कक्षा 12वी के महत्वपूर्ण फीचर-लेखन | Important Class 12th Hindi Feature Writing In Hindi

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कक्षा 12वी के महत्वपूर्ण फीचर-लेखन | Important Class 12th Hindi Feature Writing In Hindi


फीचर लेखन


फीचर लेखन क्या है?—फीचर पत्रकारिता जगत की नवीनतम विघा है। ‘फीचर’ शब्द बोजी भाषा से लिया गया है, जिसका अर्थ है-आकृति, नखशिख, रूपरेखा, विशेषता, क्तित्व। किसी भी समाचार-पत्र के प्रमुख चार अंग—समाचार, फीचर, लेख और चित्र में से त्वपूर्ण आलेख फीचर माना जाता है।

फीचर की परिभाषा विभिन्न विद्वानों ने अपने दृष्टिकोण के अनुसार की है डी. आर. विलियमसन ने कहा है- “फीचर एक ऐसा सर्जनात्मक तथा कुछ-कुछ चानुभूति मूलक लेख है जिसका गठन किसी घटना, स्थिति अथवा जीवन के किसी पक्ष के संबंध पाठक का मूलतः मनोरंजन करने और सूचना देने के उद्देश्य से किया गया हो।”

अर्ल इंग्लिश एवं क्लेरेंश हेच के अनुसार, “अच्छा फीचर लेखक वही है जो नित्यप्रति की घटनाओं के भीतर पैठ कर छानबीन करने को तैयार हो, बौद्धिक कौतूहल के प्रत्येक पहलू को यान में रखे और पैनी दृष्टि का परिचय दे, उसे इतना बोध हो कि प्रत्येक समाचार से कम-से-कम एक फीचर तो तैयार किया जा सकता है। 

उसमें मनोरंजक ढंग से लिखने की योग्यता और उसके लेखन में चतुराई तथा बहुज्ञता की झलक मिलती हो।” कृष्णचंद्र शर्मा के अनुसार, “फीचर किसी विचार, मान्यता, घटना, व्यक्ति आदि का ऐसा

विविध शाब्दिक चित्रण है जिसे स्थायी रूप दे दिया गया हो।” जितेंद्र गुप्त का मत है, “जो घटनाएँ अलग-अलग समाचार के रूप में प्रकाशित होकर भी अपना अर्थ स्पष्ट नहीं कर पाती या जिनका मार्मिक पक्ष नहीं उभर पाता लेकिन वे जीवन के परिवेश को समझने के लिए जरूरी हैं, उनको समेटकर लिखे गए सर्जनात्मक और कुछ न कुछ स्वानुभूतिमूलक आलेख को पौचर कहते हैं।”

उपर्युक्त परिभाषाओं के आलोक में कहा जा सकता है कि फीचर, समाचार मूलक यथार्थ, भावना प्रधान और सहज कल्पना वाला रसमय एवं संतुलित गद्यात्मक अथवा दृश्यात्मक शाश्वत कोटि की निःसंग और मार्मिक अभिव्यक्ति है।

कक्षा 12वी के महत्वपूर्ण फीचर-लेखन | Important Class 12th Hindi Feature Writing In Hindi

फीचर लेखन एक ऐसी सर्जनात्मक प्रक्रिया है जिसमें किसी भी घटना का उल्लेख कथात्मक या मनोरंजनात्मक रूप में, समाचार विरहित सार पर बड़े ही रमणीय भाव से करता है जो पाठकों की पटना की सूचना ही नहीं बल्कि उसके अन्तः वृत्तों तक जाने या पहुंचने का मार्ग दिखाती है या पहचान कराती है। 

अतः फीचर लेखन सर्जनात्मक विधा के रूप में कलात्मक प्रस्तुतीकरण भी है। वास्तव में, फीचर एक सुव्यवस्थित, सृजनात्मक और आत्मनिष्ठ लेखन है जो पाठकों को

सूचना देने, शिक्षित करने तथा मनोरंजन करने का कार्य करता है। यह हर समाचार पत्र का प्रमुख अंग है। फीचर कई प्रकार के होते हैं-समाचार बैकग्राउंडर, खोजपरक फोचर, साक्षात्कार फीचर, जीवनशैली, फीचर, रूपात्मक फीचर, व्यक्ति चित्र फीचर, यात्रा फीचर और विशेष रुचि के फीचर फीचर बनाम रूपक फीचर को संस्कृत में रूपक कहते हैं। आर्यभट्ट के अनुसार नेत्र से ग्राहय गुण को रूपक कहते हैं।

 रूपक का अर्थ है-वर्णन करना। भारतीय साहित्य कोश के अनुसार रूपक दृश्यकाव्य का भेद है। रूपक शब्द का प्रयोग काव्य के उस रूप के लिए किया जाता है जिसका आनंद चक्षु इंद्रियों के माध्यम से प्राप्त हो परंतु रूपक के परंपरागत अर्थ का आधुनिक अर्थ से कोई साम्य नहीं है। फीचर का आधुनिक अर्थ रूपक के परंपरागत अर्थ के अनुसार नहीं है। 

डॉ. पुरुषोत्तम दास टंडन के अनुसार, “फीचर एक प्रकार का गद्य गीत है जो नीरस, लंबा और गंभीर नहीं हो सकता। क्योंकि मनोरंजक और जानदार होना इसकी विशेषता है।” लेख और फीचर में अंतर- हालांकि लेख और फीचर में बहुत कुछ समानताएं होती है लेकिन फिर भी इन दोनों का अपना अलग-अलग अस्तित्व होता है। 

इन दोनों में एक समान यह होती है कि दोनों की ही लेखन शैली, समाचार-लेखन से पूर्णतया भिन्न होती है। पृष्ठभूि के संदर्भ और अध्ययन से एक लेख की रचना की जा सकती है मगर फीचर का नहीं। 

फीचर काम लेखन के लिए विशेष तौर पर अनुभूतियों, भावनाओं, अवलोकन तथा कल्पनाशीलता को आवश्यकता होती है। तथ्यों तथा आँकड़ों के आधार पर लेख का निर्माण तो सरल है, परंतु फीचर लेखन का कार्य अत्यधिक कलात्मक और कठिन है। 

प्रत्येक की अपनी भिन्न-भिन्न शैली होती है। लेख लिखने में पांडित्यपूर्ण शैली ठीक हो सकती है लेकिन फीचर के लिए इस शैली से नहीं चल सकता है। 

फीचर के लिए सरल शैली अधिक उपयुक्त रहती है। किताबें पढ़कर और आँकड़े जुटाकर लेख लिखे जा सकते हैं लेकिन फीचर लिखने के लिए आपको आँख, कान, भाव, अनुभूतियों, मनोवेगों और अन्वेषण की सहायता लेनी पड़ती है। फीचर को मजेदार, दिलचस्प और मन पर प्रभाव डालने वाला होना चाहिए।

फीचर और कहानी में अंतर—फीचर और कहानी में कुछ बुनियादी अंतर होते हैं जो काफी स्पष्ट रूप से दिखते हैं। कहानी का सारा ताना-बाना कल्पना के केन्द्र-बिंदु पर बुना जाता है जबकि फीचर चाहे घटना प्रधान, उसकी बुनावट तथ्यों के इर्द-गिर्द ही होती है। फीचर में तथ्य तो होते हैं लेकिन उसमें तथ्यों को इस प्रकार प्रस्तुत किया जाता है कि उसमें कथा-रस अथवा गल्प-तत्व का समावेश भी हो जाता है।

कक्षा | Class12th 
अध्याय का नाम | Chapter Nameफीचर-लेखन
अध्याय प्रकार | Chapter typeहिंदी व्याकरण | Hindi grammar
किताब | Bookहिंदी कोर | HINDI CORE
बोर्ड | Boardसभी बोर्ड | All India Board
किताब | Book एनसीईआरटी | NCERT
विषय | Subjectहिंदी | HINDI


