NCERT Solutions Class 12 Hindi Elective Chapter 10 Question Answer | अध्याय 10 केशवदास (रामचंद्रचंद्रिका)

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मैं खुद 12वीं का टॉपर रहा हूं और मुझे पता है कि 12वीं की परीक्षा में किस तरह के प्रश्न पूछे जाते हैं। वर्तमान में, मैं एक शिक्षक की भूमिका भी निभा रहा हूँ, और अपने छात्रों को कक्षा 12वीं की महत्वपूर्ण जानकारी और विषयों का अभ्यास भी कराता हूँ। मैंने यह लेख 5 वर्षों से अधिक के अपने अनुभव के साथ लिखा है। इस पोस्ट की मदद से आप परीक्षा में इस अध्याय से भूगोल में बहुत अच्छे अंक प्राप्त कर सकेंगे।

NCERT Solutions Class 12 Hindi Elective Chapter 10 Question Answer | अध्याय 10 केशवदास (रामचंद्रचंद्रिका)

कक्षा | Class12th 
अध्याय | Chapter10
अध्याय का नाम | Chapter Name(क) रामचंद्रचंद्रिका
कवि का नाम | Poet Nameकेशवदास
किताब | Bookअंतरा ऐच्छिक | Hindi Elective
खंड | Sectionकाव्य खंड | Poetry Section
बोर्ड | Boardसभी हिंदी बोर्ड
किताब | Book एनसीईआरटी | NCERT
विषय | Subjectहिंदी | HINDI
अध्ययन सामग्री | Study Materialsप्रश्न उत्तर | Question answer

केशवदास का जीवन परिचय | Biography of Keshavdas

उत्तर-भक्तिकाल के चर्चित कवियों में से एक नाम आचार्य केशवदास का भी प्रख्यात है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार केशवदास का जन्म सन् 1555 ई. को माना गया है। बेतवा नदी के पास ओरछा नगर में इनका जन्म हुआ था, ओड़छा नरेश महाराज इंद्रजीत सिंह इनके प्रधान आश्रयदाता थे, जिन्होंने इन्हें 21 गाँव भेंट में दिए थे। केशवदास ने हिंदी में संस्कृत की परंपरा की व्यवस्थापूर्वक स्थापना की थी। यह इनके जीवन के अंतिम समय त बनी रही। इनकी मृत्यु 1617 ई. में हुई।

NCERT Solutions Class 12 Hindi Elective Chapter 10
image credit: social media

रचना-परिचय—–केशवदास की प्रामाणिक रचनाएँ हैं—रसिक- प्रिया, कवि प्रिया, रामचंद्रचंद्रिक वीरचरित्र, वीरसिंह देव चरित, विज्ञान-गीता, जहाँगीर जसचंद्रिका इत्यादि। ‘रतनबावनी’ पुस्तक का रचना-समय अज्ञात है, पर यह उनकी सर्वप्रथम रचना है।

प्रस्तुत पुस्तक में उनक प्रसिद्ध रचना ‘रामचंद्रचंद्रिका’ का एक अंश दिया है, जिसमें उन्होंने माता सरस्वती की उदारत तथा वैभव का गुणगान किया है। दूसरे छंद ‘सवैया’ में आचार्य केशवदास ने पंचवटी की विशेषता का सुंदर वर्णन प्रस्तुत किया है।  नामद अंतिम छंद में मंदोदरी द्वारा रामचंद्र जी के गुणों का वर्णन है। वह रावण को समझाते हु कह रही हैं कि तुम श्रीराम के प्रताप को पहचानो । 

काव्य-शिल्प की विशेषताएँ– केशवदास ने अपने ग्रन्थ, साहित्य की सामान्य भाषा, व्रज में लिखे हैं। 

