NCERT Class 12 Sociology-II Chapter 4 Notes In Hindi ग्रामीण समाज में विकास एवं परिवर्तन Easy pdf

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NCERT Class 12 Sociology-II Chapter 4 Notes In Hindi ग्रामीण समाज में विकास एवं परिवर्तन

Class12th 
Chapter Nameग्रामीण समाज में विकास एवं परिवर्तन
Chapter numberChapter 4
PART B
Book NCERT
SubjectSociology
Medium Hindi
Study MaterialsNotes & Questions answer
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ग्रामीण समाज में विकास एवं परिवर्तन


भारतीय समाज प्राथमिक रूप से ग्रामीण समाज ही है। हालांकि यहां नगरीकरण बढ़ रहा है। भारत के बहुसंख्यक लोग गाँव के ही रहते हैं। वर्तमान समय में लगभग 65% लोग कृषि कार्य ई लगे हुए हैं। उनका जीवन कृषि अथवा उससे संबंधित व्यवसायों से चलता है। इसका अर्थ दह हुआ कि बहुत से भारतीयों के लिए भूमि उत्पादन का एक महत्त्पूर्ण साधन है। 


NCERT Class 12 Sociology-II Chapter 4 Notes In Hindi ग्रामीण समाज में विकास एवं परिवर्तन

भूमि सम्पत्ति का एक महत्त्वपूर्ण प्रकार भी हैं, लेकिन भूमि न तो केवल उत्पादन का सायन है और न ही केवल सम्पत्ति का एक प्रकार न ही केवल कृषि है जो कि उनके जीविका का एक प्रकार है। यह जीने का एक तरीका भी है। हमारी बहुत-सी सांस्कृतिक रस्मों और उनकी प्रकार में कृषि की पृष्ठभूमि होती है।

कृषि एवं संस्कृति के बीच एक घनिष्ठ संबंध है। हमारे देश में कृषि की प्रकृति और अभ्यास प्रत्येक क्षेत्र में भिन्न-भिन्न तरह का मिलेगा। वे भिन्नताएँ क्षेत्रीय संस्कृतियों में बिंबित होती हैं। 

आप कह सकते हैं कि ग्रामीण भारत की सांस्कृतिक और सामाजिक संरचना दोनों कृषि और कृषिक (एगरेरियन) जीवन पद्धति से बहुत निकटता से जुड़ी हुई है। अधिकतम ग्रामीण जनसंख्या के लिए कृषि जीविका का एकमात्र महत्त्वपूर्ण स्रोत या सावन है। लेकिन गाँवों में सिर्फ कृपे नहीं है। 

बहुत से ऐसे क्रियाकलाप हैं जो कृषि और ग्राम्य जीवन की मदद के लिए हैं और वे ग्रामीण भारत में लोगों के जीविका के स्रोत हैं। उदाहरण के लिए बहुत से ऐसे कारीगर या दस्तकार जैसे कुम्हार, तांती, जुलाहे एवं सुनार भी ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं। वे ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक हिस्सा और खण्ड है।

एक समाज का मुख्य उद्देश्य अपने सदस्यों को भोजन के उत्पादन व वितरण का सही प्रबंध करना है। आर्थिक उत्पादन समाज का मौलिक कर्त्तव्य है जो कि सामाजिक ढाँचे को निर्धारित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भारत का आर्थिक विकास कृषि विकास पर निर्भर है। 

आर्थिक पिछड़ापन तथा ग्रामीण असंतोष जैसे सभी मुद्दे भूमि के साथ जुड़े हुए हैं। भूमि संबंधों में परिवर्तन सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन का महत्त्वपूर्ण संकेतक है। भारत में भूमि सुधार शब्द का प्रयोग दो अर्थों में किया जाता है। भूमि सुधार का अर्थ. छोटे किसानों और भूमिहीनों के लाभ के लिए जमीन के अधिकारों का पुनर्वितरण है। 

भूमि सुधार की यह अवधारणा उसके सरलतम तत्त्व को प्रकट करती है। व्यापक अर्थ में भूमि की व्यवस्था में संबंधित संस्थाओं और कृषि संगठन में किसी भी प्रकार के सुधार को भूमि सुधार कहा जाता है। भूमि सुधार में जमीन का पुनर्वितरण, कृषि की स्थिति में सुधार आदि सम्मिलित हैं।



भारत में भूमि सुधार के पीछे सामाजिक न्याय और आर्थिक समानता की भावना हमेशा से रही है। समानता और सामाजिक न्याय की विचारधारा भूमि सुधार तथा निर्धनता उन्मूलन जैसे कार्यक्रमों में प्रकट की गई है। अंग्रेजी शासनकाल में जमींदारी व्यवस्था लागू की गई थी। यह प्रथा औपनिवेशिक शोषण की प्रतीक थी। 

भूमि सुधार कार्यक्रम के प्रथम चरण में कानून बनाकर जमींदारी प्रथा का उन्मूलन किया गया। भूमि सुधार कार्यक्रम जमीन की उत्पादकता बढ़ाने का माध्यम माना जाता है। अतः कृषि प्रधान देशों में आर्थिक विकास के लिए इसे एक मुख्य मुद्दा के रूप में स्वीकार किया गया है। यह कृषि विकास का एक प्रमुख कार्यक्रम बन गया है। 

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जनता की गरीबी तथा जमींदारों और सूदखोरों द्वारा किसानों के अत्यधिक शोषण ने राजनीतिक नेताओं का ध्यान अपनी ओर खींचा। सन् 1936 में पंडित नेहरू ने कांग्रेस के अधिवेशन में बिचौलियों का निष्कासन और उसके पश्चात् सहकारी जयवा सामूहिक ‘खेती’ की बात उठाई थी। 

सन् 1936 में लखनऊ में अखिल भारतीय किसान सभा ने जमींदारो उन्मूलन, रैयतों का दखल अधिकार, भूमिहीन मजदूरों के बीच परती भूमि के पुनर्वितरण आदि मांगों को उठाया।