फीचर के तत्व फीचर में निम्नलिखित तत्व हैं- 


1. कल्पना —फीचर लेखक विषय का निश्चय कर लेने के पश्चात् विषयानुरूप कल्पनाएँ। करता है। कल्पना के लिए गंभीर विषयों की आवश्यकता नहीं होती, कल्पना के द्वारा कुछ नया प्रस्तुत किया जा सकता है, जैसे—’मामूली राम’ शीर्षक से लिखा जाए। 

दुखी है मामूली राम। सब खुश हैं, पर वह दुखी है। लगता है कि दुखी रहना उसकी आद है। कुछ नहीं हुआ तो दुखी हो लिए। आखिर हँस भी तो सकते हैं। पर मामूली है कि दुखी रहता है। 

कमला है, काजी जी सूख रहे हैं, शहर के अंदेशों के कारण क्या कहने, वैसे मिलाकर स्थिति है कि बस दुखी है कि गर्मी शुरू हो गई है।” यह मामूली राम कोई भी हो सकता है, परंतु लेखक अपना कथ्य कह देता है।

2. तथ्य — फीचर लेखक तथ्यों के आधार पर अपनी बात कहता है। तथ्य की प्रस्तुति भी मनोरंजक, सरस और भावात्मक रूप से कथावृत्त के अनुरूप होनी चाहिए। 

फीचर में सत्य व तथ्य का समावेश ऐसा होता है कि पाठक तक पहुँचकर वह एक नवीन स्वरूप धारण कर लेता है। तथ्य संकलित होने पर फीचर लेखक अपने भावों अनुभवों, मनोवेगों के रूप में पुनर्रचना करता है। 

मधुकर गंगाधर के अनुसार, “फीचर तथ्याधारित होता है। फीचर या आलेख रूपक ही तथ्यपरकता श्रोता के तर्कों को बाँचती है और लेखक कथा तत्व का प्रयोग जितनी चालाकी, चुस्ती और कलापूर्ण ढंग से करता है, फीचर वस्तुतः उतना ही श्रेष्ठ होता है।”

3. लेखन कला—फीचर कल्पना प्रस्तुत चिंतन का तथ्यात्मक प्रस्तुतीकरण है। लेखक को यह ध्यान रखना होता है कि तर्क-वितर्क से बचकर सामान्य पाठक की मनोवृत्ति के अनुकूल विषयवस्तु का चयन कर कल्पना से मनोरंजनपूर्ण शैली में आकर्षक ढंग से प्रस्तुत करें। 

यह सब सरल, संक्षिप्त, रोचक शब्दावली के प्रभावपूर्ण प्रयोग से संभव है। फीचर लेखन कला में पाठकीय भागीदारी होता है। पाठक की समस्या में पाठक के प्रश्न एवं उत्तर होंगे तो पाठक स्वयं आनंद पा सकता है।


फीचर के गुण-फीचर के निम्नलिखित गुण हैं


1. विश्वसनीयता—फीचर लेखक लेखन में विश्वसनीय साक्ष्यों की प्रस्तुति करता है। समाचार पत्र के लिए फीचर का विषय निर्धारित होते ही फीचर लेखक का ध्यान उपलब्ध समाचार से भिन्न स्वरूप में उभरते समाचारिक तथ्यों की ओर जाता है। 

अपने साक्ष्यों की प्रस्तुति में फीचर लेखक सामान्य संवाददाता से अधिक स्वतंत्र व कल्पनाशील होकर अपना विवेचन प्रस्तुत करता है। इसमें यह भी ज्ञातव्य है कि उसमें समयानुकूल नवीन तथ्यों का संयोजन करते समय सत्य को विषयवस्तु परक व्याख्या व कल्पनाशीलता होनी चाहिए। 

2. सरसता फीचर लेखन का एक और आवश्यक गुण है-सरसता लेखन को अपनी कल्पना, उपलब्ध तथ्य और समाचार के पीछे निहित समाचारिकता का विश्लेषण कर उसे स्पष्ट व सरस शला में प्रस्तुत करना होता है फीचर लेखक का यह कार्य ललित निबंधकार की तरह का होता है। सरसता लाने के लिए उसे अपने कथन में गति एवं उत्तेजना उत्पन्न करनेवाले रुचिकर वाक्यविन्यास का प्रयोग करना होता है।

3. प्रचलित शब्दावली फीचर का पाठक प्रचलित शब्दावली में खोजने का प्रयत्न करता है। लेखक को ज्ञानवर्धक, सत्य व तथ्य से जुड़ी बातों को दैनिक जीवन में प्रयुक्त शब्दावली में नवीन रूप में रखना होता है। फीचर लेखक को सत्य को सीधे न देखकर प्रचलित शब्दावली में कथावृत के रूप में देना चाहिए।

4. संक्षिप्तता — फीचर में संक्षिप्तता अनिवार्य है। समाचार पत्र में स्थान की उपलब्धता, समस्या या घटना का छोटा-बड़ा होना, परंतु उसके सत्य, तथ्य की विवेचना अधिक न होने देना आदि का ध्यान रखना फीचर लेखक का ही काम है। अतः निर्धारित स्थान के अनुसार कम शब्दों में अधिक बात संप्रेषित करना अनिवार्य है। संक्षिप्त फीचर में विचार संपत व संश्लिष्ट रहते हैं तथा उनमें रोचकता रहती है। लंबे फीचर में नीरसता व विचार विखर जाते हैं।

5. प्रासंगिकता — फीचर लेखन की राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक प्रासंगिकता अनिवार्य है। यदि फीचर लेखक इन तथ्यों का ध्यान नहीं रखता तो फीचर अप्रासंगिक हो जाएगा। यदि किसी जगह कोई परियोजना शुरू की जाती है तो फीचर लेखक को इस योजना के सभी पहलुओं की तह में जाकर नए तथ्यों का उद्घाटन करना चाहिए।


फीचर लेखन के कुछ प्रमुख उदाहरण


1. पॉलीथीन से होने वाले हानियों पर एक फीचर लिखिए। 

क्यों न परहेज करें हम पॉलीथीन से 

बहुत कुछ दिया है विज्ञान ने हमें सुख भी, दुःख भी सुविधा से भरा जीवन हमारे लिए अनिवार्यता-सी बन गई है। बाजार से सामान खरीदने के लिए हम घर से बाहर निकलते हैं। 

अपना पर्स तो जेब में डाल लेते हैं पर सामान घर लाने के लिए कोई थैला या टोकरी साथ लेने की सोचते नहीं। क्या करना है उसका ? फालतू का बोझ लौटती बार तो सामान उठाकर लाना ही है तो जाती बार बेकार का बोझा क्यों ढोएँ। 

जो दुकानदार सामान देगा वह उसे किसी पॉलीथीन के थैले या लिफाफे में भी डाल देगा। हमें उसे लाने में आसानी—न तो रास्ते में फटेगा और न ही बारिश में गीला होने से गलेगा। घर आते ही हम सामान निकाल लेंगे और पॉलीथीन डस्टबिन में या घर से बाहर नाली में। 

किसी भी छोटे कस्बे या नगर के हर मुहल्ले से प्रतिदिन सौ-दो सौ पॉलीथीन के थैले या लिफाफे तो घर से बाहर कूड़े के रूप में जाते हैं। वे नालियों में बढ़ते हुए नालों में चले जाते हैं और फिर वे बिना बाढ़ के मुहल्लों में बाढ़ का दृश्य दिखा देते हैं। 

पानी में उन्हें गलना तो है नहीं। वे बहते पानी को रोक देते हैं। उनके पीछे कूड़ा इकट्ठा होता जाता है और फिर वह नालियों-नालों के किनारों से बाहर आना आरंभ हो जाता है। गंदा पानी वातावरण को प्रदूषित करता है। वह मलेरिया फैलाने का कारण बनता है। 

हम यह सब देखते हैं, लोगों को दोष देते हैं, जिस मुहल्ले में पानी भरता है उसमें रहने वालों को गंवार की उपाधि से विभूषित करते हैं और अपने घर लौट आते हैं और फिर से पॉलीथीन की थैलियाँ नाली में बिना किसी संकोच थहा देते हैं। क्यों न बढ़ाएँ-हमारे मुहल्ले में पानी थोड़े ही भरा है।

