NCERT Solutions for Class 12 Hindi Aroh Chapter 3 कविता के बहाने, बात सीधी थी पर

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मैं खुद class 12 का टॉपर रह चुका हूं और साथ ही साथ वर्तमान में मैं एक शिक्षक भी हूं। वर्तमान मे, मेरे पास कक्षा 12वीं के काफी विद्यार्थी हैं । जिनको मैं  बारहवीं की तैयारी करवाता हूं । यह पोस्ट को मैं अपने अनुभव से लिख रहा हूं । इस लेख को मैंने CBSE, NIOS, CISCE, ICSE और अन्य राज्य के board  को ध्यान में रखते हुए तैयार किया। 

NCERT Solutions for Class 12 Hindi Aroh Chapter 3 कविता के बहाने, बात सीधी थी पर

कक्षा | Class12th 
अध्याय का नाम | Chapter Nameकविता के बहाने, बात सीधी थी पर
कवि | Poetकुंवर नारायण | Kunwar Narayan
अध्याय संख्या | Chapter number03
अध्याय प्रकार | Chapter typeकविता | POEM
किताब | Bookहिंदी कोर | HINDI CORE
बोर्ड | Boardसभी बोर्ड | All India Board
किताब | Book एनसीईआरटी | NCERT
विषय | Subjectहिंदी | HINDI
अध्ययन सामग्री | Study Materialsप्रश्न उत्तर | Question Answer


कुंवर नारायण जीवन परिचय Class 12 | Kunwar Narayan Biography Class 12


कुँवर नारायण हिंदी काव्य जगत् के एक प्रमुख कवि हैं। वे काव्य-लेखन के एक सिद्ध हस्त कवि माने जाते हैं। उनका जन्म 19 सितंबर, 1927 ई. को उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिला में हुआ था। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एम. ए. किया। इन्होंने ‘युग चेतना’, ‘नया प्रतीक’ तथा ‘छायावाद’ पत्रिकाओं के संपादन मंडल का प्रतिनिधित्व किया। 

NCERT Solutions for Class 12 Hindi Aroh Chapter 3 कविता के बहाने, बात सीधी थी पर
कुंवर नारायण जीवन परिचय Class 12

ये उत्तर प्रदेश राज्य की संगीत नाटक अकादमी के उपाध्यक्ष भी रहे। कुँवर नारायण ने 1950 ई. के आस-पास काव्य लेखन प्रारंभ किया। उन्होंने सबसे पहले अंग्रेजी में कविताएँ लिखीं, किन्तु बाद में वे हिन्दी में लेखन कार्य के प्रति उन्मुख हो गए।

लेखन कार्य में सराहनीय योगदान के कारण उन्हें 1955 ई. में ‘व्यास सम्मान’, 1971 ई. में हिन्दुस्तानी अकादमी पुरस्कार’, 1973 में ‘प्रेमचंद पुरस्कार’ तथा 1982 ई. में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा ‘तुलसी पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। वस्तुतः आधुनिक युग के सशक्त कवियों में इनका महत्वपूर्ण स्थान है।

रचनाएँ कुँवर नारायण ने कविता, चिंतनपरक लेख, कहानियाँ, सिनेमा तथा अन्य कलाओं पर समीक्षाएँ भी लिखीं। इसलिए वे विविध मुखी साहित्यिक माने जाते हैं। 

इनकी प्रमुख काव्य कृतियाँ अग्रलिखित हैं- 

(क) काव्य संग्रह —चक्रव्यूह, परिवेश, हम तुम, आमने-सामने, कोई दूसरा नहीं, इन दिनों आदि।

(ख) प्रबंध काव्य आत्मजयी।

(ग) समीक्षा आज और आज से पहले। 

(घ) कहानी संग्रह-आकारों के आस-पास !

