NCERT Solutions Class 12 Hindi Elective Chapter 4 Question Answer | अध्याय 4 केदारनाथ सिंह

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मैं खुद 12वीं का टॉपर रहा हूं और मुझे पता है कि 12वीं की परीक्षा में किस तरह के प्रश्न पूछे जाते हैं। वर्तमान में, मैं एक शिक्षक की भूमिका भी निभा रहा हूँ, और अपने छात्रों को कक्षा 12वीं की महत्वपूर्ण जानकारी और विषयों का अभ्यास भी कराता हूँ। मैंने यह लेख 5 वर्षों से अधिक के अपने अनुभव के साथ लिखा है। इस पोस्ट की मदद से आप परीक्षा में इस अध्याय से भूगोल में बहुत अच्छे अंक प्राप्त कर सकेंगे।

NCERT Solutions Class 12 Hindi Elective Chapter 4 Question Answer | अध्याय 4 केदारनाथ सिंह

कक्षा | Class12th 
अध्याय | Chapter04
अध्याय का नाम | Chapter Name(क) बनारस
(ख) दिशा
कवि का नाम | Poet Nameकेदारनाथ सिंह
किताब | Bookअंतरा ऐच्छिक | Hindi Elective
खंड | Sectionकाव्य खंड | Poetry Section
बोर्ड | Boardसभी हिंदी बोर्ड
किताब | Book एनसीईआरटी | NCERT
विषय | Subjectहिंदी | HINDI
अध्ययन सामग्री | Study Materialsप्रश्न उत्तर | Question answer

केदारनाथ सिंह का जीवन परिचय | Biography of Kedarnath Singh

उत्तर-जीवन-परिचय- ‘तीसरा सप्तक’ के अग्रणी कवि केदारनाथ सिंह का जन्म 7 जुलाई, 1934 ई. को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में ‘चकिया’ नामक गाँव में हुआ। उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी में स्नातकोत्तर उपाधि ग्रहण की। वहीं से इन्होंने ‘आधुनिक हिन्दी कविता में विंव विधान’ विषय पर पी-एच. डी. की उपाधि भी प्राप्त की। 

आप जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्रोफेसर रहे हैं और भारतीय भाषा केंद्र के अध्यक्ष हैं। साहित्यिक अभिरुचि प्रारम्भ से ही थी। साम्यवादी विचारधारा ने उनके लेखन पर गहरा प्रभाव डाला। आजकल आप जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा केंद्र से प्रोफेसर पद से अवकाश ग्रहण कर चुके हैं।

रचनाएँ—अब तक केदारनाथ सिंह के छह काव्य-संग्रह प्रकाशित हुए हैं अभी बिल्कुल अभी, जमीन पक रही है, यहाँ से देखो, अकाल में सारस, उत्तर कवीर तथा अन्य कविताएँ, और ‘वाघ’। कल्पना और छायावाद उनकी आलोचनात्मक पुस्तक है और ‘मेरे समय के शब्द ‘ निबंध संग्रह है। हाल ही में उनकी चुनी हुई कविताओं का संग्रह ‘प्रतिनिधि कविताएँ’ नाम से प्रकाशित हुआ है। उनके काव्य-संग्रह ‘अकाल में सारस’ पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया तथा सन् 1994 ई. में ‘मैथिलीशरण गुप्त’ राष्ट्रीय सम्मान दिया गया।

साहित्यिक विशेषताएँ– केदारनाथ सिंह मूलतः मानवीय संवेदनाओं के कवि है। उन साम्यवाद का गहरा रंग है, किंतु उनकी वाणी में देसी उथल-पुथल और मिशनरी उबाल है, जो कि प्रायः नौसिखए प्रगतिवादियों में पाया जाता है। प्रगतिशील तत्त्व उनकी जुबान और संपत स्वर में मुखरित हुए हैं। वे प्रकृति के प्रेमी रहे हैं। तीसरा सप्तक’ में उन्होंने भी है प्रकृति बहुत शुरू से मेरे भावों का आलंबन रही है। कछार, मक्का के खेत और दूर-द तक फैली पगडंडियों की छाप आज भी मेरे मन पर उतनी ही स्पष्ट है। 

भाषा-शैली केदारनाथ सिंह की भाषा में बिंबमयता, वैचारिकता और सहजता तीन गुण विशेष रूप से उद्घाटित हुए हैं। विव-विधान पर उन्होंने अधिक बल दिया है। उन कविताओं की सुंदर चित्रमाला तैयार की जा सकती है। उनकी भाषा में प्रत्येक शब्द नपा है, विचार से परिपूर्ण है। लक्ष्यप्रेरित बाण की तरह कोई शब्द व्यर्थ नहीं है। सभी का अपना संयाम है, अपना व्यंग्य है, अपना अर्थ है। चिंतन-प्रधान होता हुए भी कवि का शब्द प्रयोग अत्यंत सह एवं सरल है। यह कवि की विशिष्ट उपलब्धि है।

अलंकार—केदारनाथ सिंह की कविताओं में अलकारों का सहज प्रयोग हुआ है। जैसे- 

अनुप्रास– ‘अचानक आता’, ‘बैठे बंदरों’ ‘बिलकुल बेखबर’ आदि। 

प्रतीक एवं बिम्ब–इनकी कविताओं में प्रतीकों व विम्बों का अत्यंत आकर्षक सृजन हु है। इनकी रचनाओं में संपूर्ण दृश्य साकार हुआ मिलता है। 

छंद-योजना— केदारनाथ सिंह की कविताएं छंद मुक्त हैं। परंतु उनमें काव्यात्मक मधुख सर्वत्र विद्यमान है।

बनारस कविता का सारांश | Summary Of The Poem banaaras

NCERT Solutions Class 12 Hindi Elective

भारत का गौरव बनारस, मन्दिरों का शहर बनारस, प्रकृति से सजा बनारस, मोक्षदायिनी बनारस आज अपनी शोभा पर प्रहार करने वाले से चिंतित है। पाखंड, प्रपंच, पर्यावरण, प्रदूष जादि के मार से पवित्रता को ठेस लग रही है।