पॉलीथीन ऐसे रसायनों से बनता है जो जमीन में 100 वर्ष के लिए गाड़े देने से भी नष्ट नहीं होते। पूरी शताब्दी बीत जाने पर भी पालीथीन को मिट्टी से ज्यों का त्यों निकाला जा सकता है। 

जरा सोचिए, धरती माता दुनिया की हर चीज हजम कर लेती है पर पॉलीथीन तो उसे भी सजम नहीं होता। पालीथीन परती के स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक है। 

यह पानी की राह को अवरुद्ध करता है : खनिजों का रास्ता रोक लेता है अर्थात् यह ऐसी बाया है जो जीवन के सहज प्रवाह को रोक सकता है। यदि कोई छोटा बच्चा या मंद बुद्धि व्यक्ति अनजाने में पॉलीथीन की थैली को सिर से गर्दन तक डाल ले फिर उसे बाहर न निकाल जाए तो उसकी मृत्यु निश्चित है।

हम धर्म के नाम पर पुण्य कमाने के लिए गौऊओं तथा अन्य पशुओं को पॉलीथीन में लिपटी रोटी सब्जी के छिलके, फल आदि ही डाल देते हैं। 

CLASS 12 NCERT SOLUTION IN ENGLISHCLASS12 NCERT SOLUTION IN HINDI
Historyइतिहास
Geography भूगोल
Political science राजनीति विज्ञान
English SubjectResult
Hindi SubjectHistory answer keys

वे निरीह पशु उन्हें ज्यों का त्यों निगल जाते हैं जिसने उन की आंतों में अवरोध उत्पन्न हो जाता है और वे तड़प-तड़प कर मर जाते हैं। ऐसा करने से हमने क्या पुण्य कमाया या पाप ? जरा सोचिए नदियों और नहरों में हम प्रायः पालीथीन अन्य सामग्रियों के साथ बहा देते हैं जो उचित नहीं है। 

सन् 2005 में इसी पॉलीथीन (और अवरुद्ध नालों के कारण वर्षा ऋतु में आधी मुंबई पानी में डूब गई थी। हमें पॉलीथीन से परहेज करना चाहिए। इसके स्थान पर कागज और कपड़े का इस्तेमाल करना अच्छा है। रंग बिरंगे पालीथीन तो वैसे भी कैंसर जनक रसायनों से बनते हैं। 

काले रंग के पॉलीथीन में तो सबसे अधिक हानिकारक रसायन होते हैं जो बार-बार पुराने पॉलीथीन के चक्रण से बनते हैं। अभी भी समय है कि हम पॉलीथीन के भयावह रूप से परिचित हो जाएँ और इसका उपयोग नियंत्रित रूप में ही करे।


2. वर्तमान समय में मानवीय जीवन के लिए कम्प्यूटर के महत्व पर एक फीचर लिखें ।

कंप्यूटर और हम

वर्तमान युग कंप्यूटर युग है। यदि भारतवर्ष पर नजर दौड़ाकर देखें तो हम पाएँगे कि आज जीवन के लगभग सभी क्षेत्रों में कंप्यूटर का प्रवेश हो गया है। बैंक, रेलवे स्टेशन, हवाई अड्डे, डाकखाने, बड़े-बड़े उद्योग, कारखाने, व्यवसाय, हिसाब-किताब, रुपये गिनने की मशीनें तक कंप्यूटरीकृत हो गई हैं। अब भी यह कंप्यूटर का प्रारंभिक प्रयोग है। आने वाला समय इसके विस्तृत फैलाव का संकेत दे रहा है।

प्रश्न उठता है कि क्या कंप्यूटर आज की जरूरत है ? क्या इसके बिना काम नहीं चल सकता ? इसका उत्तर है—–— कंप्यूटर जीवन की मूलभूत अनिवार्य वस्तु तो नहीं है, किंतु इसके बिना आज की दुनिया अधूरी जान पड़ती है। आज मनुष्य जीवन जटिल हो गया है। 

सांसारिक गतिविधियों, परिवहन और संचार उपकरणों आदि का ऐसा विस्तार हो गया है कि उन्हें रूप से चलाना अत्यंत कठिन होता जा रहा है। पहले मनुष्य जीवन भर में अगर 100 लोगों सुचारू के संपर्क में आता था, तो आज वह 2000 लोगों के संपर्क में आता है। 

पहले वह दिन में 5-10 लोगों से मिलता था तो आज 50-100 लोगों से मिलता है। पहले वह दिन में काम करता था, तो आज रातें भी व्यस्त रहती हैं। आज व्यक्ति के संपर्क बढ़ रहे हैं, व्यापार बढ़ रहे हैं; गतिविधियाँ बढ़ रही हैं, आकांक्षाएँ बढ़ रही हैं, साधन बढ़ रहे हैं। परिणामस्वरूप सब जगह भागदौड़ और आपाधापी चल रही है।

इस ‘पागल गति’ को सुव्यवस्था देने की समस्या आज की प्रमुख समस्या है। कहते हैं, आवश्यकता आविष्कार की जननी है। इस आवश्यकता ने अपने अनुसार निदान ढूंढ लिया है। कंप्यूटर एक ऐसी स्वचालित प्रणाली है, जो कैसी भी अव्यवस्था को व्यवस्था में बदल सकती है। 

हड़बड़ी में होनवाली मानवीय भूलों के लिए कंप्यूटर रामवाण औषधि है। क्रिकेट के मैदान में अंपायर की निर्णायक भूमिका हो, या लाखों-करोड़ों-अरबों की लंबी-लंबी गणनाएँ, कंप्यूटर पलक झपकते ही आपकी समस्या हल कर सकता है। पहले इन कामों को करने वाले कर्मचारी हड़बड़ाकर काम करते थे; एक भूल से घबड़ाकर और अधिक गड़बड़ी करते थे। 

परिणामस्वरूप काम कम, तनाव अधिक होता था। अब कंप्यूटर की सहायता से काफी सुविधा हो गई है। कंप्यूटर ने फाइलों की आवश्यकता कम कर दी है। 

कार्यालय की सारी गतिविधियों फेलोपी में बंद हो जाती हैं। इसलिए फाइलों के स्टोरों की जरूरत अब नहीं रही। अब समाचार-पत्र भी इंटरनेट के माध्यम से पढ़ने की व्यवस्था हो गई है। 

विश्व के किसी कोने में छपी पुस्तक, फिल्म, घटना की जानकारी इंटरनेट पर ही उपलब्ध है। एक समय था, जब कहते थे कि विज्ञान ने संसार को कुटुंब बना दिया है। कंप्यूटर ने तो मानो उसे कुटुंब को आपके कमरे में उपलब्ध करा दिया है। 

संभव है, कंप्यूटर की सहायता से आप मनचाहे सवाल का जवाब दूरदर्शन या. इंटरनेट से ले पाएँ। शारीरिक रूप से न सही, काल्पनिक रूप से जिस मौसम का, जिस प्रदेश का आनंद उठाना चाहें, उठा सके।

आज टेलीफोन, रेल, फ्रिज, वाशिंग मशीन आदि उपकरणों के बिना नागरिक जीवन जीना कठिन हो गया है। इन सबके निर्माण या संचालन में कंप्यूटर का योगदान महत्वपूर्ण है। 

रक्षा- उपकरणों, हजारों मील की दूरी पर सटीक निशान बाँधने, सूक्ष्म से सूक्ष्म वस्तुओं को खोजने में कंप्यूटर का अपना महत्व है। आज कंप्यूटर ने मानव-जीवन को सुविधा, सरलता, सुव्यवस्था और सटीकता प्रदान की है। अतः इसका महत्व बहुत अधिक है। 


3. क्रिकेट खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर की उपलब्धियों पर एक फीचर लिखिए।

अद्भुत खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर

पिछले पंद्रह सालों से भारत के लोग जिन-जिन हस्तियों के दीवाने हैं—उनमें एक गौरवशाली नाम है—सचिन तेंदुलकर। जैसे लता का गायिकी में जवाब नहीं, अमिताभ का अभिनय में मुकाबला नहीं, वैसे सचिन का क्रिकेट में कोई सानी नहीं। 