साहित्यिक विशेषताएं– कुँवर नारायण को हिंदी भाषी समाज के पर्याप्त सम्मान मिला। नई कविता और समकालीन कविता के प्रसिद्ध कवि थे। उनके काव्य में आधुनिक जीवन को यथार्थ की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है। 

भाषा-शैली—कुँवर नारायण की कविताओं की भाषा में परंपरागत छन्दों, का निर्वाह नहीं किया गया है। उनमें एक आन्तरिक लय और गीत है। भाषा का प्रयोग के अत्यंत स्वाभाविक एवं सरल अंदाज में करते हैं। उन्होंने बिंब, लय, प्रतीक आदि का सहज एवं स्वाभाविक प्रयोग किया है।


कविता के बहाने का सारांश


यह कविता कवि के संग्रह ‘इन दिनों’ में संकलित है। आज यह वाक्य प्रायः उछाल दिया। जाता है कि कविता पर संकट के बादल हैं। वस्तुतः मनुष्य यांत्रिकता के दबाव में कविता की ओर से उदासीन होता जा रहा है। इस कविता के माध्यम से कवि कविता की अपार संभावनाओं की बात कर रहा है। 

जिस प्रकार चिड़ियाँ के उड़ने के लिए आकाश का व्यापक क्षेत्र है, फूल को अपनी सुगंध फैलाने के लिए अंतरिक्ष तक की सीमा है, उसी प्रकार कविता के लिए असीम संभावनाएँ हैं। चिड़िया की एक सामर्थ्य है, फूल की गंध भी काल से रूद्र होती है किंतु कल्पना के लिए कोई बाधा या रोक-टोक नहीं है। 

कविता का माध्यम तो शब्द हैं और शब्दों के इस खेल में जड़, चेतन, अतीत, वर्तमान और भविष्य सभी उपकरण मात्र है। जब कवि में रचनात्मक ऊर्जा होगी तो वहाँ सीमाओं के बंधन स्वयं टूट जाएँगे। काव्यात्मक ऊर्जा देश, काल व भाषा की सीमा नहीं बाँधती । 

कवि भले ही चिड़िया व फूल के बहाने कविता को एक उड़ान कहता है किंतु स्वयं ही यह भी बता देता है कि कविता के पंख (कल्पना) की समता चिड़िया के पंख नहीं कर सकते। फूल को मुरझाना पड़ता है जबकि कविता सदैव खिलती रहती है। उसका प्रभाव सभी पर पड़ता है। वस्तुतः कविता युगों तक पाठकों को मोहित करती रहती है।


बात सीधी थी पर का सारांश | baat sidhi thi par summary in hindi


यह कविता कवि के ‘कोई दूसरा नहीं’ संग्रह में संकलित है। कविता की रचना-प्रक्रिया में कथ्य व माध्यम दो अंग होते हैं। कवि को अपनी अनुभूति की अभिव्यक्ति के लिए भाषा के माध्यम की आवश्यकता होती है। 

भाव के अनुसार शब्द चयन कवि की कुशलता पर निर्भर करता है। कविता वही श्रेष्ठ होती है जिसमें भावों के अनुसार भाषा का प्रयोग होता है। 

यदि भाषा के साथ तोड़-मरोड़ का प्रयास किया गया, तो भाव की अभिव्यक्ति अच्छी नहीं हो पाएगी। दूसरे शब्दों में कहें तो कला-पक्ष पर विशेषज्ञ ध्यान देने से भाव पक्ष निर्बल रह जाता है। अच्छी कविता में भाव पक्ष की प्रबलता के साथ कला पक्ष की सबलता का भी ध्यान रखना पड़ता है। 

कविता सायास नहीं बनती है। यह तो भाव का स्वाभाविक प्रस्फुटन होती है। वस्तुतः एक अच्छी कविता । में भाव पक्ष और कला पक्ष दोनों का सामंजस्य रहा है।


कविता के बहाने काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्या एवं शब्दार्थ


1. 

कविता एक उड़ान है चिड़िया के बहाने कविता की उड़ान भला चिड़िया क्या जाने

बाहर भीतर इस घर उस घर

कविता के पंख लगा उड़ने के माने

चिड़िया क्या जाने? कविता एक खिलना है फूलों के बहाने कविता का खिलना भला फूल क्या जाने !!