‘बनारस’ कविता में काशी की प्राचीन आध्यात्मिक गरिमा के साथ ही आधुनिकता का भी समावेश किया गया है। इसमें वाराणसी का भव्य रूप साकार हो उठा है। ‘बनारस’ कविता में प्राचीनतम शहर बनारस के सांस्कृतिक वैभव के साथ ठेठ बनारसीपन पर भी प्रकाश डाला गय है। बनारस विश्व की नगरी और गंगा नदी के साथ विशिष्ट आस्था का केंद्र है। बनारस में गंग, ‘गंगा के घट, मंदिर तथा मंदिरों और घाटों के किनारे बैठे भिखारियों के कटोरे जिनमें वसंत ‘उतरता है यह चित्र ‘बनारस’ कविता में अंकित हुआ है।

इस शहर के साथ मिथकीय आस्था- काशी और गंगा के सान्निध्य से मोक्ष की आवधारण जुड़ी है। गंगा में बँधी नाव, एक और मंदिरों-घाटों पर जलने वाले दीप तो दूसरी तरफ कर्मी न बूझने वाली चिताग्नि, उनसे तथा हवन इत्यादि से उठने वाला धुआँ यही तो है बनारस। यह हर कार्य अपनी ‘री’ में होता है। यह बनारस का चरित्र है। आस्था, श्रद्धा, विरक्ति, विश्वास, आश्चर्य और भक्ति का मिला-जुला रूप बनारस है। 

काशी की अति प्राचीनता, आध्यात्मिकता एवं भव्यता के साथ आधुनिकता का समाहार ‘बनारस’ कविता में मौजूद है। यह कविता एक पुरातन शहर के रहस्यों को खोलती है। बनारस एक मिथक बन चुका शहर है, इस शहर की दार्शनिक व्याख्या यह कविता करती है। कविता भाषा संरचना के स्तर पर सरल है और अर्थ के स्तर पर गहरी । कविता का शिल्प विवरणात्मक होने के साथ ही कवि की सूक्ष्म दृष्टि का परिचायक है। शब्दों की सरलता के साथ ही भाव की गहराई इस कविता की खास विशेषता है।

दिशा कविता का सारांश | Summary Of The Poem disha

”दिशा’ कविता में बच्चों की निश्छलता और स्वाभाविक सरलता का अत्यंत भावपूर्ण चित्रण है। साथ ही कवि ने यथार्थ को भी परिभाषित किया है। यह कविता बाल मनोविज्ञान से संबंधित है, जिसमें पतंग उड़ाते बच्चे से कवि पूछता है कि हिमालय किधर है ? बालक का उत्तर हुआ बाल-सुलभ है कि हिमालय उधर है, जिधर उसकी पतंग भागी जा रही है।

हर व्यक्ति का अपना यथार्थ होता है। बच्चे यथार्थ को अपने ढंग से देखते हैं। कवि को यह बाल-सुलभ संज्ञान लेता है। कविता लघु आकार की है और वह कहती है कि हम बच्चों से कुछ-न-कुछ सी सकते हैं। कविता की भाषा सहज और सपाट है। परंतु इसमें विचारों की गहराई स्पष्ट रूप से होती है।

class 12th NotesMCQ
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EnglishHindi

बनारस सप्रसंग व्याख्या एवं शब्दार्थ | बनारस सप्रसंग व्याख्या NCERT

1. इस शहर में वसंत

अचानक आता है

और जब आता है तो मैंने देखा है। 

लहरतारा या मडुवाडीह की तरफ से

उठता है घुल का एक बवंडर 

और इस महान पुराने शहर की जीभ

किरकिराने लगती है।

शब्दार्थ : लहरतारा या मडुवाडीह — बनारस के मोहल्लों के नाम । बवंडर — अंधड़, आँधी । किरकिराना— कंकड़ के कारण किरकिर शब्द करना, किरकिरी की तरह होने वाली पीड़ा। 

प्रसंग – प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘अंतरा’ (भाग-2) में संकलित, ‘बनारस’ नामक कविता से उद्धृत है। इसके रचयिता सुप्रसिद्ध कवि केदारनाथ सिंह हैं।

इन पंक्तियों में कवि ने प्राचीनतम शहर बनारस के सांस्कृतिक वैभव के वर्णन के परिप्रेक्ष्य में वहाँ वसंत ऋतु के आगमन का चित्रण किया है। यहाँ वसंत के मौसम में उठ रही आँधी का – बिंबात्मक वर्णन किया गया है।

व्याख्या— कवि कहता है कि बनारस शहर में वसंत का आगमन अचानक ही हो जाता है। मैंने देखा है कि यहाँ जब वसंत आता है, तो बनारस के लहरतारा या मडुवाडीह मोहल्ले की ओर से एक धूल भरी आँधी उठती है। उस समय इस महान पुराने शहर के प्रत्येक भाग में धूल ही पूल भर जाती है।

जिस प्रकार अंधड़ उठने पर व्यक्ति के मुँह में भी धूल चले जाने से जीभ में किरकिरी होने लगती है, उसी प्रकार मानो इस महान पुराने शहर की जीभ भी धूल से भरकर किरकिर करने लगती है। कवि के कहने का तात्पर्य यह है कि बनारस में वसंत के मौसम में आँयी के कारण संपूर्ण वातावरण धूल से भर जाता है। इस प्रकार धूल का बवंडर उठने के साथ ही यहाँ वसंत का प्रारंभ हो जाता है।

सौन्दर्य-बोध—यहाँ कवि ने बनारस में वसंत के प्रारंभ के समय वातावरण में धूल भर जाने का आकर्षक वर्णन किया है। कवि ने वसंत के आगमन पर बहने वाली फागुनी हवा का चित्रात्मक वर्णन किया है। ‘अचानक आता’ में अनुप्रास अलंकार है। शब्दों का चयन अत्यंत एवं प्रभावपूर्ण है। काव्यांश में मानवीकरण अलंकार है।