संसार भर में एक यही खिलाड़ी है जिसने टेस्ट क्रिकेट के साथ-साथ वन-डे क्रिकेट में भी सर्वाधिक शतक बनाए हैं। अभी उसके क्रिकेट जीवन के तीन-चार वर्ष और बाकी हैं। 

यदि आगे वाला समय भी ऐसा ही गौरवशाली रहा तो उनके रिकार्ड को तोड़ने के लिए भगवान को फिर से नया अवतार लेना पड़ेगा। शायद इसीलिए कुछ क्रिकेट प्रेमी सचिन को क्रिकेट का भगवान तक कहते हैं। उनके प्रशंसकों ने हनुमान चालीसा की तर्ज पर सचिन चालीसा भी बना दिया है।

मुंबई में बांद्रा-स्थित हाउसिंग सोसाइटी में रहनेवाला सचिन इतनी ऊंचाइयों पर पहुँचने पर भी मासूम और विनयी है। 

अहंकार तो उसे छू तक नहीं गया है। अब भी उसे अपने बचपन के दोस्तों के साथ वैसा ही लगाव है। सचिन अपने परिवार के साथ बिताए हुए क्षण को सर्वाधिक प्रिय क्षण मानता है। इतना व्यस्त होने पर भी उसे अपने पुत्र का टिफिन स्कूल पहुँचाना अच्छा लगता है।

सचिन ने केवल 15 वर्ष की आयु में पाकिस्तान की धरती पर अपने क्रिकेट-जीवन का पहला शतक जमाया था तो वह अपने आप में एक रिकॉर्ड था। 

उसके बाद एक पर एक रिकार्ड टूटते चले गए। अभी वह 21 वर्ष का भी नहीं हुआ था कि उसने टेस्ट क्रिकेट में 7 शतक ठोक दिए थे। 

उन्हें खेलता देखकर भारतीय लिटल मास्टर सुनील गावस्कर कहते थे – सचिन मेरा ही प्रतिरूप है। सर ब्रेडमैन ने अपनी पत्नी को कहा- ‘यह खिलाड़ी वैसा ही खेल रहा है। जैसा कि मैं खेलता था।’ न्यूजीलैंड के मार्टिन क्रोव कहते हैं— ‘वह किसी देवता की तरह बल्लेबाजी करता है।’ 

अजहरूद्दीन कहते हैं—“मैंने ऐसा संतुलित क्रिकेटर आज तक नहीं देखा। वह एकदिवसीय क्रिकेट में गजब का खिलाड़ी है। उसके पास हर शॉट है।” सचिन को आज भी ‘मास्टर ब्लास्टर’ के नाम से जाना जाता है। उसके विरोधी भी उसके प्रशंसक हैं। वे उसके

साथ खेलना गर्व का विषय मानते हैं। पिछले कुछ वर्षों से सचिन की पीठ और कुहनी में वोट है। उसके लिए आप्रेशन भी हुआ। पूरे भारत से क्रिकेट-प्रेमियों ने उसके कुशल-मंगल की दुआ की। 

वे फिर से मैदान में आए। परंतु उनका दर्द फिर-फिर उभर आता है। वे फिर से चिकित्सा कराने के लिए मैदान से बाहर है। उसकी इच्छाशक्त और प्रशंसकों को शुभ-कामनाएं उन्हें फिर से उनके पुराने रूप में सौदा जाएँगी ऐसा सबका विश्वास है।

भारत का सरताज सचिन ।

हम सब का विश्वास सचिन ।। 

उस दिन है इतिहास अधूरा ।

हमें तो नही कहना है– 

क्रिकेट का इतिहास सचिन ॥


4. निवेदित क्रिकेट खिलाड़ी महेन्द्र सिंह धोनी पर एक फीचर लिखिए। 

नवोदित विस्फोटक क्रिकेट खिलाड़ी महेन्द्र सिंह धोनी

कहते हैं प्रतिभाएँ यही नहीं जाती। वे अवतरित होती हैं। गायन के क्षेत्र में लता ऐसी उभरी कि कोई गायक उनके आसपास भी नहीं नजर आता। वे आते ही पूरे भारत की चहेती गायिका बन गई। सावन का जादू भी चला तो लोग दाँतो तले अंगूली दबाने पर मजबूर हो गए। अब क्रिकेट जगत में एक नया सितारा उदित हुआ है-राँची का महेन्द्र सिंह धोनी। 

लंबे-लंबे बाल, जनमन, सविता रंग, मस्तानी चाल, दमदार शरीर ऐसा गजब का आत्मविश्वास जैसा कि सुबीत के गोलकीपरों में होता है। जुझारू छवि और टूट पड़ने की मारक अदा। जब वे छक्के जड़ते हैं तो कैमरे की दृष्टि स्टेडियम के उस भाग पर होती है जहाँ जाकर गेंद गिरती है। 

पिछले कितने ही मैचों में इस खिलाड़ी ने छक्का लगाकर जीत हासिल की है। इसे देखते ही पाकिस्तान के राष्ट्रपति मुशर्रफ रोझ उठे। वे बोले-इसके खेल ने मुझे दीवाना बना दिया।

महज दो साल का ही संवत है कि महेन्द्र सिंह धोनी ने भारतीय क्रिकेट टीम में वह जगह बनाती है, जो कभी सचिन के पास थी। 

सचिन था तो टीम को भरोसा होता था। अब धोनी है तो लगता है कि अभी भारतीय टीम में विश्वास शेष है। इस खिलाड़ी में टीम को जिताने की क्षमता, विखरती पारी को संभालने की ताकत है और खेल को दीवाली की आतिशबाजी की तरह खेलने का सामर्थ्य है। 

यह हैरानी की बात ही है कि आई.सी.सी. ने महेन्द्र सिंह धोनी को बल्लेबाजी में विश्व का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी घोषित किया। अब तक वह आस्ट्रेलिया के पोंटिंग के बाद दूसरे नंबर का खिलाड़ी था। 

अब इसने पहला स्थान अर्जित कर लिया है। यह तो अभी धोनी के क्रिकेट जीवन का सूर्योदय काल है। अभी दोपहर होनी शेष है। 

वह जाँबाज और पाँसू खिलाड़ियों की भाँति खेलता है। उसे खेलते देखकर ब्रायन लारा और विवियन रिचर्ड्स की याद आ जाती है। वास्तव में धोनी को खेलते देखना आतिशबाजी का मजा लूटना है। धोनी को बल्लेबाजी इतनी आकर्षक है कि उसके विकेटकीपिंग की चर्चा ही नहीं हो पाती। 

जबकि विकेटकीपिंग में वह उस सुदृढ़ चट्टान की भाँति है जिसे पार करके गेंद भी नहीं जाना चाहती । एक समय था कि अच्छे विकेट कीपर के अभाव में कप्तान राहुल द्रविड़ को कीपिंग करनी पड़ती थी। 

परंतु धौनी के आने से न केवल राहुल का एक काम घटा है बल्कि अन्य विकेट-कोपरों के भी मुँह बंद हो गए हैं। उसके बारे में यों कहें तो गलत नहीं होगा-होनी को अनहोनी कर दे। 

अनहोनी को होनी । 

जो छक्कों की बारिश कर दे।

नाम है उसका धोनी ॥ 


5. सिक्खों के दसवें गुरु गुरुगोविन्द सिंह पर एक फीचर लिखिए। 

दसवें गुरु गुरुगोविन्द सिंह

चिड़ियों से मैं बाज लड़ाऊँ

तब गोविन्द सिंह नाम कहाऊँ।

इस प्रसिद्ध उक्ति को कौन नहीं जानता ? आज से लगभग 300 साल पहले की बात है। भारत में औरंगजेब का शासन था। दिल्ली के शीशगंज गुरुद्वारे के पास गुरु तेगबहादुर को शहीद कर दिया गया। कारण केवल यही था कि उन्होंने जबरदस्ती मुसलमान बनने से इनकार कर दिया था। 