बुंदेल प्रांत के निवासी होने के कारण उसके कुछ शब्द और प्रयोग इनकी रचना में आ गए हैं। संस्कृत का प्रभाव इनके ग्रंथों में, विशेष रूप से ‘रामचंद्रचंद्रिका’ तथा ‘विज्ञान-गीता’ में अधिक है। इनकी सबसे अद्भुत कल्पना अलंकार-संबंधी है। श्लेष के और श्लेषानुप्राणित अलंकारों के ये विशेष प्रेमी थे। इनके श्लेष संस्कृत-पदावली के हैं। मानव मनोभावों की इन्होंने सुंदर व्यंजना की है। संवादों में इनकी उक्तियाँ विशेष मार्मिक हैं। इनके प्रशस्ति-काव्यों में इतिहास की प्रचुर सामग्री भरी है।

रामचंद्रचंद्रिका पाठ का सारांश | lesson summary रामचंद्रचंद्रिका

प्रस्तुत पाठ में केशवदास की प्रसिद्ध रचना रामचंद्रचंद्रिका से छंद अवतरित है। प्रथम द में माँ सरस्वती की उदारता और वैभव का मनोहारी चित्रण किया है। दूसरे छंद में पंचवटी के महात्म्य का वर्णन है। अंतिम छंद में मंदोदरी द्वारा रावण को श्रीराम के गुणों से अवगत कराने का वर्णन है। वह रावण के श्रीराम के बल तथा पराक्रम के विषय में बताती है।

class 12th NotesMCQ
HistoryPolitical Science
EnglishHindi

रामचंद्रचंद्रिका- दंडक सप्रसंग व्याख्या एवं शब्दार्थ | दंडक सप्रसंग व्याख्या NCERT

1. यानी जगरानी की उदारता बखानी जाइ ऐसी मति उदित उदार कौन की भाई

देवता प्रसिद्ध सिद्ध रिषिराज तपबृद्ध कहि कहि हारे सब कहि न काहू लई ।

भावी भूत बर्तमान जगत बखानत है ‘केसोदास’ क्यों हूँ ना बखानी काहू पे गई। 

पति बने चारमुख पूत बनेँ पाँचमुख नाती बने पटमुख तदपि नई नई ॥ 

शब्दार्थ : बानी-वाणी, सरस्वती बखानी कही। मतिबुद्धि। रिधिराज श्रेष्ठ ऋषि । प्रमुख चार मुँह वाले, ब्रह्मा पांचमुख-पाँच मुख वाले, शिव पटमुख-छह मुख वाले छान, कार्तिकेय ।

संदर्भ-प्रस्तुत पंक्तियों कविवर केशवदास आचार्य द्वारा रचित ‘रामचंद्रचंद्रिका’ से उद्धृत हैं। 

प्रसंग – इन पंक्तियों में कवि ने संसार की महारानी देवी सरस्वती की महिमा का वर्णन किया है। 

व्याख्या संसार की मालकिन देवी सरस्वती की उदारता का बखान (वर्णन) कर सके, ऐसी उदार (विशाल) वृद्धि किसकी हो सकती है ? अर्थात् किसी की नहीं। देवी सरस्वती की उदारता बधान कौन कर सकता है ? वाग्देवी की उदारता और महिमा का वर्णन करने में किसी भी क्ति की वाणी समर्थ नहीं है। 

इस संसार में देवतागण, प्रसिद्ध सिद्ध पुरुष, श्रेष्ठ ऋषि-मुनि तथा परम उत्तम तपस्वी भी, माँ सरस्वती की महिमा का बखान कर-करके थक गए, फिर भी उसका यथार्थ रूप में वर्णन नहीं कर सके। यह संसार, संसार में प्रसिद्ध ऋषि, मुनि तथा सिद्ध, तपस्वी, भूत, भविष्य तथा वर्तमान काल के ज्ञान का वर्णन करने वाले किसी के द्वारा भी सरस्वती माता की महिमा का बखान क्यों नहीं किया गया ? 

