NCERT Solutions Class 12 Hindi Elective Chapter 3 Question Answer | अध्याय 3 सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय

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मैं खुद 12वीं का टॉपर रहा हूं और मुझे पता है कि 12वीं की परीक्षा में किस तरह के प्रश्न पूछे जाते हैं। वर्तमान में, मैं एक शिक्षक की भूमिका भी निभा रहा हूँ, और अपने छात्रों को कक्षा 12वीं की महत्वपूर्ण जानकारी और विषयों का अभ्यास भी कराता हूँ। मैंने यह लेख 5 वर्षों से अधिक के अपने अनुभव के साथ लिखा है। इस पोस्ट की मदद से आप परीक्षा में इस अध्याय से भूगोल में बहुत अच्छे अंक प्राप्त कर सकेंगे।

NCERT Solutions Class 12 Hindi Elective Chapter 3 Question Answer | अध्याय 3 सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय

कक्षा | Class12th 
अध्याय | Chapter03
अध्याय का नाम | Chapter Name(क) यह दीप अकेला
(ख) मैंने देखा एक बूंद
कवि का नाम | Poet Nameसच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय
किताब | Bookअंतरा ऐच्छिक | Hindi Elective
खंड | Sectionकाव्य खंड | Poetry Section
बोर्ड | Boardसभी हिंदी बोर्ड
किताब | Book एनसीईआरटी | NCERT
विषय | Subjectहिंदी | HINDI
अध्ययन सामग्री | Study Materialsप्रश्न उत्तर | Question answer

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का जीवन-परिचय | Biography of Sachchidananda Hiranand Vatsyayan ‘Ajneya’

उत्तर-जीवन-परिचय– प्रयोगवाद एवं नई कविता के सशक्त कवि श्री अज्ञेय का जन्म 7 मार्च, 1911 ई. को भगवान बुद्ध की जन्मभूमि कुशीनगर कसवा में हुआ था। उनके पिता का नाम हीरानंद वात्स्यायन था। ‘अज्ञेय’ का बचपन लखनऊ, श्रीनगर और जम्मू में व्यतीत हुआ। प्रारंभ में वे विज्ञान के विद्यार्थी थे। 

उन्होंने सन् 1929 ई. में पंजाब विश्वविद्यालय से ई. एस-सी. की परीक्षा पास की, किन्तु बाद में साहित्य में रुचि होने के कारण अंग्रेजी विषय में एम. ए. करने की ठानी। अंग्रेजी में एम. ए. करते समय क्रांतिकारी आंदोलन में कूद पड़े। सन् 1930 ई. के अंत में पकड़े गए। 

Agyeya Biography in Hindi
image credit; zeehindi

आपको स्वतंत्रता आंदोलन के चक्कर में कई बार जेल सैनिक, विशाल भारत, प्रतीक, दिनमान, नवभारत टाइम्स एवं नया प्रतीक आदि पत्र-पत्रिकाओं होना पड़ा। उन्होंने अपने जीवन में सेना सहित अनेक नौकरियाँ कीं। एक अज्ञेय’ जी को घुमक्कड़ी का बड़ा शौक था। उन्होंने देश-विदेश की यात्राएँ कीं। उन्होंने सम्पादन किया। 4 अप्रैल, 1987 ई. को नई दिल्ली में उनका देहान्त हो गया।

“अहेय की प्रारंभिक शिक्षा संस्कृत और अंग्रेजी में हुई, यही कारण है कि परंपरा में पले अंग्रेजी संस्कारों के व्यक्ति रहे। उनकी काव्यवस्तु से ही नहीं, वरन उनक से भी सुरुचि और शालीनता प्रकट होती है “आहे जी हिन्दी में प्रयोगवाद’ और ‘नयी कविता’ के प्रवर्तक माने जाते हैं। 

उनके में लौकिक प्रेम की अभिव्यक्ति से लेकर प्रकृति के विविध रूपों के चित्रण के साथ ब के महाशून्यवाद तक की अभिव्यक्ति हुई है। उन्होंने शब्दों का सटीक चयन कर सटीक भरने का प्रयास किया है। सन् 1978 ई. में उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया

रचनाएँ भग्नदूत, चिंता, इत्यलम्, हरी घास पर क्षण भर इंद्रधनुष हुए में कितनी में कितनी बार, सागर मुद्रा, नदी की बाँक पर छाया, सदानीरा (दो भाग) आदि काव्य उन्होंने तीनों ‘तार सप्तकों’ का सम्पादन भी किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने कई कहानी-2 उपन्यास, यात्रा-वृतांत आदि भी लिखे। 

भाषा-शैली—’अज्ञेय’ की भाषा संस्कृतनिष्ठ बड़ी बोली है, जिसमें छन्दों के साथ छन्द मुक्तकता भी है। उनकी भाषा में नए बिम्बों और नए प्रतीकों का भी प्रयोग मिलता

काव्य-शिल्प की विशेषताएँ भाव पक्ष अज्ञेय जी को ‘नई कविता’ का प्रवर्तक जाता है। अज्ञेय की कविताओं में विषयवस्तु की नवीनता है। उनकी कविताएँ आत्मानुभूति उपजे विवेक का काव्यात्मक प्रतिरूप हैं। अज्ञेय प्रकृति-प्रेम और मानव-मन के अंतद्वंदों के हैं। उनकी कविता में व्यक्ति की स्वतंत्रता का आग्रह है और बौद्धिकता का विस्तार भी मान संबंधों में सद्भावना, शालीनता और ईमानदारी उनके काव्य की प्रमुख विशेषता है। उन रचनाओं में भावों की विविधता भी है और व्यापकता भी। उन्होंने कविता को नई शक्ति अभिव्यक्ति दी है। 