तब गोविंद सिंह नवयुवक था। उसने इस दहला देनेवाली घटना को अपने सीने पर झेला था। साथ ही मन में यह संकल्प भी धारण कर लिया था कि जीवन में धर्म-युद्ध तो सड़ना ही पड़ेगा।

“बैसाखी का दिन था। गुरुगोविंद सिंह ने देश-भर में फैले अपने अनुयायियों को शिवालिक की पहाड़ियों में स्थित आनंदपुर नगर में बुलाया। 

विशाल सम्मेलन हुआ। गुरुगोविंद सिंह ने खुला निमंत्रण दिया- मुझे पाँच सिर चाहिए। पाँच नवयुवक तैयार हो गए। यही पाँच युवक ‘पंज प्यारे’ कहलाए। उन्हें धर्म-युद्ध लड़ने के लिए तैयार किया गया। शस्त्र अस्त्र का प्रशिक्षण दिया गया। तभी खालसा पंथ की स्थापना हुई।

खालसा पंथ चलाकर गुरुगोविंद सिंह ने सामान्य जन को धर्म-युद्ध के लिए प्रेरित किया। पहले केवल क्षत्रिय जन ही युद्ध लड़ने का काम किया करते थे। सामान्य पिछड़े दलित और निरीह जन गुलाम की चक्की में पिसा करते थे। 

उन्हें योद्धा बनाने के लिए गुरुगोविंद सिंह ने महत्वपूर्ण प्रयास किए। परंतु उनकी दृष्टि बड़ी स्पष्ट थी। वे शिवा से यही वरदान माँगते हैं कि जीवन-भर शुभ कर्म करते रहें-

देहि शिवा वर मोहि इहै शुभ कर्मन ते कबहूँ न ट । गुरुगोविन्द सिंह जैसा बलिदानी वीर तो किसी जाति में नहीं हुआ होगा। 

उन्होंने न केवल अपने पिता को धर्म के लिए बलिदान होते देखा, बल्कि अपने बच्चों को भी सामने शहीद होते देखा। उनके चार पुत्र थे। दो पुत्र युद्ध में शहीद हो गए। शेष दो पुत्र जोरावर सिंह और फतह सिंह औरंगजेब द्वारा दीवारों में जिंदा चिनवा दिए गए। फिर भी उनके मुख से निकला- चार गए तो क्या हुआ, जब जीवित कई हजार !

गुरुगोविंद सिंह सच्चे गुरु थे। तभी हजारों-हजारों नवयुवक उनके एक-एक निर्देश पर प्राण न्यौछावर करने को तैयार हो गए। गुरुजी धर्म के लिए लड़े; किंतु उनके धर्म में कट्टरता नहीं थी। 

वे शासन के अत्याचारों के विरुद्ध लड़े, जनता को उनके अधिकार दिलाने के लिए लड़े। 


6. आज के दूषित खान-पान को रेखांकित करते हुए एक फीचर लिखिए ।

क्या खा रहे हैं आप ?

खाने और लार टपकने का सीधा-सीधा संबंध है। जब भूख लगी हो तो भोजन को देखकर सार टपकती ही है, परंतु बिना भूख के भी आपका खाने को मन करे तो समझ लें कि आप किसी व्यसन या वासना के शिकार हो रहे हैं। 

आज हमारे चारों ओर ऐसा ही माहौल है कि हमें ललचाने के लिए कितने स्वादिष्ट, चटपटे और कुरकुरे व्यंजन बनाए जाते हैं। फिर उन्हें चमकदार फाकरी में रखकर, जगमगाती रोशनी और लुभाती हुई अदाओं वाली अभिनेत्रियों के मदमाते हाथ में रखकर आपको खाने के लिए उकसाया जाता है। 

कहीं मल्लिका शेरावत कहती है कि मैं ही 7 अप हूँ, मुझे पी लो। कड़ी दो नायिका कहती है खट्टी हूँ मैं मीठी हूँ। कही कोई बूढ़ा नमकीन का पैकेट चट करके कहता है-क्या करें, कंट्रोल ही नहीं होता। कहीं विज्ञापन है- ‘खाए जाओ, खाए जाओ।’ अगर पेट भर गया है तो हाजमोला खाओ। या सतमोला के रहते खाने से डरते हैं क्या !

इस देश में शराब को बुरा माना जाता है। इसलिए उसके विज्ञापन पर भी प्रतिबंध है। यहाँ वेश्यावृत्ति भी निंदनीय है। इसलिए उसे भी बुरा माना जाता है। परंतु वैसी ही एक बीमारी है— खाए चले जाना। बिना भूख के भी खाना। केवल जीभ के स्वाद के लिए खाना हमारे समाज 1 में इस पर कोई नियंत्रण नहीं है। यहाँ तक कि भारत में जबरदस्ती खिलाया जाता है। अगर मेहमान न खाना चाहता हो, तो भी जबरदस्ती उसे खाद्य-अखाद्य खिलाया जाता है।

आज पूरे भारत में ठंडे पेयों और जंक फूड्स का बोलबाला है। कहीं भी चले जाएँ, चप्पे-चप्पे पर आपको बर्गर, हॉट डॉग, सैंडविच, पेटीच, नूडल्स, कोल्ड ड्रिंक्स आदि मिल जाएँगे।

तेजी के जमाने में ये फटाफट फूड हैं, जो तैयार मिलते हैं। कभी-कभी ये आपकी प्रतीक्षा करते-करते दिनोंदिन रखे रहते हैं। रखे क्या सड़ते रहते हैं। 

जैसे बिना नहाया आदमी अपने शरीर पर पाउडर और सेंट का प्रयोग जरूर करता है, उसी प्रकार इन जंक फूड्स में उत्तेजक रसायनों, मसालों और सुगंधों का प्रयोग किया जाता है, ताकि वे आपकी जीभ को तड़पता हुआ-सा सुखद अहसास दे सकेँ। 

जिस मसाले को खाकर आपकी जीभ उत्तेजित हो जाती है, उससे आपकी नसों पर क्या असर होता होगा! क्या वे कुरकुरे आपकी नसों में जाकर खलबली नहीं मचाते होंगे।

सभी डॉक्टर एकमत से कहते हैं कि जंक फूड स्वास्थ्य के लिए विष है। बाबा रामदेव जैसे साधू-संन्यासी भी इनका जमकर विरोध करते हैं, फिर भी बाजार में इनकी खपत दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। 

कारण है— मनुष्य का स्वादु स्वभाव और भड़काते हुए विज्ञापन। इन्हीं के कारण आज पेट की बीमारियाँ बढ़ रही हैं, तोंद बढ़ रही है, मधुमेह, रक्तचाप और हृदय आघात जैसी घातक बीमारियाँ बढ़ रही हैं।

भारत सदा से सात्विक भोजन की वकालत करता रहा है। उसका कारण यह है कि भारत मनुष्य को केवल शरीर ही नहीं मानता, बल्कि मन और आत्मा भी मानता है। भारतीय मनीषियों का अनुभव यह है कि अन्न का सीधा-सीधा प्रभाव मन और आत्मा पर पड़ता है। 

इसलिए ऐसा भोजन करना चाहिए जिससे मन उत्तेजित होने की बजाय शांत हो। अतः मानसिक शांति के लिए मांस त्याज्य है, तेज मसाले त्याज्य हैं, तीखी मिर्च और बदबूदार लहसुन-प्याज त्याज्य हैं। परंतु हमारा चुलबुला अनियंत्रित मन सुनता कहाँ है। वह तो कहता है मजा इसमें इतना मगर किसलिए है?