2.जो है वह सुगबुगाता है।

जो नहीं है वह फेंकने लगता है पचखियों

आदमी दशाश्वमेघ पर जाता है।

और पाता है घाट का आखिरी पत्थर

कुछ और मुलायम हो गया है 

सीढ़ियों पर बैठे बंदरों की आँखों में

एक अजीब सी नमी है। 

और एक अजीब सी चमक से भर उठा है। 

भिखारियों के कटोरों का निचाट खालीपन 

शब्दार्थ : सुगबुगाना- जागरण, जागने की क्रिया। पचखियाँ अंकुर । निचाट – बिलकुल एकदम 

प्रसंग—प्रस्तुत पंक्तियों हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘अंतरा’ (भाग-2) में संकलित कविता ‘बनारस’ से ली गई हैं। इसके रचयिता प्रख्यात कवि केदारनाथ सिंह हैं। इन पंक्तियों में कवि ने बनारस में वसंत के समय जागृति, उल्लास और नवीन चेतना जाने का वर्णन किया है। कवि को ऐसे समय में पत्थरों तक में नरमी का अहसास होने लगता है। 

व्याख्या— कवि कहता है कि जब बनारस के वातावरण में वासंती हवा चलती है तो ज है, अर्थात् जो अस्तित्वमान है, उसमें सुगबुगाहट होने लगती है, यानि उसमें जागृति आने लगती है। जो अस्तित्वमान नहीं होता, अर्थात् जिसमें चेतना का रूप दिखाई नहीं देता, उसमें भी नया अंकुरण होने लगता है। 

इस प्रकार विगत की नष्ट हो गई चीजों या असफलताओं के बीच भी लोग नई उमंग और नए संकल्प से भर उठते हैं। कवि का तात्पर्य यह है कि वासंती हवा के स्पर्श से पूरे वातावरण में नया उल्लास आ जाता है, उसमें नए जीवन का संचार होने लगता है।

आदमी जब दशाश्यमेय घाट पर जाता है, तो वहाँ उसे गंगा नदी का स्पर्श करता हुआ घाट का अंतिम पत्थर कुछ और नरम हो गया मिलता है अर्थात् पापाण- हृदय व्यक्ति के व्यवहार में भी सहृदयता आ जाती है। वहाँ घाट की सीढ़ियों पर बैठे बंदरों की आँखों में विचित्र सी नमी दिखाई देती है।

भिखारियों के कटोरों का एकदम खालीपन भी एक विचित्र सी चमक से भर हुआ दिखाई देता है। इस प्रकार जीवन संघर्ष में लगे हुए दीन-हीन व्यक्ति भी एक विचित्र-सी उमंग से भरे हुए दिखाई देते हैं। बनारस में वसंत का आगमन सांसारिक दुखों को विस्मृत कर नवजीवन का संचार कर देता है।

सौन्दर्य-बोध- यहाँ कवि ने बनारस की हवा में उस उमंग के भरे होने का चित्रण किया है, जो वहाँ के लोगों को कठिनाइयों में भी उल्लसित रहने की प्रेरणा देती है। काव्यांश में सरल, सरस एवं प्रवाहमयी भाषा का प्रयोग किया गया है। इन पंक्तियों में चित्रात्मकता का गुण दर्शनीय है । लवणा शब्द-शक्ति का प्रयोग हुआ है। ‘बैठे बंदरों’ और ‘एक अजीब’ में हैं और पाता…..हो गया हैं’ में विरोधाभास अलंकार है। 

3. अनुप्रास अलंकार

तुमने कभी देखा है।

खाली कटोरों में वसंत का उतरना !

यह शहर इसी तरहं खुलता है

इसी तरह भरता और खाली होता है 

यह शहर इसी तरह रोज-रोज 

एक अनंत शव ले जाते हैं कंधे

अँधेरी गली से

चमकती हुई गंगा की तरफ 

शब्दार्थ : अनंत जिसका अंत न हो।

प्रसंग– प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘अंतरा’ (भाग-2) में संकलित कविता ‘बनारस’ से उद्धृत है। इसके सुप्रसिद्ध कवि केदारनाथ सिंह है।

व्याख्या कवि पूछता है कि क्या तुमने कभी खाली कटोरों में वसंत का उतरना देखा है। इन पंक्तियों में कवि ने बनारस में वसंत के आगमन पर भिखारियों के कटोरों में भी विशेष के आ जाने का बिंबात्मक चित्रण किया है। यहाँ कवि ने शहर के भरने और खाली होने बात कहकर यहाँ की स्वाभाविक जीवन शैली से परिचित कराया है।

प्रायः अभावग्रस्त लोगों को उल्लासपूर्वक खुशियाँ मनाते कहीं नहीं देखा जाता। परंतु इस में वसंत के समय भिखारियों तक के चेहरों पर उमंग भरी चमक छा जाती हैं। कवि कहता है कि यह शहर इसी तरह खुलता है, अर्थात् यहाँ हर दिन का प्रारंभ ऐसे ही स और प्रसन्नता के साथ होता है। हर दशा में प्रसन्न रहना बनारस का चरित्र है। 

लोगों स्वाभाविक उमंग, आशा और जीजिविषा से यह शहर इसी तरह भरता रहता है। परंतु यह इसी तरह खाली भी होता है। इसी तरह प्रतिदन एक अंतहीन शव को उठाए हुए कंधे कार से मोक्षदायिनी गंगा के पास ले जाकर शव का दाह संस्कार करते हैं। कहीं अँधेरी गली निकलकर चमकती हुई गंगा की ओर ले जाते हैं,

अर्थात् वे मृत्यु रूपी चेहरे पर खुशी की क, तो कहीं दुख का मातम, कहीं सुख की अनुभूति तो कहीं दुख का अहसास, दोनों का -जुला रूप है-बनारस प्राचीन काल से ही यह अंतहीन सिलसिला इस शहर में चला आ है। यही यहाँ की स्वाभाविक दिनचर्या है।

