रदायिकता राजनीति से सरोकार रखती है, धर्म से नहीं। यद्यपि सम्प्रदायवादी धर्म के साथ गहन रूप से जुड़े होते है, पर वास्वत में व्यक्तिगत विश्वास और संप्रदायवाद के कारण धर्म संकीर्ण बन जाता है। धर्म का रूप संकुचित हो जाता है। राजनीतिक व पूर्वाग्रह तत्त्व संप्रदायवाद को बढ़ावा देते हैं।

भारत में सांस्कृतिक विविधता के चलते विभिन्न चुनौतियाँ और समस्याएँ सदा बनी रहती हैं, जो देश की एकता और अखण्डता के लिए हानिकारक हैं। अतः आवश्यकता इस बात की है कि इन चुनौतियों का समुचित समाधान करने का प्रयत्न करना चाहिए। 


Class 12 Sociology Chapter 6 सांस्कृतिक विविधता की चुनौतियाँ प्रश्नोत्तर


1. सांस्कृतिक विविधता का क्या अर्थ है ? भारत को एक अत्यन्त विविधतापूर्ण देश क्यों माना जाता है ? 

Ans. सांस्कृतिक विविधता इसका तात्पर्य यह है कि किसी भी देश में अनेक प्रकार के सामाजिक समुदाय निवास करते हैं। यह समुदाय सांस्कृतिक चिह्ननों, जैसे-भाषा, धर्म, पंथ, प्रजाति या जाति के द्वारा परिभाषित किए जाते हैं। यह तर्क उचित है कि भारत एक अत्यन्त विविधतापूर्ण देश है अर्थात् यहाँ अनेक प्रकार के सामाजिक एवं समुदाय निवास व निर्वाह करते हैं। भारत के प्रत्येक राज्य में विभिन्न धर्मों, जातियों व समुदायों के लोग निवास करते हैं। 

इन समुदायों के लोगों की भाषा व रहन-सहन, खान-पान इत्यादि में भी काफी अन्तर है। परन्तु इन सांस्कृतिक विविधताओं से कठोर चुनौतियाँ भी उत्पन्न हो सकती हैं। विभिन्न सांस्कृतिक पहचानों के लोग अपनी पहचानों को प्रबल करने के लिए दंगे करवा सकते हैं। 

कभी-कभी सांस्कृतिक अंतरों के साथ-साथ आर्थिक और सामाजिक असमानताओं के जुड़ जाने से स्थिति अत्यधिक जटिल को जाती है। भारत में लोगों तथा संस्कृतियों के बीच विद्यमान विविधताएँ अनेक प्रकार की कठोर चुनौतियाँ प्रस्तुत करती हैं, फिर भी भारत की स्थिति अन्य राष्ट्रों की तुलना में अच्छी है।

2. सामुदायिक पहचान क्या होती है और वह कैसे बनती है ? 

Ans. प्रत्येक मनुष्य को इस संसार में अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए एक स्थायी पहचान की जरूरत होती है। इसी पहचान के द्वारा प्रत्येक व्यक्ति को समुदाय व समाज में पहचाना करते हैं।

सामुदायिक पहचान जन्म से ही निर्धारित होती है। प्रत्येक व्यक्ति की सामुदायिक पहचान उसके परिवार के अनुसार ही होती है। यह पहचान किसी योग्यता या उपलब्धि के आधार पर नहीं होती। इन पहचानों को ‘प्रदत्त’ कहा जाता है अर्थात् यह पहचानें जन्म से ही निर्धारित होती है। 

कोई भी व्यक्ति अपनी इच्छा के अनुसार अपनी सामुदायिक पहचान नहीं बना सकता। इसी सामुदायिक पहचान के माध्यम से हमें मातृभाषा और सांस्कृतिक मूल्य मिलता है जिनके माध्यम से हम अपनी पहचान को और अधिक सुदृढ़ बना सकते है।

इन समुदायों से संबंधित होकर व्यक्ति अत्यन्त सुरक्षित एवं संतुष्ट महसूस करते हैं जिनमें कमी सदस्यता पूरी तरह अकस्मातू होती है। यदि हम इन पहचानों को छोड़ने की कोशिश भी करें तब भी अन्य व्यक्ति हमें उन्हीं चिन्हों से पहचानते हैं अर्थात् हमारी सामुदायिक पहचान नर्धारित होती है। 

सामुदायिक संबंधों अर्थात् परिवार, जाति, भाषा क्षेत्र या धर्म के बढ़ते हुए दायरे हमारी सामुदायिक पहचान को सार्थकता प्रदान करते हैं। 

3. राष्ट्र को परिभाषित करना क्यों कठिन है ? आधुनिक समाज में राष्ट्र और राज्य कैसे संबंधित हैं ?

Ans. राष्ट्र-राष्ट्र एक तरह का बड़े स्तर का समुदाय ही होता है। यह विभिन्न समुदायों मिलकर बना एक समुदाय है।

राष्ट्र एक ऐसा अनूठा किस्म का समुदाय होता है जिसे परिभाषित नहीं किया जा सकता। इस कारण है कि धर्म, भाषा, नृजातीयता, इतिहास अथवा क्षेत्रीय संस्कृति जैसी साझी सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और राजनीतिक संस्थाओं के आधार पर राष्ट्रों का वर्णन किया जा सकता है। 

परन्तु यह पता लगाना कि किसी राष्ट्र में कैसी विशेषताएँ होनी चाहिए, अत्यन्त कठिन होता है। उदाहरण के तौर पर ऐसे बहुत से राष्ट्र हैं जिनकी अपनी एक साझा या सामान्य भाषा, धर्म, नृजातीयता नहीं है। दूसरी ओर ऐसी अनेक भाषाएँ, धर्म या नृजातियाँ हैं जो कई राष्ट्रों में पाई जाती है।

एक राज्य के लिए ‘राष्ट्र’ एक सर्वाधिक स्वीकृत अथवा औचित्यपूर्ण आवश्यकता है। राज्यों को राष्ट्र की उनती ही आवश्यकता है जितनी राष्ट्र को राज्यों की आज भावी अथवा आकांक्षी राष्ट्रीयताएँ अपना राज्य बनाने के लिए प्रयत्नशील हैं। हाल के समय में राष्ट्र और राज्यों के बीच एक- एक का संबंध है। राष्ट्र ऐसे समुदाय होते हैं जिनका अपना राज्य होता है, परन्तु पहले यह बात सच नहीं थी। अर्थात् एक राज्य केवल एक ही राज्य का प्रतिनिधित्व कर सकता था।

 प्रत्येक राष्ट्र का अपना एक राज्य होना जरूरी था। ऐतिहासिक तौर पर राज्यों ने राष्ट्र निर्माण की रणनीतियों के माध्यम से अपनी राजनीतिक वैधता को स्थापित करने और उसे एकीकरण की नीतियों के जरिए अपने नागरिकों की निष्ठा, देशभक्ति और आज्ञाकारिता प्राप्त करने के प्रयास किए हैं। ऐसी परिस्थितियों में नागरिक अपने देश के साथ अपने नृजातीय, धार्मिक, भाषायी अथवा अन्य प्रकार के समुदाय के साथ भी गहरा तादात्म्य रखते हैं।. 