7. आज की तनावपूर्ण जीवन-शैली पर एक फीचर लिखिए ।

जीवन है या तनाव

एक नव-विवाहित अध्यापिका इंटरव्यू देने पहुँची तो नियोक्ता ने पूछा—’यदि हम तुम्हें नौकरी पर रख लें तो तुम इसी वर्ष अपने परिवार में तो वृद्धि नहीं कर लोगी ?” नौकरी की। मारी अध्यापिका ने कहा- नहीं, बिल्कुल नहीं। अभी एक-डेढ़ साल तो हमारा ऐसा इरादा नहीं है।”

बाप रे! उनका होने वाला बच्चा बिना संसार में आए ‘क्यू’ में खड़ा है। सामने बोर्ड टँगा है— कृपया प्रतीक्षा कीजिए। यह बच्चा जब संसार में आएगा, तो क्या शांत और सहज रह पाएगा? नहीं। 

वास्तव में उसे पालने के लिए किसी के पास खाली समय नहीं है। यह तो शुक्र मानिए, बच्चे की माँ उसे अपनी कोख में धारण कर लेगी, किराए की कोख नहीं लेगी। वरना यह भी तो हो सकता था।

कैसी तनाव भरी जिंदगी है ! माँ अपनी ममता बच्चे पर लुटाना चाहती है किंतु छुट्टियाँ सीमित हैं। बच्चा एक सुरक्षित गोद में लोटना चाहता है किंतु माँ खिसक जाती है। पिता सुबह चले जाते हैं। 

रात को देर से आते हैं। बच्चे को न ममता मिली न पिता का प्यार। वह अभी चलना भी नहीं सीखा कि उसे तरह-तरह से पढ़ाया सिखाया जाने लगा है। ढाई साल का होते-होते उसे प्रि-नर्सरी में डाल दिया जाता है। गले में बस्ता, हाथ में बोतल, तोतली बोली।

प्राइमरी स्कूल में प्रवेश का मामला है और माता-पिता के चेहरे पर तनाव है। वे चाहते हैं कि बढ़िया से बढ़िया स्कूल में प्रवेश हो जाए। इसलिए वे सारा तनाव बच्चे पर डाल देते हैं- ऐसे बोलना, वैसे न बोलना, शरारतें न करना आदि-आदि। 

जैसे-तैसे प्रवेश होता है तो बच्चा मानो पेल दिया जाता है पढ़ाई के रणक्षेत्र में। उसे प्रथम आना है। बीस में से बीस अंक लेने हैं। एक अंक भी कम आया तो दोहरी झिड़कियाँ। इधर से अध्यापिका ‘बुद्ध’ कहती है तो उधर

से माता-पिता। बच्चा बेचारा घनचक्कर बन जाता है। पाँचवीं-छठी तक आते-आते पढ़ाई के अतिरिक्त टूयूशन रख दी जाती है। प्राइवेट कोचिंग में पहुँचे। घर तो बस रेस्तराँ है, जहाँ सुबह का नाश्ता, शाम की चाय और रात | स्कूल का भोजन मिल जाता है।

बाकी समय पढ़ो, पढ़ो और आगे बढ़ो का भूत । पूछो उनसे खेलेगा कौन? से आए मजे की बात यह है कि बच्चे अपने माँ-बाप द्वारा फैलाए गए इस चक्रव्यूह में हँसी-खुशी से फँस जाते हैं। वे भी इसी फेर में उलझे रहते हैं कि किस तरह किताबों को चाटते चाटते सर्वोत्तम पढ़ाकू बन जाए। 

जरा दसवीं और बारहवीं के बच्चों की दशा तो देखिए। खासकर किसी प्रतियोगिता में बढ़ने वाले विद्यार्थी की दशा। वह सुबह पांच बजे उठता है। ट्यूशन जाता है। दिन-भर स्कूल में पढ़ता है। शाम को फिर ट्यूशन पर जाता है। रात को स्कूल तथा ट्यूशन का काम करता है। न जाने कब पढ़ते-पढ़ते सो जाता है। सुबह चार बजे फिर अलार्म बजता है-उठी उठी जल्दी उठो यह जिंदगी है या जलजला ।

बात यहीं तक होती तो गनीमत थी। इंजीनियरिंग में प्रवेश मिला तो अब फिर से अच्छे उन्को का तनाव। अंक आ गए तो नौकरी मिलने के लिए संघर्ष । नौकरी भी मिल गई पचास हजार रुपए वाली। परंतु सुबह सात बजे घर से निकले, रात को नौ बजे घर पहुँचे। जाकर थककर तो गए। 

कल सुबह फिर से जल्दी जो जाना है। जवानी नौकरी में तबाह हुई। बचपन पढ़ाई में चला गया। शेष रहा बुढ़ापा अकेला, थका-हरा। उसमें भी तनाव- कि कोई अपना बंधु पास नही है। बच्चे उसी तरह नौकर हैं। काम करते हैं, खटते हैं और तनाव पीते हैं। 


8. आज की शिक्षा के बदलते स्वरूप पर एक फीचर लिखिए।

शिक्षा का बदलता चेहरा

एक समय था कि कोई अपने आपको ‘स्नातक’ या ‘एम.ए.’ कहते हुए गर्व से फूला न सनाता था। एक आज है कि एम. ए. करने वाला बगले झाँक रहा है। उसे समझ नहीं आता कि वह एम. ए. की डिग्री को लेकर क्या करे ? 

नौकरी के लिए एम.ए. की कोई अहमियत नहीं। नौकरी छोटी हो या बड़ी, सरकारी हो या निजी-सब काम को देख रहे हैं, अनुभव को देख रहे हैं, प्रोडक्शन को देख रहे हैं। उनके लिए डिग्रियाँ बेमानी हैं।

सन् 2000 तक तो डिग्रियों की फिर भी कोई पूछ थी, किंतु इक्कीसवीं सदी में प्रवेश करते ही मानो शिक्षा में निजीकरण का बोलबाला हो गया। तकनीकी शिक्षा और कंप्यूटर अनिवार्य हो गए। 

कॉलेज की सैद्धांतिक शिक्षा बिल्कुल बेकार हो गई। आज स्थिति यह है कि बी. ए., एम. ए. लगभग बेकार घूमते हैं। जब तक वे कंप्यूटर, बी. एड. या अन्य कोई व्यावसायिक डिग्री न ले ले, उनके लिए नौकरी के द्वार नहीं खुलते।

ठीक यही स्थिति बी. कॉम तथा बी. एस-सी. का भी है। इन्हें भी आजीविका के लिए कार्य अनुभव या फिर व्यावसायिक पाठ्यक्रम में से गुजरना पड़ता है। पहले हर छात्र कक्षा दस-बारह तक पढ़ने के बाद कॉलेज में पढ़ने का सपना संजोता था। 

उसके लिए शिक्षित होना सपने के समान होता था। उसके लिए वह आजीविका या व्यावसायिकता को भी नजरअंदाज कर जाता था। परंतु अब जमाना बहुत जागरूक हो गया है।

आज स्थिति यह है कि स्कूल-कॉलेज की शिक्षा प्रणाली हाशिए पर आ गई है। जागरूक माता-पिता प्राइवेट प्रशिक्षण को महत्व देने लगे हैं। बच्चे के पैदा होते ही उन्हें प्रि प्राइमरी स्कूल में प्रवेश पाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। इसके लिए घर-घर खुले प्रशिक्षण केन्द्रों की शरण में जाना पड़ता है। 

स्कूल में पढ़ते हुए भी बच्चे ट्यूशन पर अधिक निर्भर रहने लगे हैं, स्कूलों पर कम। अच्छे-से-अच्छे स्कूलों की भी यही दशा है। माता-पिता को चैन नहीं है। वे चाहते हैं कि उनका बच्चा 90% से ऊपर अंक ले तथा प्रथम आए। 

इसके चलते योग्य शिक्षकों ने प्राइवेट डॉक्टरों को तरह प्राइवेट ट्यूशन अकादमियाँ खोल ली हैं। वे 8-10 हजार की सीमित आप की बजाय हजारों-लाखों कमाने लगे हैं। घर-घर में ट्यूशन सेंटर खुल गए हैं। कितने ही

बेरोजगारों को इससे आजीविका मिली है। कक्षा बाहर तो मानो वाटरलू का मैदान हो गई है। यह साल बच्चे के लिए ‘टर्निंग प्वाइंट’ होता है। इसलिए माता-पिता बच्चे पर इस वर्ष सबसे अधिक ध्यान देते हैं। 

