NCERT Class 12 Sociology-II Chapter 8 Notes In Hindi सामाजिक आन्दोलन Easy Pdf

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NCERT Class 12 Sociology-II Chapter 8 Notes In Hindi सामाजिक आन्दोलन Easy Pdf


सामाजिक आन्दोलन (SOCIAL MOVEMENT)


सामाजिक आन्दोलन में एक लम्बे समय तक निरंतर सामूहिक गतिविधियों की आवश्यकता होती है। ऐसी गतिविधियाँ प्रायः राज्य के विरुद्ध होती हैं तथा राज्य की नीति तथा व्यवहार में परिवर्तन की माँग करती हैं। स्वतः स्फूर्त तथा असंगठित विरोध को भी सामाजिक आन्दोलन नहीं कह सकते। सामूहिक गतिविधियों में कुछ हद तक संगठन होना आवश्यक है। 

इस संगठन में नेतृत्व तथा संरचना होती है जिसमें सदस्यों का पारस्परिक संबंध, निर्णय प्रक्रिया तथा उनका अनुपालन परिभाषित होता है। सामाजिक आन्दोलन में भाग लेने वाले लोगों के उद्देश्य तथा विचारधाराओं में भी समानता होती है। 

सामाजिक आन्दोलन में एक सामान्य अभिमुखता अथवा किसी परिवर्तन को लाने (या रोकने) का तरीका होता है। ये विशिष्ट लक्षण स्थायी नहीं होते। ये सामाजिक आन्दोलन को जीवन अवधि में बदल सकते हैं।

देश में स्वतंत्रता पूर्व और स्वतंत्रता पश्चात् अनेक आंदोलन चले, जिनमें किसान आंदोलन और श्रमिक आन्दोलनों की भी विशिष्ट भूमिका थी। ये आंदोलन प्रमुखतः शोषकों के विरुद्ध थे। इन पर गाँधीजी का प्रभाव बहुत कम था। 

उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, आंध्रप्रदेश इन आंदोलनों के मुख्य केन्द्र थे। इनमें से कुछ आंदोलन शांतिपूर्ण थे और कुछ में हिंसाएँ हुई वर्तमान में उत्तर प्रदेश तथा महाराष्ट्र में किसान आंदोलन समय-समय पर होते रहे हैं, राजस्थान में भी

अभी हाल ही में एक किसान आंदोलन समाप्त हुआ है। सामाजिक आन्दोलन कई प्रकार के होते हैं। उन्हें निम्न प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है— 

  • प्रतिदानात्मक अथवा रूपांतरणकारी 
  • सुधारवादी तथा क्रांतिकारी।
  • सामाजिक आन्दोलन कदाचित इस संबंध को सर्वश्रेष्ठ ढंग से दिखाते हैं।
  • ये उत्पन्न होते हैं, क्योंकि व्यक्ति तथा सामाजिक समूह अपनी दशा को परिवर्तित करना चाहते हैं।
  • ये संगठित होते हैं तथा अपनी दशा में परिवर्तन हुए समाज को बदलने की चेष्टा करते हैं।

NCERT Class 12 Sociology-II Chapter 8 Notes In Hindi सामाजिक आन्दोलन Easy Pdf

NCERT Class 12 Sociology-II Chapter 8 Notes In Hindi सामाजिक आन्दोलन Easy Pdf
Class12th 
Chapter Nameसामाजिक आन्दोलन
Chapter numberChapter 8
PART B
Book NCERT
SubjectSociology
Medium Hindi
Study MaterialsNotes & Questions answer
Download PDFSociology PART B class 12 chapter 8 pdf

अति लघु उत्तरीय प्रश्न (VERY SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. तेभागा आंदोलन के विषय में लघु टिप्पणी कीजिए।

Ans. सन् 1946-47 के शीतकाल में बंगाल में एक आश्रमक आंदोलन का उमार आया। प्रांतीय किसान सभा ने प्लाउड कमीशन की सिफारिशों के अनुसार, ‘तेभागा लागू करने के लिए जन आंदोलन का आहन किया। ‘तेभागा’ से आशय है-बटाईदार के लिए, उपज का दो-तिहाई, न कि आधा या इससे भी कम । 

कम्युनिस्ट कार्यकर्त्ताओं, जिनमें कई शहरी छात्र थे, गाँवों में पहुँचकर बटाईदारों को संगठित किया।

नवम्बर, 1946 से आंदोलन मजबूत होता गया और इसका केंद्रबिंदु उत्तरी बंगाल बन गया, पर आंदोलन का दमन भी बढ़ता गया। 

साथ ही आंदोलन के तहत आदिवासी रखी और मझोले, गरीब किसानों के आंतरिक तनावों के कारण संघर्ष की कुछ सामाजिक सीमाएँ भी बनती गई। इन सब कारणों से आंदोलन का ह्रास हो गया।

2. श्रमजीवी वर्ग का उदय कैसे हुआ ?

Ans. उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक से बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ तक ब्रिटिश शासन ने भारतीय समाज एवं अर्थव्यवस्था में काफी परिवर्तन ला दिया था। ब्रिटिश साम्राज्यवादी शासकी के औद्योगिक स्वार्थी की सिद्धि एवं उनके पूँजी निवेश के साधनों के माध्यम के रूप में, भारत में रेलवे, उद्योगों, चाय बागानों, खानों आदि का विकास हुआ था जिसने अनिवार्यतः श्रमजीवी वर्ग को जन्म दिया। 

प्रथम विश्वमुख के पहले के मजदूर आंदोलन पर विचार करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि नवजात मजदूर वर्ग ने शोषण एवं उत्पीड़न के विरुद्ध आवाज उठाना और संघर्ष करना उन्नीसवीं शताब्दी में ही प्रारंभ कर दिया था। बीसवीं शताब्दी में यह आवाज संघर्ष में बदल गई जिसके उदाहरण 1907 की रेलवे हड़ताल और 1908 की मुंबई हड़ताल जैसी बड़ी लड़ाइयों में मिलते हैं। 

सन् 1907 में सारे देश में रेलवे हड़ताल हुई थी जिसके माध्यम से मजदूर अपना वेतन बढ़वाने एवं मालिकों के अत्याचार कुछ कम कराने में सफल हुए थे।

3. जन आंदोलन की प्रकृति पर अति लघु टिप्पणी लिखिए। 

Ans. जन-आंदोलन वे आंदोलन होते हैं जो प्रायः समाज के संदर्भ या श्रेणी के क्षेत्रीय अथवा स्थानीय हितों, माँगों और समस्याओं से प्रेरित होकर प्रायः लोकतांत्रिक तरीके से चलाए जाते हैं। 

उदाहरण के लिए 1973 में चलाया गया चिपको आंदोलन, भारतीय किसान यूनियन द्वारा चलाया गया आंदोलन, दलित पैंथर्स आंदोलन, आंध्र प्रदेश में ताड़ी विरोधी आंदोलन, समय-समय पर चलाये गये छात्र आंदोलन, नारी मुक्ति और सशक्तिकरण समर्थित आंदोलन, नर्मदा बचाओ आंदोलन आदि जन आंदोलनों के उदाहरण हैं।

4. उत्तराखंड के कुछ गाँवों ने जंगलों की कटाई के विरोध में किस प्रकार एक प्रसिद्ध आंदोलन का रूप ग्रहण किया ?