4. राज्य अक्सर सांस्कृतिक विविधता के बारे में शंकालु क्यों होते हैं ?

Ans. भारत में सांस्कृतिक विविधता पायी जाती है जिससे अनेकता में एकता होते हुए भी विभिन्न समस्याएँ सामने रहती हैं जो देश के लिए घातक होता है। ऐसा देखा जाता है कि राज्य अक्सर सांस्कृतिक विविधता के बारे में शंकालु होते हैं। 

सांस्कृतिक विविधता के सभी पक्षों में शायद धार्मिक समुदायों और धर्म-आधारित पहचानों के मुद्दे सबसे अधिक विवादास्पद हैं। इन मुद्दों को मोटे तौर पर दो संबंधित समूहों धर्मनिरपेक्षता एवं साम्प्रदायिकता और अल्पसंख्यक एवं बहुसंख्यक के अन्तर्गत बाँटा जा सकता है। 

धर्मनिरपेक्षता और साम्प्रदायिकता के प्रश्न, राज्य के धर्म और उन राजनीतिक समूहों के साथ संबंधों के बारे में होते हैं जो धर्म को अपनी प्राथमिक पहचान मानते हैं। अल्पसंख्यकों और बहुसंख्यकों के बारे में प्रश्न उन निर्णयों से संबंधित होते. हैं कि राज्य विभिन्न धार्मिक, नृजातीय या अन्य समुदायों के साथ जो संख्या और शक्ति (सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विन्दुओं (शाक्ति सहित) की दृष्टि से असमान हैं, के साथ कैसा बर्ताव करता है। 

इन सभी विचार के कारण राज्य अक्सर सांस्कृतिक विविधता के बारे में शंकालु की स्थिति में रहता है। यही कारण है कि सांस्कृतिक विविधता से संबंधित चुनौतियाँ और समस्याएँ भारत में सदा वर्तमान रहती हैं।


अति लघु उत्तरीय प्रश्न (VERY SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS) 


1. सामुदायिक पहचान का अर्थ बताइए। ‘प्रदत्त’ पहचानें क्या होती हैं ?

Ans. सामुदायिक पहचान का अर्थ उस पहचान से है जिसके द्वारा कोई भी व्यक्ति समुदाय में पहचाना जाता है। इससे पता चलता है कि किसी व्यक्ति का संबंध किस जाति या समुदाय से है। वे पहचानें जो जन्म से ही निर्धारित होती हैं व जन्म के पश्चात् बदली नहीं जा सकतीं, प्रदत्त पहचानें कहलाई जाती हैं। 

2. सामुदायिसक पहचानें क्यों आवश्यक हैं ? दो कारण बताइए ।

Ans. सामुदायिक पहचानें अनेक कारणों से आवश्यक हैं- (i) ये सामुदायिक पहचानें ऐसे चिह्न होते हैं जिनके द्वारा किसी व्यक्ति को समाज में जाना जाता है।

(ii) व्यक्ति इन समुदायों से संबंधित होकर अत्यंत सुरक्षित एवं संतुष्ट महसूस करता है। 

3. सामुदायिक संबंधों में कौन-कौन शामिल हैं व इनका हमारे जीवन में क्या योगदान है ?

Ans. सामुदायिक संबंधों में परिवार, नातेदारी, जाति, भाषा, नृजातीयता, धर्म और क्षेत्र शामिल होते हैं। यही सामुदायिक संबंधों के दायरे ही हमारी दुनिया को सार्थकता प्रदान करते हैं।

4. प्रदत्त पहचानों की क्या विशेषता होती है ? 

Ans. ये पहचानें सर्वव्यापी होती हैं अर्थात् इनकी विशेषता यही होती है कि ये कभी समाप्त नहीं होतीं। यह पहचानें जन्म से निर्धारित होकर मृत्यु तक हमारे साथ रहती हैं।

5. ‘राष्ट्र’ शब्द का अर्थ स्पष्ट कीजिए । 

Ans. एक ऐसा समुदाय जो अपने आपको एक समुदाय मानता है और अनेक साझा विशिष्टताओं, जैसे- साझी भाषा, भौगोलिक स्थिति, इतिहास, धर्म, जाति, प्रजाति, सजाति आदि पर आधारित होता है। राष्ट्र एक ऐसी विशिष्टताओं के बिना भी अस्तित्व में रह सकते हैं। एक राष्ट्र उन लोगों से मिलकर बना होता है जो उस राष्ट्र के शक्ति, अस्तित्व और सार्थकता के प्रोत होते हैं।

6. राष्ट्र-राज्य से आप क्या समझते हैं ?

Ans. एक विशेष प्रकार का राज्य, जो आधुनिक जगत की विशेषता है, जिसमें एक सरकार की एक निर्धारित भौगोलिक क्षेत्र पर संप्रभु शक्ति होती है और वहाँ रहने वाले लोग उसके नागरिक कहलाते हैं जो अपने आप को एकल राष्ट्र का हिस्सा मानते हैं। राष्ट्र-राज्य राष्ट्रीयता उसे पनिष्ठता से जुड़े हैं।

7. उन दो नीतियों के नाम बताइए जिसके द्वारा नागरिकों को देशभक्ति और निष्ठा को प्राप्त करने के प्रयास किए गए हैं ?