चार मुख वाले ब्रह्मा जी जिसके पति बने, पाँच मुख वाले शिवजी जिसके पूत (पुत्र) बने तथा छह मुख वाले कार्तिकेय भगवान जिसके नाती धने, फिर भी जो नित नूतन दिखाई देती हैं, ऐसी सरस्वती देवी सदा अजर-अमर हैं, यह कवि के कहने का अभिप्राय है। 

सरस्वती की अपरंपार महिमा का वर्णन करने में देवता, सिद्ध, ऋषि-मुनि और शिवजी आदि भी असमर्थ हैं, फिर मनुष्यों की तो बात ही और है अर्थात् मनुष्य तो उनकी महिमा का वर्णन किसी भी प्रकार नहीं कर सकते।

सौन्दर्य-बोध- इन पंक्तियों में कवि ने कोमलकांत पदावली का प्रयोग किया है। काव्य में ब्रजभाषा का प्रयोग किया गया है। पद में संगीतात्मकता का गुण विद्यमान है। तदपि प्रसिद्ध सिद्ध, तपवृद्ध आदि शब्दों में संस्कृत का प्रयोग किया गया है। ‘कहि कहि’ तथा ‘नई नई’ में अनुप्रास तथ पुनरुक्ति का प्रयोग किया गया है।

लक्ष्मण उर्मिला सप्रसंग व्याख्या एवं शब्दार्थ | लक्ष्मण उर्मिला सप्रसंग व्याख्या NCERT

सब जाति फर्टी दुख की दुपटी कपटी न रहै जहँ एक घटी। 

निघटी रुचि मीचु घटी हूँ घटी जगजीव जतीन की छूटी घटी।

अघओघ की बेरी कटी बिकटी निकटी प्रकटी गुरुज्ञान-गटी।

चहुँ ओरनि नाथति मुक्तिनटी गुन धूरजी जटी पंचवटी ॥

शब्दार्थ : कपटी -छली व्यक्ति। घटी-चौबीस मिनट। मीचु मुत्यु । अघओघ — पापों का समूह। मुक्तिनटी-मोल की नर्तकी धूरजटी — शिव। 

प्रसंग—इन पद्यों में कवि ने पंचवटी की महिमा का वर्णन करते हुए कहा है कि यहाँ दुख दूर हो जाते हैं।

व्याख्या – पंचवटी ऐसा स्थान है, जहाँ दुख के दोनों पाट सब भाँति से, सभी प्रकार से फट जाते हैं अर्थात् दूर हो जाते हैं। यह ऐसा स्थान है, जहाँ दुःख लेशमात्र भी नहीं रहता। कपटी, छली आदमी या प्राणी इस स्थान पर थोड़ी देर भी नहीं रह सकता। 

यहाँ छोटे विचार मन से हट जाते हैं तथा मृत्यु का क्षण भी, मौत का डर भी दूर हो जाता है। इस स्थान पर यम का मय भी दूर हो जाता है। यह ऐसा पवित्र स्थान है, जहाँ संसारी जीव की चंचल इच्छाएँ शांत हो जाती हैं। सभी विघ्न वायाएँ मिट जाती हैं। 

इस जगह पापों के समूहों की विकटता, भयंकर पापों का समुदाय, पापराशि रूपी बेड़ी भी कट जाती है। कहने का अभिप्राय यह है कि इस स्थान पर कठिन से कठिन, भारी से भारी पाप भी दूर हो जाते हैं। 

गुरु की ज्ञान रूपी गुदड़ी यहाँ समीप (पास) में प्रकट (प्रत्यक्ष) हो जाती है अर्थात् गुरुज्ञान रूपी सम्पत्ति अपने पास आ जाती है। इस जगह पर रहकर गुरुज्ञान की प्राप्ति हो जाती है। इस स्थान का ऐसा प्रभाव है कि गुरुदेव की कृपादृष्टि यहाँ प्राप्त होती है। चारों तरफ मोक्षरूपी नर्तकी का नाच यहाँ होता रहता है यहाँ सर्वत्र मोक्ष का नजारा पग-पग पर देखने को मिलता है। जिस मोक्ष की प्राप्ति के ऋषि-मुनि उग्र तपस्या करते हैं, वह यहाँ सहज रूप में प्राप्त हो जाता है। 