बाहर भीतर इस घर उस घर

बिना मुरझाए महकने के माने फूल क्या जाने? कविता एक खेल है बच्चों के बहाने बाहर भीतर

यह घर, वह घर सब घर एक कर देने के माने

बच्चा हो जाने।

शब्दार्थ : महकने—गंध फैलाने।

प्रसंग

यह कविता कवि के संकलन ‘इन दिनों’ में संकलित है। हमारी पाठ्य पुस्तक आरोह भाग-2 से उद्धृत इस कविता के कवि कुँवर नारायण हैं। कवि कविता के अस्तित्व के प्रति अपनी आशा व विश्वास को प्रकट कर रहा है।

व्याख्या

कविता कल्पना की उड़ान है, कवि के हृदय में उत्पन्न भावों की उड़ान है जिसमें कल्पना के पंख लगे होते हैं तो क्या कविता की समता चिड़िया की उड़ान से की जा सकती है। कवि कहता है चिड़िया बेचारी कविता की उड़ान को समझ भी नहीं सकती। 

चिड़िया की सामर्थ्य की सीमा है। वह इस घर से उस घर तक की उड़ान भर लेती है किंतु कवि जब कल्पना के पंख लगाकर कविता को उड़ाता है तो चिड़िया उसके क्षेत्र का अनुमान नहीं लगा सकती।

कविता की समानता कवि खिलते हुए पुष्प से करता है। फूल खिलकर गंध बिखेरता है, अपने रूप-सौंदर्य से दर्शक को आनंदित करता है किंतु कवि का मत है कि कविता के खिलने की तुलना फूल नहीं कर सकता। फूल का आकर्षण अल्पकालिक है। 

उसकी गंध की सीमा भी बहुत दूर तक नहीं होती। वह तो इस घर से उस घर तक अपनी गंध भेज सकता है। मुरझाना उसका स्वभाव है और मुरझाने तक ही उसके खिलने की सीमा है अर्थात् फूल तभी तक खिलता है, जब तक वह मुरझा न जाए।

अंत में कवि कहता है कि कविता बच्चों के खेल के समान है। बालक अपने खेल में इस घर, उस घर तक सीमित नहीं रहता। वह तो अपने खेल से सभी घरों को अपनी सीमा में ले सेता है। 

बच्चों के खेल में किसी प्रकार की सीमा को कोई स्थान नहीं होता। कविता भी शब्दों का खेल है और शब्दों के इस खेल में जड़, चेतन, अतीत, वर्तमान और भविष्य सभी उपकरण मात्र हैं। 

अतः यदि रचनात्मक ऊर्जा होगी तो भाषा, छंद, रस, अलंकार आदि काव्य शास्त्रीय बंधन कुछ नहीं कर पाएँगे।

वह समय से बाधित नहीं होगी। तभी तो आदिकवि वाल्मीकि की कविता आज भी उड़ कविता का क्षेत्र इस घर से उस घर तक सीमित नहीं रहेगा अपितु वह सभी घरों तक रही है, खिल रही है। 

जिस प्रकार चालक के सपनों की कोई सीमा नहीं होती, उसी प्रकार कविता के उड़ान की भी सीमा नहीं होती। अतः कविता की भावी यात्रा में संदेह करना व्यर्थ है। 1

सौंदर्य बोध 

कविता की मौत की आशंकाओं को निराधार सिद्ध किया है। ऊर्जावान की कविता शाश्वत के कालजयी होती है। कथन की शैली में मौलिकता है। काव्य शास्त्रीय आचार्यों के बंधनों को नकारा गया है। भाषा सरल, सुबोध व व्यावहारिक है। ‘बिना मुरझाए महकने के माने’ में अनुप्रास अलंकर है तथा ‘बच्चों के बहाने, बाहर भीतर’ में अनुप्रास अलंकार है। कविता में चिंतन का स्वर है। छंदविहीन कविता में भी छंद जैसी लय है।

2. 

आखिरकार वही हुआ जिसका मुझे डर था 

जोर जबरदस्ती से 

बात की चूड़ी मर गई 

और वह भाषा में बेकार घूमने लगी !

हार कर मैंने उसे कील की तरह 

“उसी जगह ठोंक दिया।

ऊपर से ठीक ठाक

पर अंदर से

न तो उसमें कसाव था 

न ताकत!

बात ने, जो एक शरारती बच्चे की तरह

मुझसे खेल रही थी,

‘मुझे पसीना पोंछते देख कर पूछा-

“क्या तुमने भाषा को

सहूलियत से बरतना कभी नहीं सीखा?” 