Ans. (i) आत्मसातीकरण, (ii) एकीकरण।

8. आत्मसातीकरणवादी और एकीकरणवादी रणनीतियाँ किन राष्ट्रीय पहचानों क स्थापित करती हैं ? किन्हीं दो का उल्लेख करें।

Ans. यह रणनीतियाँ एकल राष्ट्रीय पहचान स्थापित करने का प्रयास करती है, जैसे- 

(i) प्रभावशाली समूह की भाषा को ही एकमात्र राजकीय राष्ट्रभाषा के रूप में अपनान और उसके प्रयोग को सभी सार्वजनिक संस्थाओं में अनिवार्य बना देना।

(ii) अल्पसंख्यक समूहों और देशज लोगों से जमीनें, जंगल एवं मत्स्य क्षेत्र छीनकर उन्हें राष्ट्रीय संसाधन घोषित कर देना।

 9. आत्मसातीकरण को बढ़ावा देने वाली नीतियों का उद्देश्य बताइए ।

Ans. इन नीतियों का उद्देश्य नागरिकों को एकसमान सांस्कृतिक मूल्यों और मानकों को अपनाने के लिए राजी, प्रोत्साहित करना है। यह मूल्य तथा मानक आमतौर पर प्रभावशाली सामाजिक समूह के होते हैं। समाज में अन्य प्रभावशाली समूहों यह अपेक्षा की जाती है कि अपने सांस्कृतिक मूल्यों को छोड़कर विहित मूल्यों को अपना लें। 

10. एकीकरण नीतियों का उद्देश्य बताइए ।

Ans. एकीकरण नीतियाँ इस बात पर बल देती हैं कि सार्वजनिक संस्कृति को सामान्य राष्ट्रीय स्वरूप तक सीमित रखा जाए और ‘गैर राष्ट्रीय’ संस्कृतियों को निजी क्षेत्रों के लिए छोड़ दिया जाए। ये नीतियाँ शैली की दृष्टि से तो अलग होती हैं, परन्तु इनका उद्देश्य भिन्न नहीं होता।

11. सांस्कृतिक विविधता का दमन नुकसानदायक क्यों हो सकता है ? 

Ans. सांस्कृतिक विविधता का दमन करने से उन अल्पसंख्यक अथवा अधीनस्य समुदायो का अलगाव हो जाता है जिनकी संस्कृति को गैर- राष्ट्रीय मान लिया जाता है। इसके अलावा दमनकारी कार्य सामुदायिक पठवान को और गहरा बनाने का विपरीत प्रभाव उत्पन्न करता है। 


लघु उत्तरीय प्रश्न (SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. ‘सामुदायिक पहचान’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए। यह पहचान किसी व्यक्ति-विशे के लिए क्यों आवश्यक हैं ?

Ans. सामुदायिक पहचान का अर्थ उस पहचान से होता है जिसके द्वारा किसी भी व्यक्ति को समुदाय में एक अलग पहचान मिलती है। इन्हीं पहचान के तौर पर किसी व्यक्ति विशेष को समाज में एक अलग नजरिया से देखा जाता है। इन पहचानों के आधार पर ही पता चलता है। 

कि किसी व्यक्ति का संबंध किस जाति या समुदाय से है। ये पहचान जन्म से ही निर्धारित होती हैं व किसी व्यक्ति को उसके परिवार से मिलती हैं। संबंधित व्यक्तियों की पसंद व नापसंद इसने शामिल नहीं होती। सामुदायिक पहचान संबंधित व्यक्तियों के लिए इसलिए आवश्यक हैं, क्योंकि इन समुदायों से संबंधित व्यक्ति सुरक्षित एवं संतुष्ट महसूस करते हैं। 

इन समुदायों से संबंधित होने के लिए व्यक्ति विशेष को किसी योग्यता या कौशल की आवश्यकता नहीं होती। हमारा समुदाय हमें भाषा और सांस्कृतिक मूल्य प्रदान करता है जिनके माध्यम से हम स्वयं की पहचान को सहारा देते हैं। प्रदत्त पहचान इतनी पक्की होती हैं कि इन्हें बदला नहीं जा सकता। ये सर्वव्यापी होती हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपनी पहचान के प्रति प्रतिबद्ध एवं वफादार होते हैं।

2. एकीकरण का अर्थ स्पष्ट कीजिए। इन नीतियों को बढ़ावा देने वाली नीतियों क उद्देश्य बताइए। 

Ans. एकीकरण-सांस्कृतिक जुड़ाव या समेकन की एक प्रक्रिया जिसके द्वारा सांस्कृतिक विभेद निजी क्षेत्र में चले जाते हैं और एक सामान्य सार्वजनिक संस्कृति सभी समूहों द्वारा अपन ली जाती है। इस प्रक्रिया के अन्तर्गत प्रबल या प्रभावशाली समूह की संस्कृति को ही आधिकारिbके रूप में अपनाया जाता है। 

सांस्कृतिक अंतरों, विभेदों या विशिष्टताओं की अभिव्यक्ति प्रोत्साहित नहीं किया जाता। कभी-कभी सार्वजनिक क्षेत्र में ऐसी अभिव्यक्ति पर रोक लगा दी जाती है। एकीकरण नीतियाँ इस बात पर बल देती हैं कि सार्वजनिक संस्कृति को सामान्य राष्ट्रीय स्वरूप तक सीमित रखा जाए और गैर- राष्ट्रीय संस्कृतियों को निजी क्षेत्रों के लिए छोड़ जाए ये नीतियों शैली की दृष्टि से अलग होती है, परन्तु इनका उद्देश्य समान होता है। 

एकीकरण की नीतियाँ केवल एक अकेली राष्ट्रीय पहचान बनाए रखना चाहती है जिसके लिए है सार्वजनिक तथा राजनीतिक कार्यों से नृजातीय राष्ट्रीय और सांस्कृतिक विभिन्नताओं को दूर करने का प्रयत्न करती हैं।

3. सामुदायिक संबंधों में कौन-कौन शामिल होते हैं ? प्रदत्त पहचानें किसी व्यक्ति-विशेष के लिए क्या विशेषताएँ रखती हैं ? 