Ans. 1973 में पेड़ों को बचाने के लिए सामूहिक कार्यवाही की एक असाधारण घटना ने वर्तमान उत्तराखंड राज्य के स्त्री-पुरुषों की एकजुटता को प्रदर्शित कर वनों की व्यावसायिक कटाई का घोर विरोध किया। इस विरोध का मूल कारण था कि सरकार ने जंगलों की कटाई के लिए अनुमति दी थी। 

गाँव के लोगों ने (विशेषकर महिलाओं) अपने विरोध को जताने के लिए। एक नयी तरकीब अपनायी। इन लोगों ने पेड़ों को अपनी बाँहों में घेर लिया ताकि उन्हें कटने से बचाया जा सके। 

यह विरोध आगामी दिनों में भारत के पर्यावरण आंदोलन के रूप में परिणत हुआ और ‘चिपको आंदोलन’ के नाम से विश्वप्रसिद्ध हुआ। 

5. नामदेव उसाल कौन था ? उनके दलित पैंथर्स समर्थक (पक्षधर) विचारों को उनकी एक मराठी कविता के आधार पर संक्षेप में लिखिए । 

Ans. नामदेव ढसाल मराठी के प्रसिद्ध कवि थे। उन्होंने अनेक रचनाएँ लिखीं जिनमें सेकुछ प्रसिद्ध रचनाएँ अंधेरे में पदयात्रा और सूरजमुखी, अशीशे वाला फकीर थे। विचार- 

(i) नामदेव दलितों के प्रति सच्ची हमदर्दी रखते थे। वे यह मानते थे कि वह सदियों तक दूषित सामाजिक अथवा जाति प्रथा के कारण कष्ट उठाते रहे हैं। 

(ii) वे यह मानते थे कि अब अन्याय रूपी सामाजिक व्यवस्था के अंधकार का अंत और सामाजिक समानता और न्यायरूपी सूरज के उदय होने का समय आ गया है। 

(iii) नामदेव यह मानते थे कि दलित पैंथर्स लोग अपने हक और न्याय के लिए खुद खड़े होंगे और समाज को बदलेंगे। वे प्रगति करके अवकाश को छू लेंगे। वह सूरजमुखी की भाँति प्रगति, न्याय और समानता की ओर अपना रुख करेंगे।

6. स्वतंत्रता के बाद महिलाओं की स्थिति में क्या परिवर्तन आया है ?

Ans. स्वतंत्रता के बाद महिलाओं की स्थिति को असमानता से समानता तक लाने के प्रयास होते रहे हैं। वर्तमान काल में महिलाओं को पुरुषों के साथ समानता का दर्जा है। महिलाएँ किसी भी प्रकार की शिक्षा या प्रशिक्षण को चुनने के लिए स्वतंत्र हैं, 

परंतु योग समाज में अभी भी महिताओं के साथ भेदभाव किया जाता है जिसे दूर किया जाना यद्यपि कानूनी तौर पर महिलाएँ पुरुषों के समान अधिकार रखती है परंतु आदि काल खली आ रही पुरुष प्रधान व्यवस्था में व्यावहारिक रूप में महिलाओं के साथ कभी भी भेदभाव जाता है। 

7. शिक्षा और रोजगार में पुरुषों और महिलाओं की स्थिति का अंतर बताइए।

Ans. पुरुषों और महिलाओं की स्थिति में शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में अंतर है। स्त्री भारता 2001 में 54,16 प्रतिशत थी जबकि पुरुषों की साक्षरता 75.85 प्रतिशत थी। शिक्षा के प्रभाव के कारण रोजगार, प्रशिक्षण और स्वास्थ्य सुविधाओं के उपयोग जैसे क्षेत्रों में महिलाओं है सफलता सीमित है।



8. किन्हीं उन प्रमुख चार नेताओं का उल्लेख कीजिए, जिन्होंने समाज के दलितों के कल्याण के लिए प्रयास किए। 

Ans. (i) ज्योतिराव गोविंद राव फुले ने भारतीय समाज के तथाकथित पिछड़े वर्ग के स्त्याण के लिए आवाज उठाई, संगठन बनाए और लेख लिखे। वे ब्राह्मणवाद के कट्टर विरोधी थे।

(ii) मोहनदास करमचंद गाँधी ने हरिजन संघ, हरिजन नाम से पत्रिका, कुमादूत उन्मूलन और तथाकथित हरिजनों (जिन्हें प्रायः दलित कहा जाना अधिक सही माना जाता है) के कल्पान के लिए बहुत प्रयास किया।

(iii) डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अपने जीवन भर दलितों के उत्थान के लिए कार्य किए संगठन बनाए और भारतीय संविधान की रचना के दौरान दुआछूत उन्मूलन के लिए व्यवस्था कराई। किसी भी रूप में छुआछूत का व्यवहार करने वाले लोगों को दोषी मानकर कानून के अंतर्गत कठोर दंड दिए जाने की व्यवस्था कराई। 

(iv) कांशीराम ने डॉ. भीमराव अंबेडकर जैसे महान समाज-सुधारक को अपना आदर्श और प्रेरणास्रोत मानकर बहुजन समाज पार्टी की रचना की। यह दल उनके संपूर्ण जीवन में कार्यरत रहा। आज भी यह दल कुछ परिवर्तित रूप में तथाकथित दलितों के कल्याण के लिए कार्यरत है।


लघु उत्तरीय प्रश्न (SHORT ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. संयुक्त प्रांत के सन् 1920-21 के किसान आंदोलन पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।

Ans. संयुक्त प्रांत के अदय क्षेत्र में प्रतापगढ़, रायबरेली, सुल्तानपुर और फैजाबाद जिल में 1920-21 में जोरदार किसान आंदोलन हुए। सन् 1918 में उत्तर प्रदेश किसान सभा का आंदोलन एक शांतिपूर्ण आंदोलन के रूप में शुरू हुआ। 

इस आंदोलन में प्रतापगढ़ जिले के किसानों ने बड़ी संख्या में भागीदारी की। किसानों को बाबा रामचंद्र जैसा सक्षम नेता मिला। उन्होंने किसानों को उनकी उचित मांगों के लिए संगठित किया। बाबा रामचन्द्र ने किसानों की एकजुटता के आपन के लिए रामायण से संबंधित धार्मिक मिथकों और जातीय मुहावरों का व्यापक प्रयोग किया। 

लेकिन बाबा रामचन्द्र की सफलता का यही एकमात्र कारण नहीं था। सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों का भी महत्त्वपूर्ण योगदान था। बड़े पैमाने पर रैयतों को भूस्वामिल प्राप्त नहीं था जो मनमानी वसूली विस्थापन और बढ़ते राजस्व के शिकार थे। 

इनकी मांगे बहुत सामान्य थीं- ‘सेस’ और ‘बेगार’ की समाप्ति, ‘बेदखल की गई जमीन पर खेती की मनाही, ‘नाई-धोबी बंद’ द्वारा दमनकारी भूस्वामियों का बहिष्कार। सन् 1920 के अंत तक शांतिपूर्ण किसान आंदोलन अवध के तीन अन्य जिलों में फैल गया। सितंबर, 1920 में किसान आंदोलन की ताकत उभरकर सामने आई जब प्रतापगढ़ में किसानों के एक शांतिपूर्ण एवं विशाल प्रदर्शन से बाबा रामचन्द्र की रिहाई संभव हो गई।

