NCERT Class 12 Sociology-II Chapter 5 Notes In Hindi औद्योगिक समाज में परिवर्तन और विकास Easy pdf

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NCERT Class 12 Sociology-II Chapter 5 Notes In Hindi औद्योगिक समाज में परिवर्तन और विकास Easy pdf

Class12th 
Chapter Nameऔद्योगिक समाज में परिवर्तन और विकास
Chapter numberChapter 5
PART B
Book NCERT
SubjectSociology
Medium Hindi
Study MaterialsNotes & Questions answer
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औद्योगिक समाज में परिवर्तन और विकास


समाजशास्त्र के अनेकों महत्त्वपूर्ण कार्य तब किए गए थे जबकि औद्योगीकरण एक नयी अवधारणा था और मशीनों ने एक महत्त्वपूर्ण स्थान ग्रहण किया हुआ था। कार्ल मार्क्स, वेबर और एमील दुर्खाइम जैसे विचारकों ने उद्योग की बहुत-सी नयी संकल्पनाओं से स्वयं को जोड़ा। 

ये थी नगरीकरण जिसने आमने-सामने के संबंध को बदला जोकि ग्रामीण समाजों में पाए जाते थे। जहाँ कि लोग अपने या जान-पहचान के भूस्वामियों के खेमों में काम करते थे, उन संबंधों का स्थान आधुनिक कारखानों एवं कार्यस्थलों के अज्ञात व्यावसायिक संबंधों ने ले लिया। औद्योगीकरण से एक विस्तृत श्रम विभाजन होता है।

NCERT Class 12 Sociology II Chapter 5 Notes In Hindi औद्योगिक समाज में परिवर्तन और विकास Easy pdf 1

औद्योगीकरण कुछ एक स्थानों पर जबरदस्त समानता लाता है। उदाहरण के लिए रेलगाड़ियों, बसों और साइबर कैफे में जातीय भेदभाव के महत्त्व का ना होना। 

दूसरी तरफ, भेदभाव के पुराने स्वरूपों को नए कारखानों और कार्यस्थलों में अभी भी देखा जा सकता है। हालाँकि इस संसार में सामाजिक असमानताएँ कम हो रही हैं, लेकिन जर्थिक या आय से संबंधित असमानताएँ उत्पन्न हो रही हैं। बहुचा सामाजिक और आय संबंध असमानता परस्पर आच्छादित हो जाती है।

औद्योगीकरण हमारे समाज का एक अभिन्न हिस्सा है। कुछ समाजशास्त्रियों ने औद्योगीकरण को सकारात्मक और नकारात्मक दोनों रूपों में देखा है। 20वीं सदी के मध्य में औद्योगीकरण का सकारात्मक रूप दिखाई दे रहा था। 

अब इसके नकारात्मक रूप भी दिखाई देने लगे हैं। भारत में औद्योगीकरण की शुरुआत स्वतंत्रता के बाद से ही हुई। आज यहाँ औद्योगीकरण चरम सीमा पर है। लोगों को रोजगार मिला हुआ है। 

यह एक संगठित क्षेत्र में दिखाई देता है। स्वतंत्रता के प्रारंभिक वर्षों में रूई, जूट, कोयला खानें एवं रेलवे भारत के प्रथम आधुनिक उद्योग थे। जब सुरक्षा, परिवहन, संचार और न जाने क्या-क्या इसमें शामिल हो गए हैं। भूमंडलीकरण एवं उदारीकरण के दौर में उद्योगों में भी परिवर्तन आया है।



भारत एक कृषि प्रधान देश होते हुए भी यहाँ पर औद्योगीकरण की गति तेज हुई हैं, कल-कारखानों में मजदूर काम करते हैं जिससे औद्योगिक उत्पादन होता है। देश में औद्योगीकरण का समुचित विकास होने से देश की अर्थव्यवस्था पर इसका अनुकूल प्रभाव पड़ा है।


अति लघु उत्तरीय प्रश्न (VERY SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. लघु उद्योग किसे कहते हैं ?