शब्दार्थ : 

आखिरकार—अन्ततः । जोर जबरदस्ती धींगा मुश्ती। चूड़ी कील या चोबिया के फेर। ठोंक दिया—गाड़ दिया। कसाव – पकड़, खिंचाव । सहूलियत — सुविधाजनक ढंग ।

प्रसंग 

यह पद्यांश ‘बात सीधी थी पर’ नामक कविता से लिया गया है। यह कविता कवि के ‘कोई दूसरा नहीं’ संकलन में संकलित है। इस कविता के रचयिता कुँवर नारायण है। इस अश में कवि भाषा के सायाश प्रयास के दोष का वर्णन कर रहा है।

व्याख्या

कवि बताता है क़ि भाषा के मकड़जाल में फँसने के कारण वही स्थिति बन गई जिसकी मुझे आशंका थी। बात प्रभावी ढंग से न कह पाया। 

भाषा के चक्कर में अर्थात् वाग्जाल में भाव की प्रबल अभिव्यक्ति नहीं हो पाई। कवि लोहे की चूड़ीदार कील के सादृश्य से बात को स्पष्ट करता है। 

वह कहता है कि जिस प्रकार जोर-जबरदस्ती करने से कील की चूड़ी मर जाती है और तब चूड़ीदार कील को चूड़ी विहीन कील के समान ठोंकना पड़ता है, उसी प्रकार कव्य के अनुकूल भाषा के अभाव में प्रभावही न भाषा में भाव को व्यक्त किया गया।

इस प्रकार की कविता ऊपर से भले ही कविता प्रतीत हो किंतु उस कविता में प्रभाव व आकर्षण का अभाव उसी प्रकार था जिस प्रकार चूड़ी विहीन कील में कसाव पकड़ की कमी रहती है। जिस भावाभिव्यक्ति के लिए मैं प्रयत्नशील था वह न हो सकी। 

अतः वह भाव या उस बात ने खेलते हुए शरारती बच्चे के समान मुझसे पूछ ही लिया कि तुमने क्या अभी तक भाषा का स्वाभाविक प्रयोग नहीं सीखा है? कवि कहना चाहता है कि भाव के साथ जो भाषा स्वयं आती है, वही प्रभावी होती है। सोच-सोचकर या शब्दकोश देखकर शब्दों का प्रयोग करने से बात बनेगी नहीं अपितु बिगड़ेगी।

सौंदर्य बोध

भाषा के भावानुकूल प्रयोग का महत्त्व बताया गया है। भाषा सरल व व्यावहारिक है और हिंदीतर शब्दों का प्रयोग है। चूड़ीदार कील से तुलना आधुनिक प्रयोग है। ॐ उत्तम बिंब विधान है। मुहावरों का सटीक प्रयोग है। बात का मानवीकरण किया गया है। साथ ही अमूर्त बात का मूर्त रूप वर्णित हुआ है।


बात सीधी थी पर काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्या एवं शब्दार्थ


बात सीधी थी पर एक बार

भाषा के चक्कर में

जरा टेढ़ी फँस गई।

उसे पाने की कोशिश में

भाषा को उलटा पलटा 

तोड़ा मरोड़ा

घुमाया फिराया

कि बात या तो बने

या फिर भाषा से बाहर आए

लेकिन इससे भाषा के साथ साथ 

बात और भी पेचीदा होती चली गई।

सारी मुश्किल को धैर्य से समझे बिना

मैं पेंच को खेलने के बजाए 

उसे बेतरह कसता चला जा रहा था

क्यों कि इस करतब पर मुझे 

साफ सुनाई दे रही थी

तमाशबीनों की शाबाशी और वाह वाह ।

शब्दार्थ 

सीधी-सरल, सुबोध। टेढ़ी फँसना-क्लिष्ट हो जाना। कोशिश-प्रयास। बात बनना — ठीक-ठाक काम होना। बात पेचीदा होना— कठिनाई उत्पन्न होना। मुश्किल समस्या । धैर्य—धीरज। पेंच — उलझन बेतरह बहुत जोर से करतब – कार्य। तमाशबीनों दर्शकों । शाबाशी उत्साहवर्धन। वाह वाह-प्रशंसा।