Ans. सामुदायिक संबंधों के बढ़ते हुए दायरे ही हमारी पहचान को सार्थकता प्रदान करते हैं। इन सामुदायिक संबंधों में नातेदारी, परिवार, भाषा, धर्म, जाति इत्यादि आते हैं। यही कारण है कि व्यक्ति अपनी सामुदायिक पहचान के लिए हिंसात्मक प्रवृत्ति को भी अपना लेते हैं। 

प्रत्येक व्यक्ति को एक मातृभूमि व मातृभाषा होती है व हम सब अपनी-अपनी पहचानों के प्रति प्रतिबद्ध एवं वफादार होते हैं। परन्तु शायद कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो अपनी पहचान के लिए विशेष रूप से प्रतिबद्ध न हो। परन्तु अपनी पहचान के प्रति आत्मसमर्पण की भावना प्रत्येक व्यक्ति में होती है। 

यही कारण है कि यदि कोई युद्ध छिड़ जाता है तो एक पक्ष के लोग अपने ही पक्ष के साथियों के गुणों का बखान करते हैं व दूसरे पक्ष का विरोध। यदि दो राष्ट्रों के बीच युद्ध विड़ जाए तो देशभक्त लोग विरोधी राष्ट्र को ही आक्रमणकारी शत्रु मानते हैं। इन प्रदत्त पहचानों

के कारण ही अधिकांश लोग अपने ही पक्षों का आदर व गुणों का बखान करते हैं। 

4. आत्मसातीकरणवादी और एकीकरणवादी रणनीतियों किन-किन उपायों द्वारा एकल राष्ट्रीय पहचान स्थापित करने की कोशिश करती हैं ? किन्हीं चार उपायों का उल्लेख कीजिए ।

Ans. ये रणनीतियाँ विभिन्न उपायों द्वारा एकल राष्ट्रीय पहचान स्थापित करती हैं जो इस प्रकार हैं- 

(i) संपूर्ण शक्ति को ऐसे मंचों में केंद्रित करना जहाँ प्रभावशाली समूह बहुसंख्यक हो और स्थानीय या अल्पसंख्यक समूहों की स्वायत्तता को मिटाना ।

(i) प्रभावशाली समूह की परम्पराओं पर आधारित एक एकीकृत कानून एवं न्याय व्यवस्था कोना और अन्य समूहों द्वारा प्रयुक्त वैकल्पिक व्यवस्थाओं को खत्म कर देना।

(iii) प्रभावशाली समूह की भाषा और संस्कृति को राष्ट्रीय संस्थाओं के जरिए, जिनमें राज्य निमंत्रित जनसंपर्क के माध्यम और शैक्षिक संस्थाएँ शामिल हैं, बढ़ावा देना। 

(iv) प्रभावशाली समूह के इतिहास, शूरवीरों और संस्कृति को सम्मान प्रदान करने वाले राज्य प्रतीकों को अपनाना, राष्ट्रीय पर्व, छुट्टी या सड़कों आदि के नाम निर्धारित करते समय भी इन बातों का ध्यान रखना।

5. राष्ट्र एवं राष्ट्र राज्य को परिभाषित कीजिए ।

Ans. राष्ट्र- एक ऐसा समुदाय जो अपने आपको समुदाय मानता है और अनेक साझा विशिष्टताओं, जैसे- साझी भाषा, भौगोलिक स्थिति, इतिहास, धर्म, प्रजाति, संजाति, राजनीतिक आकांक्षाओं पर आधारित होता है। किन्तु राष्ट्रो ऐसी एक या अधिक विशिष्टताओं के बिना भी अस्तित्व में रह सकते हैं। 

एक राष्ट्र उन लोगों से मिलकर बना होता है जो उस राष्ट्र के अस्तित्व, सार्थकता और शक्ति के स्रोत होते हैं। राष्ट्र राज्य- एक विशेष प्रकार का राज्य, जो आधुनिक जगत् की विशेषता है जिसमें एक सरकार की एक निर्धारित भौगोलिक क्षेत्र पर संप्रभु शक्ति होती है और वहाँ रहने वाले लोग उसके नागरिक कहलाते हैं, जो स्वयं को उस एकल राष्ट्र का हिस्सा मानते हैं। 

राष्ट्रीयता के प्रारम्भ से ही राष्ट्र राज्य घनिष्ठता से जुड़े हुए हैं। राष्ट्रवादी निष्ठाएँ हमेशा उनके विशिष्ट राज् की परिसीमाओं के अनुरूप नहीं होती राष्ट्र राज्यों काम विकास प्रारम्भ में यूरोप में शुरू राष्ट्र-राज्य प्रणाली के अन्तर्गत हुआ था, लेकिन आज राष्ट्र-राज्य संपूर्ण भूमंडल में पाए जा हैं। इनका अत्यधिक विकास हुआ है ।

6. क्षेत्रवाद से क्या अभिप्राय है ? वर्णित कीजिए । 

Ans. क्षेत्रवाद-एक खास क्षेत्रीय पहचान के लिए प्रतिबद्ध विचारधारा, जो भौगोलिक क्षेत्र के अलावा, भाषा, सजातीयता आदि अन्य विशेषताओं पर आधारित होती है। भारत में क्षेत्रवाद के पाए जाने के कारण काफी साधारण हैं। यह भारत की भाषाओं, संस्कृतियों और धर्मों के विविधता के कारण पाया जाता है। इन विभिन्न क्षेत्रों को भौगोलिक संकेंद्रण के कारण भी काफी प्रोत्साहन दिया जाता है। 

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारतीय राज्यों ने ब्रिटिश व्यवस्था को अपनाए रखा जिसके अन्तर्गत भारत बड़े-बड़े प्रांतों में बँटा हुआ था। इन बड़े-बड़े प्रांतों को प्रेसीडेंसी कहा जाता था जिनमें कलकत्ता, बम्बई, मद्रास जैसे तीन शहरों के नाम थे। 

यह बड़े-बड़े प्रांतीय राज्य थे। पुराना बम्बई राज्य मराठी, गुजराती, कन्नड़ एवं कोंकणी बोलने वाले लोगों का बहुभाषी राज्य था। मद्रास राज्य तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम बोलने वाले लोगों का बहुभाषी राज्य था। क्षेत्रीय तथा जनजातीय पहचान ने भाषा के साथ मिलकर भारत में नृजातीय-राष्ट्रीय पहचान बनाने के लिए एक अत्यन्त सशक्त साधन का काम किया है। 

2000 में बने तीन नए राज्यों जैसे-झारखण्ड, उत्तरांचल और छत्तीसगढ़ के निर्माण में क्षेत्रीय वचन और नृजातीयता ने मिलकर इन राज्यों की स्थापना में काफी सहयोग दिया।