Ans. लघु उद्योगों को निवेश की मात्रा के आधार पर परिभाषित किया जाता है। समय-समय पर निवेश की मात्रा में परिवर्तन किया जाता है। 1950 में उस उद्योग को लघु उद्योग कहा जाता था जिसमें अधिकतम निवेश 5,00,000 रुपये हैं। वर्तमान समय में इस सीमा कोष को बढ़ाकर एक करोड़ कर दिया गया है।

2. लघु उद्योगों को विकसित करने के लिए भारत सरकार द्वारा कई कदम उठाए गए हैं। कोई चार उपाय लिखें।

Ans. (i) सरकार ने लघु उद्योगों की कुछ वस्तुओं को कर से मुक्त रखा है। 

(ii) इन्हें बैंकों से कम व्याज पर ऋण दिया जाता है। (iii) लघु उद्योगों के विकास के लिए देश में बड़ी संख्या में औद्योगिक बस्तियों की स्थापना की गई है। 

(iv) कुछ वस्तुओं के उत्पादन का आरक्षण लघु उद्योगों को दिया गया है। 

3. संरक्षण की नीति किस अवधारणा पर आधारित है ?

Ans. संरक्षण की नीति इस अवधारणा पर आधारित है कि विकासशील देशों के उद्योग अधिक विकसित देशों से निर्मित वस्तुओं का मुकाबला नहीं कर सकते। ऐसी मान्यता है कि यदि घरेलू उद्योगों को संरक्षण दिया जाता है तो वे कुछ समय के पश्चात् विकसित देशों में निर्मित वस्तुओं का मुकाबला कर सकेंगे। 


लघु उत्तरीय प्रश्न (SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. औद्योगीकरण की प्रारंभिक दशा में समाजशास्त्र ने क्या कार्य किए ? 

Ans. समाजशास्त्र में अनेकों महत्त्वपूर्ण कार्य उस समय किए गए थे जबकि औद्योगीकरण एक नई अवधारणा था और मशीनों ने एक महत्त्वपूर्ण स्थान ग्रहण किया हुआ था। कार्ल मार्क्स, देवर और एमील दर्खाइम जैसे टिशरकों ने उद्योग को अनेक नई संकल्पनाओं से स्वयं को जोड़ा।

ये थीं नगरीकरण जिसने आमने-सामने के संबंध को बदला जो कि ग्रामीण समाजों में पाए जाते है। जहाँ कि लोग अपने या परिचितों के भूस्वामियों के खेतों में काम करते थे, उन संबंधों का स्थान आधुनिक कारखानों एवं कार्यस्थलों के अज्ञात व्यावसायिक संबंधों ने ले लिया। औद्योगीकरण से एक विस्तृत श्रम विभाजन होता है। 

लोग अधिकांशतया अपने कार्यों को अंतिम रूप नहीं दे पाते क्योंकि उन्हें उत्पादन के एक छोटे से पुर्जे को बनाना होता है। अक्सर यह कार्य दोहराने और चकाने वाला होता है, लेकिन फिर भी बेरोजगार होने से यह स्थिति अच्छी है। मार्क्स मैंने इस स्थिति को ‘अलगाव’ कहा, जिसमें लोग अपने कार्य से प्रसन्न नहीं होते, उनकी उत्तरजीवित भी इस बात पर निर्भर करती है कि मशीनें मानवीय श्रम के लिए कितना स्थान छोड़ती है।

2. औद्योगीकरण से आई समानता असमानता के उदाहरण दीजिए। 

Ans- औद्योगिकीकरण कुछ एक स्थानों पर अभूतपूर्व समानता लाता है। उदाहरण के लिए रेलगाड़ियाँ, बसों और साइबर कैफे में जातीय भेदभाव के महत्त्व का न होना। दूसरी ओर, भेदभाव के पुराने स्वरूपों को नए कारखानों और कार्यस्थलों में अभी भी देखा जा सकता है। हालांकि, इस संसार में सामाजिक असमानताएँ कम हो रही हैं लेकिन आर्थिक अथवा आय से संबंधित असमानताएँ उत्पन्न हो रही है।

 बहुचा सामाजिक और आय संबंधी असमानता परस्पर आच्छादित हो जाती है। उदाहरण के लिए अच्छे वेतन वाले व्यवसायों जैसे दवा, कानून अथवा पत्रकारिता में उच्च जाति के लोगों का वर्चस्व आज भी बना हुआ है। महिलाएँ (अधिकांशतः) समान कार्य के लिए कम वेतन ही पाती है।