सौन्दर्य-बोध– इन पंक्तियों में कवि ने बनारस के हर्ष-विषाद युक्त मिले-जुले चरित्र का संत भावूर्ण चित्रण किया है। शब्दों का चयन अत्यंत सटीक व सराहनीय है। काव्यांश में शहर खुलते, भरते और खाली होते हुए बताकर आकर्षक बिंबों का प्रयोग किया गया है। ‘इसी रोज रोज….. चमकती हुई गंगा की तरफ -इन कथन के द्वारा कवि ने काशी और गंगा सान्निध्य से मोक्ष प्राप्त होने की आस्था का चित्रण किया है। ‘रोज-रोज’ में पुनरुक्ति प्रकाश कार है। काव्यांश में चित्रात्मकता का गुण दर्शनीय है। पंक्तियों में मानवीकरण अलंकार है।

4. इस शहर में धूल धीरे-धीरे उड़ती है

धीरे-धीरे चलते हैं लोग धीरे-धीरे बजते हैं घंटे

शाम धीरे-धीरे होती है

यह धीरे-धीरे होना

धीरे-धीरे होने की सामूहिक लय

दृढ़ता से बाँधे है समूचे शहर को 

इस तरह कि कुछ भी गिरता नहीं है

कि हिलता नहीं है कुछ भी कि जो चीज यहाँ थी

वहीं पर रखी है। कि गंगा वहीं है

कि वहीं पर बँधी है नाव

कि वहीं पर रखी है तुलसीदास की खड़ाऊँ 

सैंकड़ों बरस से

शब्दार्थ : लय—गति, सामंजस्य। दृढ़ता- मजबूती। समूचा संपूर्ण । 

प्रसंग– ग-प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘अंतरा’ (भाग-2) में संकलित कविता- ‘बनारस’ से अवतरित की गई हैं। इसके रचयिता सुप्रसिद्ध कवि केदारनाथ सिंह हैं। इन पंक्तियों में हर काम को धीरे-धीरे करने की बनारसी शैली का वर्णन किया गया है। कार्य करने की यह सामूहिक गत इस शहर के चरित्र को सैकड़ों वर्षों से आध्यात्मिक व सांस्कृतिक स्थायित्व भी प्रदान करती आ रही है।

व्याख्या-कवि कहता है कि बनारस शहर में धूल धीरे-धीरे उड़ती है। लोग धीरे-धीरे चलते है। मंदिरों-घाटों पर घंटे धीरे-धीरे बजते हैं। यहाँ शाम भी धीरे-धीरे होती है। अर्थात् हर कार्य को पीरे-धीरे करना बनारस की जीवन-शैली है। यहाँ हर कार्य अपनी ‘री’ में होता है। सभी कार्यों का धीरे-धीरे होना यहाँ का स्वाभाविक चरित्र है।

यह धीरे-धीरे होने की सामूहिक जति पूरै शहर को मजबूती से बाँधे हुए है। इस मजबूत बंधन में बँधे होने से यहाँ का कुछ गिरता नहीं है, कुछ भी हिलता नहीं है। जो चीज जहाँ पर थी, अब भी वहीं पर रखी हुई है गंगा नदी वहीं पर है, अर्थात् गंगा के प्रति आस्था और श्रद्धा उसी प्रकार बनी हुई है। नाव भी वहीं पर बंधी हुई है। सैकड़ों वर्षों से तुलसीदास की खड़ाऊँ वहीं पर रखी हुई है।

भाव यह है कि सैकड़ों वर्षों से बनारस के चरित्र में कोई बदलाव नहीं आया है। पुराने मूल्य मान्यताएँ, आस्था, श्रद्धा, विश्वास सब कुछ अभी भी बनारस में उसी प्रकार सुरक्षित हैं, बहुमूल्य परोहर की तरह। काशी की प्राचीन आध्यात्मिकता, भव्यता अब भी उसी प्रकार बनी हुई है। 

सौन्दर्य-बोध—इन पंक्तियों में कवि ने काशी की अपरिवर्तित संस्कृति, आध्यात्मिक विश्वास व प्राचीन परंपराओं का अत्यंत भावपूर्ण चित्रण किया है। ध्वन्यात्मकता का गुण दर्शनीय है। ‘धीरे-धीरे’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है। ‘कि कुछ में अनुप्रास अलंकार है। ‘धीरे-धीरे’ की काव्यांश में बार-बार आवृत्ति से भाव में विशेष गहराई आने के साथ ही भाषा का स्वरूप भी निखर गया है। पूरे काव्यांश में बिंबों का आकर्षक प्रयोग हुआ है। प्रतीकात्मकता दर्शनीय है।

5.कभी सई साँझ

बिना किसी सूचना के

घुस जाओ इस शहर में कभी आरती के आलोक में

इसे अचानक देखो

अद्भुत है इसकी बनावट यह आधा जल में है

आघा मंत्र में आया फूल में है।

आधा शव में आधा नींद में है

आधा शंख में है

अगर ध्यान से देखो तो यह आधा है।

और आधा नहीं है।

शब्दार्थ : सई-साँझ–शाम की शुरुआत। आलोक – प्रकाश अद्भुत – विचित्र, आश्चर्यजनक ।

प्रसंग – प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘अंतरा’ (भाग-2) में संकलित कविता ‘बनारस’ से उद्धृत है। इसके रचयिता सुप्रसिद्ध कवि केदारनाथ सिंह हैं। इन पंक्तियों के कवि ने संध्या के समय फूल, जल और मंत्र से श्रद्धा और विश्वासपूर्वक की जाने वाली आरती के साथ ही शव, नींद आदि का वर्णन करते हुए बनारस के मिले-जुले रूप का चित्रण किया है।

व्याख्या—कवि कहता है कि कभी संध्या काल में बिना किसी सूचना के इस शहर में प्रवेश कर जाओ। कभी आरती के प्रकाश में इसे अचानक देखो! उस समय तुम्हें इसकी बनावट आश्चर्यजनक दिखाई पड़ेगी। तुम्हे दिखाई देगा कि यह शहर आधा जल में है, आघा मंत्र में है, आधा फूल में है अर्थात् संध्या के समय मंदिरों-घाटों पर आधा बनारस शहर जल, मंत्र और फूल से भगवान की आरती करते हुए श्रद्धा-भक्ति में सराबोर हुआ दिखता है। उसी समय घाट पर चिता की अग्नि में जलते हुए शव भी दिख जाते है। 