7. “राज्य निर्माण के लिए क्षेत्रीय भावनाएँ ही पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि इसके लिए एक संस्थागत ढाँचे की भी आवश्यकता है ।” वर्णन कीजिए। 

Ans. क्षेत्रीय भावनाओं को आदर देना मात्र ही राज्य निर्माण के लिए पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसके लिए एक ऐसा संस्थागत ढाँचा होना भी जरूरी है जो यह निर्धारित कर सके कि वह एक बड़े संघीय ढाँचे के अंतर्गत एक स्वायत्त इकाई के रूप में में चल सकता है। भारत में इन कार्यों को राज्यों तथा केन्द्रों की शक्तियों को परिभाषित करने वाले संवैधानिक उपबंधों द्वारा किया गया है। 

राज्य विधानमंडल संसद के ऊपरी सदन के द्वारा ही राज्यसभा का गठन किया जाता है। भारत के संविधान में शासन संबंधी कार्यों की सूची की जिम्मेदारी राज्य या केन्द्र की होती हैं। इसके बारे में राज्य और केंद्र दोनों ही कार्य कर सकते हैं। 

इसके अलावा कुछ आवधिक समितियाँ और आयोग हैं जो केन्द्र राज्य संबंधों को निश्चित करते हैं। प्रत्येक पंचवर्षीय योजनाओं को बनाने में भी राज्यों की योजनाएँ शामिल होती हैं जो हर राज्य के राज्य योजना आयोगों द्वारा तैयार की जाती है। इस प्रकार संघीय प्रणाली काफी सुनिश्चित ढंग से चलती है। 

8. उदारीकरण के युग से अंतरक्षेत्रीय आर्थिक असमानताएँ विद्वानों के लिए चिंता का विषय क्यों है ? कारण सहित बताइए।

Ans. भारत की संघीय प्रणाली काफी सुचारु रूप से चल रही है, परन्तु इसमें भी कई विवादास्पद मुद्दे पाए जाते हैं। यह तर्क उचित है कि उदारीकरण के युग से ही, बढ़ती हुई अंतर-क्षेत्रीय आर्थिक एवं आधारभूत ढाँचे से संबंधित असमानताएँ नीति-निर्माताओं व विद्वानों के लिए चिंता का विषय बनी हुई हैं। इसके कई कारण हो सकते हैं-

(i) आर्थिक विकास में निजी पूँजी निवेश को अत्यधिक भूमिका सौंपी गई है। इसी कारण क्षेत्रीय समदृष्टि तत्वों को काफी कम महत्त्व मिला है। 

(ii) निजी निवेशकर्ता ऐसे विकसित राज्यों में पूँजी लगाना चाहते हैं जहाँ एक आधारभूत ढाँचा हो तथा अन्य सुविधाएँ भी बेहतर हों।

9. अल्पसंख्यक समूहों की धारणा का समाजशास्त्र में व्यापक रूप से प्रयोग किया जाता है, कैसे ? अल्पसंख्यक लोगों को वर्णित कीजिए ।

Ans. अल्पसंख्यक समूहों की धारणा का समाजशास्त्र में व्यापक रूप से प्रयोग किया जाता है। इसमें आमतौर पर असुविधा या हानि का भाव होता है। ‘अल्पसंख्यक’ शब्द का प्रयोग विशेषक के बिना किए जाने से इसका अभिप्राय छोटे व सुविधा-वंचित समूहों से होता है। 

विशेषाधिकार प्राप्त अल्पसंख्यक, जैसे- अत्यंत धनवान व्यक्ति को अल्पसंख्यक नहीं कहा जा सकता। यदि इनका उल्लेख करना हो तो इनके साथ विशेषक जोड़ दिया जाता है, जैसे- ‘विशेषाधिकार प्राप्त अल्पसंख्यक’। इस शब्द का समाजशास्त्रीय भाव यह भी है कि अल्पसंख्यक वर्ग के सदस्य एक सामूहिकता का निर्माण करते हैं। 

उनमें अपने समूह के प्रति एकात्मता, एकजुटता और उससे संबंधित होने का प्रबल भाव होता है। यह भाव समूह के प्रति दिलचस्पी और निष्ठा की भावनाओं को बढ़ा देता है व हानि तथा असुविधा से जुड़ा होता है। इसलिए जो समूह सांख्यिकीय दृष्टि से अल्पसंख्यक हो समाजशास्त्रीय अर्थों में अल्पसंख्यक नहीं कहलाते। 

परन्तु कुछ अल्पसंख्यक समूह ऐसे भी होते हैं जिन्हें एक अर्थ में तो सुविधा वंचित कहा जा सकता है, परन्तु अन्य अर्थो में नहीं। जैसे- पारसियों या सिखों जैसे धार्मिक अल्पसंख्यक वर्ग आर्थिक दृष्टि से अपेक्षाकृत संपन्न हो सकते हैं, परन्तु सांस्कृतिक अर्थ में सुविधावंचित हो सकते हैं। इसका कारण है कि हिन्दुओं की विशाल जनसंख्या में उनकी संख्या काफी कम है।

10. अल्पसंख्यकों एवं सांस्कृतिक विविधता पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 29 व 30 का उल्लेख कीजिए । 

Ans. अनुच्छेद 29-

(i) भारत के राज्यक्षेत्र या उसके किसी भाग के निवासी नागरिक के किसी अनुभाव को, जिसकी अपनी विशेष भाषा, लिपि या संस्कृति है, उसे बनाए रखने का अधिकार होगा। 

(ii) राज्य द्वारा पोषित या राज्य निधि से सहायता पाने वाली किसी शिक्षा संस्था में प्रवेश से किसी भी नागरिक को केवल धर्म, मूलवंश, जाति, भाषा या इनमें से किसी के आधार पर वंचित नहीं किया जाएगा। अनुच्छेद 300-

(iii) धर्म या भाषा पर आधारित सभी अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी रुचि की शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन का अधिकार होगा। 

(iv) शिक्षा संस्थाओं को सहायता देने में राज्य किसी शिक्षा संस्था के विरुद्ध इस आधार पर विभेद नहीं करेगा कि वह धर्म या भाषा पर आधारित किसी अल्पसंख्यक वर्ग के प्रबंध में है।


दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (LONG ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. ‘सामुदायिक पहचान को वर्णित कीजिए। इससे समाज पर क्या प्रभाव पड़ता है ?