कला-पक्ष भाषा शैली अज्ञेय जी ने शब्दों को नया अर्थ देने का प्रयास करते हुए काव्य-भाषा को विकसित करने में महान योगदान दिया है। उनकी रचनाओं में नई शिल्प- है। उन्होंने अपने काव्य में हिंदी के अतिरिक्त देशी-विदेशी छन्दों और शास्त्रीय लोक धुनों भी प्रयोग किया है। उनकी भाषा में सरलता, गंभीरता व प्रवाहमयता है।

अलंकार – अज्ञेय जी ने कहीं-कहीं अलंकारों का अत्यंत आकर्षक प्रयोग किया है। जैसे अनुप्रास कौन कृती, गाता गीत अपमान अवज्ञा, अखंड अपनाता आदि।

रूपक—– यह गोरस जीवन कामधेनु का अमृत-पूत पय।

चित्रात्मकता–अज्ञेय जी की रचनाओं में चित्रात्मकता का गुण प्रायः देखा जा सकता

यह दीप अकेला कविता का सारांश | Summary Of The Poem yah deep akela

NCERT Solutions Class 12 Hindi Elective

‘अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता को ध्यान में रखकर अज्ञेय जी ने व्यक्तिविशेष की को ललकारा है। उन्होंने व्यक्तियों से बने समूह की ताकत का भरोसा दिलाया है। इसी पर ‘यह दीप अकेला’ नामक कविता में अज्ञेय जी ने व्यक्ति के प्रतीक के रूप में एक ऐसे दी को चित्रित किया है जो स्नेह भरा है, गर्व भरा है, मदमाता भी है, किंतु अकेला है। 

कवि मानना है कि अहंकार का मद हमें अपनों से अलग कर देता है। कवि कहता है कि इस दीप को भी पंक्ति में शामिल कर लो। पंक्ति रूपी समाज में शामिल करने से उस दीप की मात्र एवं सार्थकता बढ़ जाएगी। दीप में सब कुछ है, सारे गुण एवं शक्तियाँ उसमें हैं, उसकी व्यक्ति सत्ता भी कम नहीं है, फिर भी पंक्ति की तुलना में वह एक है, अकेला है। दीप का पंक्ति प समूह में विलय ही उसकी ताकत का, उसकी सत्ता का सार्वभौमीकरण है।

इसी प्रकार व्यक्ति का समाज में सम्मिलित होना उसके लक्ष्य एवं उद्देश्य का सर्वव्यापीकरण है। व्यक्ति सब कुछ है सर्वशक्तिमान है, सर्वगुणसंपन्न है, फिर भी समाज में उसका विलय, समाज के साथ उसकी आरा से समाज मजबूत होगा, राष्ट्र मजबूत होगा। इस कविता के माध्यम से ‘अज्ञेय’ ने सत्ता को सामाजिक सत्ता के साथ जोड़ने पर बल दिया है। दीप का पंक्ति में विलय आष्टि का समष्टि में विलय है और आत्मबोध का विश्ववोध में रूपांतरण। इसी में दीप की सार्थकता है और व्यक्ति की भी ।

मैंने देखा एक बूंद कविता का सारांश | Summary Of The Poem mainne dekha ek boond

“मैंने देखा, एक बूंद’ कविता में कवि अज्ञेय ने बूँद के माध्यम से मानव-जीवन के एक-एक क्षण को महत्त्वपूर्ण एवं सार्थक बताया है। इस कविता में अज्ञेय जी ने समुद्र से अलग प्रतीत होती बूंद की क्षणभंगुरता को व्याख्यायित किया है। यह क्षणभंगुरता बूंद की है, समुद्र की नहीं। कवि देखता है कि बूंद क्षणभर के लिए ढलते सूरज की आग से रंग जाती है। क्षणभर का यह दृश्य देखकर कवि को एक दार्शनिक तत्त्व भी दीखने लग जाता है। 

उसे यह अनुभूति होती है कि विराट से अलग हुई बूंद क्षणभर के लिए विशेष सौन्दर्य से परिपूर्ण होकर अपनी अलग पहचान बना लेती है। यद्यपि वह पल भर में ही अस्तित्वहीन ही जाती है, परंतु विराट के सम्मुख बूँद का समुद्र से अलग दिखना नश्वरता के दाग से, नष्ट होने के दोष से मुक्ति का अहसास है। इस कविता के माध्यम से कवि ने जीवन में क्षण के महत्त्व के साथ ही उसकी क्षणभंगुरता को भी प्रतिष्ठापित किया है। कवि ने यह संदेश दिया है कि जीवन की सार्थकता इसी में है कि वह छोटा होते हुए भी विशेषताओं से भरा हुआ हो।

class 12th NotesMCQ
HistoryPolitical Science
EnglishHindi

यह दीप अकेला सप्रसंग व्याख्या एवं शब्दार्थ | यह दीप अकेला सप्रसंग व्याख्या NCERT

1. यह दीप अकेला स्नेह भरा है गर्व भरा मदमाता, 

पर इसको भी पंक्ति को दे दो। 

यह जन है-गाता गीत जिन्हें फिर और कौन गाएगा ?

पनडुब्बा- ये मोती सच्चे फिर कौन कृती लाएगा ?