कुछ समय से समाजशास्त्रियों ने औद्योगीकरण को सकारात्मक और नकारात्मक दोनों रूपों में देखा है। आधुनिकीकरण के सिद्धांत के प्रभाव से 20वीं शताब्दी के मध्य से औद्योगीकरण अपरिहार्य एवं सकारात्मक रूप में दिखाई दे रहा है। 

आधुनिकीकरण का सिद्धांत यह तर्क देता है कि आधुनिकीकरण की प्रक्रिया में पृथक् समाज की अवस्थाएँ अलग-अलग हैं परंतु उन सभी की दिशा एक ही है। इन सिद्धांतकारों अनुसार आधुनिक समाज पश्चिम का प्रतिनिधित्व कर रहा है।

3. भारत में स्वतंत्रता के प्रारंभिक वर्षों में औद्योगीकरण की क्या दशा थी ? 

Ans. कपास, जूट, कोयला खाने एवं रेलवे भारत के प्रथम आधुनिक उद्योग थे। स्वतंत्रता के पश्चात् सरकार ने आर्थिकी को ‘प्रभावशाली ऊँचाइयों पर रखा। इसमें सुरक्षा, परिवहन एवं संचार, ऊर्जा, खनन एवं अन्य परियोजनाओं को सम्मिलित किया गया। जिन्हें करने के लिए सरकार ही सक्षम थी और यह निजी उद्योगों के विकास के लिए भी आवश्यक था। 

भारत की मिश्रित आर्थिक नीति में कुछ क्षेत्र सरकार के लिए आरक्षित थे जबकि कुछ निजी क्षेत्रों के लिए खुले थे। लेकिन उसमें भी सरकार अपनी अनुज्ञप्ति (लाइसेंसिंग) नीति द्वारा यह सुनिश्चित करने का प्रयास करती है कि वे उद्योग विभिन्न भागों में फैले हुए हों। स्वतंत्रता के पहले उद्योग मुख्यतः बंदरगाह वाले शहरों जैसे मद्रास, बम्बई एवं कलकत्ता (चेन्नई, मुम्बई एवं कोलकाता) तक ही. सीमित थे। लेकिन उसके पश्चात् अन्य स्थान जैसे बड़ौदा (बड़ोदरा), कोयम्बटूर, बंगलोर (बंगलूरू) पूणे, फरीदाबाद एवं राजकोट भी महत्त्वपूर्ण औद्योगिक केन्द्र बन गए। 

सरकार अन्य छोटे पैमाने के उद्योगों को भी विशिष्ट प्रोत्साहन एवं सहायता देकर प्रोत्साहित करने का प्रयास कर रही है। अनेक वस्तुएँ जैसे कागज एवं लकड़ी के समान, लेखन सामग्री, शीशा एवं चीनी मिट्टी के उद्योग, छोटे पैमाने के क्षेत्रों के लिए आरक्षित थे। 1991 तक कुल कार्यकारी जनसंख्या में से केवल 28% बड़े उद्योगों में नौकरी कर रहे थे, जबकि 72% लोग छोटे पैमाने के एवं परंपरागत उद्योगों में कार्यरत थे।

4. औद्योगिक नीति 1956 ने भारत के उद्योगों को कितनी श्रेणियों में बाँटा ? इन वर्गों में किन उद्योगों को रखा गया ? 

Ans. उद्योगों का वर्गीकरण औद्योगिक नीति के अनुसार भारतीय उद्योगों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया- 

(i) प्रथम वर्ग 

(ii) द्वितीय वर्ग तथा 

(iii) तृतीय वर्ग 

(1) प्रथम श्रेणी- प्रथम श्रगेणी में युद्ध सामग्री का निर्माण, परमाणु शक्ति के उत्पादन एवं नियंत्रण, अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण, रेल यातायात तथा डाकघर रखा गया। इसके स्वामित्व और प्रबंध तथा स्थापना एवं विकास का दायित्व पूर्ण रूप से केन्द्रीय सरकार को सौंपा गया।