इस पंचवटी में की जटाओं के समान गुण भरे पड़े हैं। जैसे शिवजी की जटाएँ पवित्र तथा अपार महिमा से हैं, ऐसे ही पंचवटी की महिमा है। पापों के समूह की भयंकर बेड़ी भी यहाँ सहज की कट है। यहाँ विकट पापों का समूह भी अतशीघ्र नष्ट हो जाता है। 

गुरुज्ञान की गुटिका ही प्रकट हो जाती है अर्थात् गुरु द्वारा ज्ञान-प्राप्ति में विलम्ब नहीं होता। गुरुदेव का कृ शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है। मुक्तिरूपी नटिनी यहाँ पर चारों ओर नाचती है। शिवजी की ज के समान गुण यहाँ पर चहुँ ओर बिखरे रहते हैं। ऐसा पवित्र स्थान है यह पंचवटी।

सौन्दर्य-बोध– ‘घटी हूँ घटी’ में श्लेष अलंकार का सुंदर प्रयोग किया गया है। यहाँ ”घटी’ का अर्थ ‘घट गई’ (कम हो गई है तथा दूसरी ‘घटी’ का अर्थ घड़ी (24 मिनट) है। ज्ञानरूपी गटी (गुरुज्ञान-गटी) में रूपक अलंकार का प्रयोग किया गया है। ‘चहू’ औरनि मुक्तिनटी’ में मुक्ति का सुंदर चित्रण प्रस्तुत किया गया है। भाषा विषयानुकूल, सरस एवं सरल है

अंगद सप्रसंग व्याख्या एवं शब्दार्थ | अंगद सप्रसंग व्याख्या NCERT

3. सिंधु तर यो उनको बनरा तुम पै धनुरेख गई न तरी ।

बाँधोई बाँघत सो न बन्यो उन वारिधि बाँधिकै बाट करी । 

श्रीरघुनाथ प्रताप की बात तुम्हें दसकंठ न जानि परी ।

तेलनि तूलनि पूँछि जरी न जरी, जरी लंक जराइ- जरी ॥ 

शब्दार्थ : सिंधु- समुद्र बनरा— बन्दर। बारिधिसमुद्र । दसकंठ — रावण । 

प्रसंग —यहाँ कवि ने श्री रामचंद्र की महिमा का वर्णन किया है। मंदोदरी द्वारा अपने ( दशकंट) रावण को समझाते हुए राम की महिमा प्रस्तुत की गई है। 

व्याख्या— मंदोदरी अपने पति रावण को समझाते हुए कह रही है कि उनके अर्थात् श्रीरा जी के वानरों (बंदर) हनुमान के द्वारा लंका के सागर को लाँघ लिया गया। 

हनुमान ने वान की सहायता से पुल बनाकर समुद्र को पार कर लिया, जो कि लगभग असंभव सा लगता य श्रीराम जी के भाई लक्ष्मण के धनुष के द्वारा रेखा (पंक्ति) खींची, जो लक्ष्मण रेखा के नाम जानी जाती है। 

तुमसे वह रेखा भी नहीं तोड़ी गई अर्थात् तुम उस पंक्ति को भी नहीं लाँघ सके उन वानरों ने समुद्र पर बाँध (पुल) बना लिया। 

तुमसे वह बाँध भी नहीं बनाया गया और दे बाँध बनाकर समुद्र को लाँघकर लंका नगरी में पहुँच गए। हे मेरे प्राणाघर! तुम्हें श्री रामचंद्र ज के प्रताप की बात समझ में नहीं आई। तुमने हनुमान की पूँछ में तेल और कपड़े आदि लगा जलाने की कोशिश की, किंतु उनकी पूँछ नहीं जली। 

उस पूँछ के द्वारा तुम्हारी सोने की तं ही जल गई। अभी भी वक्त है, तुम श्रीराम जी के प्रताप को जानो। उनकी शरण में चले जाओ, तो तुम्हारा उद्धार हो सकता है।