यह समिधा ऐसी आग हठीला बिरला सुलगाएगा। 

यह अद्वितीय वह मेरा यह मैं स्वयं विसर्जित-

यह दीप, अकेला, स्नेह भरा है गर्व भरा मदमाता, 

पर इसको भी पंक्ति को दे दो।

शब्दार्थ : कृती—भाग्यवान, कुशल पनडुब्बा — गोताखोर, एक जलपक्षी जो पानी में हू-डूबकर मछलियाँ पकड़ता है। समिधा — यज्ञ की सामग्री। बिरला बहुतों में एक। विसर्जित-त्याहुआ।

प्रसंग प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘अंतरा’ (भाग-2) में संकलित ‘यह दीप अकेला’ नामक कविता से उद्धृत है। इसके रचयिता प्रसिद्ध कवि सच्चिदानंद हीरानंद वातस्यायन ‘ये है। इन पंक्तियों में कवि ने एक स्नेह और गर्व भरे दीप को पंक्ति में सम्मिलित करने का यूरोप किया है। उसमें सारी शक्तियाँ हैं, वह सर्वगुणसंपन्न है, फिर भी अकेला है। दीप के प्रतीक के माध्यम से कवि ने व्यक्तिगत सत्ता को सामाजिक सत्ता के साथ जोड़ने का आह्वान है। 

व्याख्या– कवि कहता है कि यह दीपक अकेला है। यह स्नेह से भरा हुआ है, गर्व से भरा हुआ है और मदमाता भी है अर्थात् अहंकार की मस्ती में चूर है। फिर भी यह अकेला है, अतः इस अकेले दीप को भी पंक्ति में शामिल कर लो अर्थात् इसकी व्यक्तिगत सत्ता को सत्ता के साथ जोड़ दो।  

यह गीत गाता हुआ मनुष्य है, इस समूह में शामिल कर लो, नहीं तो इन गीतों को कौन गाएगा ? यह जल में गोते लगाने वाला ऐसा गोताखोर है, जो सच्चे मोती निकाल कर है। इसे साथ ले लो, नहीं तो कौन कुशल व्यक्ति उन सच्चे मोतियों को ढूंढ कर लाएगा इसे समाज में सम्मिलित कर लेने से समाज लाभान्वित होगा।

यह यज्ञ की हवन सामग्री है, ऐसी प्रज्वलित अग्नि कोई हटवाला बहुतों में एक ही पाएगा। यह अद्वितीय है अर्थात् इसके जैसा दूसरा कोई नहीं है। यह मेरा है अर्थात् इसमें का भाव है, परंतु यह स्वयं अपने अहं का त्याग भी किए हुए है अर्थात् इसकी अपनी अ व्यक्तिगत सत्ता होते हुए भी इसका उद्देश्य सामाजिक सत्ता में विलय होना है। यह दीपक अके है, स्नेह से भरा हुआ है, गर्व से मरा हुआ है, अहंकार के नशे में चूर है। फिर भी अकेला है इसको भी पंक्ति में शामिल कर लो अर्थात् इसके व्यष्टि का समष्टि में विलय कर लो। सुतय

सौन्दर्य-बोध- – इन पंक्तियों में कवि ने मनुष्य की व्यक्तिगत सत्ता को सामाजिक सत्ता से जोड़ने का संदेश दिया है। कवि ने यह विचार व्यक्त किया है कि व्यक्ति का समूह में विलय ही उसकी सत्ता का सार्वभौमीकरण है। काव्यांश में सरल, सरस एवं प्रवाहमयी भाषा का प्रयोग हुआ है। ‘गाता गीत’, ‘कीन कृती’ में अनुप्रास अलंकार है। लाक्षणिक प्रयोग दर्शनीय है। ‘दीप को व्यक्तिगत सत्ता तथा ‘पंक्ति’ को सामाजिक सत्ता के प्रतीक के रूप में चित्रित किया गय है। पंक्तियों में रूपक अलंकार है। 

2. यह मधु है स्वयं काल की मौना का युग-संचय,

यह गोरस – जीवन – कामधेनु का अमृत-पूत पय, 

यह अंकुर-फोड़ धरा को रवि को तकता निर्भय,

यह प्रकृत, स्वयंभू, ब्रह्म, अयुतः इसको भी शक्ति को दे दो।

यह दीप, अकेला, स्नेह भरा है गर्व भरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति को दे दो।

शब्दार्थ मौना टोकरा, पिटारा। गोरस- दूध, दही। निर्भय भय रहित, निडर। प्रकृत- प्रकृति से उत्पन्न, प्रकृति के अनुरूप, स्वाभाविक स्वयंभू—ब्रह्मा, स्वयं पैदा हुआ। अयुतः- 10 हजार की संख्या, असंबद्ध, पृथक, अनुव्य अमृत-पूत पय देवपुत्र-पय, अर्थात् अमृत । प्रसंग — 

प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘अंतरा’ (भाग-2) में संकलित ‘यह दीप अकेला’ नामक कविता से उद्धृत है। इसके रचयिता सुप्रसिद्ध कवि सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ हैं। इन पंक्तियों में यह संदेश दिया गया है कि व्यक्ति भी एक अकेले दीपक की भाँति ही है, तो स्नेह, गर्द और अहं भाव से परिपूर्ण है। परंतु सनाज में सम्मिलित हो जाने में ही उसकी सार्थकता है। यहाँ कवि ने उसे मधु, दूध, अंकुर आदि के रूप में चित्रित करते हुए समष्टि में उसके विलय की आवश्यकता पर बल दिया है। 

व्याख्या— कवि कहता है कि यह काल के टोकरे में युग-युग तक स्वयं एकत्रित हुआ मधु है। यह ऐसा दूध है, जो जीवन रूपी कामधेनु का देवपुत्र-पय अर्थात् अमृत है। यह वह अंकुर है, जो धरती को फोड़कर निर्भयतापूर्वक सूर्य की ओर देखता है। यह प्रकृति के अनुरूप, स्वयं पैदा हुआ, ब्रह्म और सर्वथा पृथक् है।