सन् 1920-1946 के बीच अनेक किसान संगठन बने। किसान आंदोलनों के सकारात्मक परिणाम निकले। स्वतंत्रता के पश्चात् कृषि के आधुनिकीकरण तथा कृषि अर्थव्यवस्था में व्याप्त असमानताओं को घटाने की दृष्टि से भूमि सुधार कार्यक्रम आरंभ किए गए जिनका उद्देश्य था राज्य एवं जमीन जोतने वाले के बीच सभी प्रकार के मध्यस्थों का उन्मूलन करना।

किसानों द्वारा खेती की जाने वाली जमीन पर उनको स्वामित्व का अधिकार प्रदान करना, खेतों की जोत की सीमा का निर्धारण करना, कृषि में आधुनिक तकनीक को सुलभ बनाना और खेतों की चकबंदी करना, भूमि संबंधी रिकार्ड को तर्कसंगत बनाना। भूमि सुधार कार्यक्रम के अंतर्गत अनेक कार्य किए गए।

भारत में छठे दशक के अंत में खाद्यान्नों के उत्पादन में आधारभूत अंतर और आश्चर्यजनक गति से होने वाली वृद्धि को हरित क्रांति का नाम दिया गया। ‘हरित’ शब्द का ग्रामीण क्षेत्रों के हरे-भरे खेतों के लिए प्रयोग किया गया और ‘क्रांति’ शब्द व्यापक परिवर्तन को व्यक्त करता है। प्रथम पंचवर्षीय योजना में खायान्नों के उत्पादन को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई थी। 

छठे दशक के प्रारंभ में कृषि विकास की प्रक्रिया को तेज करने के लिए एक नई रणनीति बनाई गई। कृषि में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का व्यापक प्रयोग खाद्यान्नों के उत्पादन में प्रचुर मात्रा में वृद्धि के रूप में फलदायी हो सकता है। प्रारंभ में देश में सात जिलों में एक पैकेज कार्यक्रम प्रारंभ किया गया। बाद में इसे कुछ अन्य जिलो में भी प्रारंभ कर दिया गया। 

खाद्यान्नों के उत्पादन में वृद्धि हुई। बाद में इसे गहन कृषि कार्यक्रम के नाम से प्रारंभ किया गया। उर्वरकों, कीटनाशक, औषधियों, संस्थागत ऋण और विस्तृत सिंचाई सुविधाओं की आपूर्ति के साथ नये बीजों के प्रयोग से सन् 1977-78 में गेहूँ का उत्पादन दुगुना हो गया। चावल का उत्पादन भी बढ़ा। वर्ष 2007- 2008 में खाद्यान्नों का कुल उत्पादन 70 करोड़ 34 लाख टन रहा।

sociology class 12 chapter 4 questions and answers


अति लघु उत्तरीय प्रश्न (VERY SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. “भारत का आर्थिक विकास कृषि विकास पर निर्भर है।” स्पष्ट कीजिए। 

Ans. भारत गाँवों का देश है। इसमें 6 लाख से अधिक गाँव हैं। लोगों का मुख्य आर्थिक कार्य कृषि है। कृषि गाँवों में लोगों का मुख्य व्यवसाय है। 100 करोड़ से अधिक लोगों को बाह सामग्री खेती से प्राप्त होती है। अतः हम कह सकते हैं कि भारत का आर्थिक विकास मूलतः कृषि विकास पर निर्भर करता है।

2. भूमि सुधार से क्या अभिप्राय है ?

Ans. भूमि व्यवस्था में संबंधित संस्थाओं और कृषि संगठन में किसी भी सुधार को भूमि सुधार कहते हैं। भूमि सुधार की अवधारणा से स्पष्ट है कि भूमि सुधार को जमीन के पुनर्वितरण क ही सीमित नहीं रखना चाहिए बल्कि कृषि में सुधार के उपायों को भी उसमें शामिल करना चाहिए।

3. भारत में भूमि सुधार के उद्देश्य बताइए। 

Ans. (i) समानतावादी कृषि संबंधों की स्थापना।

(ii) भूमि संबंधों में शोषण को समाप्त करना ।

(iii) काश्तकारों को जमीन उपलब्ध कराना। (iv) गाँव के गरीब लोगों के भू-धारण अधिकार को बढ़ावा।

(v) कृषि उत्पादन में वृद्धि करना।

(vi) कृषि अर्थव्यवस्था का विविधीकरण करना।

(vii) कृषि क्षेत्र से विचौलियों का उन्मूलन करना। 

4. जमींदारी प्रथा से क्या अभिप्राय है ?

Ans. लार्ड कार्नवालिस ने भारत में जमींदारी प्रथा आरंभ की। भू-राजस्व वसूल करने इसे अधिकारियों का पद बढ़ाकर उन्हें भू-स्वामी या जमींदार बना दिया गया। ये जमींदार सरकार को निश्चित मालगुजारी जमा करते थे और कृषकों का शोषण करते थे। वे अधिक लगान वसूल करते थे, परंतु भूमि सुधार के लिए कोई कार्य नहीं करते थे। 

5. महालवाड़ी प्रथा से आप क्या समझते हैं ?

Ans. इसमें ग्रामीण समुदाय का भूमि पर संयुक्त स्वामित्व होता था और गाँव के सभी सदस्य संयुक्त रूप से लगान चुकाने के लिए उत्तरदायी रहते थे।

6. रयतवाड़ी प्रथा से क्या अभिप्राय है ?

Ans. लार्ड विलियम बेंटिक ने रैयतवाड़ी प्रथा चलाई। इसमें रैयत भूमिचारी जोतदार या कृषक थे। इनका सीधा संबंध ब्रिटिश सरकार के साथ था। पहला रैयतवाड़ी बंदोबस्त सन् 1792 में मद्रास में लागू हुआ। इसमें रैयतों को जमीनों के अनुपात में निर्धारित किराया या लगान सीधे सरकार को देना पड़ता था।

7. स्वतंत्रता के पश्चात् भूमि सुधार कार्यक्रमों का उल्लेख कीजिए । 

Ans. 