इस प्रकार बनारस शहर आया शव में नजर आता है। यह आधा नींद में डूबा हुआ दिखाई देता है, तो आया शंख नाद में जगा हुआ भी दिखता है अर्थात् शहर में कहीं नींद की बोझिलता रूपी अजागरूकता होती है, तो कहीं देर तक पूजा-पाठ का जागरण कवि कहता है कि अगर ध्यान से देखो, तो यह आपा है और आया नहीं है

अर्थात् आया बनारस प्राचीन संस्कृति के अनुरूप काशी का मिथकीय स्वरूप लिए है और आधा नहीं है। तात्पर्य यह है कि इस शहर में जहाँ एक ओर काशी की प्राचीनता, आध्यात्मिकता, आस्था, श्रद्धा और भक्ति है, वहीं दूसरी ओर आधुनिकता का समावेश भी है।

सौन्दर्य-बोध– इन पंक्तियों में काशी की अति प्राचीन आध्यात्मिक भव्यता के साथ ही उसमें हो रहे परिवर्तन को भी दर्शाया गया है। भाषा में सरलता, सजीवता एवं प्रवाहमयता है। ‘आरती के आलोक’, ‘और आधा’ में अनुप्रास अलंकार है। ‘आधा’ शब्द के बार-बार प्रयोग से भाव में विशेश गंभीरता आ गई है शब्दों का चयन अत्यंत सटीक है। लाक्षणिक प्रयोग दर्शनीय उत्कृणिक बिम्मों का सृजन हुआ है। जो है वह खड़ा है। बिना किसी स्तंभ के है। 

6. जो नहीं है उसे थामे है। 

राख और रोशनी के ऊँचे-ऊंचे स्तंभ 

और पानी के स्तंभ आदमी के उठे हुए हाथों के स्तंभ

आग के स्तंभ

धुएँ के खुशबू के

शब्दार्थ : स्तंभ- खंभा । 

प्रसंग — प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘अंतरा’ (भाग-2) में संकलित कविता ‘बनारस’ से उद्धृत है। इसके रचयिता प्रख्यात कवि केदारनाथ सिंह हैं। इन पंक्तियों में कवि ने बनारस के प्राचीन आध्यात्मिक एवं भव्य स्वरूप के साथ ही आधुनिकता के सम्मिश्रण को भी अभिव्यक्त किया है। यहाँ काशी की विरासत के रूप में आस्था, श्रद्धा, विश्वास आदि का सुदंर चित्रण हुआ है।

व्याख्या -कवि कहता है कि बनारस में जो कुछ विद्यमान है, वह बिना किसी खंभे के खड़ा अर्थात् यहाँ की प्राचीनता, आध्यात्मिक आस्था, श्रद्धा, विश्वास, भक्ति, सामूहिक गति आदि सब कुछ बिना किसी सहारे के अपने आप ही विरासत के रूप में जन-जीवन में समाया हुआ है।

इस प्रकार काशी का मिथकीय स्वरूप किसी सहारे के बिना ही उसी रूप में सुरक्षित है। जो मान नहीं है, उसे राय और रोशनी के ऊँचे-ऊंचे खंभे, आग के खंभे और पानी के घने पुरं के, सुगंध के और आदमी के उठे हुए हाथों के खंभे यार है। भाव यह है कि बनारस में एक ओर प्राचीन आध्यात्मिकता का दर्शन होता है, तो दूसरी और आधुनिक जीवन शैली का भी। 

सौन्दर्य-बोध इन पंक्तियों में कवि ने बनारस में आध्यात्मिकता और आधुनिकता की समन्वित जीवन-शैली का आकर्षक चित्रण किया है। भाषा में सरलता, सजीवता एवं प्रवाहमयता है। ऊँचे-ऊँथे’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है। ‘स्तंभ’ शब्द की बार-बार आवृत्ति ने कविता की भावात्मकता में वृद्धि के साथ ही इसके सौंदर्य को भी बढ़ा दिया है। इन पंक्तियों में कवि  आकर्षक बिंबों का सृजन किया है। 

7. किसी अलक्षित सूर्य को

देता हुआ अब

शताब्दियों से इसी तरह

गंगा के जल में अपनी एक टांग पर खड़ा है यह शहर बिलकुल बेखवर !

अपनी दूसरी टाँग से

शब्दार्थ: अर्ध्य-पूजा के 16 उपधारों में से एक (टूब, दूध, चावल आदि मिला हुआ जल, जो देवता के सामने श्रद्धापूर्वक गिराया जाए)। अलक्षितन देखा हुआ, अदृश्य, अज्ञात । 

प्रसंग प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘अंतरा’ (भाग-2) में संकलित कविता ‘बनारस’ से उद्धृत है। इसके रचयिता सुप्रसिद्ध कवि केदारनाथ सिंह हैं।

इन पंक्तियों में कवि ने बनारस में सदियों से चली आ रही प्राचीन आध्यात्मिक व सांस्कृतिक विरासत की अक्षुण्णता का वर्णन किया है। यहाँ काशी के मूल आध्यात्मिक स्वरूप के आधुनिकता से अप्रभावित रहने के कारण उस महान विरासत के अब तक सुरक्षित रहने का वर्णन भी कवि ने किया है। 

व्याख्या—कवि कहता है कि यह बनारस शहर शताब्दियों से किसी न देखे हुए सूर्य को अर्घ्य देता हुआ गंगा के जल में अपनी एक टॉग पर खड़ा है, उसनी दूसरी टाँग से बिलकुल अनजान बना हुआ। तात्पर्य यह है कि इस शहर में सदियों से सूर्य को एक अदृश्य शक्ति अर्थात् परब्रह्म का प्रतिरूप मानते हुए गंगा के जल में खड़े होकर उसके पवित्र जल को अर्घ्य के रूप में अर्पित करने की परंपरा चली आ रही है। लोग गंगा स्नान करते हैं, सूर्य को ईश्वर का रूप मानते हुए एक पैर पर खड़े होकर अर्घ्य देते हैं। 