इसको भी शक्ति दे दो। तात्पर्य वह है कि व्यक्ति में सारे गुण व शक्तियाँ हैं, वह स्वयं में पूर्ण है, फिर भी समाज के साथ उसकी अंतरंगता से समाज मजबूत होगा। कवि कहता है कि यह दीपक अकेला है, स्नेह से परिपूर्ण है, गर्व से भरा हुआ है, इसने अहं भाव भी है। परंतु इसको भी पंक्ति को दे दो। अर्थात् एक अकेले व्यक्ति को भी समाज में शामिल कर लो।

सौन्दर्य-बोध-इन पंक्तियों में व्यक्ति को सर्वगुणसंपन्न और सर्वशक्तिमान बताया गया है, फिर भी उसके समाज में जुड़ने से उसकी महत्ता और सार्थकता बढ़ जाएगी, यह बात स्पष्ट की गई है। इस काव्यांश में दीप की उपमा उनेक वस्तुओं से की गई है। भाषा तत्सम प्रधान, भावपूर्ण एवं प्रवाहमयी है। शब्दों का चयन अत्यंत सटीक एक आकर्षक है। आक्षणिक प्रयोग है।

3.यह वह विश्वास, नहीं जो अपनी लघुता में भी काँपा,

वह पीड़ा, जिस की गहराई को स्वयं उसी ने नापा; कुत्सा,

अपमान, अवज्ञा के धुंधुआ कडुवे तम में यह सदा द्रवित, चिर-जागरूक,

अनुरक्त-नेत्र, उल्लंब बाहु, यह चिर- अखंड अपनापा ।

जिज्ञासु, प्रबुद्ध, सदा श्रद्धामय, इसको भक्ति को दे दो-यह दीप,

अकेला, स्नेह भरा है गर्व भरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति को दे दो।

शब्दार्थ : लघुता—छोटाई। कुत्सा-बुराई, निंदा, घृणा अवज्ञा अनादर, अपेक्षा। ब्ल्लंब बाहु-उठी हुई बाँह वाला अपनापा अपनत्व, आत्मीयता। प्रसंग — प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘अंतरा’ (भाग-2) में संकलित ‘यह दीप केला’ नामक कविता से उद्धृत है। इसके रचयिता सुप्रसिद्ध कवि सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन नज्ञेय’ हैं।

इन पंक्तियों में कवि ने दीपक के प्रतीक के माध्यम से मनुष्य को विश्वास से परिपूर्ण, दुख सहनशील, जागरूक, प्रबुद्ध आदि बताते हुए उसे सर्वगुणसंपन्न दर्शाया है। साथ ही उसे पंक्ति दे देने की बात कर कवि ने उसकी व्यक्तिगत सत्ता को सामाजिक सत्ता से जोड़ने का संदेश या है।

व्याख्या— कवि कहता है कि यह दीपक उस विश्वास का रूप है, जो अपने छोटे होने के वजूद काँपता नहीं है। यह वह पीड़ा है, जिसकी गहराई को उसने स्वयं ही नाप लिया है अर्थात् दीपक रूपी व्यक्ति में पूर्ण आत्मविश्वास भरा हुआ है और इसमें गहरे दुख को भी सहन रने की क्षमता है।

निंदा, अपमान, अनादर के धुंधलाते कठोर अंधकार में यह हमेशा द्रवित अर्थात् करुणा से हुआ, दीर्घकाल से जागरूक, अनुरागयुक्त नेत्रों वाला, (गले लगाने को) उठी हुई बाँहों वाला नीर दीर्घ समय से सम्पूर्ण आत्मीयता से भरा हुआ है। यह ज्ञान प्राप्ति के लिए उत्सुक, जाग्रत, श्रद्धा से युक्त इसको भक्ति को दे दो

यह दीप अकेला है, स्नेह से भरा हुआ है, यह गर्व से भरा है और अहं भाव से परिपूर्ण है, परंतु इसको भी पंक्ति को दे दो। तात्पर्य यह है कि दीपक रूपी इस व्यक्ति में समस्त अच्छे गुण हुए है। यह सर्वगुणसंपन्न है, इसलिए इसे समूह में सम्मिलित कर लेना चाहिए। इस प्रकार के साथ उसकी अंतरंगता से समाज में सद्गुणों की वृद्धि होगी और समाज मजबूत होना। 

सौन्दर्य-बोध – इन पंक्तियों में व्यक्ति को सर्वगुणसंपन्न बताते हुए उसकी सामाजिक उपयोगिता को प्रतिष्ठित किया गया है। इस काव्यांश में तत्सम प्रधान गंभीर भाषा का प्रयोग हुआ है। ‘वह विश्वास’, ‘अपमान अवज्ञा’, ‘अखंड अपनापा’ में अनुप्रास अलंकार की छटा है। शब्दों का चयन अत्यंत सटीक एवं प्रभावपूर्ण है। दीप का प्रतीकात्मक प्रयोग दर्शनीय है। लाक्षणिक प्रयोग इष्टव्य है।

मैंने देखा एक बूँद सप्रसंग व्याख्या एवं शब्दार्थ | मैंने देखा एक बूँद सप्रसंग व्याख्या NCERT

1.एक बूँद सहसा

उछली सागर के झाग से;

रंग गई क्षणभर

मुझ को दीख गया :

ढलते सूरज की आग से । 

सूने विराट् के सम्मुख 

हर आलोक छुआ अपनापन

है उन्मोचन

नश्वरता के दाग से !