(i) जमींदारी प्रथा समाप्त कर विधीलियों का उन्मूलन करना। 

(ii) काश्तकारी सुधार जिसमें नियमित मजदूरी, काश्तकारी सुरक्षा, काश्तकारों को भूमि खरीदने का अधिकार आदि।

(iii) कृषि भूमि की उच्चतम सीमा का निर्धारण करना। (iv) जोत की चकबंदी करना।

(v) भू-अभिलेखों का नवीनीकरण और आधुनिकीकरण करना। 

8. हरित क्रांति से क्या अभिप्राय है ?

Ans. सामान्य तौर पर हरित क्रांति का अभिप्राय कृषि व्यवसाय में क्रांतिकारी नीतियों द्वारा सर्वांगीण विकास से है और इसका अंतिम लक्ष्य कृषि फसलों का अधिकतम उत्पादन होता है। हरित क्रांति कृषि व्यवसाय में अधिक-से-अधिक और अच्छा अन्य उपजाने का एक प्रभाव आंदोलन है।

9. हरित क्रांति के तत्वों का उल्लेख कीजिए। 

Ans. (i) अधिक उपज देने वाले बीजों का प्रयोग। CDE खाद का प्रयोग।

(iii) कृषि में आधुनिक उपकरण व संयंत्रों का प्रयोग।

(iv) कीटनाशकों का प्रयोग। 

(v) सिंचाई की व्यवस्था।

(vi) कृषि मूल्य का निर्धारण और कृषि ऋण व्यवस्था । 

10. हरित क्रांति के क्या परिणाम हैं ?

Ans. आज हरित क्रांति केवल खाद्यान्न आंदोलन ही नहीं है बल्कि ग्रामीण, आर्थिक, सामाजिक उत्थान की क्रांति है। हरित क्रांति से-

(i) किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार आया है। 

(ii) बहुत-से किसान गरीबी की रेखा से ऊपर उठे हैं।

(iii) रोजगार में वृद्धि हुई है। 

(iv) पनी और निर्वन किसानों की आर्थिक स्थिति में अंतर आ गया है।

(v) पूँजीपति किसानों का एक नया वर्ग उत्पन्न हो गया है। 

(vi) गेहूं और चावल के उत्पादन में वृद्धि हुई है।


लघु उत्तरीय प्रश्न (SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. भारत में भूमि सुधार के उद्देश्य क्या हैं ? 

Ans. भूमि सुधार के सामान्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं-

1. सामाजिक तथा आर्थिक समानता-भूमि सुधार के पीछे सामाजिक न्याय तथा आर्थिक समानता की भावना हमेशा से रही है। भेदभाव और गरीबी को समाप्त करना भी आवश्यक है। अतः भूमि सुधार का उद्देश्य समानता और सामाजिक न्याय लाना तथा निर्धनता दूर करना है। 

2. मध्यस्थों की समाप्ति-संसार के अधिकतर देशों ने दूसरे विश्वयुद्ध के पश्चात् स्वतंत्रता प्राप्त की। औपनिवेशिक काल में विदेशियों के स्वामित्व में भूसंपत्ति का स्वामित्व कुछ गिने-चुने लोगों के हाथ में था। भारत में जमींदारी व्यवस्था अंग्रेजी शासनकाल की देन थी।  

3. लोकतंत्र की स्थापना के लिए भूमि सुधार कार्यक्रम के पीछे लोकतंत्र की भावना भी काम करती रही है। स्वाधीनता और न्याय के लक्ष्य को प्रजातांत्रिक समाज में ही प्राप्त किया जा सकता है। निर्धन और वंचित नागरिक अपनी शिकायतों को लोकतंत्र के माध्यम से व्यक्त कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में सुधार के लिए एक वातावरण का निर्माण होता है।

4. भूमि की उत्पादकता में वृद्धि-भूमि सुधार के प्रभावशाली उपायों को अपनाकर कृषि क्षेत्र का विकास भूमि की उत्पादकता को बढ़ाकर किया जा सकता है। 

2. भूमि चकबंदी के पीछे क्या उद्देश्य था ?

Ans. भूमि के छोटे-छोटे और बिखरे हुए होने की समस्या भूमि के उपविभाजन और विखंडन की समस्या कहलाती है। जब जनसंख्या वृद्धि के रण भूमि के छोटे-छोटे टुकड़े करके उत्तराधिकारियों के बीच बोट दिये जाते हैं तो भूमि की जात आर्थिक हो जाती है। 

भूमि का बहुत-सा भाग मेड़ व नाली आदि बनाने में बेकार हो जाता है। अलग-अलग खेतों की देखभाल नहीं हो पाती। पशुओं द्वारा फसल खराब की जाती है। हर खेत पर पानी पहुँचाना आसान नहीं * किसानों में छोटी-छोटी बातों पर मुकदमेबाजी हो जाती है। कृषि के आधुनिक तरीकों को छोटे खेतों पर अपनाना कठिन होता है। छोटे किसान कृषि की आधुनिक तकनीक को भी प्रयोग

नहीं ला पाते भूमि का छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजन कृषि विकास में एक महत्त्वपूर्ण बाधा रही है। अधिकतर खेत न केवल छोटे हैं बल्कि दूर तक फैले हुए भी हैं। अतः सभी राज्यों में चकबंदी संबंधी कानून बनाए गए एक किसान को जोत के अलग-अलग टुकड़ों को एक अथवा दो जगह पर एकत्र करके उनका उचित इस्तेमाल किया जा सकता है। 

जिन क्षेत्रों में सिंचाई की बेहतर सुविधाएँ उपलब्ध हैं वहाँ चकबंदी से उत्पादन में वृद्धि हुई है। फसलों की सुविधा बढ़ी है तथा जोत को आर्थिक बनाने में सफलता मिली है।

3. भारत में राजनीति ने भूमि सुधार कार्यक्रमों को किस प्रकार प्रभावित किया ?