(II) द्वितीय श्रेणी- इस श्रेणी में वे उद्योग रखे गये जिनके विकास में सरकार अधिक भाग लेगी। उद्योगों को इस श्रेणी में रखा गया जैसे औजार, मशीन, दवाइयाँ, रासायनिक खाद, रबड़, जल यातायात, सड़क यातायात आदि। भविष्य में इस श्रेणी के उद्योगों की स्थापना सरकारी क्षेत्र में ही की जायेगी। 

(iii) तृतीय श्रेणी-इस श्रेणी में उन सभी उद्योगों को रखा गया जो निजी क्षेत्र के लिए सुरक्षित रहेंगे। इनका विकास निजी क्षेत्र की प्रेरणा से होगा किन्तु इस श्रेणी में भी राज्य नए उद्योगों की स्थापना कर सकता है।

5. भारत में औद्योगिक लाईसेंसिंग नीति के क्या प्रमुख उद्देश्य रहे हैं ? 

Ans. भारत में औद्योगिक लाईसेंसिंग नीति के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं- (i) विभिन्न योजनाओं के लक्ष्यों के अनुसार औद्योगिक निवेश तथा उत्पादन को विकसित एवं नियंत्रित करना।

(ii) छोटे और लघु उद्योगों को प्रोत्साहन देना तथा उन्हें संरक्षण प्रदान करना। 

(iii) औद्योगिक स्वामित्व के रूप में आर्थिक शक्ति के केन्द्रीकरण को रोकना। 

(iv) आर्थिक विकास के क्षेत्र में क्षेत्रीय असमानताओं को दूर करना तथा समुचित संतुलित औद्योगिक विकास के लिए प्रेरित करना।


दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (LONG ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. 1982 की हड़ताल के बारे में दिए गए परिच्छेद को पढ़कर अंत में दिए गए प्रश्नों के उत्तर दें-

Ans. प्रकाश भिलारे (मिल के भूतपूर्व कामगार महाराष्ट्र गिरनी कामगार संघ के महासचिव) – कपड़ा मिल के कामगार केवल अपना वेतन और महँगाई भत्ता लेते हैं। इसके अलावा उन्हें कोई और भत्ता नहीं मिलता। इन्हें केवल पाँच दिन का आकस्मिक अवकाश मिलती है। दूसरे उद्योगों के कामगारों को अन्य भत्ते जैसे यातायात, स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएँ इत्यादि मिलने शुरू हो गए साथ ही 10-12 दिन का आकस्मिक अवकाश भी। 

इससे कपड़ा मिल के कामगार भड़क गए 22 अक्टूबर, 1981 को स्टैंडर्ड मिल के कामगार डॉ. दत्ता सामंत के घर गए और उनसे अपनी अगुआई करने को कहा। पहले सामंत ने मना कर दिया, उन्होंने कहा कि कपड़ा मिलें, बी.आई. आर.ए. के अंतर्गत आती है, और मुझे इसके बारे में अधिक जानकारी भी नहीं है। परंतु ये कामगार किसी भी हालत में न नहीं सुनना चाहते थे। वे रात भर उनके घर के बाहर चौकसी करते रहे और अंत में सुबह सामंत मान गए।

लक्ष्मी भाटकर-(हड़ताल की सहभागी) – मैंने हड़ताल का समर्थन किया। हम रोजाना गेट के बाहर बैठ जाते थे और सलाह करते थे कि आगे क्या करना होगा। हम समय-समय पर संगठित होकर मोर्चे भी निकालते थे….. मोर्चे बहुत बड़े हुआ करते थे…. हमने किसी को लूटा या चोट नहीं पहुँचाई। मुझे कभी-कभी बोलने के लिए कहा गया, लेकिन में भाषण नहीं दे सकती। मेरे पाँव बुरी तरह काँपने लगते हैं। इसके अलावा मैं अपने बच्चों से भी डरती हूँ-वो क्या करेंगे?