उस समय उन्हें अपने दूसरे पैर का ध्यान नहीं होता। यहाँ कवि यह भाव प्रकट करता है कि बनारस का यह आध्यात्मिक स्वरूप सदियों से दृढ़तापूर्वक उसी तरह स्थिर है। शहर के जीवन में आई आधुनिकता का इस आस्था, श्रखा और भक्ति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इस प्रकार बनारस की प्राचीनता, आध्यात्मिकता और भव्यता चिरस्थायी बनी हुई है।

सौन्दर्य-बोध– इन पंक्तियों में कवि ने बनारस की आध्यात्मिक आस्था के चिरकाल से बने रहने की बात का भावपूर्ण चित्रण किया है। यहाँ सरल, सजीव एवं प्रवाहमयी भाषा का प्रयोग किया गया है। ‘बिलकुल बेखवर’ में अनुप्रास अलंकार है। ‘टॉग’ का प्रतीकात्मक प्रयोग दर्शनीय है। आकर्षक बिंव का सृजन किया गया है। सूर्य को अलक्षित बताकर उसे अदृश्य सत्ता के प्रतीक के रूप में चित्रित किया गया है।

दिशा सप्रसंग व्याख्या एवं शब्दार्थ | दिशा सप्रसंग व्याख्या NCERT

1.हिमालय किधर है ?

मैंने उस बच्चे से पूछा 

जो स्कूल के बाहर जिधर 

उसकी पतंग भागी जा रही थी

पतंग उड़ा रहा था। 

उधर-उधर उसने कहा

मैं स्वीकार करूँ मैंने पहली बार जाना

हिमालय किधर है !

शब्दार्थ : स्वीकार – सहमति, मंजूरी, मान लेना।

प्रसंग—–प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘अंतरा’ (भाग-2) में संकलित कविता ‘दिशा’ से ली गई हैं। इसके रचयिता सुप्रसिद्ध कवि केदारनाथ सिंह हैं।

इन पंक्तियों में कवि ने बाल मनोविज्ञान का भावपूर्ण चित्रण किया है। कवि ने पतंग उड़ाते बच्चे के माध्यम से स्पष्ट किया है कि बच्चे यथार्थ को अपने ढंग से देखते हैं। ‘व्याख्या कवि कहता है कि एक बच्चा स्कूल के बाहर पतंग उड़ा रहा था। उससे मैंने पूछा कि हिमालय किधर है ? जिधर उस बच्चे की पतंग भागी जा रही थी, उधर की ओर इशारा

करते हुए उसने कहा- ‘उधर उघर’ । ‘कवि कहता है कि मैं स्वीकार करता हूँ कि मैंने पहली बार जाना कि हिमालय किथर है। कवि के कहने का तात्पर्य यह है कि उस समय कवि ने पहली बार यह अनुभव किया कि प्रत्येक व्यक्ति का अपना-अपना यथार्थ होता है। बच्चे दुनिया की हर चीज को अपने ढंग से देखते हैं। उनका सरोकार सिर्फ अपनी छोटी-सी दुनिया से होता है।

सौन्दर्य-बोध– इन पंक्तियों में कवि ने यथार्थ के प्रति लोगों के भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण की भावात्मक अभिव्यक्ति की है। कविता की भाषा अत्यंत सरल, सरस और प्रवाहपूर्ण है। ‘उपर-उघर’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है। भाषा का चित्रात्मक रूप दर्शनीय है। ‘उपर-उधर उसने’ में अनुप्रास अलंकार है।

बनारस के प्रश्न उत्तर | NCERT Solutions Class 12 Hindi Elective Chapter 4 Question Answer

प्रश्न 1. बनारस में वसंत का आगमन कैसे होता है और उसका क्या प्रभाव इस शहर पर पड़ता है ? 

उत्तर-

  • (i) बनारस में वसंत का आगमन अचानक होता है।
  • (ii) उस समय लहरतारा या मडुवाडीह की ओर से धूल का एक बवंडर उठता है और पूरे शहर का वातावरण धूल की किरकिराहट से भर जाता है।
  • (iii) जन-जीवन में नया उल्लास छा जाता है। भावनाओं का अंकुरण होने लगता है। 
  • (iv) दशाश्वमेध घाट का आखिरी पत्थर कुछ और मुलायम हो जाता है।
  • (v) बंदरों की आँखों में एक अजीब सी नमी आ जाती है। 
  • (vi) भिखारियों के खाली कटोरों में भी आश्चर्यजनक चमक आ जाती है, अर्थात् दीन-हीन लोग भी उल्लसित हो उठते हैं।

प्रश्न 2. ‘खाली कटोरों में वसंत का उतरना’ से क्या आशय है ? 

उत्तर-

  • (i) कवि कहता है कि वसंत के आगमन पर भिखारियों के बिलकुल खाली कटोरे भी एक विचित्र सी चमक से भर उठते हैं।
  • (ii) इस प्रकार उनके खाली कटोरों में भी वसंत उतर आता है।
  • (iii) यहाँ ऐसा कहने से कवि का आशय यह है कि बनारस में वसंत के आने पर दीन-हीन निर्बल लोग भी उमंग से भर उठते हैं।
  • (iv) जीवन-संघर्ष में लगे हुए व्यक्तियों का मन भी आशा की नई चमक से प्रकाशित हो उठता है। 

प्रश्न 3. बनारस की पूर्णता और रिक्तता को कवि ने किस प्रकार दिखाया है ? 