Ans. भारत में भूमि सुधार कार्यक्रमों के पीछे राजनीतिक वातावरण और राष्ट्रवादी विचारधारा का बहुत बड़ा हाथ रहा है। राष्ट्रीयता की भावना के विकास से ऐसी स्थितियों कानिर्माण हुआ जिसमें सरकार के लिए भूमि सुधार के उपायों का बीड़ा उठाना अनिवार्य हो गया। 

स्वाधीनता संग्राम के दिनों में जनता की गरीबी और जमींदारों तथा सूदखोरों द्वारा किसानों के अत्यधिक शोषण ने राजनीतिक नेताओं का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। 1936 में कांग्रेस अधिवेशन में पंडित नेहरू ने कृषक और राज्य के बीच के विचौलियों के निष्कासन और उसके पश्चात् सहकारी अथवा सामूहिक खेती की बात उठाई। 

1936 में अखिल भारतीय किसान सभा ने जमींदारी उन्मूलन रैयतों के दखल-अधिकार, भूमिहीन मजदूरों के बीच परती जमीन के पुनर्वितरण आदि मांगों को उठाया गया। स्वामी सहजानन्द सरस्वती के नेतृत्व में किसान सभा आंदोलन, 1981 का बारदोली सत्याग्रह तथा बंगाल

विभाजन आंदोलन ने सारे देश में किसानों और भूमि मालिकों के बीच संघर्षो को जन्म दिया। किसानों की शिकायतों के समाधान की योजना बनाने के लिए सरकार बाध्य हो गई और स्वतंत्रता के पश्चात् भूमि सुधार कार्यक्रम प्रारंभ किए गए। 

4. स्वतंत्रता के पश्चात् भारत में भूमि सुधार के कौन-से प्रारंभिक उद्देश्य थे ? 

Ans. स्वतंत्रता के तुरंत पश्चात् सरकार ने भूमि सुधार कार्यक्रम को भूमि कानून के द्वारा प्रारंभ करने की रणनीति बनाई। इस संबंध में देश के विभिन्न राज्यों में विधान सभाओं द्वारा कानून बनाए गए। भारत में भूमि सुधार के प्रारंभिक उद्देश्य निम्नलिखित पे

1. कृषि व्यवस्था में व्याप्त शोषण और सामाजिक अन्याय के सभी तत्वों का निष्कासन ताकि समाज के सभी वर्गों को उन्नति के अवसर प्राप्त हो सके। 

2. कृषि संरचना में मौजूदा रुकावटों को हटाना जिससे उत्पादन में वृद्धि हो सके। अतः कृषि के आधुनिकीकरण तथा कृषि अर्थव्यवस्था में व्याप्त असमानताओं को घटाने की दृष्टि से ही भूमि सुधार कार्यक्रम प्रारंभ किए गए। इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए निम्नलिखित कार्य किए गए-

1. राज्य और जमीन जोराने वालों के बीच सभी प्रकार के मध्यस्थ दंगों का उन्मूलन करना।

2. किसानों द्वारा खेती की जाने वाली भूमि पर उनके स्वामित्व का अधिकार प्रदान करना।

3. खेतों की अधिकतम जोत का निर्धारण करना। करना।

4. कृषि में आधुनिक तकनीकों के प्रयोग को सुलभ बनाने की दृष्टि से जोतों की चकबंदी 

5. भूमि संबंधी रिकॉर्ड को तर्क संगत बनाना।

5. जमींदारी प्रथा से क्या अभिप्राय है ? यह किसानों के शोषण के लिए किस प्रकार उत्तरदायी थी ?

Ans. ब्रिटिश शासकों ने जमीन से अधिकतम लगान प्राप्त करने के लिए तीन प्रकार के भूमि बंदोबस्त प्रारंभ किए-

1. जमींदारी 2. रेवाड़ी 3. महालवाड़ी

जमींदारी व्यवस्था के अंतर्गत जमीन की संपत्ति का अधिकार स्थानीय लगान वसूल करने वालों को दिया गया, वे जमींदार कहलाये और ये सामान्यतः ऊँची जातियों के सदस्य थे। इस नये बंदोबस्त ने वास्तविक किसानों को रैयत बना दिया। भूमि व्यवस्था में से संरचनात्मक परिवर्तन ने राज्य और जमीन जोतने वालों के बीच विचौलियों को खड़ा कर दिया। 

इन मध्यस्थों की भूमि प्रबंधन और सुधार में कोई अभिरुचि नहीं थी। जमींदारों को एक निश्चित राजस्व की रकम सरकार को देनी होती थी, परंतु किसानों से वसूली की कोई सीमा नहीं थी। समय-समय पर उनसे अनेक कर वसूल किए जाते थे। यह व्यवस्था अन्यायपूर्ण थी और इसमें आर्थिक शोषण

और सामाजिक उत्पीड़न दोनों ही विद्यमान थे। स्वतंत्रता के प्रारंभिक वर्षों में विचीलियों का उन्मूलन भूमि सुधार का पहला लक्ष्य बना। देश के सभी भागों में जमींदारी प्रथा को कानून बनाकर समाप्त कर दिया गया। अब खेतिहरों को राज्य के साथ प्रत्यक्ष रूप से जोड़ दिया गया। खेतिहरों को भूमि के स्थायी अधिकार प्रदान

कर दिए गए। 

6. कृषि में काश्तकारी सुधारों से क्या अभिप्राय है ? 