वो सोचेंगे कि यहाँ हम भूखे मर रहे हैं और वे यहाँ अपना फोटो अधबार में छपवा रही हैं एक बार हमने सेंचुरी मिल के शो रूम की तरफ भी मोर्चा निकाला। हमें गिरफ्तार करके बोरीली ले जाया गया। मैं अपने बच्चों के बारे में सोच रही थी। मैं खाना नहीं खा पाई। मैं अपने बारे में सोचने लगी कि हम लोग कोई अपराधी नहीं, मिल के कामगार है। हम अपने खून-पसीने की कमाई के लिए लड़ रहे हैं।

किसान सालुंके- (स्पिन मिल्स का भूतपूर्व कामगार)- सेंचुरी मिल में हड़ताल शुरू हुए मुश्किल से डेढ़ महीना ही हुआ होगा कि आर.एम. एम.एस. वालों ने मिल खुलवा दी। वे ऐसा कर सकते हैं क्योंकि उन्हें राज्य और सरकार दोनों का समर्थन प्राप्त है।

 वे बाहर के लोगों को बिना उनके बारे में पूरी तरह जाने मिल के अंदर ले आए… मोंसले ( तब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री) ने 30 रुपये बढ़ाने की पेशकश की। दत्ता सामंत ने इस विषय पर विचार करने के लिए मीटिंग बुलाई। 

आगे के सारे क्रियाकलाप यहीं होते थे। हमने कहा, “हमें यह नहीं चाहिए” अगर हड़ताल नेताओं के पास कोई मर्यादा, कोई बातचीत नहीं है, हम बिना किसी उत्पीड़न के काम पर वापस जाने के लिए तैयार नहीं है।

दत्ता इसवालकर- (मिल चार्ल्स टेनेंट एसोसिएशन के अध्यक्ष) कांग्रेस ने बाबू रेशिम, रमा नायक और अरुण गवली जैसे सभी गुंडों को स्ट्राइक खत्म करवाने के लिए जेल से बाहर कर दिया। हमारे पास स्ट्राइक तोड़ने वालों को मारने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था। हमारे लिए यह जीवन-मृत्यु का प्रश्न था ।

भाई भोंसले (1982 की हड़ताल में आर.एम. एम.एस. के महासचिव) हमने तीन महीने की हड़ताल के बाद लोगों को वापस काम पर बुलाना शुरू कर दिया….हम सोचते थे, कि अगर लोग काम पर जाना चाहते हैं तो उन्हें जाने देना चाहिए, वास्तव में यह उनकी सहायता ही थी. .. माफिया गैंग के बीच में आ जाने के बारे में, मैं उसके लिए उत्तरदायी था… वे दत्ता सामंत जैसे लोग सुविधाजनक समय का इंतजार कर रहे हैं, और आराम से काम कर जाने वालों का इंतजार कर रहे हैं। 

हमने पारेल एवं अन्य स्थानों पर प्रतिपक्षी को तैयार किया था। स्वाभाविक रूप से वहाँ कुछ झगड़ा, कुछ खूनखराबा हो सकता था…. जब रमा नायक की मृत्यु हुई तो उस वक्त के मेयर भुजबल उसके सम्मान में अपनी ऑफिस की कार में आए। इन लोगों की ताकतों को एक समय या अन्य अनेक लोगों द्वारा राजनीति में इस्तेमाल किया गया।

2. योजना अवधि के दौरान औद्योगिक विकास में सार्वजनिक क्षेत्र को ही अग्रणी भूमिका क्यों सौंपी गई थी ?

Ans. सार्वजनिक उपक्रम से अभिप्राय ऐसी व्यावसायिक या औद्योगिक संस्था से है जिनका स्वामित्व, प्रबन्ध एवं संचालन सरकार या उसकी किसी संस्था के अधीन होता है। स्वतंत्रता के बाद भारत में सार्वजनिक क्षेत्र को निम्नलिखित कारणों से महत्त्व दिया गया है- 

(i) विशाल विनियोग की आवश्यकता कई ऐसे आधारभूत तथा देश के लिए आवश्यक उद्योग होते है जिनमें इतने निवेश की आवश्यकता होती है कि निजी क्षेत्र के उद्योग उनमें रुचि नहीं लेते। अतः उन उद्योगों की स्थापना सार्वजनिक क्षेत्र में ही करनी पड़ती है। 

(ii) क्षेत्रीय असमानताओं को दूर करने के लिए भारत जब स्वतंत्र हुआ था तो उस समय क्षेत्रीय असमानताएं बहुत थीं। इन क्षेत्रीय असमानताओं को दूर करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र में उपक्रमों की स्थापना आवश्यक थी। सार्वजनिक क्षेत्र में उद्योगों की स्थापना उन क्षेत्रों में की जाती है जो आर्थिक दृष्टि से पिछड़े हुए होते हैं।