उत्तर-बनारस की पूर्णता —

  • (i) बनारस की पूर्णता को कवि ने वसंत के आने पर लोगों के मन में आए उल्लास के रूप में दिखाया है।
  • (ii) कवि ने यह दर्शाया है कि पेड़-पौधे, पशु, मनुष्य, सभी के अंदर जीवन के प्रति आशा का अभाव जागृत हो उठता है। 
  • (iii) बनारस उल्लास भरे जीवन रस से परिपूर्ण हो जाता है।

बनारस की रिक्तता — 

  • (i) बनारस की रिक्तता को कवि ने शहर की अँधेरी गलियों से गंगा की ओर ले जाए जाने वाले शवों के चित्रण के माध्यम से दर्शाया है।
  • (ii) कवि यह दिखाता है कि मनुष्य की नश्वरता की प्रकृति के कारण ही यह शहर रिक् होता जाता है। पुराने की समाप्ति शहर को खाली करती रहती है। 

प्रश्न 4. बनारस में धीरे-धीरे क्या होता है ? ‘धीरे-धीरे’ से कवि इस शहर के बारे में क्या कहना चाहता है ?

  • उत्तर- (i) बनारस में धूल धीर-धीरे उड़ती है। 
  • (ii) लोग धीर-धीरे चलते हैं।
  • (iii) मंदिरों में और घाटों पर घंटे धीरे-धीरे बजते हैं।
  • (iv) बनारस में शाम भी धीरे-धीरे होती है।
  • (v) ‘धीरे-धीरे’ से कवि इस शहर के बारे में यह कहना चाहता है कि इस शहर में कार्य अपनी ‘री’ में ही होता है। 
  • (vi) हर चीज़ के ‘धीरे-धीरे’ के चरित्र के कारण ही यहाँ की प्राचीन संस्कृति, आध्यात्मिक आस्था, विश्वास, श्रद्धा, भक्ति आदि का विरासत अब तक सुरक्षित बची हुई है। 

प्रश्न 5. धारे-धीरे होने की सामूहिक लय में क्या-क्या बँधा है ?

  • उत्तर— (i) धीरे-धीरे होने की सामूहिक लय में सारा शहर दृढ़ता से बँधा हुआ है।
  • (ii) जो चीज जहाँ थी, बिना हिले वहीं पर पड़ी हुई है। (iii) गंगा नदी वहीं पर है। अर्थात् गंगा की पवित्रता, उसके प्रति आस्था, उसके मोक्षदायिनी स्वरूप पर विश्वास- सब कुछ अटल है।
  • (iv) नाव वहीं पर बँधी है अर्थात् गंगा से संबंधित समस्त परंपराएँ उसी रूप में विद्यमान हैं। 
  • (v) तुलसीदास की खड़ाऊँ भी सैकड़ों वर्षों से वहीं रखी है।
  • (vi) तात्पर्य यह है कि यहाँ धार्मिक विश्वास भी सदियों से कायम है।

प्रश्न 6. ‘सई- साँझ’ में घुसने पर बनारस की किन-किन विशेषताओं का पता चलता है ?

  • उत्तर— (i) ‘सई-साँझ’ में घुसने पर बनारस की अनेक विशेषताओं का पता चलता है।
  • (ii) उस समय बनारस आधा जल में, आघा मंत्र और आधा फूल में उपस्थित नजर आता है।
  • (iii) इस प्रकार उस समय बनारस शहर आध्यात्मिक आस्था, श्रद्धा, भक्ति, विश्वास आदि
  • से परिपूर्ण दिखाई देता है। यहाँ बनारस की प्राचीन काल से चली आ रही धार्मिक विशेषताओं का पता चलता है।
  • (iv) उस समय घाटों पर जल रही चिताएँ भी दिखाई पड़ती हैं। उनसे काशी और गंगा के सान्निध्य में मोक्ष की अवधारणा के प्रति आस्था का पता चलता है।
  • (v) बनारस में आधी पूर्णता और आधी रिक्तता की विशेषता नजर आती है। (vi) यह भी पता चलता है कि कहीं लोग नींद में विश्राम कर रहे है, तो कहीं शंख नाद के साथ जागरण कर रहे हैं।
  • (vii) इस प्रकार सई-साँझ में घुसने पर बनारस में आध्यात्मिकता और आधुनिकता का समन्वय दिखाई देता है। 

प्रश्न 7. बनारस शहर के लिए जो मानवीय क्रियाएं इस कविता में आई हैं, उनका व्यंजनार्थ स्पष्ट कीजिए।

  • उत्तर— (i) इस कविता में कहा गया है कि बनारस शहर इसी तरह खुलता है। इस कथन का व्यंजनार्थ यह है कि यहाँ लोगों के दिन की शुरुआत इसी तरह से होती है, आशा और विश्वास के साथ।
  • (ii) यह शहर इसी तरह भरता है-ऐसा कहने का अभिप्राय यह है कि बनारस धीरे-धीरे लोगों की चहल-पहल और उमंग से भर उठता है।
  • (iii) और यह शहर खाली होता रहता है-इस कथन का व्यंजनार्थ यह है कि जब लोग यहाँ प्राण-त्याग करते हैं, उस समय सारी खुशियाँ और आशाएँ समाप्त हो जाती हैं।
  • (iv) यह शहर किसी अलक्षित सूर्य को अर्घ्य देता हुआ शताब्दियों से अपनी एक टाँग पर खड़ा है। इसका व्यंजनार्थ यह है कि अदृश्य ईश्वर के प्रति बनारस के लोगों में असीम श्रद्धा और विश्वास है। इसीलिए यहाँ के लोग गंगा में एक टाँग पर खड़े होकर सूर्य की ओर उन्मुख होकर उसे अर्घ्य देते हैं। यह परंपरा यहाँ सदियों से चली आ रही है। 

प्रश्न 8. शिल्प-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए- 

(क) ‘यह धीरे-धीरे होना समूचे शहर को ‘ और आधा नहीं है’ बेखबर’