Ans. कृषि जोत की अधिकतम सीमा निर्धारित करने का मूल उद्देश्य एक निश्चित सीमा से अधिक भूमि को वर्तमान भू-स्वामियों से लेकर भूमिहीनों के बीच वितरित करना था। यह पुनर्वितरण सामाजिक-आर्थिक न्याय के सिद्धांत पर आधारित है। भारत में भूस्वामित्व की असमानता बहुत अधिक पाई जाती है। 

स्वतंत्रता के समय ग्रामीण परिवारों में एक-चौथाई के पास कोई जमीन नहीं थी जबकि भू-स्वामियों के स्वामित्व में हजारों एकड़ जमीन थी। इस असंतुलन को दूर करने के लिए ही कृषि भूमि को जोतों का निर्धारण किया गया। सभी राज्यों में व्यक्ति अथवा परिवार के स्वामित्व में रहने वाले खेतों के आकार को नियंत्रित करने वाले कानून बनाए गए। 

निर्धारित सीमा से अधिक भूमि रखने की मनाही की गई। सीमा निर्धारण से प्राप्त अतिरिक्त भूमि राज्य सरकार ने अधिगृहीत करके समाज के कमजोर वर्गों को बाँट दी।

भूमि की अधिकतम सीमा निर्धारण में विभिन्न राज्यों में भिन्नता पाई जाती है। अधिकतम राज्यों में निर्धारित सीमा काफी ऊँची है। भूमि की गुणवत्ता के आधार पर तथा सिंचाई वाली भूमि और वर्षा पर आधारित भूमि के आधार पर भूमि की अधिकतम सीमा का निर्धारण किया गया। 

सीमा निर्धारण से प्राप्त अतिरिक्त भूमि भूमिहीनों में बाँट दी गई। अब तक 64.84 लाख एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया गया है जिसमें से 52.99 लाख एकड़ जमीन का वितरण 55,10 लाख लोगों को किया गया जिसमें 36 प्रतिशत अनुसूचित जाति के लोग तथा 15 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति के लोग हैं।

7. जोतों की चकबंदी से क्या समझते हैं ? भूमि की उत्पादकता को बढ़ाने में चकबंदी किस प्रकार लाभकारी है ?

Ans. भूमि के छोटे-छोटे टुकड़ों में बेटा होना भूमि का उपविभाजन कहलाता है और जब के टुकड़े अलग-अलग स्थानों पर बिखरे हुए होते हैं तो इसे भूमि का विखंडन कहते हैं। भूमि छोटे-छोटे टुकड़े कृषि विकास में बाचक होते हैं। बहुत-सी भूमि खेतों की बाड़ बनाने में खराब जाती है। 

किसान अपने संसाधनों का प्रयोग करने में असमर्थ रहता है। वह उनका उचित प्रयोग नहीं कर पाता। सिंचाई परियोजनाओं का लाभ भी उन्हें नहीं मिल पाता। 

इसलिए छोटे-छोटे और बिखरे हुए खेतों को मिलाकर एक स्थान पर कर देने से किसान भूमि का प्रयोग ठीक प्रकार हे कर पाता है और उत्पादन में भी वृद्धि होती है। 

नये कृषि यंत्रों का प्रयोग करके कृषि की आधुनिक विधियों का प्रयोग में लाकर उत्पादकता में वृद्धि कर सकता है।

8. जोत की भूमि के सीमा निर्धारण से क्या अभिप्राय है ? इसका क्या लाभ हुआ है ? 

Ans. जोत की भूमि की सीमा निर्धारित करने का मूल उद्देश्य एक निश्चित सीमा से अधिक भूमि को वर्तमान भू-स्वामियों से लेकर भूमिहीनों के बीच वितरित करना था। यह भूमि का पुनर्वितरण सामाजिक-आर्थिक न्याय के सिद्धांत पर आधारित है। 

स्वतंत्रता के समय ग्रामीण परिवारों में एक चीधाई के पास जमीन होती थी जबकि बड़े किसानों और जमींदारों के पास हजारों एकड़ जमीन थी। इस असंतुलन को दूर करने के लिए ही कृषि जोतों का निर्धारण किया गया। भूमि की उच्चतम सीमा का अर्थ है कि “एक व्यक्ति या परिवार अधिक-से-अधिक

कितनी योग्य भूमि का स्वामी हो सकता है। उच्चतम सीमा से अधिक भूमि भूस्वामियों से लेकर उन्हें बदले में मुआवजा दिया जायेगा।” इस प्रकार जो भूमि ली जायेगी, उसे छोटे किसानों, काश्तकारों या भूमिहीन कृषि मजदूरों में बाँटा जा सकता है या उसो पंचायतों या सहकारी समितियों को दे दिया जायेगा। 

भूमि की उच्चतम सीमा का उद्देश्य भूमि के समान और उचित प्रयोग को प्रोत्साहन देना है। भारत में ये कदम खेती करने वाले काश्तकारों की स्थिति को सुधारने के लिए उठाए गए। लगान को निर्धारित किया गया है। भूधारण की सुरक्षा से भस्वामियों द्वारा उन्हें बेदखल किए जाने से रोका गया है। 

काश्तकारों को 156.30 लाख एकड़ भूमि पर उनके अधिकारों को सुरक्षित किया गया। सरकार ने 52.99 लाख एकड़ भूमि जिसमें से 36 प्रतिशत अनुसूचित तथा 15 प्रतिशत अनुसूचित जनजातियों के सदस्य सम्मिलित हैं।

9. भूमि संबंधी नवीनतम रिकार्ड की आवश्यकता क्यों है ? 

Ans. भारत में भूमि के अधिकारों से संबंधित आखेल अत्यंत दोषपूर्ण और असंतोषजनक है। सही और नवीनतम रिकार्डों की उपलब्धता बनी रहती है। इसलिए प्रमाणित भूमि रिकार्ड का नवीनीकरण भूमि सुधार कार्यक्रम का हिस्सा बना दिया गया। 

पंचवर्षीय योजना के आलेख में कहा गया है कि ‘अनेक राज्यों के रिकॉर्ड, रैयत दर रैयत तथा बटाईदारों से संबंधित कोई सूचना नहीं देते। देश के अधिकतर राज्यों में अभी भी आधुनिकतम भूमि रिकॉर्ड नहीं है। बड़े भू-स्वामी इसका विरोध करते हैं। 

कई राज्यों में भूमि संबंधी रिकार्ड को सर्वेक्षण तथा बंदोबस्त के द्वारा आधुनिक बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं। भूमि दस्तावेजों को कंप्यूटरीकरण किया गया है। 

10. स्वतंत्रता के पश्चात भूमि सुधार के क्या उद्देश्य थे ?