पर वास्तव में जनवरी, 1921 में यह आंदोलन चरम सीमा पर आया। जनवरी और मार्च, 1921 के बीच में रायबरेली, प्रतापगढ़, फैजाबाद और सुल्तानपुर में व्यापक पैमाने पर किसान विक्रोड हुए। कई क्षेत्रों में बाजार टूटना, ताल्लुकेदार सूदखोर पर हमला, पुलिस से टकर किसान आक्रामक कार्यक्रम हुए और यह सभी गाँधी के नाम पर हुआ। 

मार्च, 1921 में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन गवर्नर बटलर ने इस संबंध में अपना मत इस प्रकार रखा, “दक्षिणी अवध के तीन जिलों में हमने क्रांति जैसी स्थितियों की शुरुआत देखी।” पर अप्रैल, 1921 में यह आंदोलन सरकारी दमन और कांग्रेस की अवरोधकारी भूमिका के कारण नष्टप्राय हो गया।

इस साल के अंत में अवध में किसान आंदोलन एक बार फिर उभर आया, जैसे यह ‘अपनी राख से ही चिनगारी बनकर’ सामने आया हो । अब हरदोई, बाराबंकी, बहराईच, सीतापुर और लखनऊ आदि अद्ध के उत्तरी जिले आंदोलन के केन्द्र बन गए। अपने नए रूप में यह ‘एक’ आंदोलन कहलाया। 

इसका प्रेरणा-स्रोत मदारी पासी नामक एक क्रांतिकारी किसान नेता था। आंदोलन की मुख्य माँग थी—बढ़ती महँगाई के कारण उत्पाद, राजस्व (कटाई) का नकद में स्वपांतरण। पर सरकारी दमन से यह आंदोलन भी 1922 की गर्मियों तक समाप्त हो गया।”

 2. आंध्र प्रदेश में किसान आंदोलन के विषय में आप क्या जानते हैं ?

Ans. आदिवासियों के निरंतर जुझारू संघर्ष का सबसे अच्छा उदाहरण आंध्रप्रदेश में गोदावरी के उत्तरी क्षेत्र में मिलता है जो मुख्यतः आदिवासी बहुल क्षेत्र था। यहाँ अगस्त, 1922 से मई, 1924 के बीच अल्लूरी सीताराम राजू के नेतृत्व में गुरिल्ला युद्ध-सा होता रहा। आंदोलन का नायक राजू आंध्र में लोक कथाओं का पात्र बन गया।

यह आंदोलन विभिन्न तत्त्वों के संयोग से विकसित हुआ और आदिम विद्रोह आधुनिक राष्ट्रवाद से जुड़ गया। राजू ने अपने को ‘बुलेट प्रूफ’ होने का दावा किया, इसके साथ ही उसने ‘कल्कि अवतार’ के भी अनिवार्य आगमन की घोषणा की। राजू ने गाँधीजी की प्रशंसा की, पर उसने हिंसा को भी अनिवार्य बताया। 

उसके नेतृत्व में आदिवासियों में अंग्रेजों और भारतीयों के बीच अंतर करने की उल्लेखनीय प्रवृत्ति दिखाई दी। आदिवासियों की समस्याएँ-शिकायतें वही थीं जो इस क्षेत्र में पहले भी कई आंदोलनों का कारण बनी थीं। सूदखोरी, वन अधिकारों पर नियंत्रण, सरकारी कर्मचारियों द्वारा आदिवासियों से बेगार करवाना आदि असंतोष के मुख्य कारण थे।

आंदोलन में गुरिल्ला युद्ध की कार्यनीति का सक्षमता से उ-योग किया गया। इस आंदोलन का जनाधार भी व्यापक था। मालावार पुलिस और असम राइफल्स ने दो साल में और 15 लाख रुपये व्यय करके आंदोलन का दमन किया।

सन् 1930 के दौरान कृष्णा जिले में दुग्गीलाल बलरामकृष्णैया जैसे स्थानीय नेताओं के नेतृत्व में लगानबंदी अभियान छेड़ने के लिए कांग्रेस पर दबाव डाला गया। सन् 1931 में नेल्लौर में चराई शुल्क के विरुद्ध वन सत्याग्रह हुआ। इस शुल्क के जरिए जमींदार किसानों के चारे और लकड़ी के पारंपरिक अधिकारों में कटौती कर रहा था। 

आंदोलन का नेतृत्व एन.वी. और एन. जी. रंगा ने किया। सितंबर, 1931 में कृष्णा और गुंटूर जिलों में महाजन विरोधी परी का उभार आया। इसमें काफी संख्या में जनता सम्मिलित हुई। रामानायडू

3. तेलंगाना आंदोलन पर टिप्पणी कीजिए। 

Ans. तेलंगाना का किसान संघर्ष कई मायनों में पूर्ववर्ती संघर्षो की तुलना में काफी के बड़ा रहा। जुलाई, 1946 से अक्टूबर, 1951 के बीच तेलंगाना में आधुनिक भारतीय स में किसानों के सबसे व्यापक गुरिल्ला युद्ध का सभी रहा। यह आंदोलन अपने उभार 16,000 वर्ग मील, 3000 गाँवों और 30 लाख की आबादी में फैल गया। 

इस क्षेत्र में सामंती वन चरम सीमा पर था और राजनीतिक लोकतांत्रिक अधिकरों का भयंकर दमन होता था। सम और उच्चवर्गीय हिंदू ‘देशमुख’, या ‘पैगा’, ‘जागीरदार’, ‘बंजरदार’, ‘मक्तेदार’ जैसे दादी उत्पीड़क निम्न वर्गीय, आदिवासी किसानों या कर्ज में दबे लोगों से ‘वेट्टी’ वसूलते ”बेट्टी’ प्रथा जबर्दस्ती बेगार या पैसा लेने की प्रथा है।

जुलाई 1946 की एक चिंगारी ने तेलंगाना में कृषक विद्रोह की आग लगा दी। जनगाँव ४ देशमुख रामचंद्र रेड्डी ऐलम्मा नामक घोबिन के खेत छीन लेना चाहता था। देशमुख के गुंडों इसका विरोध कर रहे एक ग्रामीण कार्यकर्त्ता डोड्डी कुमारय्या की हत्या कर दी। इस घटना तेलंगाना के किसानों की क्रोधाग्नि भड़क उठी। किसान संगठित रूप से आंदोलन करने लगे।

 हम का मुकाबला करने के लिए सशस्त्र गुरिल्ला दस्ते बन गए। ये दस्ते कई गाँवों में फैल गए। ई गाँवों में ‘वेट्टी’ अपने आप रुक गई, खेत की मजदूरी बढ़ गई, देखमुख और अधिकारी द छोड़कर भाग गए। तेलंगाना आंदोलन के एक नेता पी. सुंदरैय्या ने इसका विस्तार से प्रमाणिक वर्णन किया है। पर सितंबर, 1948 के बाद भारतीय सेना ने सफलतापूर्वक आंदोलन दमन शुरू किया और कम्युनिस्ट प्रभाव कम होने लगा। पर कम्युनिस्ट अपनी हार के बावजूद इस क्षेत्र में कई सालों तक प्रभावी बन गये। 

4. जन आंदोलनों की कमियों एवं त्रुटियों को संक्षेप में लिखिए।

Ans. (i) जन-आंदोलनों द्वारा लामबंद की जाने वाली जनता सामाजिक और आर्थिक रूप सेदचित तथा अधिकारहीन वर्गों से संबंध रखती है। जन आंदोलनों द्वारा अपनाए गए वैर-तरीकों से मालूम होता है कि रोजमर्रा की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में इन वंचित समूहों को अपनी कहने का पर्याप्त मौका नहीं मिलता था।