शब्दार्थ : विराट्—–बहुत बड़ा, ब्रह्म । आलोक – प्रकाश । उन्मोचन—मुक्त करना, ढील करना। नश्वरता नाशशीलता, मिटना। 

प्रसंग–प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘अंतरा’ (भाग-2) में संकलित ‘मैंने देखा, एक बूँद’ नामक कविता से ली गई हैं। इसके रचयिता सुप्रसिद्ध कवि सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ हैं। इन पंक्तियों में कवि ने समुद्र से अलग प्रतीत होती बूँद की क्षणभंगुरता को व्याख्यायित किया है। इसके माध्यम से कवि ने यह दर्शाया है कि जीवन की नश्वरता के बावजूद जीवन में प्रत्येक क्षण का महत्त्व है।

व्याख्या— कवि कहता है कि मैंने देखा कि सागर के झाग से अचानक एक बूँद उछली। वह क्षण भर के लिए ढलते सूरज की आग से रंग गई अर्थात् अस्त होते हुए सूर्य की लालिमा से उसका रंग बिलकुल लाल हो गया।

यह दृश्य देखकर मुझको यह तथ्य दिखाई दे गया कि सूने विराट् के सामने प्रकाश के प्रत्येक स्पर्श से आया अपनापन नश्वरता के दाग से मुक्ति देता है। अर्थात् समुद्र से अलग चमकती हुई बूँद को देखकर कवि को यह बोध होता है कि विराट् के सम्मुख क्षणभर को भी अलग दिखना नश्वरता के दाग से मुक्ति का अहसास है। इस प्रकार विराट् से अलग होकर अस्तित्वमान हुआ व्यक्ति नशवान होने की प्रकृति के बंधन में तो बँध जाता है, परंतु उसकी पृथक सत्ता की अनुभूति उसे नष्ट होने के भाव से मुक्ति दिला देती है।

सौन्दर्य-बोध – इन पंक्तियों में कवि ने जीवन की क्षणभंगुरता की महत्ता को भावपूर्ण शब्दों में दर्शाया है। भाषा में सरलता, सजीवता एवं प्रवाहमयता है। शब्दों का चयन अत्यंत सटीक एवं प्रभावपूर्ण है। ‘बूंद’ और ‘सागर’ का प्रतीकात्मक प्रयोग हुआ है। लाक्षणिक प्रयोग दर्शनीय है।

यह दीप अकेला के प्रश्न उत्तर | NCERT Solutions Class 12 Hindi Elective Chapter 3 Question Answer

प्रश्न 1. ‘दीप अकेला’ के प्रतीकार्थ को स्पष्ट करते हुए यह बताइए कि उसे कवि ने स्नेह भरा, गर्व भरा एवं मदमाता क्यों कहा है ? 

  • उत्तर- (i) ‘दीप अकेला’ का प्रतीकात्मक अर्थ है, ‘एक अकेला व्यक्ति’ । 
  • (ii) यहाँ कवि ने यह स्पष्ट किया है कि जिस प्रकार एक जलते हुए दीपक में जबतक स्नेह (तेल) भरा होता है, उसकी ज्वाला गर्व से तनी रहती है, उसमें प्रकाश उत्पन्न करने का अहं भाव भरा होता है; उसी प्रकार एक व्यक्ति में भी स्नेह, गर्व और अहं भाव आदि भरे होते हैं। 
  • (iii) कवि के कहने का भाव यह है कि मनुष्य स्वयं में ही सर्वगुणसंपन्न होता है। केवल इच्छाशक्ति को प्रबल करने की आवश्यकता है।

प्रश्न 2. यह दीप अकेला है ‘पर इसको भी पंक्ति’ को दे दो’ के आधार पर व्यष्टि का समष्टि में विलय क्यों और कैसे संभव है ?

  • उत्तर— (i) एक अकेला दीप स्नेह और गर्व से भरा हुआ है। उसमें अहं भाव भी है अर्थात् उसकी अपनी व्यक्तिगत सत्ता है।
  • (ii) दीप को पंक्ति को दे देने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य की व्यक्तिगत सत्ता को सामाजिक सता से जोड़ दिया जाए। 
  • (iii) इस तरह व्यष्टि का समष्टि में विलय इसलिए आवश्यक है, क्योंकि इससे समाज मजबूत होगा।
  • (iv) यह इस प्रकार संभव है कि मनुष्य अपनी समस्त व्यक्तिगत विशेषताओं को समाज में भी प्रसारित करे, उनका उपयोग समाज के हित में करे। 
  • (v) उस समय उसके सारे गुण एवं शक्तियाँ समाज को अधिक अच्छा और सुदृढ़ बनाने में सहायक सिद्ध होगी।
  • (vi) इससे उस दीप की भी महत्ता और सार्थकता बढ़ जाएगी। 

प्रश्न 3. ‘गीत’ और ‘मोती’ की सार्थकता किससे जुड़ी है ? 