Ans. स्वतंत्रता के तत्काल बाद भूमि सुधार पर काफी जोर दिया गया। भूमि सुधार को भूमि कानून के जरिए प्रारंभ करने की रणनीति अपनाई गई। भूमि सुधार के प्रारंभिक उद्देश्य निम्नलिखित थे-

1. कृषि संरचना में सभी रुकावटों को दूर करना। 

2. कृषि व्यवस्था में शोषण और सामाजिक अन्याय के सभी तत्वों का निष्कासन करना ताकि समाज के सभी वर्गों को अवसर की समानता मिल सके।

भारत में स्वतंत्रता के पश्चात् कृषि अर्थव्यवस्था में व्याप्त असमानताओं को कम करने की दृष्टि से ही भूमि सुधार कार्यक्रम प्रारंभ किये गये। इन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित कार्य किए गए- 

1. राज्य एवं जमीन जोतने वालों के बीच सभी प्रकार के मध्यस्थ वर्गों का उन्मूलन करना।

2. किसानों द्वारा खेती की जाने वाली भूमि पर उनके स्वामित्व का अधिकार प्रदान किया गया।

3. खेतों की जोत का सीमा निर्धारण। 

4. कृषि में आधुनिक तकनीकों के प्रयोग को सुलभ बनाने की दृष्टि से जोतों की चकबंदी करना।

5. भूमि संबंधी रिकार्ड को तक संगत बनाना।


दीर्घ उत्तरीय प्रश्न | LONG ANSWER TYPE QUESTIONS


1. हरित क्रांति से क्या अभिप्राय है ? हरित क्रान्ति के प्रभाव बताइये। Or, भारत में हरित क्रांति के सामाजिक-आर्थिक प्रभाव बताइए । 

Ans. भारत में योजनाओं की अवधि में अपनाए गए कृषि सुधारों के फलस्वरूप 1967-

68 में अनाज के उत्पादन में 1966-67 की तुलना में लगभग 25 प्रतिशत वृद्धि हुई। किसी एक वर्ष अनाज के उत्पादन में इतनी अधिक वृद्धि होना एक क्रांति के समान था। इसलिए अर्थशास्त्रियों ने आज के उत्पादन में होने वाली इस वृद्धि को हरित क्रांति का नाम दिया। हरित क्रांति से अभिप्राय कृषि उत्पादन में होने वाली भारी वृद्धि से है जो कृषि की नई नीति अपनाने के कारण हुई है। 

अतः हरित क्रांति शब्द सन् 1968 में होने वाले उस आश्चर्यजनक परिवर्तन के लिए प्रयोग में लाया जाता है जो भारत में खाद्यान्न के उत्पादन में हुआ और अब भी जारी है। हरित क्रांति से अभिप्राय कृषि उत्पादन में होने वाली भारी वृद्धि से है जो कृषि की नई नीति अपनाने के कारण हुई है। 

अतः हरित क्रांति शब्द सन् 1968 में होने वाले उस आश्चर्यजनक परिवर्तन के लिए प्रयोग में लाया जाता है जो भारत में खाद्यान्न के उत्पादन में हुआ और अब भी जारी है। हरित क्रांति के फलस्वरूप कृषि उत्पादन में काफी वृद्धि हुई और इसका प्रभाव दीर्घकाल में कृषि उत्पादन के ऊँचे स्तर को बनाए रखने में देखा जा सकता है।

हरित क्रांति के प्रभाव (Effect of Green Revolution) भारतीय अर्थव्यवस्था पर हरित क्रांति के बहुत ही आश्चर्यजनक परिणाम देखने को मिले हैं। इसके फलस्वरूप भारतीय अर्थव्यवस्था को एक नया आधार प्राप्त हुआ है। हरित क्रांति के मुख्य प्रभाव निम्नलिखित हैं-

1. उत्पादन में वृद्धि (Effect of Green Revolution) : हरित क्रांति के फलस्वरूप फसलों के उत्पादन में बड़ी तेजी से वृद्धि हुई। 1967-68 के वर्ष जिसे हरित क्रांति का वर्ष कहा जाता है में अनाज का उत्पादन 950 लाख टन हो गया। 

2. किसानों की समृद्धि (Prosperity of Farmers) : हरित क्रांति के फलस्वरूप किसानों की अवस्था में काफी सुधार हुआ। उनका जीवन स्तर पहले से ऊँचा हो गया। कृषि एक लाभदायक व्यवसाय माना जाने लगा। किसानों की समृद्धि से औद्योगिक उत्पादों की माँग भी तेजी से बढ़ी है।

3. पूँजीवादी खेती को प्रोत्साहन (Capitalistic Farming) : वे किसान जिनके पास

4. खाद्य समाग्री के आयात में कमी (Reduction in Imports of Foodgrains): क्रांति के फलस्वरूप भारत में खाद्य सामग्री के मामले में आत्मनिर्भरता बढ़ी और विदेशों खाद्य सामग्री का आयात कम हो गया। 5. उद्योगों का विकास (Developments of Industries) : हरित क्रांति के कारण उद्योगों के विकास पर काफी उचित प्रभाव पड़ा है। कृषि यंत्र ? उद्योगों का तेजी से विकास हुआ। सायनिक खाद और ट्रैक्टर आदि बनाने के कारखाने खोले गये डीजल इंजन, पंपसेट आदि हे नये कारखाने स्थापित किए गए।