Or, ‘सामुदायिक पहचान’ का महत्त्व बताइए व इसे वर्णित कीजिए।

Ans. विश्व में प्रत्येक व्यक्ति को अपना अस्तित्व बनाने के लिए एक स्थायी पहचान की आवश्यकता होती है। यह पहचान उसे समुदाय से या उसके परिवार, जाति आदि से प्राप्त होती है। इसे ही सामुदायिक पहचान कहते हैं। अर्थात् वह पहचान जो किसी योग्यता के आधार पर आधारित नहीं होती। 

यह पहचानें जन्म से ही संबंधित होती हैं। इस प्रकार की पहचानें ‘प्रदत्त’ होती हैं अर्थात् जन्म से निर्धारित। इसमें व्यक्तियों की पसंद या नापसंद शामिल नहीं होती। हम सारे परिवारों या धार्मिक अथवा क्षेत्रीय समुदाय की सदस्यता के लिए कोई शर्त नहीं होती। 

कुछ प्रदत्त पहचानें इतनी पक्की होती हैं कि उन्हें ठुकराया नहीं जा सकता चाहे ही कोई व्यक्ति उन्हें अस्वीकार करें। क्योंकि इनहीं सामुदायिक पहचानों के द्वारा ही व्यक्ति विशेष को समाज में जाना जाता है। सामुदायिक संबंधों, जैसे- धर्म, जाति, भाषा, नृजातीयता के बढ़ते दायरे ही हमारी दुनिया को सार्थकता प्रदान करते हैं और हमें एक पहचान देते हैं।

प्रदत्त पहचानों की विशेषता यह होती है कि ये सर्वव्यापी होती है। प्रत्येक व्यक्ति की एक मातृभाषा व मातृभूमि होती है व प्रत्येक व्यक्ति अपनी पहचान के प्रति समान रूप से प्रतिबद्ध एवं वफादार होता है। यह प्रतिबद्धता लगभग अधिकांश लोगों में पाई जाती है। 

इन्हीं पहचानों को लेकर झगड़े होते हैं और इन झगड़ों या विवादों को निपटाना बहुत कठिन होता है। इन झगड़ों में प्रत्येक पक्ष दूसरे पक्ष को यात्रुला या घृणा की दृष्टि से देखता है। उसमें अपने पक्ष के गुण को और विरोधी पक्ष के दुर्गुणों को बढ़ा-चढ़ाकर कहने की प्रवृत्ति होती है। प्रत्येक राष्ट्र के देशभक्त लोग विरोधी राष्ट्र को आक्रमणकारी शत्रु मानते हैं। 

कोई भी देश या समूह अपने नागरिकों या सदस्यों को असत्य, अन्याय अथवा असमानता के लिए संघर्ष करने को प्रोत्साहित नहीं करता अर्थात् प्रत्येक देश या समूह हमेशा सत्य, न्याय और समानता के लिए ही लड़ता है। इसलिए पहचान के आधार पर हुए दंगे काफी भयानक रूप भी ले लेते हैं। पहचान द्वंद्व या विवाद की स्थिति में परस्पर सम्मत सच्चाई के किसी भाव को स्थापित करना बहुत कठिन होता है।

अत: यह कहा जा सकता है कि सामुदायिक पहचाने व्यक्ति विशेष के लिए महत्त्वपूर्ण होती है और प्रत्येक व्यक्ति अपनी सामुदायिक पहचान के अस्तित्व को बनाए रखना चाहता है। वह इस अस्तित्व को बनाए रखने के लिए झगड़ों व विवादों से उलझने से भी नहीं घबराता । 

2. समुदाय, राष्ट्र एवं राष्ट्र-राज्यों का वर्णन कीजिए ।

Ans. समुदाय – किसी भी ऐसे समूह के लिए प्रयुक्त सामान्य शब्द, जिसके सदस्य सचेतन रूप से मान्यता प्राप्त समानताओं और नातेदारी के बंधनों, भाषा, संस्कृति आदि के कारण आपस में जुड़े हों। इन समानताओं में विश्वास उनके अस्तित्व के वास्तविक प्रमाण से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण होता है।

 राष्ट्र एक तरह का समुदाय होता है। राष्ट्र-यह एक ऐसा समुदाय है जो अपने आपको एक समुदाय मानता है और अनेक साझा विशिष्टताओं, जैसे- साझी भाषा, भौगोलिक स्थिति, धर्म, इतिहास, प्रजाति, सजाति, राजनीतिक आकांक्षाओं आदि पर आधारित होता है। किंतु राष्ट्र ऐसी एक या अधिक विशिष्टताओं के बिना

भी अस्तित्व में रह सकते हैं। एक राष्ट्र उन लोगों से मिलकर बना होता है जो उस राष्ट्र के अस्तित्व, सार्थकता और शक्ति के स्रोत होते हैं।

राष्ट्र राज्य- एक विशेष प्रकार का राज्य, जो आधुनिक जगत की विशेषता है, जिसमें एक सरकार की निर्धारित भौगोलिक क्षेत्र पर संप्रभु शक्ति होती है और वहाँ रहने वाले लोग उसके नागरिक कहलाते हैं। जो अपने आपको उस एकल राष्ट्र का हिस्सा मानते हैं। 

राष्ट्र-राज्य राष्ट्रीयता के उदय से घनिष्ठता से जुड़े हैं, यद्यपि राष्ट्रवादी निष्ठाएँ हमेशा उनके विशिष्ट राज्यों, जो आज विद्यमान हैं, की परिसीमाओं के अनुरूप नहीं होतीं। राष्ट्र-राज्यों का विकास प्रारम्भ में यूरोप में शुरू हुई राष्ट्र-राज्य प्रणाली के अन्तर्गत हुआ था, लेकिन आज राष्ट्र-राज्य सम्पूर्ण भूमंडल में पाए जाते हैं।

‘राज्य’ शब्द का अर्थ एक ऐसा अमूर्त सत्व होता है जिसमें राजनीतिक-विधिक संस्थाओं के समुच्चय शामिल होते हैं और वह खास भौगोलिक क्षेत्र पर और उसमें रहने वाले लोगों पर नियन्त्रण रखता है। मैक्स वेबर की परिभाषा के अनुसार, “राज्य एक ऐसा निकाय होता है जो एक विशेष क्षेत्र में विधिसम्मत एकाधिकार का सफलतापूर्ण दावा करता है।”