  • उत्तर— (i) ‘गीत’ की सार्थकता जन अर्थात् मुनष्य से जुड़ी हैं।
  • (ii) कोई भी गीत तभी सार्थक है, जब उसे लोग गाएँ।
  • (iii) ‘मोती’ की सार्थकता पनडुब्बा अर्थात् गोताखोर के निकालने से जुड़ी है। 
  • (iv) मोती जब तक समुद्र के अंदर पड़ा हुआ है, तब तक उसकी कोई महत्ता नहीं है। 
  • (v) जब मोती को गोताखोर समुद्र से निकालकर बाहर ला देता है, तभी वह उपयोग में लाया जाता है। 
  • (vi) इस प्रकार मोती तभी सार्थक होता है, जब उसे गोताखोर समुद्र से निकाल लाता है।

प्रश्न 4. ‘यह अद्वितीय यह मेरा यह मैं स्वयं विसर्जित’-पंक्ति के आधार पर व्यष्टि के समष्टि में विसर्जन की उपयोगिता बताइए ।

  • उत्तर- (i) कवि दीप को प्रतीक के रूप में चित्रित करते हुए व्यक्ति के बारे में कहता है कि प्रत्येक व्यक्ति की सत्ता अद्वितीय है उसका अस्तित्व पृथक् रूप से अपनी पहचान रखता है।
  • (ii) परंतु जब वह अपने ‘स्व’ का त्याग कर समाज में उसका विलय कर देता है, तब उसकी सार्थकता और बढ़ जाती है। 
  • (iii) उसकी समस्त शक्तियों व गुणों का उपयोग कर संपूर्ण मानवता लाभान्वित होती है।
  • (iv) इस प्रकार व्यष्टि का समष्टि में विसर्जन अत्यंत उपयोगी होती है। 

प्रश्न 5. ‘यह मधु है” “तकता निर्भय’-पंक्तियों के आधर पर बताइए कि ‘मधु’, ‘गोरस’ और ‘अंकुर’ की क्या विशेषता है ?

उत्तर— मधु की विशेषता – स्वयं काल (समय) द्वारा अपने टोकरे में युगों तक एकत्रित करने के पश्चात् प्राप्त हुआ द्रव्य ही ‘मधु’ है। गोरस की विशेषता—’गोरस’ जीवन रूपी कामधेनु से निकला हुआ देव पुत्रों द्वारा पा

जाने वाला अमृत है। अंकुर की विशेषता ‘अंकुर पृथ्वी को फोड़कर निकला हुआ और सूर्य को नहर होकर देखने वाला है।

प्रश्न 6. भाव- सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए-

(क) यह प्रकृत, स्वयंभू “शक्ति दे दो।’ 

(ख) ‘यह सदा द्रवित, चिर-जागरूक” “चिर- अखंड अपनापा ।’

(ग) जिज्ञासु, प्रबुद्ध, सदा श्रद्धामय, इसको भक्ति को दे दो।’

उत्तर- (क) भाव-सौन्दर्य 

  • (i) इस पंक्ति में यह भाव प्रकट किया गया है कि यह दीपक प्रकृति के अनुरूप है। यह स्वयं पैदा हुआ है। यह ब्रह्म अर्थात् सच्चिादांनद स्वरूप जगत का मूल है। यह अयुतः अर्थात् सबसे पृथक् अलग अस्तित्व वाला है।
  • (i) यहाँ दीपक के प्रतीक का प्रयोग करते हुए व्यक्ति को अपने आप में परिपूर्ण एक सर्वशक्तिमान बताया गया है।
  • (iii) इस पंक्ति में मनुष्य की व्यक्तिगत सत्ता की महिमा को स्थापित किया गया है। 

(ख) भाव-सौन्दर्य 

  • (i) इन पक्तियों में दीप के प्रतीक के माध्यम से व्यक्ति को निश अपमान और उपेक्षा भरी परिस्थितियों में भी सदैव द्रवित, दीर्घकाल से जागरूक, आँखों में प्रेम की भावना रखने वाला, प्रेम में उठी हुई भुजाओं वाला तथा चिर काल तक संपूर्ण आत्मीये से भरा हुआ बताया गया है। 
  • (ii) व्यक्ति की संवेदनशीलता, चेतना एवं स्नेहभाव का अत्यंत प्रभावशाली चित्रण किया गया है। 

(ग) भाव-सौन्दर्य 

  • (i) इस पंक्ति में दीप को प्रतीक रूप में चित्रित करते हुए मानवीय गुणों की महिमा का वर्णन किया गया है। 
  • (ii) यहाँ यह भाव प्रकट किया गया है कि दीपक यदि मंदिर में प्रज्वलित किया जाता है, तो वह भक्ति भावना का द्योतक बन जाता है। 
  • (iii) उसी प्रकार मनुष्य की ज्ञान-प्राप्ति की लालसा, जागृति और श्रद्धा की भावना उसे आध्यात्मिक चेतना से परिपूर्ण कर देती है।
  • (iv) व्यक्ति इन सभी विशेषताओं से पूर्ण होता है। उसका भक्ति में विलय उसे सार्थक बना देता है। 

प्रश्न 7. ‘यह दीप अकेला’ एक प्रयोगवादी कविता है। इस कविता के आधार पर ‘लघु ‘मानव’ के अस्तित्व और महत्त्व पर प्रकाश डालिए। 

उत्तर— ‘लघु मानव’ का अस्तित्व और उसका महत्त्व 

  • (i) मनुष्य परम सत्ता अर्थात् ब्रह्म का ही लघु रूप है।
  • (ii) इसी प्रकार वह वृहत् समाज की भी एक इकाई है। (iii) यद्यपि यह परब्रह्म का अंश है, परंतु वह स्वयं में भी परिपूर्ण है। 
  • (iv) उसका रूप ‘लघु मानव’ का है, फिर भी उसकी एक वृहत् सत्ता है।
  • (v) उसमें ‘स्व’ का भाव है। इस कारण उसका स्वतंत्र अस्तित्व है।
  • (vi) उसमें समस्त गुण व सारी शक्तियाँ अन्तनिर्हित हैं।
  • (vii) उसकी कुछ अपनी विशिष्टताएँ हैं, जो उसे दूसरों से अलग एकदम अद्वितीय बना देती हैं। 
  • (viii) इस प्रकार लघु मानव का एक स्वतंत्र अस्तित्व है, जो उसके महत्त्व को प्रतिपादित 