6. आर्थिक विकास और स्थिरता का आधार (Base for economic growth and ability) भारत जैसे देश में जहाँ 29% राष्ट्रीय आय कृषि से प्राप्त होती है, सरकारी बजट हार यातायात पर कृषि का बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। कृषित उत्पादन में होने वाली वृद्धि है देश में आर्थिक विकास, स्थिरता और आत्मनिर्भरता के उद्देश्य को पूरा करने में सहायता मिलती है।

7. विचारधारा में परिवर्तन (Change in Thinking) : भारत जैसे अल्पविकसित देश में जहाँ अधिकतर किसान अनपढ़, रूढ़िवादी और अंधविश्वासी हैं, हरित क्रांति का एक बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा है। लोग अब विज्ञान के महत्त्व को समझने लगे हैं। भारतीय किसानों ने शीघ्रता से कृषि की नई तकनीक को अपनाया है। वे नये विचारों और तकनीकों को ग्रहण कर रहे हैं। 

2. हरित क्रांति के विरोध में तर्क दीजिए।

Ans. हरित क्रांति के निम्नलिखित प्रभावों के कारण कई प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों में असमानता बढ़ी है और हरित क्रांति का प्रभाव देश के सभी भागों में समान रूप से नहीं पड़ा है।

1. सीमित फसलें (Limited Crops) कृषि उत्पादन में होने वाली वृद्धि केवल कुछ फसलों तक सीमित है। इसका प्रभाव मुख्य रूप से गेहूँ, ज्वार, मक्का और बाजरा पर पड़ा है। देश की 60 प्रतिशत भूमि पर इसका प्रभाव नहीं पड़ा। चावल के उत्पादन पर इसका अधिक प्रभाव नहीं पड़ा है।

2. सीमित क्षेत्र (Limited Area) : हरित क्रांति का प्रभाव भारत के सभी राज्यों में एक समान नहीं पड़ा है। कुछ राज्यों जैसे पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र और तमिलनाडु पर इसका अच्छा प्रभाव पड़ा। इन राज्यों में कृषि उत्पादन में बहुत अधिक वृद्धि हुई परंतु उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, उड़ीसा तथा सूखे प्रदेशों में हरित क्रांति अपना प्रभाव नहीं छोड़ सके।

3. घनी किसानों को लाभ (Benefit to big Farmers) : जिन किसानों के पास 10 हेक्टेयर से अधिक भूमि थी और जो बीज, खाद, ट्यूबवेल, ट्रैक्टर आदि खरीदने की सामर्थ्य रखते थे उन्हें अधिक लाभ पहुँचा। छोटे किसानों ने इस तकनीक को नहीं अपनाया। 

4. आर्थिक असमानता में वृद्धि (Increase in Economic Inequality) : हरिल क्रांति ने धनी और निर्धन के बीच अंतर बढ़ा दिया।

3. भारत में हरित क्रांति के सामाजिक-आर्थिक परिणामों की व्याख्या कीजिए ।

Ans. हरित क्रांति शब्द सन् 1968 में होने वाले उस आश्चर्यजनक परिवर्तन के लिए प्रयोग में लाया जाता है जो भारत के खाद्यान्न के उत्पादन में हुआ था तथा अब भी जारी है। हरित क्रांति से अभिप्राय है-कृषि उत्पादन में काफी अधिक वृद्धि होना और दीर्घकाल में कृषि उत्पादन के ऊँचे स्तर को स्थिर रखना। भारतीय अर्थव्यवस्था पर हरित क्रांति ने कई प्रकार से प्रभाव डाले हैं। हरित क्रांति के प्रभाव : 

(i) उत्पादन में वृद्धि : हरित क्रांति के फलस्वरूप 1967-68 और उसके बाद के वर्षों में कृषि उत्पादन में तेजी से वृद्धि हुई है।

(ii) किसानों की समृद्धि : हरित क्रांति के फलस्वरूप किसानों की आर्थिक स्थिति में काफी सुधार हुआ है। उनका जीवन स्तर भी ऊँचा हो गया है। कृषि का व्यवसाय एक लाभकारी व्यवसाय माना जाने लगा है। 

(iii) खाद्यान्न के आयात में कमी: हरित क्रांति के फलस्वरूप खाद्यान्न के आयात में कमी आई। भारत अनाज का एक निर्यातक देश बन गया। 

(iv) उद्योग का विकास हरित क्रांति के कारण उद्योगों का भी विकास हुआ। कृषि 8 यंत्र व उपकरण बनाने, रासायनिक उर्वरकों के उत्पादन और उपभोक्ता वस्तुओं के उत्पादन में तेजी से वृद्धि हुई।

(v) आर्थिक विकास कृषि विकास से सरकार की आय में वृद्धि हुई। इससे देश में आर्थिक स्थिरता और आत्मनिर्भरता के उद्देश्य को पूरा करने में सफलता मिली। हरित क्रांति के सामाजिक प्रभाव: हरित क्रांति का प्रभाव सभी राज्यों में एक समान नहीं पड़ा। पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र और तमिलनाडु पर इसका अधिक प्रभाव पड़ा। इन राज्यों में कृषि उत्पादन में तेजी से वृद्धि हुई परंतु अन्य राज्यों में जहाँ सिंचाई व्यवस्था की कमी थी उसका हरित क्रांति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

4. कृषि में पैकेज कार्यक्रम से क्या अभिप्राय है ? 