(ii) किंतु कुल मिलाकर सार्वजनिक नीतियों पर इन आंदोलनों का कुल असर काफी समित रहा है। इसका एक कारण तो यह है कि समकालीन सामाजिक आंदोलन किसी एक मुद्दे के इर्द-गिर्द ही जनता को लामबंद करते हैं। इस तरह वे समाज के किसी एक वर्ग का ही प्रतिनिधित्व कर पाते हैं।

इसी सीमा के चलते सरकार इन आंदोलनों की जायज मांगों को ठुकराने का साहस कर पाती है। लोकतांत्रिक राजनीति वंचित वर्ग के व्यापक गठबंधन को लेकर ही चलती है जबकि जन-आंदोलनों के नेतृत्व में यह बात संभव नहीं हो पाती।

(iii) राजनीतिक दलों को जनता के विभिन्न वर्गों के बीच सामंजस्य बैठाना पड़ता है, जन-आंदोलन का नेतृत्व भी ऐसे मुद्दों को सीमित ढंग से ही उठा पाता है। 

(iv) विगत वर्षों में राजनीतिक दलों और जन-आंदोलनों का आपसी संबंध कमजोर होता गया है। इससे राजनीति में एक सूनेपन का माहौल पनपा है। हाल के वर्षों में, भारत की राजनीति में यह एक बड़ी समस्या के रूप में उभरा है। 

5. नर्मदा बचाओ आंदोलन का मूल्यांकन कीजिए।

Ans. (i) लोगों द्वारा 2003 में स्वीकृत राष्ट्रीय पुनर्वास नीति को नर्मदा बचाओ जैसे सामाजिक आंदोलन की उपलब्धि के रूप में देखा जा सकता है। परंतु सफलता के साथ ही नर्मदा बचाओ आंदोलन को बाँध के निर्माण पर रोक लगाने की माँग उठाने पर तीखा विरोध भी झेलना पड़ा है।

(ii) आलोचकों का कहना है कि आंदोलन का अड़ियल रवैया विकास की प्रक्रिया, पानी की उपलब्धता और आर्थिक विकास में बाधा उत्पन्न कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सरकार को बांध का काम आगे बढ़ाने की हिदायत दी है लेकिन साथ ही उसे यह आदेश भी दिया गया है कि प्रभावित लोगों का पुनर्वास सही ढंग से किया जाए।

(iii) नर्मदा बचाओ आंदोलन दो से भी ज्यादा दशकों तक चला। आंदोलन ने अपनी मांग रखने के लिए हर संभव लोकतांत्रिक रणनीति का इस्तेमाल किया। आंदोलन ने अपनी बात न्यायपालिका से लेकर अंतर्राष्ट्रीय मंचों तक से उठायी। आंदोलन की समझ को जनता के सामने रखने के लिए नेतृत्व ने सार्वजनिक रैलियों तथा सत्याग्रह जैसे तरीकों का भी प्रयोग किया। परंतु विपक्षी दलों सहित मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों के बीच आंदोलन कोई खास जगह नहीं बना पाया।

(iv) वास्तव में, नर्मदा आंदोलन की विकास रेखा भारतीय राजनीति में सामाजिक आंदोलन और राजनीतिक दलों के बीच निरंतर बढ़ती दूरी को बयान करती है। उल्लेखनीय है कि नौवे दशक के अंत तक पहुँचते-पहुँचते नर्मदा बचाओ आंदोलन से कई अन्य स्थानीय समूह और आंदोलन भी आ जुड़े।

ये सभी आंदोलन अपने-अपने क्षेत्रों में विकास की वृहत् परियोजनाओं का विरोध करते थे। इस समय के आस-पास नर्मदा बचाओ आंदोलन देश के विभिन्न हिस्सो में चल रहे आंदोलनों के गठबंधन का अंग बन गया। 

6. भारतीय किसान यूनियन, किसानों की दुर्घटना की तरफ ध्यान आकर्षित करने वाला अग्रणी संगठन है। नब्बे के दशक में इसने किन मुद्दों को उठाया और इसे कहाँ तक सफलता मिली ? 

Ans. भारतीय किसान यूनियन द्वारा उठाए गए मुद्दे-

(i) बिजली की दरों में बढ़ोत्तरी का विरोध किया।

(ii) 1990 के दशक से भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के प्रयास हुए और इस क्रम में नगदी फसल के बाजार को संकट का सामना करना पड़ा। भारतीय किसान यूनियन ने गन्ने और गेहूँ की सरकारी और खरीद मूल्य में बढ़ोत्तरी करने का निर्णय लिया।

(iii) कृषि उत्पादनों के अंतर्राज्यी आवाजाही पर लगी पाबंदियाँ हटाने। 

(iv) समुचित दर पर गारंटीशुदा बिजली आपूर्ति करने । (v) किसानों के लिए पेंशन का प्रावधान करने की माँग की। 

सफलताएँ – 

(i) मेरठ में किसान यूनियन के नेता जिला समाहर्त्ता के दफ्तर के बाहर तीन हफ्तों तक डेरा डाले रहे। इसके बाद इनकी माँग मान ली गई। किसानों का यह बड़ा अनुशासित घरना था और जिन दिनों वे धरने पर बैठे थे उन दिनों आस-पास के गाँवों से उन्हें निरंतर राशन पानी मिलता रहा। मेरठ के इस धरने को ग्रामीण शक्ति का या कहें कि काश्तकारों की शक्ति का एक बड़ा प्रदर्शन माना गया।

(ii) 1990 के दशक के शुरुआती सालों तक बीकेयू ने अपने को सभी राजनीतिक दलों से दूर रखा था। वह अपने सदस्यों की संख्या बल के दम पर राजनीति में एक दबाव समूह की तरह सक्रिय थी। इस संगठन के राज्यों में मौजूद अन्य किसान संगठनों को साथ लेकर अपनी कुछ माँगें मनवाने में सफलता पाई। इस अर्थ में यह किसान आंदोलन के दशक में सबसे ज्यादा सफल सामाजिक आंदोलन था।

इस आंदोलन की सफलता के पीछे इसके सदस्यों की राजनीतिक मोल-भाव की क्षमता का हाथ था। यह आंदोलन मुख्य रूप से देश के समृद्ध राज्यों में सक्रिय था। खेती को अपनी जीविका का आधार बनाने वाले अधिकांश भारतीय किसानों के विपरीत बीकेयू जैसे संगठनों के सदस्य बाजार के लिए नगदी फार उपजाते थे। बीकेयू की तरह राज्यों के अन्य किसान संगठनों

अपने सदस्य उन समुदायों के बीच से बनाए जिनका क्षेत्र की चुनावी राजनीति में रसूख था। राष्ट्रका शेतकारी संगठन और कर्नाटक का रैयत संघ ऐसे ही किसान संगठनों के अन्य उदाहरण हैं। 

7. आंध्र प्रदेश में चले शराब विरोधी आंदोलन ने देश का ध्यान कुछ गंभीर मुद्दों की खींचा। वे मुद्दे क्या थे ? 