सौन्दर्य-बोध– सिंधु तर यो उनको बनरा’ में उदात्त अलंकार का प्रयोग किया गया है। समुद्र तरने से रामदूत हनुमान के उदात्त भाव का वर्णन प्रस्तुत किया गया है । ‘तेलनि तूलनि में अनुप्रास अलंकार की सुंदरता देखने योग्य है। ‘चाँपोई बचत सो न बन्यो’ में अलंकार का प्रयोग हुआ है। भाषा सरस तथा सरल है।

NCERT Solutions Class 12 Hindi Elective Chapter 10 Question Answer



प्रश्न 1. देवी सरस्वती की उदारता का गुणगान क्यों नहीं किया जा सकता ?

उत्तर—देवी सरस्वती की उदारता का गुणगान इसलिए नहीं किया जा सकता, क्योंकि देवता प्रसिद्ध ऋषिगण, मुनिवृंद तथा सिद्ध और तपस्वी भी उनकी महिमा का गुणगान करके थक-हार गए, तो मनुष्यों में इतनी प्रतिभा तथा बुद्धि कहाँ है कि वे देवताओं, ऋषि-मुनियों, तपस्वियों सिद्धों की बराबरी कर सके ? जो देवी सरस्वती भूत, भविष्य तथा वर्तमान का वर्णन करती है उनकी महिमा का बखान कौन कर सकता है ? 

प्रश्न 2. चारमुख, पाँचमुख और पटमुख किन्हें कहा गया है और उनका देवी सरस्वती संबंध है ?

उत्तर— चारमुख से यहाँ ब्रह्मा जी को संबोधित किया गया। ये देवी सरस्ती के पति माने जाते हैं। इनका यह संबंध शास्त्रों में प्रसिद्ध है। पाँचमुख शिवजी को माना जाता है। इन्हें पंचानन श्री कहा जाता है। इनको इस पद में ‘पूत’ (पुत्र) के रूप में चित्रित किया गया है।

पटमुख से अभिप्राय षडानन कार्तिकेय जी से है। ये शिवजी के पुत्र हैं। इनका जन्म शिवजी से हुआ है। इन्हें गणेश जी का बड़ा भाई माना जाता है। ये देवी वाणी (सरस्वती) के नाती स्वीकार किए गए हैं। गणेश जी को कार्तिकेय (स्कंद) का छोटा भाई माना गया है। 

प्रश्न 3. कविता में पंचवटी के किन गुणों का उल्लेख किया गया है ? 

उत्तर- कविता में पंचवटी को पवित्र माना गया है। इस पंचवटी स्थान की ऐसी महिमा है कि यहाँ रहने वाले व्यक्ति के दुखों की बड़ी से बड़ी श्रृंखला भी समाप्त हो जाती है अर्थात् बड़े से बड़ा दुख भी यहाँ आकर नष्ट हो जाता है। यहाँ छली आदमी एक घड़ी भी नहीं रह •सकता। यहाँ मौत का डर भी खत्म हो जाता है। पापों का समूह समाप्त हो जाता है तथा गुरुजन की कृपादृष्टि इस स्थान पर प्राप्त हो जाती है। इस जगह मुक्ति (मोक्ष) का नाथ होता रहता है। 

प्रश्न 4. तीसरे छंद में संकेतित कथाएँ अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर–तीसरे छंद में हनुमानजी द्वारा समुद्र को लाँघने, लक्ष्मणजी द्वारा लक्ष्मण रेखा खीयने तथा समुद्र पर हनुमान द्वारा बाँध बाँधने की कथाओं / घटनाओं का वर्णन प्रस्तुत किया गया है। इसके अलावा हनुमानजी द्वारा अपनी जलती हुई पूँछ से सोने की नगरी लंका को जलाने की कथा का वर्णन किया गया है।

प्रश्न 5. निम्नलिखित पंक्तियों का काव्य-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए- 