विज्ञान के बच्चे पूरा और कोचिंग की रगड़ खाते हैं। उसके बाद प्रवेश परीक्षा के लिए रिफ्रेशर या वर्ष ट्यूशन फ़ैश कोर्स करते हैं। पढ़ाई मानो युद्ध का मैदान हो जाती है। अब लोग अच्छी शिक्षा के लिए प्राइवेट कोचिंग केन्द्रों पर भरोसा करने लगे हैं। इन केन्द्रों में मोटी फीस वसूल की जाती है। कक्षा बाहर के बाद अधिकतर योग्य छात्र इंजीनियर, डॉक्टर, वकील, सी.ए. आदि के

निश्चित व्यवसाय खोज लेते हैं। जो इनमें असफल रहते हैं, वे ही दूसरे विकल्प के रूप में काले की परंपरागत शिक्षा की ओर मुड़ते हैं। इसलिए कॉलेज की पढ़ाई तो दूसरी श्रेणी की पढ़ाई बनकर रह गई है। कुछ अच्छे कॉलेजों में चल रहे व्यावसायिक या तकनीकी पाठ्यक्रमों को छोड़ दें, तो शेष सब कॉलेज मानो टाइम पास करने का माध्यम बनकर रह गए हैं। 


9. मोबाइल के सुख-दुख को रेखांकित करते हुए एक फीचर लिखिए।

मोबाइल सुविधा या असुविधा

तेजी से बदलती दुनिया में संचार क्षेत्र में चमत्कारिक परिवर्तन हुए हैं। इन्हीं परिवर्तनों की एक कड़ी मोबाइल सेवा है। मोबाइल फोन त्वरित संप्रेषण का मुख्य साधन है। मोबाइल लोगो के लिए एक आवश्यकता की वस्तु बनता जा रहा है। इस सुविधा का उपयोग करने के बाद इसके बिना अधूरेपन का अहसास होता है। मानव का जीवन इस सेवा से आसान हो गया है। मगर सुविधा के साथ असुविधा भी होती है।

वर्तमान में मोबाइल फोन में इतनी सुविधाएँ आ गई हैं कि प्रयोग करने वाला सारा दिन व्यस्त रहता है। एस.एम.एस., रेडियो, खेल, कैमरा और टेपरिकार्डर आदि अनेक सुविधाएँ लोगों को आकर्षित करती हैं। हम इसके जरिए एक-दूसरे के संपर्क में रहते हैं आज इतणार का जमाना नहीं है। 

आज चिट्ठी-पत्रों का काम मोबाइल के माध्यम से होता है। धीरे-धीरे यह सेवा सामाजिक प्रतिष्ठा का विषय बन गई है। बच्चे, बूढ़े, युवा, महिला हर किसी की जेब में मोबाइल बजता दिखाई देता है।

अनेक सुविधाएँ होते हुए भी मोबाइल फोन असुविधा पैदा करता है। कंपनियों नित नई प्रतियोगिताओं के ऑफर दे रही हैं। इनमें फँसकर आदमी धन व समय दोनों बर्बाद करता है। मोबाइल फोन से अदृश्य किरणें निकलती हैं जो हमारे स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है मोबाइल के निरंतर प्रयोग से चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है। 

इसके प्रयोग से अनेक प्रकार की मानसिक उलझनें खड़ी हो जाती हैं। मोबाइल के कारण समाज में आपराधिक गतिविधियाँ बढ़ी है। अचानक बजी मोबाइल की घंटी से हृदय पर असर पड़ता है जो धीरे-धीरे बड़ी समस्या को जन्म दे सकता है। फीचर लिखिए ।


10. संतुलित भोजन के महत्व पर प्रकाश डालते हुए एक  फीचर लिखिये

भोजन ठीक तो स्वास्थ्य ठीक

आज जीवन इतना बदल गया है कि हर समय स्वास्थ्य संबंधी कोई-न-कोई समस्या लगी रहती है। मानव जीवन इतना व्यस्त हो गया है कि उसे ढंग से खाने-पीने का भी समय नहीं। 

ठीक समय पर न खाने से और पौष्टिक तत्वों के अभाव में शरीर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इस कारण बीमारियाँ घेर लेती हैं। चलते-चलते खाना-पीना या बातें करते हुए खाना गलत है। अगर हम एक-साथ दो काम करते हैं तो किसी भी काम के साथ न्याय नहीं कर सकते।

भोजन करते समय बातें नहीं करनी चाहिए। आराम से शांतचित्त बैठकर खूब चबा-चबाकर खाना खाना चाहिए। ध्यान रहे कि भोजन में भी जरूरी तत्व उचित मात्रा में मौजूद हों। पाश्चात्य शैली का खाना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। 

सप्ताह में अलग-अलग तरह का भोजन करें। उपवास भी स्वास्थ्य को ठीक रखता है। हो सके तो सप्ताह में एक दिन उपवास जरूर रखें। भोजन में हरी पत्तेदार सब्जियाँ अवश्य शामिल करें। ज्यादा स्वाद के चक्कर में सब्जियों को ज्यादा तलकर न खाएँ। भोजन के साथ प्याज, टमाटर, पालक, धनियाँ, पत्ता गोभी आदि

सलाद के रूप में कच्ची ही खाएं। दालें शरीर के लिए आवश्यक है। आए दिन अल-बदलकर दालों का प्रयोग करें। 

ज्यादा मसाले स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। चाय, कॉफी, ठंडे पेय पदार्थों का सेवन कम ही करें तो अच्छा होगा। इनकी जगह दूध और ही का प्रयोग करें। तली हुई चीजों का प्रयोग कम-से-कम करें। इन सब बातों के साथ यदि त्याम और योग आदि का सहारा लिया जाए तो सोने पर सुहागा। 


11. भारत में संचार क्रान्ति के विकास एवं उसके प्रभाव के संदर्भ में एक फीचर लिखिए।

संचार क्रान्ति और भारत

‘संचार’ का अर्थ है— संदेश भेजने के साधन । इन साधनों में डाक, तार, मीडिया, दूरभाष आदि साधन आ जाते हैं। 

‘संचार क्रान्ति’ का आशय है ऐसे साधन आश्चर्यजनक ढंग से बहुत अधिक संख्या में उपलब्ध हो जाना। आज भारत में टेलीफोन, डाक-तार, मोबाइल, रेडियो, दूरदर्शन, कुरियर, इन्टरनेट जैसे अनगिनत साधन उपलब्ध हो गए हैं। 

आज अपना संदेश भेजना इतना सरल सस्ता और सहज सुलभ हो गया है कि संचार क्षेत्र में अद्भुत क्रांति उपस्थित हो गयी है।

भारत गरीब देश है। यहाँ की अधिसंख्य गरीब ग्रामीण जनता अब भी पोस्टकार्ड, मनीआर्डर जैसे परम्परागत साधनों का उपयोग करती है। इसलिए डाकखानों में भीड़ ज्यों-की-त्यों बनी हुई है। 

अभी कागजी कार्यवाही की आवश्यकता बनी हुयी है। इसलिए नगरों की समृद्ध जनता ने डाक विभाग को छोड़कर प्राइवेट कुरियर सेवा का प्रयोग करना आरंभ कर दिया है। 

प्राइवेट कुरियर सेवा डाकसेवा की तुलना में अधिक प्रामाणिक, भरोसेमंद और चुस्त दुरुस्त मानी जाती है। इस सायन ने कितने ही बेरोजगार युवकों को रोजगार उपलब्ध कराया है।

भारत की मध्यवर्गीय जनता का सबसे लोकप्रिय संचार साधन है-दूरभाष आज देश में करोड़ों दूरभाष है। छोटे नगरों में ही नहीं, गाँवों में भी दूरभाष सुलभ हो गए हैं। इस साधन आश्चर्यजनक रूप से गाँव और देश को दूर और पास को तथा देश-विदेश को आपस में जोड़ दिया है। 

पलक झपकते ही मात्र एक रुपए में अपने प्रिय को अपना संदेश भेजना सचमुच बहुत बड़ी सुविधा है। इसके कारण शहरी लोग चिट्ठी-पत्री तक लिखना भूल गए हैं। दूरभाष से भी अधिक बड़ी क्रान्ति की है। मोबाईल फोन ने। यह छोटा-सा यंत्र धारक की जेब में रहता है। 