Ans. आंध्रप्रदेश में ताड़ी-विरोधी आंदोलन का नारा बहुत साधारण था-“ताड़ी की बिक्री करो लेकिन इस साधारण नारे ने क्षेत्र के व्यापक सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों हवा महिलाओं के जीवन को गहरे प्रभावित किया। 

(i) ताड़ी व्यवसाय को लेकर अपराध एवं राजनीति के बीच एक गहरा नाला बन गया था। राज्य सरकार को ताड़ी की बिक्री से काफी राजस्व की प्राप्ति होती थी, इसलिए वह इस पर प्रतिबंध नहीं लगा रही थी। 

(ii) स्थानीय महिलाओं के समूहों ने इस जटिल मुद्दे को अपने आंदोलन में उठाना शुरू किया। वे घरेलू हिंसा के मुद्दे पर भी खुली तौर पर चर्चा करने लगीं। आंदोलन ने पहली बार महिलाओं को घरेलू हिंसा जैसे निजी मुद्दों पर बोलने का मौका दिया।

(iii) कालान्तर में ताड़ी-विरोधी आंदोलन महिला आंदोलन का एक हिस्सा बन गया। इससे पहले घरेलू हिंसा, दहेज-प्रथा, कार्यस्थल एवं सार्वजनिक स्थानों पर यौन उत्पीड़न के खिलाफ कम करने वाले महिला समूह आमतौर पर शहरी मध्यवर्गीय महिलाओं के बीच ही सक्रिय थे।

और वह बात पूरे देश लागू होती थी। महिला समूहों के इस सतत कार्य से यह समझदारी विकसित होनी शुल कठिन है। की कि औरतों पर होने वाले अत्याचार और लैंगिक भेदभाव का मामला खासा

(iv) आठवें दशक के दौरान महिला आंदोलन परिवार के अंदर और उसके बाहर होने वाली मैन-हिंसा के मुद्दों पर केंद्रित रहा। इन समूहों ने दहेज प्रथा के खिलाफ मुहिम चलाई और लैंगिक समानता के सिद्धांत पर आधारित व्यक्तिगत एवं संपत्ति कानूनों की मांग की।

(v) इस तरह के अभियानों ने महिलाओं के मुद्दों के प्रति समाज में व्यापक जागरूकता पैदा की। धीरे-धीरे महिला आंदोलन कानूनी सुधारों से हटकर सामाजिक टकराव के मुद्दों पर भी ते तौर पर बात करने लगा।

 (vi) नीवें दशक तक आते-आते महिला अधिवेशन समान राजनीतिक प्रतिनिधित्व की बात करने लगा था। आपको ज्ञात ही होगा कि संविधान के 73वें और 74वें संशोधन के अंतर्गत महिलाओं को स्थानीय राजनीतिक निकायों में आरक्षण दिया गया है। 

8. क्या आंदोलन और विरोध की कार्यवाहियों से देश का लोकतंत्र मजबूत होता है ? अपने उत्तर की पुष्टि के उदाहरण दीजिए। 

Ans. अहिंसक और शांतिपूर्ण तरीके से कानून के दायरे में रहकर आंदोलन करने से देश का लोकतंत्र मजबूत होता है। हम अपने उत्तर की पुष्टि में निम्न उदाहरण दे सकते हैं-

(i) चिपको आंदोलन अहिंसक, शांतिपूर्ण चलाया गया और यहा एक व्यापक जनआंदोलन इससे पेड़ों की कटाई, वनों का उजड़ना रुका। पशु-पक्षियों, गिरिजनों को जल, जंगल, जमीन और स्वास्थ्यवर्धक पर्यावरण मिला। सरकार लोकतांत्रिक मांगों के सामने झुकी। 

(ii) वामपंथियों द्वारा शांतिपूर्ण चलाए गए किसान और मजदूर आंदोलन द्वारा जन साधारण में जागृति, राष्ट्रीय कार्यों में भागीदारी और सरकार को सर्वहारा वर्ग की उचित मांगों के लिए उगाने में सफलता मिली।

(iii) दलित पैंथर्स नेताओं द्वारा चलाए गए आंदोलनों, लिखे गए सरकार विरोधी कारों की ताओं और रचनाओं ने आदिवासी, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और पिछड़ी जातियों में चेतना पैदा की। दलित पैंथर्स राजनैतिक दल और संगठन बने। जाति भेद-भाव और छुआछूत को धक्का लगा। समाज में समानता, स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय, आर्थिक न्याय, राजनैतिक न्याय को सुदृढ़ता मिली। 

(iv) ताड़ी विरोधी आंदोलन ने नशाबंदी और मद्य निषेध के विरोध में वातावरण तैयार किया। महिलाओं से संबंधित अनेक समस्याएँ या मामले (यौवन उत्पीड़न, घरेलू समस्या, दहेज प्रथा और महिलाओं को विधायिकाओं में आरक्षण दिए जाने) उठे। संविधान में कुछ संशोधन हुए और कानून बनाए गए। 

9. दलित-पैंथर्स ने कौन-से मुद्दे उठाए ?

Ans. बीसवीं शताब्दी के सातवें दशक के शुरुआती सालों में शिक्षित दलितों की पहली पीढ़ी ने अनेक मंचों से अपने हक की आवाज उठायी। इनमें ज्यादातर शहर की झुग्गी बस्तियों मैं पलकर बड़े हुए दलित थे। दलित हितों की दावेदारी के इसी क्रम में महाराष्ट्र में दलित युवाओं का एक संगठन ‘दलित पैंथर्स’ 1972 में बना।

(i) आजादी के बाद के सालों में दलित समूह मुख्यतया जाति आधारित असमानता और भौतिक साधनों के मामले में अपने साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ लड़ रहे थे। वे इस बात को लेकर सचेत थे कि संविधान में जाति आधारित किसी भी तरह के भेद-भाव के विरुद्ध गारंटी दी गई है।

(ii) आरक्षण के कानून तथा सामाजिक न्याय की ऐसी ही नीतियों का कारगर क्रियान्वयन इनकी प्रमुख माँग थी।

(ii) भारतीय संविधान में छुआछूत की प्रथा को समाप्त कर दिया गया है। सरकार ने इसके अंतर्गत साठ और सत्तर के दशक में कानून बनाए। इसके बावजूद पुराने जमाने में जिन जातियों को अछूत माना गया था, उनके साथ इस नए दौर में भी सामाजिक भेदभाव तथा हिंसा का बरताव कई रूपों में जारी रहा।

(iv) दलितों की बस्तियाँ मुख्य गाँव से अब भी दूर होती थीं। दलित महिलाओं के साथ यौन-अत्याचार होते थे। जातिगत प्रतिष्ठा की छोटी-मोटी बात को लेकर दलितों पर सामूहिक जुल्म ढाये जाते थे। दलितों के सामाजिक और आर्थिक उत्पीड़न को रोक पाने में कानून की व्यवस्था नाकाफी साबित हो रही थी। 

10. संक्षेप में गैर-सरकारी संगठनों की मजदूर कल्याण, स्वास्थ्य-शिक्षा, नागरिक अधिकार, नारी-उत्पीड़न तथा पर्यावरण से संबंधित उनके पहलुओं की भूमिका का उल्लेख कीजिए।

Ans. भारत में सरकार के साथ-साथ गैर-सरकारी संगठन भी विभिन्न सामाजिक समस्याओं से जुड़े मामलों को उठाते रहे हैं। ये मामले, कल्याण, पर्यावरण, महिला कल्याण आदि के साथ जुड़े रहे हैं। 