प्रसंग 

यह पद्यांश कवि के ‘कोई दूसरा नहीं’ संग्रह में संकलित है। इस कविता के रचयिता कुंवर नारायण हैं। इस अंश में कवि काव्य निर्माण के समय भाषा की समस्या का वर्णन कर रहा है। कविता का नाम ‘बात सीधी थी पर’ है।

व्याख्या

कवि कहता है कि मेरा कथ्य बहुत सरल व सीधा था किंतु में भाषा के लालित्य, उसकी प्रांजलता व तत्समता के चक्कर में ऐसा फँसा कि मेरा कथ्य ही बदला-बदला लगने लगा। मैं जो कहना चाहता था, उसे कहने के लिए शब्दों को टटोलता रहा। 

शब्दों के पर्याय खोजता रहा कि जो मैं चाहता हूँ वह अभिव्यक्त हो जाए। मैंने यह भी प्रयास किया कि भाषा की परवाह किए के बिना अपनी बात कह दूँ किंतु भाषा का विचार करते-करते अभिव्यक्ति की समस्या और कठिन होती चली गई।

ऐसे में मेरा कर्त्तव्य यह था कि समस्या को धैर्य से समझता कि कठिनाई क्या है किंतु मैं भूषा पर ही जोर देता रहा। इस शब्द- चमत्कार पर श्रोताओं व पाठकों से मुझे प्रशंसा मिल रही थी। 

वे मुझे देख लिखने के लिए उत्साहित करते रहे। मुझे लगा, मेरा कार्य अच्छा है। अतः मैं भाषा के खेल में मग्न रहा। भाषा पर ज्यादा ध्यान देने से भाव में अपेक्षित सौंदर्य उत्पन्न नहीं हो पाता। 

सौंदर्य बोध

कविता की अभिव्यक्ति में भाषा के माध्यम पर कवि अपना विचार प्रकट कर परोक्ष रूप से कवि फला-पक्ष के हिमायतियों पर वोट कर रहा है। रीतिकालीन कवियों अपनी प्रतिमा के प्रदर्शन के लिए शब्दों से खिलवाड़ की थी। कविता उसकी और संकेत है। भाषा अत्यंत सरल है तथा मुहावरों का प्रयोग हुआ है। साथ ही, हिंदीतर शब्दों का स्वाभावि प्रयोग हुआ है।


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प्रश्न 1. इस कविता के बहाने बताएँ कि ‘सब घर एक कर देने के माने’ क्या है? 

उत्तर—सब घर एक कर देने का अर्थ यह है कि कविता चिड़िया व फूल की तरह इस ए से उस घर तक सीमित नहीं रहती अपितु वह घर-घर की बन जाती है। उसका क्षेत्र असीम है कवि की कविता देश-काल की सीमा को लाँघकर भी घर-घर पहुँचती है।

प्रश्न 2. ‘उड़ने’ और ‘खिलने’ का कविता से क्या संबंध बनता है? 

उत्तर— कवि ने चिड़िया के उड़ने व फूल के खिलने के समान कविता के उड़ने व खिलने का वर्णन किया है। कविता जब देश की सीमाओं को लाँघकर जाती है तब कवि उसे उसका उ मानता है। कविता सुनकर या पढ़कर जब श्रोता या पाठक आनंद से खिल उठता है, तब करि उसे कविता का खिलना मानता है।

प्रश्न 3. कविता और बच्चे को समानांतर रखने के क्या कारण हो सकते हैं? 

उत्तर—बच्चे की कल्पना असीम होती है। वह कुछ भी कल्पना कर सकता है। यथा स्वयं राजा बनना या चाँद खिलीना लेना आदि। उसी प्रकार कविता का महल भी कल्पना पर ही खड़ा होता है। कुछ भी कल्पना कर लो। जयशंकर प्रसाद तो कल्पना के जगत तक की कल्पना कर लेते हैं- आठ कल्पना का वह कोमल मथुर जगत कितना होता। अतः कविता व बच्चे को समानांतर रखा गया है।

प्रश्न 4. कविता के संदर्भ में ‘बिना मुरझाए महकने के माने’ क्या होते हैं? 