(ख) ‘अगर ध्यान से देखो 

(ग) ‘अगर एक टाँग पर

उत्तर—(क) शिल्प-सौन्दर्य- 

  • (i) यहाँ कवि ने बनारस में हर काम के धीमी गति से होने को चित्रित किया है।
  • (ii) कवि यह विचार प्रकट करता है कि धीरे-धीरे होने की सामूहिक गति के कारण ही यहाँ की संस्कृति, परंपराएँ, आस्था, विश्वास, श्रद्धा आदि सब कुछ दृढ़तापूर्वक इस श्हार में रचा-बसा हुआ है।
  • (iii) शब्दों का चयन सटीक एवं आकर्षक है। 
  • (iv) ‘धीरे-धीरे में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  • (v) बिंब-योजना सराहनीय है। 
  • (vi) वर्णन में चित्रात्मकता का गुणः है।

(ख) शिल्प-सौन्दर्य- 

  • (i) यहाँ कवि यह विचार कर रहा है कि संध्या के समय बनारस को ध्यानपूर्वक देखने पर पता चलता है कि यह शहर आधा पूर्ण है और आधा रिक्त है।
  • (ii) भाषा में सरलता, सजीवता और प्रवाहमयता है।
  • (iii) ‘आया’ शब्द की पुनरावृत्ति से काव्यांश में विशेष आकर्षण आ गया है। 
  • (iv) कवि ने ‘पूर्णता’ और ‘रिक्तता’ को प्रतीकों के माध्यम से प्रकट किया है।
  • (v) शब्दों का चयन सराहनीय है।

(ग) शिल्प-सौन्दर्य –

  • (i) इन पंक्तियों में कवि ने बनारस के लोगों की आध्यात्मिक आस्था और विश्वास का सुदंर निरूपण किया है। 
  • (ii) कवि यह स्पष्ट करता है कि आधुनिकता का समावेश होने के बावजूद बनारस का श्रद्धा और भक्ति भरा सदियों पुराना वही रूप आज की दृढ़ स्वरूप में दिखाई देता है।
  • (iii) यहाँ ‘टाँगों’ का प्रतीकात्मक प्रयोग किया गया है।
  • (iv) बिंद-योजना दर्शनीय है।
  • (v) ‘विलकुल बेखबर’ में अनुप्रास अलंकार है।
  • (vi) भाषा सरल, सजीव एवं प्रवाहपूर्ण है। 
  • (vii) सूर्य को अदृश्य सत्ता के प्रतीक के रूप में चित्रित किया गया

दिशा के प्रश्न उत्तर | NCERT Solutions Class 12 Hindi Elective Chapter 4 Question Answer

प्रश्न 1. बच्चे का ‘उघर उघर’ कहना क्या प्रकट करता है ?

उत्तर— (i) पतंग उड़ाते हुए एक बच्चे से कवि पूछता है कि हिमालय कियर है ? 

(ii) इसके उत्तर में बच्चा अपनी भागी जा रही पतंग की ओर संकेत करते हुए कहता है-उधर-उधर ।

(iii) बच्चे का ‘उधर-उघर’ कहना यह प्रकट करता है कि हर व्यक्ति का अपना-अपना मदार्थ होता है और बच्चे यथार्थ को अपनी दृष्टिकोण से देखते हैं।

प्रश्न 2 में स्वीकार कर मैंने पहली बार जाना हिमालय किधर है’- प्रस्तुत पंक्तियों का भाव स्पष्ट कीजिए। 

उत्तर-भाव-

  • (i) कवि द्वारा पतंग उड़ा रहे बच्चे से यह पूछने पर कि हिमालय कियर है, बच्चे ने अपनी पतंग की ओर इशारा करते हुए कहा कि उधर है। 
  • (ii) उस समय कवि कहता है कि में इस बात को स्वीकार करता हूँ कि मुझे पहली बार पता चला कि हिमालय कियर है अर्थात् कवि को पहली बार इस बात का अहसास हुआ है प्रत्येक व्यक्ति यथार्थ को अपने ढंग से देखता है। 


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FAQs

प्रश्न 1. प्राचीनतम शहर बनारस के सांस्कृतिक वैभव क्या हैं ? 

उत्तर— शिव की नगरी तथा आस्था का केन्द्र बनारस में गंगा, गंगा के घाट, मन्दिर तथा मन्दिरों और घाटों के किनारे बैठे भिखारियों के कटोरे जिसमें वसंत उतरता है आदि पंक्ति की रुकावट के साथ मोक्ष दिलाने वाली नगरी कहलाने का सामर्थ्य रखता है। 

प्रश्न 2. बनारस में वसंत के आने पर वहाँ सुगबुगाने और पचखियाँ फेंकने से कवि का क्या आशय है ?

उत्तर— (i) बनारस में जब वसंत का आगमन होता है, तब वहाँ जो है वह सुगबुगाता है, अर्थात् वहाँ उपस्थित हर अस्तित्वमान वस्तु जागने लगती है। 
(ii) इस प्रकार बनारस में चारों तरफ उल्लास का वातावरण बन जाता है। लोगों में नई आशा का संचार होने लगता है।
(iii) जो अस्तित्वमान नहीं है, वह पचखियाँ फेंकने लगता है अर्थात् जो नष्ट हो चुका होता है, उससे भी नया अंकुर निकलने लगता है। 
(iv) इस प्रकार वसंत के समय वहाँ विगत की नष्ट हो गई चीजों या असफलताओं के बीच भी लोगों के मन में नई उमंग और नए संकल्प उत्पन्न हो जाते हैं और वे जीवन-संघर्ष की राह पर आगे बढ़ने लग जाते हैं।

प्रश्न 2. कवि ने पतंग उड़ा रहे बच्चे से क्या प्रश्न पूछा ? बच्चे के उत्तर से उसने क्या सीखा ? 

उत्तर—(i) कवि ने पतंग उड़ा रहे बच्चे से यह पूछा कि हिमालय किधर है । 
(ii) बच्चे ने अपनी भागी जा रही पतंग की ओर संकेत करते हुए कहा कि उधर है।
(iii) बच्चे के इस उत्तर से कवि ने यह सीखा कि हरेक व्यक्ति का अपना-अपना यथार्थ होता है। हम संबर की हर चीज को अपने ही दृष्टिकोण से देखते हैं।

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