भारत में गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका, मजदूरों के कल्याण, स्वास्थ्य के विकास, शिक्षा के प्रसार और नागरिकों के अधिकारों के रक्षण, नारी उत्पीड़न की समाप्ति, कृषि के विकास, वृक्षारोपण आदि के क्षेत्र में व्यापक रूप में रही है। गैर-सरकारी संगठनों में- 

(a) अंतर्राष्ट्रीय चैंबर ऑफ कॉमर्स, 

(b) रेडक्रॉस सोसाइटी, 

(c) एमनेस्टी इंटरनेशलन, 

(d) मानवाधिकार आयोग आदि संगठन विश्व स्तर पर सभी देशों में फैले हुए हैं। 

इन गैर-सरकारी संगठनों ने विभिन्न क्षेत्रों में अपनी भूमिका द्वारा निम्नलिखित विकास किया- 

(i) इन गैर-सरकारी संगठनों ने मानव जाति के अधिकारों की रक्षा की। विश्व के विभिन्न देशों में इनकी स्थापित शाखाएँ विभिन्न सरकारों द्वारा मानव अधिकारों की रक्षा करवाती है।

(ii) इन गैर-सरकारी संगठनों ने विभिन्न देशों में वृक्षारोपण में सहयोग दिया।

(iii) इन गैर-सरकारी संगठनों ने रोजगारोन्मुख योजना चलाकर मजदूरों को विभिन्न कार्यों का प्रशिक्षण दिया।

(iv) वे गैर-सरकारी संगठन स्वास्थ्य के क्षेत्र में दवा छिड़काव, टीकाकरण, विभिन्न प्रकार की दवाओं के वितरण और बीमारियों की रोकथाम में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। 

(v) इन गैर-सरकारी संगठनों ने कृषि के क्षेत्र में उन्नति के लिए सरकारों से निवेदन कर विकासात्मक कार्य करवाया। खाद, बीज आदि की व्यवस्था में योगदान दिया।

(vi) विभिन्न गैर-सरकारी संगठनों ने बच्चों की शिक्षा के लिए शिक्षण कार्य किया एवं सामग्रियाँ वितरित कीं। इस तरह गैर-सरकारी संगठनों ने बच्चों की शिक्षा के लिए शिक्षण कार्य किया एवं सामग्रियाँ वितरित कीं। इस तरह गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका मानव जाति के विकास और समस्याओं के समाधान में व्यापक रूप से रही है।


दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (LONG ANSWER TYPE QUESTIONS)


1. आंध्र प्रदेश में शराब-विरोधी आंदोलन क्यों और कब शुरू हुआ। इसने कैसे एक महिला आंदोलन का रूप ले लिया ?

Ans. (i) दक्षिणी राज्य आंध्र प्रदेश में ताड़ी-विरोधी आंदोलन महिलाओं का एक स्वतः स्फूर्त आंदोलन था। ये महिलाएँ अपने आस-पड़ोस में मदिरा की बिक्री पर पाबंदी की माँग कर रही थीं। वर्ष 1992 के सितंबर और अक्टूबर माह में ग्रामीण महिलाओं ने शराब के खिलाफ लड़ाई छेड़ रखी थी। यह लड़ाई माफिया और सरकार दोनों के खिलाफ थी। इस आंदोलन ने

ऐसा रूप धारण किया कि इसे राज्य में ताड़ी-विरोधी आंदोलन के रूप में जाना गया।

(ii) आंध्र प्रदेश के नेल्लोर जिले के एक-दराज के गाँव दुबरगंटा में 1990 के शुरुआती दौर में महिलाओं के बीच प्रौढ़-साक्षरता कार्यक्रम चलाया गया जिसमें महिलाओं ने बड़ी संख्या में पंजीकरण कराया। कक्षाओं में महिलाएँ घर के पुरुषों द्वारा देशी शराब, ताड़ी आदि पीने की शिकायतें करती थीं। ग्रामीणों को शराब की गहरी लत लग चुकी थी। 

(iii) कालांतर में यह आंदोलन महिला आंदोलन के रूप में सक्रिय हुआ। ताड़ी विरोधी आंदोलन द्वारा महिलाओं ने अपने जीवन से जुड़ी सामाजिक समस्याओं जैसे-दहेज प्रथा, घरेलू इस घर से बाहर पौन उत्पीड़न, समाज में महिलाओं पर हो रहे अत्याचार, परिवार में लैंगिक सभाव आदि के विरुद्ध व्यापक जागरूकता पैदा की।

(iv) महिलाओं ने पंचायतों, विधान सभाओं, संसद में अपने लिए एक-तिहाई स्थानों के आरक्षण और सरकार के सभी विभागों जैसे- वायुमान, पुलिस सेवाएँ आदि में समान अवसरों और पदोन्नति की बात की। उन्होंने न केवल धरने दिए, प्रदर्शन किए, जूलूस निकाले बल्कि विभिन्न मुद्दों पर महिला आयोग, राष्ट्रीय आयोग और लोकतांत्रिक मंचों से भी आवाज उठाई। 

(v) संविधान में 73 व 74वाँ संशोधन हुआ। स्थानीय निकाय में महिलाओं के स्थान आरक्षित हो गए। विधानसभाओं और संसद में आरक्षण के लिए विधेयक अभी पारित नहीं हुए है। अनेक राज्यों में शराब बंदी लागू कर दी गई है और महिलाओं के विरुद्ध अत्याचारों पर कठोर दंड दिए जाने की व्यवस्था की गई है।

2. भारत में स्त्री उत्थान के लिए उठाए गए कदमों का वर्णन कीजिए। 

Ans. स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में स्त्रियों की दशा में सुधार लाने के लिए बहुत-से कदम उठाए गए हैं, जिनमें से कुछ निम्नलिखित हैं- 

(i) महिला अपराध प्रकोष्ठ तथा परिवार न्यायपालिका- यह महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों को रोकने के लिए सुनवाई करते हैं। विवाह, तलाक, दहेज, पारिवारिक मुकदमे भी सुनते हैं।

(ii) सरकारी कार्यालयों में महिलाओं की भर्ती लगभग सभी सरकारी कार्यालयों में महिला कर्मचारियों की नियुक्ति की जाती है। अब तो वायुसेना, नौसेना तथा थलसेना और सशस्त्र सेनाओं की तीनों में अधिकारी पदों पर स्त्रियों को भर्ती पर लगी रोक को हटा लिया गया है। सभी क्षेत्रों में महिलाएँ कार्य कर रही हैं। 

(iii) स्त्री शिक्षा-स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भारत में स्त्री शिक्षा का काफी विस्तार हुआ है।

(iv) राष्ट्रीय महिला आयोग 1990 के एक्ट के अंतर्गत एक राष्ट्रीय महिला आयोग की स्थापना की गई है। महाराष्ट्र, गुजरात, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, दिल्ली, पंजाब, कर्नाटक, असम एवं गुजरात राज्य में भी महिला आयोगों की स्थापना की जा चुकी है। 

(v) महिला आरक्षण महिलाएँ कुल जनसंख्या की लगभग 50 प्रतिशत हैं परंतु सरकारी कार्यालयों, संसद, राज्य विधानमंडलों आदि में इनकी संख्या बहुत कम है। 1993 के 73वें 74वें संविधान संशोधनों द्वारा पंचायती राज संस्थाओं तथा नगरपालिकाओं में एक-तिहाई स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित कर दिए गए हैं।  

3. मंडल आयोग की रिपोर्ट की सिफारिशें, उनके कार्यान्वयन और उनके परिणामों पर एक लेख लिखिए ।

Ans.