(क) पति बने चारमुख पूत बनें पंच मुख नाती व पटमुख तदपि नई-नई ।

(ख) चहुँ ओरनि नाचति मुक्तिनटी गुन घूरजटी जटी पंचवटी । 

(ग) तेलन तूलनि पूँठि जरी न जरी, जरी लंक जराई-जरी । 

उत्तर- काव्य-सौन्दर्य- 

(क) ‘पति बने चारमुख, पूत बने पाँचमुख’ इन पदों में ब्रह्मा तथा शिवजी जैसे देवता जिस वाणी की देवी सरस्वती के संबंधी हैं, उसकी महिमा अपरंपार है। इतनी अधिक आयु वाले जिसके पति और पुत्र हैं, फिर भी वह नई-नई है। इससे उसकी कमनीयता का बोध होता है। अधिक आयु वालों के साथ संबंध होने पर भी वह नित नूतन भाव से परिपूर्ण रही है। उसकी नूतनता हमेशा विद्यमान रहती है। 

(ख) पंचवटी में मुक्ति का नाच ऐसा है जैसे शिवजी की जटाएँ हिलती रहती हैं। यहाँ शिवजी की जटाओं से मुक्ति रूपी नटनी की तुलना की गई है। अतः यहाँ उपमा अलंकार दर्शनीय है।

(ग) “सिंधु तर यो उनको बनरा तुम पे धनुरेख गई न तरी” में श्रीरामचंद्र जी के सेवक वानर हनुमानजी की श्रेष्ठता तथा रावण की निकृष्टता को दर्शाता गया है। यहाँ उदात्त अलंकार का प्रयोग किया गया है।

(घ) ‘तेलनि तुलनि’, ‘जराई जरी’ में अनुप्रास की छटा दर्शनीय है। 

प्रश्न 6. निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए- 

(क) भावी भूत वर्तमान जगत बखानत है केसोदास क्यों हूँ ना बखानी काहू पै गई ।

(ख) अघओघ की बेरी कटी विकटी निकटी प्रकटी गुरुज्ञान-गटी । 

उत्तर- (क) इस पंक्ति का आशय यह है कि सरस्वती देवी की महिमा का गुणगान वाणी की सीमा से परे है। जो वाग्देवी स्वयं भूत, भविष्य, वर्तमान का बखान करती है, उसकी महिमा का वर्णन पूर्णतः कौन कर सकता है ?

(ख) पंचवटी की पवित्रता के कारण यहाँ आने वाले व्यक्ति के पाप कट जाते हैं तथा गुरु द्वारा ज्ञान प्राप्ति का मार्ग सहज हो जाता है। कहने का अभिप्राय यह है कि इस स्थान पर गुरु की कृपा अनायास ही प्राप्त हो जाती है।



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FAQs

प्रश्न 1. “भावी भूत वर्तमान जगत बखानत है ‘केसोदास’ क्यों हू ना बखानी पै गई।” इस कथन में केशवदास ने त्रिकाल द्रष्टा को किस प्रकरण में विफल बताया है?

उत्तर- उक्त कथन में केशवदास जी कहना चाहते हैं कि भूतकाल, वर्तमानकाल तथा भविष्यकाल का स्पष्ट वर्णन करने वाले विद्वान भी सरस्वती की महिमा का विवेचन करने में असमर्थ हैं अर्थात् विश्व के सर्वोत्तम कालद्रष्टा भी शारदा के सभी गुणों का विवेचन नहीं कर सकते हैं।

प्रश्न 2. “अघओघ को बेरी कटी विकटी निकटी प्रकटी गुरुज्ञान-गटी”। यहाँ केशवदास जी किसके विलय तथा किसके आविर्भाव का उल्लेख कर रहे हैं ?

उत्तर—पंचवटी के माहात्म्य पर प्रकाश डालते हुए केशवदास कहते हैं कि पंचवटी में धोर पापों का समूह नष्ट हो गया है। गुरु के ज्ञान का सर्वोदय हो गया है। वस्तुतः अद्वितीय तथा अनिर्वचनीय तीर्थ है।

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