Ans. नई कृषि रणनीति इस बात पर आधारित थी कि कृषि में विज्ञापन और प्रौद्योगिकी का व्यापक प्रयोग खाद्यान्नों के उत्पादन में प्रचुर मात्रा में वृद्धि के रूप में फलदायी हो सकता है। वर्ष 1961 में गहन कृषि जिला कार्यक्रम आरंभ किया गया। इसका उद्देश्य उन्नत औजार, साख, अधिक उपज वाले बीज, सुनिश्चित सिंचाई आदि को एक साथ मिलाकर कृषि की उत्पादकता को बढ़ाना था। 

कार्यक्रम का अच्छा परिणाम निकला। खाद्यान्नों के उत्पादन में तेजी से वृद्धि हुई। फिर इसका विस्तार बड़े क्षेत्रों में किया गया। इसे गहन कृषि कार्यक्रम का नाम दिया गया। छठे दशक के उत्तरार्द्ध में भारी उपज और सीमांत किसान और कृषि मजदूर विकास प्रमुख थे। इन कार्यों को उर्वरकों कीटनाशको, ऋण-सुविधाओं और सिंचाई सुविधाओं के साथ जोड़ा गया। 

अधिक उपज देने वाले बीजों के प्रयोग से खाद्यान्नों का उत्पादन काफी तेथे से बढ़ा। सन् 1977-78 में गेहूँ का उत्पादन दुगुना हो गया। चावल का उत्पादन भी बढ़ना आरंभ हो गया धीरे-धीरे दलहन, ज्वार, मक्का और बाजरे के उत्पादन में भी तेजी से वृद्धि हुई। वर्ष 2007-08 में खाद्यान्नों का कुल उत्पादन 70 करोड़ 34 लाख टन रहा।

5. भारत में भूमि सुधार का उद्देश्य बिचौलिये (मध्यस्थों) को हटाना क्यों था ? 

Ans. ब्रिटिश शासकों ने जमीन से अधिकतम राजस्व प्राप्त करने के लिए तीन प्रकार की भूमि व्यवस्थाओं को प्रचलित किया-जमींदारी, रैयतवाड़ी तथा महालवाड़ी। जमींदारी व्यवस् के अंतर्गत जमीन की संपत्ति का अधिकार स्थानीय लगान वसूलने वालों को दिया गया। वे जमींदार कहलाये। ये सामान्यतः ऊँची जातियों के सदस्य थे। इस नये बंदोबस्त ने वास्तविक किसानों को रैयत बना दिया। 

भूमि व्यवस्था के इस संरचनात्मक परिवर्तन ने राज्य एवं जर्मन जोतने वालों के बीच बिचोलियों को खड़ा कर दिया। रैयतवाड़ी व्यवस्था के अंतर्गत विचौलियों को मान्यता नहीं मिली। जमीन जोतने वालों को अपनी जमीन पर हस्तांतरण का अधिकार दिया गया। इस व्यवस्था के अंतर्गत भी प्रभावशाली रैयत शक्तिशाली भू-स्वामी के रूप में उभरे। 

महालवाड़ी प्रथा के अंतर्गत भी विचौलियों का एक वर्ग उत्पन्न हो गया। इन मध्यस्थों की भूमि प्रबंधन और सुधार में कोई रुचि नहीं थी। जमींदारों को एक निश्चित राजस्व की राशि सरकार को देनी होती थी, परंतु किसानों से वसूली की कोई सीमा नहीं थी। इस व्यवस्था ने आर्थिक शोषण और सामाजिक उत्पीड़न को बढ़ाने का कार्य किया।

स्वतंत्रता के पश्चात् विचौलियों का उन्मूलन करना भूमि सुधार का पहला लक्ष्य था। इस कार्यक्रम के द्वारा देश के सभी क्षेत्रों में विथोलियों जैसे जमींदारों आदि की समाप्ति करने का प्रयत्न किया गया। 

खेतिहर किसानों को राज्य के साथ प्रत्यक्ष रूप से जोड़ दिया गया। किसानों को भूमि के स्थायी अधिकार दे दिये गए। सन् 1954-55 तक सभी राज्यों ने भूमि सुधार कार्यक्रम के अंतर्गत विचौलियों को हटा दिया। जमींदारों से भूमि लेकर जोतने वाले किसानों को सौंप दी गई।

CLASS 12 NCERT SOLUTION IN ENGLISHCLASS12 NCERT SOLUTION IN HINDI
Historyइतिहास
Geography भूगोल
Political science राजनीति विज्ञान
English SubjectResult
Hindi SubjectHistory answer keys

FAQs


1. भारत में हरित क्रांति लाने में किसका योगदान है ?

Ans. डॉ. एम. एस. स्वामिनाथ के प्रयासों से 1960 के दशक में नए बीजों की खोज की गई जिसके फलस्वरूप खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता आई। गेहूं के उत्पादन में 2.5 गुना वृद्धि तथा धान के उत्पादन में 3 गुना वृद्धि हुई।

2. भूमि चकबंदी से क्या अभिप्राय है ? 

Ans. भूमि के छोटे-छोटे और बिखरे खेतों पर सिंचाई की व्यवस्था करना कठिन होता है। अतः छोटे-छोटे भूमि के टुकड़ों को मिलाकर किसानों को एक स्थान पर देना भूमि की चकबंदी कहलाता है। इससे खेत पर मशीनों का प्रयोग किया जा सकता है। साथ ही सिंचाई की व्यवस्था और भूमि की देख-रेख की जा सकती है।

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NOTES & QUESTIONS ANSWER


  1. Introducing Indian Society
  2. The Demographic Structure of the Indian Society
  3. Social Institutions: Continuity and Change
  4. The Market as a Social Institution
  5. Patterns of Social Inequality and Exclusion
  6. The Challenges of Cultural Diversity
  7. suggestions for projects work
  1. Structural Change
  2. Cultural Change
  3. The Story of Indian Democracy
  4. Change and Development in Rural Society
  5. Change and Development in Industrial Society
  6. Globalisation and Social Change
  7. Mass Media and Communications
  8. Social Movements

MCQS IN ENGLISH


  1. Introducing Indian Society
  2. The Demographic Structure of the Indian Society
  3. Social Institutions: Continuity and Change
  4. The Market as a Social Institution
  5. Patterns of Social Inequality and Exclusion
  6. The Challenges of Cultural Diversity
  1. Structural Change
  2. Cultural Change
  3. The Story of Indian Democracy
  4. Change and Development in Rural Society
  5. Change and Development in Industrial Society
  6. Globalisation and Social Change
  7. Mass Media and Communications
  8. Social Movements

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