 I. नियुक्ति भारतीय संविधान की धारा 304 (1) के अन्तर्गत 1978 में मोरारजी देसाई की अगुवाई वाली जनता पार्टी की सरकार की सिफारिश पर देश के राष्ट्रपति द्वारा बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल की अध्यक्षता में दुबारा पिछड़ा वर्ग आयोग (याद रहे पहला पिछड़ा वर्ग आयोग काका कालेलकर की अध्यक्षता में नियुक्त किया गया) गठित किया गया। इसके पाँच अन्य सदस्य भी थे।

मंडल आयोग ने पिछड़े वर्ग की पहचान के लिए जाति को उचित आधार माना। हिंदु समाज में पिछड़े वर्गों को पहचानने के लिए आयोग ने 11 संकेतों का निर्माण किया हैं-चार सामाजिक जाति-आधारित पिछड़ेपन, तीन शैक्षणिक पिछड़ेपन और चार आर्थिक पिछड़ेपन को स्थापित करते हैं। इन आधारों को अलग-अलग महत्त्व देते हुए आयोग ने भारत की कुल जनसंख्या के बड़े भाग अर्थात् 52 प्रतिशत को अन्य पिछड़ी जातियों में गिना अर्थात् अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों से अतिरिक्त अन्य ।

II. मंडल आयोग की सिफारिशें पिछड़ी जातियों को दी जाने वाली रियायतें कोई आसान कार्य नहीं था। कुछ राज्यों में पिछड़ी जातियों तथा गरीब वर्गों के लिए आरक्षण लागू करना आसान था, परंतु इसने आरक्षण विरोधियों द्वारा उत्पन्न विरोध को भी सामने खड़ा कर दिया।

1978 में बिहार में ‘अग्रणीय ब्लाक’ तथा ‘पिछड़ी जातियों’ के मध्य हिंसात्मक विरोध हुआ। 1980 में गुजरात, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और यहाँ तक कि उत्तर प्रदेश में भी यही हाल था। इसीलिए, पिछड़ी जातियों की स्थिति के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए जनता सरकार ने 1978 में मंडल की अध्यक्षता में एक आयोग को गठित किया था। इस आयोग द्वारा

निम्नलिखित सिफारिशें की गई-

 (i) पिछड़ी जातियों को सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण दिया जाए।

(ii) केंद्र तथा राज्य सरकारों द्वारा संचालित सभी वैज्ञानिक, तकनीकी और व्यावसायिक संस्थानों में पिछड़ी जातियों के लिए 27 प्रतिशत सीटें आरक्षित की जाएँ। 

(iii) पिछड़े वर्गों को वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए सरकार द्वारा अलग से वित्तीय संस्थाओं की स्थापना की जाए। भारत सरकार ने 7 अगस्त, 1990 को इन सिफारिशों को लागू करने की घोषणा की। 

III. मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की घोषणा और प्रतिक्रिया मंड आयोग ने अपनी रिपोर्ट सन् 1980 में पेश की थी तथा संसद के सामने अप्रैल 1982 में रखा गया था। कॉंग्रेस सरकार ने इस प्रतिबेदन को न तो अस्वीकृत किया और न ही स्पष्ट रूप से स्वीकार किया। वास्तव में इसे चुपचाप अलमारी में रख दिया गया था।

जनवरी 1990 में सत्ता में आई राष्ट्रीय मोर्चा सरकार ने आयोग की सिफारिशों को लागू करने के कदम उठाए। इसने सभी राज्य सरकारों से उनके विचार पूछे तथा अंततः प्रधानमंत्री बी. पी. सिंह ने 7 अगस्त, 1990 को घोषणा की और 17 अप्रैल, 1990 को नौकरियों में 27% आरक्षण की मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के औपचारिक आदेश जारी कर दिए गए। 

IV. मंडल और आरक्षण का विरोध-मंडल आयोग की रिपोर्ट ने एक भयंकर विवाद हो उत्पन्न कर दिया। एक विचित्र बात यह है कि वविाद दक्षिणपंथी तथा वामपंथी के मध्य नहीं हड़ा जा रहा है; अपितु विवाद के दोनों तरफ, दोनों ही प्रकार के लोग उपस्थित हैं।  

4. स्वतंत्रता पूर्व मजदूर आंदोलन के इतिहास पर प्रकाश डालिए।

Ans. उन्नीसवीं शताब्दी एवं बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ तक ब्रिटिश शासन ने भारतीय समाज एवं अर्थव्यवस्था में काफी परिवर्तन ला दिया था। ब्रिटिश साम्राज्यवादी शासकों के औद्योगिक स्वार्थ की सिद्धि एवं उनके पूँजी निवेश के साधनों के माध्यम के रूप में भारत में रेलवे, उद्योगों, चाय बागानों आदि का विकास हुआ था जिसने अनिवार्यतः श्रमजीवी वर्ग को जन्म दिया। 

प्रथम विश्वयुद्ध के पहले मजदूर आंदोलन पर विचार करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि नवजात मजदूर वर्ग ने शोषण एवं उत्पीड़न के विरुद्ध आवाज उठाना और संघर्ष करना उन्नीसवी शताब्दी में ही प्रारंभ कर दिया था। बीसवीं शताब्दी में यह आवाज संघर्ष में बदल गई जिसके उदाहरण 1907 के रेलवे हड़ताल और 1908 की मुंबई हड़ताल जैसी लड़ाइयों में मिलते हैं। 

सन् 1907 में सारे देश में रेलवे हड़ताल हुई थी जिसके माध्यम से मजदूर अपना वेतन बढ़वाने एवं मालिकों के अत्याचार कुछ कम कराने में सफल हुए थे किंतु बीसवीं सदी के प्रथम दशक की सबसे महत्त्वपूर्ण हड़ताल थीं-22 जुलाई 1908 को तिलक को दिए गए 6 साल के कारावास दंड के विरुद्ध मुंबई के मजदूरों की हड़ताल। वस्तुतः मुंबई के मजदूरों ने शहर के श्रमजीवियों एवं देश-प्रेमियों से मिलकर तिलक पर मुकदमा शुरू होने के समय से ही प्रारंभ कर दिया था। यह उनकी राजनीतिक हड़ताल थी।

 इसमें उन्होंने ब्रिटिश सेना के साथ मुंबई की सड़कों पर लड़ाई की थी। मुंबई के श्रमजीवियों का यह संग्राम भारत के स्वाधीनता संग्राम का एक गौरवमय अध्याय था। बीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक में राष्ट्रीय आंदोलन की जो लहर आई थी, मजदूर वर्ग उससे अछूता नहीं था। बंगाल उस समय बंग-भंग के कारण प्रबल राजनीतिक आंदोलन का केन्द्र था।

 इस आंदोलन से यहाँ का मजदूर वर्ग भी प्रभावित था। विश्वयुद्ध-काल से पूर्व मजदूर वर्ग मूलतः असंगठित ही था। उनके संघर्षों के दौरान उनके संगठन अवश्य बनने लगे थे, किन्तु अभी वे अपनी शैशवास्था में ही थे किंतु प्रथम विश्वयुद्ध एवं उसी के दौरान रूस की समाजवादी क्रांति ने मिलकर भारत के मजदूर वर्ग एवं उनके आंदोलन में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन कर दिया। युद्ध ने