उत्तर— कविता फूल के समान कभी मुरझाती नहीं है। वह तो सदा सर्वदा अपनी गंव बिखेरती रहती है। कविता कितनी ही प्राचीन हो, पहली बार पढ़ने वाले के लिए वह एक दम ताजगी लिए हुए नई होती है।

प्रश्न 5. ‘भाषा को सहूलियत से बरतने के क्या अभिप्राय हैं ? 

उत्तर— ‘भाषा को सहूलियत’ से बरतने से अभिप्राय भाषा का अक्षरानुकूल प्रयोग है। किसी भी समय भाषा के प्रयोग से पहले हमें सोच-विचार कर लेना चाहिए। जहाँ प्यार की भाषा की आवश्यकता हो, वहाँ प्यार की भाषा ही प्रयोग करनी चाहिए तथा दुष्ट व्यक्ति के समक्ष क्रोध की भाषा का प्रयोग ही उचित माना जाता है।

प्रश्न 6. चूड़ी, कील, पेंच आदि मूर्त उपमानों के माध्यम से कवि ने कथ्य की अमूर्तता को साकार किया है। भाषा को समृद्ध एवं संप्रेषणीय बनाने में बिंबों और उपमानों के महत्व पर परिसंवाद आयोजित करें।

उत्तर- काव्य बिंब का संबंध भाषा की सर्जनात्मक शक्ति से है तथा इसका निर्माण मनुष्य के ऐन्द्रिक बांध का ही प्रतिफल है। ये शब्द भाव और विचार के अमूर्त संकेत तो हैं, लेकिन इन अमूर्त संकेतों में यह शक्ति भी होती है कि वह अमूर्त संकेतों के माध्यम से एक मूर्त चित्र निर्मित कर सकता है। 

यही बिंव निर्माण की प्रक्रिया है। उपमानों के माध्यम से रचनाकार पाठक के समक्ष ऐसे उदाहरण प्रस्तुत करना है जिससे वह सरल, बोधगम्य, शब्द गम्य, शब्दाडंबर रहित होकर अपनी रचना के लक्ष्य तक पहुँचने में सफल हो जाता है। ये सभी उपमान पाठक के वातावरण के आस-पास के होते हैं।

नोट : उपर्युक्त परिभाषाओं और महत्त्व के आधर पर छात्र परस्पर परिसंवाद आयोजित करें। 

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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न


प्रश्न 1. कवि ने किस-किस बहाने से कविता की बात की है? 

उत्तर – कवि ने चिड़िया, फूल व बच्चे के बहाने से कविता की बात की है। उदाहरण- कविता एक उड़ान है चिड़िया के बहाने । कविता एक खिलना है फूलों के बहाने । कविता एक खेल है बच्चों के बहाने ।

प्रश्न 2. बच्चों के खेल व कविता की उड़ान में आप क्या साम्य देखते हैं। स्पष्ट करें। 

उत्तर- बच्चे खेल-खेल में बड़ी-बड़ी कल्पना कर लेते हैं। वे एक लाठी को टाँगों के मध्य डेकर घोड़े की सवारी का आनंद ले लेते हैं। वे अपने पैर पर गीला रेत दवाकर और फिर निकाल कर मकान बनाने का सुख लूट लेते हैं। इसी प्रकार कवि हिमालय की सबसे ऊँची चोटी पर जा बैठता है- 

हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर

बैठ शिला की शीतल छाँह । 

एक पुरुष भींगे नयनों से

देख रहा था प्रलय प्रवाह ।।।।

दोनों की कल्पनाओं की कोई सीमा नहीं है। अतः दोनों में साम्य है।


लघु उत्तरीय प्रश्न


प्रश्न 1. ‘कविता के बहाने में कवि ने अमूर्त को मूर्त रूप में वर्णित किया है। स्पष्ट करे ।

उत्तर—– कविता अमूर्त होती है किंतु कवि ने उसकी उड़ान, उसके पंख, उसके खिलने, बिना मुरझाए महकने आदि के वर्णन के द्वारा अमूर्त को मूर्त रूप में वर्णित किया है।

प्रश्न 2. ‘कविता के बहाने’ कविता के मूल में प्रतीप अलंकार है। स्पष्ट करें।

उत्तर— उड़ान के लिए चिड़िया व खिलने के लिए फूल उपमान है, किंतु कवि ने उपमेय कविता के सम्मुख उनकी पराजय और ‘भला क्या जाने’ व ‘फूल क्या जाने’ कहकर अपमानित कराया है। अतः प्रतीप अलंकार है। 

प्रश्न 3. कविता की उड़ान चिड़िया क्यों नहीं जान सकती है? 