राष्ट्र एक अनूठे किस्म का समुदाय होता है। इसे परिभाषित नहीं किया जा सकता, परन्तु कुछ अर्थों में इसका वर्णन किया जा सकता है। ऐसे अनेक विशिष्ट राष्ट्रों का वर्णन किया जा सकता है जिसकी स्थापना साझे धर्म, भाषा, नृजातीयता, इतिहास अथवा क्षेत्रीय संस्कृति जैसी साझी सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और राजनीतिक संस्थाओं के आधार पर की गई। ऐसे बहुत से राष्ट्र हैं जिनकी अपनी एक साझा या सामान्य भाषा, धर्म, नृजातीयता आदि नहीं है; जबकि ऐसी अनेक भाषाएँ, धर्म या नृजातियाँ हैं जो कई राष्ट्रों में पाई जाती है। परन्तु इससे यह निष्कर्ष

नहीं निकलता कि सभी मिलकर एक एकीकृत राष्ट्र का निर्माण करते हैं। किसी भी विशेष समुदाय के लिए यह निश्चित नहीं किया जा सकता कि वह राष्ट्र का रूप ग्रहण कर लेगा। तराष्ट्र का अंतर दर्शाने वाली सबसे नजदीकी कसौटी राज्य है। राष्ट्र ऐसे समुदाय होते हैं

3.राष्ट्र राज्य का एक विकल्प है। इस बात की पुष्टि कीजिए । लोकतंत्रों पर किया गया सर्वेक्षण क्या प्रदर्शित करता है ?

Ans. राष्ट्र राज्य का एक विकल्प है- ‘राज्य-राष्ट्र जहाँ नृजातीय, धार्मिक, भाषायी या देश पढचानों पर आधारित विभिन्न ‘राष्ट्र’ एक अकेली राज्य व्यवस्था के अंतर्गत सहयोगपूर्वक एक साथ रह सकते हैं। 

वैयक्तिक अध्ययन यह दर्शाते हैं कि बहु-सांस्कृतिक राज्यव्यवस्थाओं में स्थायी, सहनशील लोकतंत्रों की स्थापना की जा सकती है। विविध समूहों के सांस्कृतिक अपवर्जन (बहिष्कार) को खत्म करने…. और बहुविष तथा पूरक पहचानों का निर्माण करने के लिए स्पष्ट प्रयत्नों को आवश्यकता होती है। 

ऐसी प्रतिसंवेदी नीतियाँ विविधता में एकता का निर्माण करने के लिए, “हम भाव जागृत करने के लिए प्रोत्साहन देती हैं। 

नागरिक अपने देश तथा अपनी अन्य सांस्कृतिक पहचानों के साथ तादात्म्य स्थापित करने, साझी संस्थाओं में अपना विश्वास बनाने और लोकतांत्रिक राजनीति में भाग लेने तथा उसे समर्थन देने के लिए संस्थाओं तथा राजनीति में अवसर प्राप्त कर सकते हैं। ये सभी लोकतंत्रों को मजबूत और गहरा बनाने तथा सहनशील ‘राज्य राष्ट्रों’ का निर्माण करने के प्रमुख कारक हैं।

यद्यपि भारत सांस्कृतिक दृष्टि से विविधतापूर्ण राष्ट्र है। लंबे समय से चल रहे लोकतंत्रों, जिनमें भारत भी एक है, का तुलनात्मक सर्वेक्षण यह दर्शाता है कि अपनी विविधताओं के बावजूद यह एक अत्यंत सशक्त लोकतंत्र है। 

लेकिन आधुनिक भारत संपूर्ण देश पर एक अकेली हिंदू पहचान को थोपने के लिए उत्सुक समूहों के उत्थान के साथ, बहुविध एवं पूरक पहचानों को दिए गए संवैधानिक वचनों के प्रति गंभीर चुनौती का सामना कर रहा है। 

आज भारत में यह खतरे समावेश के भाव को क्षति पहुँचाते हैं और अल्पसंख्यकों के अधिकारों का उल्लंघन करते हैं। सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं से भविष्य में सामाजिक मेल-मिलाप की भावनाओं के प्रति गहरी चिंताएँ खड़ी होती हैं और देश के द्वारा पहले प्राप्त की गई उपलब्धियों को ठेस पहुँचाने

का खतरा पैदा होता है। भारत के संवैधानिक स्वरूप में भिन्न-भिन्न समूहों के दावों को मान्यता देते हुए अनुकूल प्रतिक्रिया दिखलाई है और अनेक क्षेत्रीय, भाषायी और सांस्कृतिक विविधता के बावजूद राज्य व्यवस्था को संगठित बनाए रखा है। 

इसके नागरिक देश के विविधतापूर्ण और अत्यंत स्तरबद्ध समाज के बावजूद, देश तथा लोकतंत्र के लिए गंभीरतापूर्वक प्रतिबद्ध हैं। जब भारतीय लोकतंत्र के कार्य-निष्पादन की तुलना अन्य लंबे समय से स्थापित एवं संचालित और अधिक संपन्न लोकतंत्रों से की जाती है तो भारत का कार्य-निष्पादन विशेष रूप से प्रभावोत्पादक नजर आता है।

4. क्षेत्रवाद को परिभाषित कीजिए व भारतीय संदर्भ में क्षेत्रवाद की भूमिका का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। क्षेत्रीय भावनाओं के संस्थागत ढाँचे का कार्य कैसे किया जाता है ? 