(iii) आर्थिक शक्ति के केन्द्रीकरण को रोकने के लिए जब भारत स्वतंत्र हुआ था तो उस समय आय तथा संपत्ति का असमान वितरण था। देश के कुछ लोगों के पास ही देश का अधिकांश पन केंद्रित था। अमीर लोग बहुत अमीर थे और गरीब लोग बहुत ही गरीब थे आय की विषमताओं को कम करने के लिए स्वतंत्रता के पश्चात् सार्वजनिक क्षेत्र को महत्त्व दिया गया।

(iv) आधारभूत संरचनाओं का विकास करने के लिए स्वतंत्रता के समय भारत में आधारभूत संरचनायें अविकसित तथा असंतोषजनक थीं। बिना आधारभूत संरचनाओं में सुधार लाये देश का विकास नहीं हो सकता। आधारभूत संरचनाओं को विकसित करने के लिए निजी क्षेत्र आगे आने को तैयार नहीं था, क्योंकि आधारभूत संरचनाओं में काफी निवेश होता है और काफी समय के पश्चात् उनसे आय प्राप्त होती है। अतः इन संरचनाओं को विकसित करने के लिए सरकार को आगे आना पड़ा।

(v) सुरक्षा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण-जब देश स्वतंत्र हुआ तो उस समय भारत की सुरक्षा खतरे में थी। देश की सुरक्षा के लिए युद्ध सामग्री (बम, गोले, अस्त्र, शस्त्र) के निर्माण की आवश्यकता थी। युद्ध सामग्री के निर्माण के लिए हम निजी क्षेत्र पर भरोसा नहीं कर सकते। अतः इन सबका निर्माण सार्वजनिक क्षेत्र में किया गया।

CLASS 12 NCERT SOLUTION IN ENGLISHCLASS12 NCERT SOLUTION IN HINDI
Historyइतिहास
Geography भूगोल
Political science राजनीति विज्ञान
English SubjectResult
Hindi SubjectHistory answer keys

FAQs


1. विदेशी प्रतियोगिता से संरक्षण की आलोचना किस आधार पर की जाती है ?

Ans. ऐसा माना जाता है कि अधिक समय तक संरक्षण देने से उद्योग अपनी वस्तुओं की गुणवत्ता नहीं बढ़ायेंगे क्योंकि उन्हें पता है कि वह ऊँची कीमत पर अपनी निकृष्ट वस्तुएँ अपने देश में बेच सकते हैं।

2. घरेलू उद्योगों को विदेशी प्रतियोगिता से किन दो रूपों में संरक्षण दिया गया ? उन रूपों का संक्षेप में वर्णन करें।

Ans. घरेलू उद्योगों को विदेशी प्रतियोगिता से दो रूपों में संरक्षण दिया गया-प्रशुल्क तथा कोटा। प्रशुल्क से अभिप्राय आयातित वस्तुओं पर कर से है। प्रशुल्क से आयात की जाने वाली वस्तु महंगी हो जाती है। परिणामस्वरूप आयात कमी जाने वाले वस्तुओं का प्रयोग कम हो जाता है। 

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NOTES & QUESTIONS ANSWER


  1. Introducing Indian Society
  2. The Demographic Structure of the Indian Society
  3. Social Institutions: Continuity and Change
  4. The Market as a Social Institution
  5. Patterns of Social Inequality and Exclusion
  6. The Challenges of Cultural Diversity
  7. suggestions for projects work
  1. Structural Change
  2. Cultural Change
  3. The Story of Indian Democracy
  4. Change and Development in Rural Society
  5. Change and Development in Industrial Society
  6. Globalisation and Social Change
  7. Mass Media and Communications
  8. Social Movements

MCQS IN ENGLISH


  1. Introducing Indian Society
  2. The Demographic Structure of the Indian Society
  3. Social Institutions: Continuity and Change
  4. The Market as a Social Institution
  5. Patterns of Social Inequality and Exclusion
  6. The Challenges of Cultural Diversity
  1. Structural Change
  2. Cultural Change
  3. The Story of Indian Democracy
  4. Change and Development in Rural Society
  5. Change and Development in Industrial Society
  6. Globalisation and Social Change
  7. Mass Media and Communications
  8. Social Movements

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