मजदूर वर्ग पर बहुत असर डाला था। प्रथम विश्वयुद्ध का एक परिणाम यह हुआ कि भारत में कल-कारखानों का उत्पादन बढ़ गया और औद्योगिक प्रगति हुई। उत्पादन की यह वृद्धि कारखानों को दिन-रात चलाने से एवं मजदूरों पर ज्यादा बोझ डालकर हुई थी। युद्ध के दौरान बहुत से नए उद्योग खुले एवं कई सीमित पूँजी निवेश कंपनियाँ स्थापित हुई।

 इस दौरान चाय बागानों, कोयला खानों, कपड़ा मिलों, लोहे के कारखानों आदि का तेजी से विकास हुआ और इसमें काम करने वाले मजदूरों की संख्या में भी अभूतपूर्व वृद्धि हुई। यह उन्नति युद्ध-जनित परिस्थितियों का परिणाम थी। मिल मालिकों के दौरान असीमित लाभ कमाया किंतु मजदूरों का वास्तविक वेतन बढ़ने के बजाय औसतन कम हो गया। 

मिल मालिकों द्वारा कमाए गए अत्यधिक लाभ का एक अन्य कारण कच्चे माल की कीमत में आकाश-पाताल का अंतर था। दूसरे शब्दों में यह लाभ कच्चा माल पैदा करने वाले किसानों के शोषण का परिणाम था। मजदूरों एवं किसानों की इस गिरती हुई दशा के कारण युद्ध की अवधि में एवं उसके बाद श्रमजीवियों एवं ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के बीच मतभेद गहरे हो गए।

5. स्वतंत्रता पूर्व किसान आंदोलनों के कारणों पर संक्षेप में प्रकाश डालिए। 

Ans. सन् 1920-21 में देश में किसान आंदोलन ने भी जोर पकड़ा। ब्रिटिश शासकों के विरुद्ध कृषकों का संघर्ष प्रायः उतना ही पुराना था जितना ब्रिटिश शासन। ब्रिटिश के अंतर्गत कृषक भी दरिद्र से दरिद्र होते जा रहे थे। बंगाल में ब्रिटिश शासन के प्रारंभ से ही यथासंभव अधिकतम भू-राजस्व उगाहने की क्लाइव और हेस्टिंगस की नीति के कारण बहुत विध्वंस हुआ था। 

स्थायी एवं अस्थायी बंदोबस्त वाले जमींदारी क्षेत्रों में कितनों से जमींदारों की दया पर छोड़ दिया गया जिन्होंने लगान को असहनीय सीमाओं तक बढ़ा दिया तथा उन्हें राजस्व (महसूल) देने एवं बेगार करने के लिए मजबूर किया रेवतवाड़ी एवं महालवाड़ी क्षेत्रों में सरकार ने जमीदारो स्थान ले लिया एवं अत्यधिक भू-राजस्व निर्धारित किया। यह उन्नीसवीं सदी में दरिद्रता की एवं कृषि की अवनति के मुख्य कारणों में से एक सिद्ध हुआ। कृषि सुधार पर सरकार बहुत कम व्यय किया। 

अत्यधिक भू-राजस्व की रकम वसूल करने के कठोर तरीके ने उसके हानिकारक परिणामों को और भयंकर बना दिया था। भू-राजस्व अदा करने में असफल होने पर किसानों की भूमि नीलाम करने की प्रथा ने प्रायः किसानों को अपनी भूमि से बंचित कर दिया अथवा किसानों को महाजनों से ऊँची दर पर कर्ज लेने पर विवश किया जिसका परिणाम श्री अंततः किसान की भूमि महाजन के हाथ में जाना ही होता था।

जमीन के हाथ से निकल जाने, औद्योगीकरण एवं हथकरपा उद्योग के अभाव से जमीन पर बोझ बढ़ने के कारण भूमिहीन किसानों, दस्तकारों एवं हस्तशिल्पियों को बहुया कम-से-कम मजदूरी पर खेतीहर मजदूर के लिए विवश होना पड़ रहा था। 

इस प्रकार किसान वर्ग सरकार, जमीदार एवं महाजन के तिहरे बोझ तले कुचला जा रहा था। इस प्रकार ब्रिटिश शासन के विरुद्ध किसान संघर्ष का प्रारंभ इस शासन की स्थापना के प्रारंभिक वर्षों से ही शुरू हो गया था। संयासी विद्रोह (1763-1800) की मुख्य शक्ति किसान ही थे। संथाल विद्रोह (1855-56), 1857 का महाविद्रोह, नील महाविद्रोह (1859-60), कूका विद्रोह (1871-72). पवना विद्रोह (1875).

CLASS 12 NCERT SOLUTION IN ENGLISHCLASS12 NCERT SOLUTION IN HINDI
Historyइतिहास
Geography भूगोल
Political science राजनीति विज्ञान
English SubjectResult
Hindi SubjectHistory answer keys

FAQs


1. किसान आंदोलनों व अमिक आंदोलनों का उद्देश्य क्या था ? 

Ans. किसान आंदोलनों और श्रमिक आंदोलनों का मुख्य उद्देश्य अवैध वसूली और शोषण के विरुख आवाज उठाना रहा था। 

2. बिहार में किसान आंदोलन के विषय में आप क्या जानते हैं ?

Ans. सन् 1919-20 में उत्तरी बिहार में दरभंगा राज के व्यापक क्षेत्र में हुए किसान आंदोलन का नेतृत्व स्वामी विद्यानंद ने किया। यह आंदोलन दरभंगा, मुजफ्फरपुर, भागलपुर, पूर्णिया और मुंगेर जिलों में फैल गया। 

3. ट्रेड यूनियन आंदोलन के विषय में लघु टिप्पणी कीजिए।

Ans. भारत में ट्रेड यूनियन की जड़े धीरे-धीरे जमी हैं। सन् 1919-20 में कानपुर, कलकत्ता, बंबई, मद्रास, जमशेदपुर जैसे कई औद्योगिक केन्द्रों में अनेक हड़तालें हुईं। कम्युनिस्टों ने ट्रेड यूनियन आंदोलन में अपना प्रभाव बढ़ाया और फरवरी एवं सितंबर 1927 में खड़गपुर में रेलवे वर्कशॉप मजदूरों की हड़ताल आयोजित करने में निर्णायक भूमिका निभाई। सन् 1928 तक कम्युनिस्ट नेतृत्व वाली गिरनी कामगार यूनियन बहुत सशक्त हो गई। 

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NOTES & QUESTIONS ANSWER


  1. Introducing Indian Society
  2. The Demographic Structure of the Indian Society
  3. Social Institutions: Continuity and Change
  4. The Market as a Social Institution
  5. Patterns of Social Inequality and Exclusion
  6. The Challenges of Cultural Diversity
  7. suggestions for projects work
  1. Structural Change
  2. Cultural Change
  3. The Story of Indian Democracy
  4. Change and Development in Rural Society
  5. Change and Development in Industrial Society
  6. Globalisation and Social Change
  7. Mass Media and Communications
  8. Social Movements

MCQS IN ENGLISH


  1. Introducing Indian Society
  2. The Demographic Structure of the Indian Society
  3. Social Institutions: Continuity and Change
  4. The Market as a Social Institution
  5. Patterns of Social Inequality and Exclusion
  6. The Challenges of Cultural Diversity
  1. Structural Change
  2. Cultural Change
  3. The Story of Indian Democracy
  4. Change and Development in Rural Society
  5. Change and Development in Industrial Society
  6. Globalisation and Social Change
  7. Mass Media and Communications
  8. Social Movements

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