Ans. क्षेत्रवाद – एक खास क्षेत्रीय पहचान के लिए प्रतिबद्ध विचारधारा, जो भौगोलिक क्षेत्र के अलावा, भाषा, सजातीयता आदि अन्य विशेषताओं पर आधारित होती है। भारत में क्षेत्रवाद भारत की भाषाओं, जनजातियों, संस्कृतियों और धर्मों की विविधता के कारण पाया जाता है। विशेष क्षेत्रों में पहचान चिह्नों के भौगोलिक संकेंद्रण के द्वारा क्षेत्रवाद को प्रोत्साहन मिलता है। 

ब्रिटिश भारतीय व्यवस्था भारत में स्वतन्त्रता के पश्चात् भी टिकी रही। भारत बड़े-बड़े प्रांतों में, जिन्हें ‘प्रेसीडेंसी’ भी कहा जाता था, बँटा हुआ था। मद्रास, मुंबई, कलकत्ता इन प्रेसीडेंसियों के नाम थे। यह राज्य बहुत बड़े बहुनृजातीय और बहुभाषी प्रांतीय राज्य थे जो भारत संघ कहे जाने वाले अर्द्धसंघीय राज्य की बड़ी-बड़ी राजनीतिक प्रशासनिक इकाइयों के रूप में काम करते थे। 

पुराना बंबई राज्य मराठी, गुजराती, कन्नड़ एवं कोंकणी बोलने वाले लोगों का बहुभाषी राज्य था। इसी प्रकार मद्रास राज्य तमिल, तेलुगु, कन्नड़ वाले लोगों का बहुभाषी राज्य था। ब्रिटिश भारतीय सरकार द्वारा प्रत्यक्ष रूप से प्रशासित प्रेसीडेंसियों और प्रांतों के अलावा सम्पूर्ण भारत में अनेक देशी राजाओं की रियासतें थीं जिनमें मैसूर, कश्मीर और बड़ौदा के देशी राज्य थे।

भाषा ने क्षेत्रीय तथा जनजातीय पहचान के साथ मिलकर भारत में नृजातीय राष्ट्रीय पहचान बनाने के सशक्त साधन का काम किया है। परन्तु सन् 2000 में छत्तीसगढ़, उत्तरांचल, झारखंड जैसे तीन राज्यों के निर्माण में भाषा ने कोई भूमिका अदा नहीं की बल्कि इन नए राज्यों की स्थापना में जनजातीय पहचान, भाषा, क्षेत्रीय वचन पर आधारित नृजातीयता ने मिलकर आधार प्रदान किया। 

राज्य निर्माण के लिए सिर्फ क्षेत्रीय भावनाओं को आदर देना ही काफी नहीं बल्कि इसके लिए एक संस्थागत ढाँचा भी होना जरूरी है, जो यह सुनिश्चित कर सके कि राज्य एक बड़े संघीय ढाँचे के अन्तर्गत एक स्वायत्त इकाई के रूप में चल सकता है। इन कार्यों को भारत में संवैधानिक उपबंधों द्वारा किया गया है जो यह राज्यों तथा केन्द्र की शक्तियों को परिभाषित करते हैं। 

भारत के संविधान में शासन सम्बन्धी विषयों या कार्यों की सूची होती है जिनकी जिम्मेदारी राज्य या केंद्र की होती है। राज्य विधानमंडल के ऊपरी सदन, राज्यसभा के गठन को निर्धारित करते हैं।

कुछ आवधिक समितियाँ और आयोग केन्द्र-राज्य संबंधों को निश्चित करते हैं। प्रत्येक पंचवर्षीय योजनाओं में भी राज्यों की योजनाएँ शामिल होती हैं जो हर राज्य के राज्य योजना आयोगों द्वारा तैयार की जाती हैं। इस तरह संघीय प्रणाली सुचारु रूप से चलती रहती है ।


FAQs


1. भारत में विविधताओं के बारे में बताइए ।

Ans. भारत राष्ट्र-राज्य सामाजिक तथा सांस्कृतिक दृष्टि से विश्व के सर्वाधिक विविधतापूर्ण देशों में से एक है। इसकी आबादी सौ करोड़ से भी अधिक है। यहाँ कुल मिलाकर 1,632 भिन्न-भिन्न भाषाएँ और बोलियाँ बोली जाती हैं। यहाँ 80.5% आबादी हिन्दुओं की है द 13.4% आबादी मुसलमानों की है। इसके अतिरिक्त यहाँ सिख, बौद्ध, ईसाई और जैन इत्यादि जैसे धर्मो के लोग भी रहते हैं।

2. भारत में क्षेत्रवाद के कारण बताइए। विभिन्न क्षेत्रों की भावुकताओं को कैसे समायोजित किया जाता है ?

Ans. भारत में क्षेत्रवाद भारत की भाषाओं, संस्कृतियों और धर्मों की विविधता के कारण पाया जाता है। इन क्षेत्रों को भौगोलिक संकेंद्रण के कारण भी काफी प्रोत्साहन दिया जाता है। भारतीय संघवाद इन क्षेत्रीय भावुकताओं को समायोजित करने वाला साधन है।

3. ‘प्रेसीडेंसी’ किसे कहा जाता है ? किन्हीं तीन प्रेसीडेंसियों के नाम बताइए । 

Ans. भारत में बड़े-बड़े प्रांतों को प्रेसीडेंसी कहा जाता है। तीन प्रेसीडेंसियाँ हैं :
(i) मद्रास (ii) बम्बई (iii) कलकत्ता।

4. क्षेत्रवाद का अर्थ समझाइए ।

Ans. एक खास क्षेत्रीय पहचान के लिए प्रतिबद्ध विचारधारा, जो भौगोलिक क्षेत्र के भाषा, सजातीयता आदि अन्य विशेषताओं पर आधारित होती है। 

5. उन विभिन्न प्रेसीडेंसियों के नाम बताइए जो बहुभाषी राज्य थे ।

Ans. बंबई – मराठी, गुजराती, कोंकणी एवं कन्नड़, तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम ।

NOTES & QUESTIONS ANSWER


  1. Introducing Indian Society
  2. The Demographic Structure of the Indian Society
  3. Social Institutions: Continuity and Change
  4. The Market as a Social Institution
  5. Patterns of Social Inequality and Exclusion
  6. The Challenges of Cultural Diversity
  7. suggestions for projects work
  1. Structural Change
  2. Cultural Change
  3. The Story of Indian Democracy
  4. Change and Development in Rural Society
  5. Change and Development in Industrial Society
  6. Globalisation and Social Change
  7. Mass Media and Communications
  8. Social Movements

MCQS IN ENGLISH


  1. Introducing Indian Society
  2. The Demographic Structure of the Indian Society
  3. Social Institutions: Continuity and Change
  4. The Market as a Social Institution
  5. Patterns of Social Inequality and Exclusion
  6. The Challenges of Cultural Diversity
  1. Structural Change
  2. Cultural Change
  3. The Story of Indian Democracy
  4. Change and Development in Rural Society
  5. Change and Development in Industrial Society
  6. Globalisation and Social Change
  7. Mass Media and Communications
  8. Social Movements

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