इसकी सहायता से पूरा विश्व हर कदम पर उसके संग रहता है और वह भी विश्व के लिए उपलब्ध रहता है। लैंड-फोन के लिए तो व्यक्ति का घर या कार्यालय में होना आवश्यक है, परन्तु मोबाईल तो चलता-फिरता एटलस है। सचमुच मोबाइल के रहते दुनिया हमारी मुट्ठी में रहता है।

सेवा का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसे लेने के लिए कोई भीड़ नहीं, कोई लाइन नहीं। मोबाइल सेवा द्वारा आपके घर पर कनैक्शन उपलब्ध रहता है। इसका बिल चुकाना भी आसान है। 

इसलिए यह धीरे-धीरे मध्यमवर्ग का लोकप्रिय साधन बनता जा रहा है। मोबाइल सेवा में निस्त्री, ठेकेदार, बिजली-मैकेनिक तथा अन्य छोटे कारीगरों की दुनिया बदल डाली है। मोबाइल सेवा से उन्हें काम-धन्धा मिलने में आसानी होने लगी है। 

उच्च मध्यमवर्ग और उच्च वर्ग के लिए इन्टरनेट बहुत बड़ा संचार-साधन बनता जा रहा है। इन्टरनेट पर अपने संदेश बहुत कम कीमत पर भेजे और पाए जा सकते हैं। इसके लिए कंप्यूटर और इंटरनेट कनैक्शन आवश्यक

है जो महँगे हैं। इसलिए यह बहुत अधिक संख्या में प्रचलित नहीं हो पाया है। पत्रिकाओं की भूमिका कम नहीं हुयी है, तो भी इनका आकर्षण कम अवश्य हुआ है। अब दूरसंचार और रेडियो समूह-संचार के लोकप्रिय साधन है। 

यद्यपि समाचार-पत्रों और चौबीसों घंटे समाचार प्रसारित होते रहते हैं। मनोरंजक तथा अन्य ज्ञानवर्द्धक सामग्री हर समय दूरदर्शन पर उपलब्ध रहती है। इसलिए दूरदर्शन हर व्यक्ति का प्रिय साधन होता जा रहा है। वस्तुतः आधुनिक संचार साधनों का आजकल महत्व बहुत अधिक हो गया है।


12. दूरदर्शन के बढ़ते प्रभाव पर एक फीचर लिखिए । 

दूरदर्शन अपसंस्कृति का प्रचारक

कहने को चाहे दूरदर्शन ज्ञान-प्रसार का माध्यम हो, पर सच में तो यह मनोरंजन का साधन है। गह अपने-आप में एक स्वतंत्र दुनिया बसाए हुए है। आप मानें या न मानें, दूरदर्शन पर आनेवाले सीरियलों के पात्र हमारे अधिक करीबी है। 

हमें उनके सुख-दुख की अधिक परवार है। हमारा भाई सीढ़ियों से गिर जाए, हमें उसकी मरहम-पट्टी की परवाह हो या न हो किंतु सीरियल के नायक को लगी चोटों की चिंता बहुत अधिक रहती है। 

सीरियल का नायक है मूल ही घायल होता है किंतु हम अपनी मोटी-मोटी आँखों से उसके लिए आँसू गिराना नहीं भूलते। 

सचमुच दूरदर्शन की दुनिया हमारी वास्तविक दुनिया से भी अधिक नजदीक और प्रिय हो गई है। महिलाएँ और बच्चे तो उस पर जान न्योछावर किए रहते हैं। 

इसे हम दूरदर्शन की सफलता मानें या अपनी लाचारी परंतु यह सच है कि दूरदर्शन दूर होकर भी समीप आ गया है और हमारे अपने नजदीक रहते हुए भी हमसे दूर होते चले जा रहे हैं।

दूरदर्शन के रंगबिरंगे सीरियलों में आजकल हमें जो परोसा जा रहा है, उसे देखकर हमें चिंता होती है कि क्या हमारी दुनिया सचमुच ऐसी ही भौंड़ी, विकृत और बीनी है। अधिकांश सभी सीरियलों में खल पात्र एक पर एक दुष्टता दिखाते नजर आते हैं। 

दुख तो इस बात का है कि जिस नारी को हम देवी और श्रद्धा कहकर भावुक हो उठते हैं, वही इनमें दुष्टा, पैशाचिनी और डॉन के रूप में दिखाई देती है। क्या ये हमारे समाज की ही नारियाँ हैं ? यदि हाँ, तो फिर भी इन्हें दिखाने से क्या लाभ? क्या इन्हें देखकर समाज में कोई सद्भाव जागेगा या ऐसी ही मॉडल

और तैयार होंगी ? दूरदर्शन के विज्ञापनों की न पूछिए। इन्होंने इतना कल्याण तो कर ही दिया है कि अब नंगापन हमें कचोटता नहीं है। हर दो मिनट बाद कोई अश्लील दृश्य या विज्ञापन इस तरह परिवार की आँखों के सामने आ जाता है कि अब शर्म आनी बंद हो गई है। 

इसलिए समाज के लड़के और लड़कियाँ बोल्ड हो गए हैं। वे वैसे वस्त्र पहनते हैं जैसे दूरदर्शन में दिखाए जाते हैं। परिणामस्वरूप शहरों में पढ़ी-लिखी लड़कियाँ जींस-टॉप पहनने लगी हैं। लड़के दुष्ट पात्रों की नकल करने का कोई तरीका छोड़ना नहीं चाहते। 

रही समाचार श्रृंखला की बात इन्हें देखता ही कौन है ? इसलिए समाचार चैनलों ने स्वयं को आकर्षक बनाने के चक्कर में अपराध जगत के भींडे और डरावने दृश्य जनता के सामने पेश करने की होड़ लगा दी है। इससे इन्हें दर्शक मिलते हैं और पैसा मिलता है। रही जनता के संस्कार की बात, इसकी किसे चिंता है!


FAQs

Q. फीचर लेखन क्या है?

फीचर पत्रकारिता जगत की नवीनतम विघा है। ‘फीचर’ शब्द बोजी भाषा से लिया गया है, जिसका अर्थ है-आकृति, नखशिख, रूपरेखा, विशेषता, क्तित्व। किसी भी समाचार-पत्र के प्रमुख चार अंग—समाचार, फीचर, लेख और चित्र में से त्वपूर्ण आलेख फीचर माना जाता है।

Q. फीचर लेखन से क्या आशय है?

फीचर लेखन से आशय- फीचर की परिभाषा विभिन्न विद्वानों ने अपने दृष्टिकोण के अनुसार की है डी. आर. विलियमसन ने कहा है- “फीचर एक ऐसा सर्जनात्मक तथा कुछ-कुछ चानुभूति मूलक लेख है जिसका गठन किसी घटना, स्थिति अथवा जीवन के किसी पक्ष के संबंध पाठक का मूलतः मनोरंजन करने और सूचना देने के उद्देश्य से किया गया हो।”

Q. फीचर लेखन कैसे लिखा जाता है?

फीचर लेखक लेखन में विश्वसनीय साक्ष्यों की प्रस्तुति करता है। समाचार पत्र के लिए फीचर का विषय निर्धारित होते ही फीचर लेखक का ध्यान उपलब्ध समाचार से भिन्न स्वरूप में उभरते समाचारिक तथ्यों की ओर जाता है। 

Q. फीचर और कहानी में क्या अंतर है?

फीचर और कहानी में अंतर—फीचर और कहानी में कुछ बुनियादी अंतर होते हैं जो काफी स्पष्ट रूप से दिखते हैं। कहानी का सारा ताना-बाना कल्पना के केन्द्र-बिंदु पर बुना जाता है जबकि फीचर चाहे घटना प्रधान, उसकी बुनावट तथ्यों के इर्द-गिर्द ही होती है। फीचर में तथ्य तो होते हैं लेकिन उसमें तथ्यों को इस प्रकार प्रस्तुत किया जाता है कि उसमें कथा-रस अथवा गल्प-तत्व का समावेश भी हो जाता है।


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