उत्तर— कवि के अनुसार चिड़िया स्वाभाविक उड़ान भरती है, किंतु कवि कल्पना की उड़ान भरता है। इस प्रकार दोनों की उड़ान में अंतर है। कविता की उड़ान में कवि अपने विचारों की अभिव्यक्ति करता है। इसलिए चिड़िया उसे नहीं जान सकती है।

महत्वपूर्ण काव्यांशों का काव्य-सौंदर्य प्रश्न – 

कविता एक उड़ान है चिड़िया के बहाने 

कविता की उड़ान भला चिड़िया क्या जाने

बाहर भीतर

इस घर उस घर 

कविता के पंख लगा उड़ने के माने

चिड़िया क्या जाने ?

उत्तर— भाव-सौन्दर्य 

प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘आरोह भाग- 2’ में संकलित कुँवर नारायण द्वारा रचित ‘कविता के बहाने’ कविता से उद्धृत है। कवि के अनुसार कविता की रचना करते समय कवि का हृदय चिड़िया के समान उड़ान भरने लग जाता है। कवि का मन किसी भी विषय को गहराई में पूर्ण रूप से खो जाता है, किंतु अंतर केवल इतना है कि उस कवि हृदय की कल्पना को चिड़िया नहीं समझ सकती है।

शिल्प-सौंदर्य 

(क) प्रस्तुत काव्यांश में कवि द्वारा कविता रचते समय सहज एवं स्वाभाविक-कल्पना के आश्रय का वर्णन किया गया है।

(ख) शुद्ध खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है।

(ग) कविता की उड़ान को चिड़िया की उड़ान के समान मानने की उपमा दी गई है।


FAQs


प्रश्न 1. बात और भाषा परस्पर जुड़े हैं, किंतु कभी-कभी भाषा के चक्कर में सीधी बात भी टेढ़ी हो जाती है कैसे?

उत्तर- ‘वात’ और ‘भाषा’ का परस्पर गहरा संबंध है। भाषा के बिना बात करना असंभव है। ठीक उसी प्रकार बात के बिना भाषा महत्त्वहीन होती है, किन्तु कभी-कभी बात करते समय भाषा के अनुचित प्रयोग के कारण बात कलह या विवाद का रूप ले लेती है। कभी-कभी यह विवाद इस स्तर पर भी पहुँच जाता है कि फिर आपस में बताचीत करने वालों का मन मिलाना भी असंभव हो जाता है। इस प्रकार सीबी बात भी टेढ़ी बन जाती है।

प्रश्न 2. आधुनिक युग में कविता की संभावनाओं पर चर्चा कीजिए।

उत्तर आधुनिक युग में लिखी जाने वाली कविताओं में गीतात्मकता का अभाव है। संगीतात्मकता, लयात्मकता और तुकांत से हट कर मुक्तक छंद में रचनाएँ लिखी जाने लगी है। छंद आदि में नए- नए प्रयोग किए जाते हैं। इनमें आम आदमी के दुख-दर्द, संघर्ष, आकांक्षा और भविष्य का अभाव है, किन्तु फिर भी कविता का भविष्य उज्जवल है। यह निरन्तर चलती रहने वाली एक विद्या है। 


Conclusion


नमस्कार Students,  मैंने इस पोस्ट को CBSE, NIOS,  CISCE, ICSE और अन्य राज्य के board के मुताबिक इस पोस्ट को तैयार किया है, तथा भविष्य में जो भी लेटेस्ट अपडेट आएंगी उसके अनुसार यह पोस्ट अपडेट भी होता रहेगा । इसलिए मुझे यह आशा है कि यह पोस्ट आपके लिए काफी जानकारी पूर्ण होगा और आपके परीक्षा के लिए काफी सहायता प्रदान करेगा । तो मेरा आपसे यही आग्रह है कि आप इस लेख को पूरा अवश्य पढ़ें । 



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