प्रश्न 8. कविता के लाक्षणिक प्रयोगों का चयन कीजिए और उसमें निहित सौन्दर्य करता है।

स्पष्ट कीजिए। 

  • उत्तर- (i) ‘यह दीप अकेला’ कविता में दीप को अकेला, स्नेह भरा और गर्व भरा मदमाता दिखाकर कवि ने लाक्षणिक प्रयोग किया है। इसके माध्यम से कवि ने एक अकेले व्यक्ति को स्नेह, गर्व और अहं भाव से पूर्ण होने पर भी समाज में उसके विलय की ओर संकेत किया है। 
  • (ii) व्यक्ति को मोती खोजने वाला गोताखोर बताकर उसे तथ्यान्वेषी के रूप में चित्रित किया गया है। 
  • (iii) कवि ने उसे काल के टोकरे का युगों से संचित मधु, जीवन रूपी कामधेनु से निकला अमृत और धरती को फोड़कर निकला हुआ अंकुर बताया है। यहाँ कवि ने व्यक्ति की अन्तर्निहित शक्तियों को संकेतित किया है। 
  • (iv) कवि ने दीप को प्रकृत, स्वयंभू, ब्रह्म और अयुतः बताते हुए इसके माध्यम से व्यक्ति की रक्ता के सर्वव्यापीकरण की ओर संकेत किया है। 
  • (v) दीप को पीड़ा की गहराई नापने वाला बताकर कवि ने व्यक्ति की सहनशीलता का भावपूर्ण चित्रण किया है। 
  • (vi) व्यक्ति को जिज्ञासा, चेतना, श्रद्धा आदि गुणों से युक्त बताया गया है। 
  • (vii) इस प्रकार कविता में लाक्षणिक अर्थ को प्रकट किया गया है।

मैंने देखा एक बूँद के प्रश्न उत्तर | NCERT Solutions Class 12 Hindi Elective Chapter 3 Question Answer

प्रश्न 1. ‘सागर’ और ‘बूंद’ से कवि का क्या आशय है ?

उत्तर-

  • (1) सागर से कवि का आशय है, विराट्।
  • (ii) ‘बूंद’ से कवि का आशय है, मनुष्य ।
  • (iii) इसमें कवि ने समुद्र से अलग प्रतीत होती बूँद के वर्णन के माध्यम से विराद के सम्मुख मानव-जीवन के महत्त्व को स्थापित किया है। 

प्रश्न 2. रंग गई क्षणभर ढलते सूरज की आग से ‘पंक्ति के आधार पर बूँद से क्षण घर रंगने की सार्थकता बताइए।

उत्तर- बूँद के क्षण भर रंगने की सार्थकता –

  • (i) ‘मैंने देखा, एक बूंद’ कविता में कवि ने यह दर्शाया है कि समुद्र के झाग से बाहर निकली एक बूंद क्षण भर के लिए दलते सूर्य की जैसे दहकते रंग से रंग गई।
  • (i) इसके द्वारा कवि यह बोध कराता है कि विराट् के सम्मुख बूंद का क्षण भर के लिए, जाना, उसमें एक विशिष्टता उत्पन्न कर देता है। 
  • (iii) यह विशिष्टता बूँद को नष्ट होने के बोय से मुक्ति का अहसास दिलाती है।
  • (iv) इस प्रकार विराट् से अलग मनुष्य के जीवन का एक क्षण भी उसकी सार्थकता को कर देता है। उसे नश्वरता के भाव से मुक्त कर देता है।

प्रश्न 3. ‘सूने विराट् के सम्मुख” दाग से !’-पंक्तियों का भावार्थ स्पष्ट कीजिए।

  • उत्तर- भावार्थ- (i) सागर के झाग से निकली बूँद को क्षण भर सूर्य की लालिमा में रंग जाने को देखकर कवि यह अनुभव करता है कि सूने विराट् के सामने हर प्रकाश से पूर्ण अपनापन शीलता के दाग से मुक्ति देता है।
  • (ii) इस प्रकार मनुष्य के जीवन में प्रत्येक क्षण महत्त्वपूर्ण है। 
  • (iii) क्षण का महत्त्व ही मानव को नष्ट होने के बोय से मुक्ति का अहसास दिलाता है।
  • (iv) उसका अस्तित्व दोष उसकी क्षणभंगुरता को प्रतिष्ठापित कर देता है। 

प्रश्न 4. ‘क्षण के महत्त्व’ को उजागर करते हुए कविता का मूल भाव लिखिए।

उत्तर- ‘मैंने देखा, एक बूँद’ कविता का मूल भाव — 

  • (i) ‘मैंने देखा, एक बूंदा कविता ने कवि ने जीवन में क्षण के महत्त्व को स्थापित किया है। 
  • (ii) कवि देखता है कि समुद्र के झाग से निकलकर एक बूंद क्षण भर सूर्य की लालिमा से रंगकर अद्भुत सौन्दर्य से परिपूर्ण हो गई।
  • (ii) उस दृश्य को देखकर कवि को यह अनुभूति हुई कि समुद्र से अलग होकर बूँद वनमंगुर अवश्य हो गया, परंतु इस क्षणभंगुरता ने उसमें विशिष्टता भी भर दी। 
  • (iv) इस विशिष्टता के आ आने से उसके जीवन में आया वह क्षण सार्थक हो गया।
  • (v) उसने उसे अस्तित्ववान होने का बोध करा दिया। (vi) बूँद के प्रतीक के माध्यम से यहाँ कवि यह भाव प्रकट कर रहा है कि जिस प्रकार हिन्दू के सम्मुख बूँद का समुद्र से अलग दिखना उसे नश्वरता के दाग से मुक्ति दिला देता है, के प्रकार मनुष्य के जीवन का एक विशेष क्षण भी उसके जीवन को सार्थक बना देता है। 
  • (vii) उसे नष्ट होने के बोष से मुक्ति का अहसास दिला देता है। 
  • (vii) इस प्रकार कविता का मूल भाव है-मानव-जीवन में क्षण के महत्त्व को प्रतिष्ठापित करना।

प्रश्न 1. भारतीय दर्शन में ‘सागर’ और ‘बूंद’ का संदर्भ जानिए। 

  • उत्तर— (i) भारतीय दर्शन में ‘सागर’ को परमात्मा और ‘बूँद’ को आत्मा के प्रतीक के में वर्णित किया गया है। (ii) जिस प्रकार बूंद सागर से उत्पन्न होकर अस्तित्ववान होती है, उसी प्रकार आत्मा को भी परमात्मा का अंश माना गया है।
  • (ii) भारतीय दर्शन में यह माना गया है कि आत्मा परमात्मा से बिछड़कर उसमें पुनः मि जाने के लिए छटपटाती रहती है, उसी प्रकार बूंद भी सदैव इस बात के लिए प्रयासरत रहते है कि वह पुनः सागर में समा जाए।
  • (iv) भारतीय दर्शन में ‘परमात्मा’ को प्रेम से परिपूर्ण बताया गया है, इस कारण ‘आस्था’ को भी प्रेम का स्वरूप कहा गया है। 
  • (v) उसकी तुलना में समुद्र को जल रूपी रस से भरा हुआ और बूँद को भी उसी रस में पूर्ण बताया गया है। 


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FAQs

प्रश्न 1. एक अकेला दीप को उदाहरण बनाकर कवि क्या कहना चाहता है ? 

उत्तर—एक अकेला दीप जबतक जलता है अंधकार को कम किये रहता है। वह राह बताने में समर्थ होता है। यदि उसे पंक्तियों में समूहित करके सजाया जाए तो दिवाली की शोभा बन जाती है। अकेले व्यक्ति में भी अपार क्षमता छिपी रहती है। समूह बन जाने पर अंगुलियों से बनी मुट्ठी की तरह ताकतवर बन जाती है। 

प्रश्न 2. दीप को किस तरह की समिधा बताया गया है ? इसका प्रतीकार्थ स्पष्ट कीजिए । 

उत्तर— (i) दीप को ऐसी समिधा बताया गया है, जिसके द्वारा प्रज्वलित अग्नि कोई बिरला व्यक्ति ही सुलगा पाएगा।
(ii) यहाँ समिधा के प्रतीक के माध्यम से कवि ने यह स्पष्ट किया है कि जिस प्रकार हवन सामग्री प्रज्वलित होकर यज्ञ की शक्ति का साधन बन जाती है, उसी प्रकार एक मनुष्य भी अपनी अन्तर्निहित शक्तियों का उपयोग कर दुष्कर कार्य भी कर डालता है।
(iii) यहाँ व्यक्ति को शक्तिसंपन्न बताया गया है और यह स्पष्ट किया गया है कि इस शक्ति का समाज में विलय करने से ही वह यज्ञ के समान कल्याणकारी सिद्ध होगी। 

प्रश्न 3. दीप के लघुता में भी नहीं काँपने को किस रूप में चित्रित किया गया है? ‘यह दीप अकेला’ पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए। 

उत्तर—(i) ‘यह दीप अकेला’ पाठ में यह दिखाया गया है कि यह दीप वह विश्वास है, जो अपनी लघुता में भी नहीं काँपता है। 
(ii) इस कथन के द्वारा कवि यह प्रकट करना चाहता है कि छोटा होने के बिना कंपन किए जैसे अबाध रूप से जलता रहता है, वह उसके विश्वास के कारण ही संभव हो पाता है।
(ii) उसी प्रकार व्यक्ति भी आत्मविश्वास से परिपूर्ण रहे, तो वह बिना विचलित हुए. अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता रहेगा। 
(iv) विश्वास से भरा हुआ यह दीप पंक्ति में सम्मिलित होकर अंधकार दूर करने के अपने लक्ष्य की ओर और भी अधिक शक्ति से अग्रसर हो जाएगा। 
(v) इसी प्रकार विश्वास से परिपूर्ण व्यक्ति समाज को और भी अधिक श्रेष्ठ बनाने में अपने महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकता है।

प्रश्न 4. क्या कवि यह मानने को तैयार है कि बूँद-बूँद से घड़ा भरता है ? 

उत्तर- कवि का सकारात्मक भाव व्यक्तियों से बने समाज की सार्थकता को स्वीकार करता हैं। कवि बूँदों के समूह से घड़ा अर्थात् विराट सागर के बनने का विश्वास दिलाता है। छोटा रूप, क्षणभंगुर स्थिति, क्षमता में कमी आदि मनुष्य के नकारात्मक भाव है। यदि व्यक्ति कुछ करना चाहे तो बूँद की तरह सूर्य के प्रकाश से चमक सकता है।

प्रश्न 5. क्या अकेले बूँद में कोई क्षमता नहीं होती है ? 

उत्तर—अकेले बूँद असहाय और कमजोर तो अवश्य माना जाता है लेकिन स्वाद की परख अकेले बूँद से ही होती है। सूरज की रोशनी पाकर जिस प्रकार कोई भी बूँद चमक उठता है उसी प्रकार अकेले व्यक्ति भी समाज को सहारा बनाकर चाँद पर टहलकर आ सकता है।

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