NCERT Solutions Class 12 Hindi Elective Chapter 5 Question Answer | अध्याय 5 विष्णु खरे

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तो छात्रों, इस लेख को पढ़ने के बाद, आपको इस अध्याय से परीक्षा में बहुत अधिक अंक प्राप्त होंगे, क्योंकि इसमें सभी परीक्षाओं से संबंधित प्रश्नों का वर्णन किया गया है, इसलिए इसे पूरा अवश्य पढ़ें।

मैं खुद 12वीं का टॉपर रहा हूं और मुझे पता है कि 12वीं की परीक्षा में किस तरह के प्रश्न पूछे जाते हैं। वर्तमान में, मैं एक शिक्षक की भूमिका भी निभा रहा हूँ, और अपने छात्रों को कक्षा 12वीं की महत्वपूर्ण जानकारी और विषयों का अभ्यास भी कराता हूँ। मैंने यह लेख 5 वर्षों से अधिक के अपने अनुभव के साथ लिखा है। इस पोस्ट की मदद से आप परीक्षा में इस अध्याय से भूगोल में बहुत अच्छे अंक प्राप्त कर सकेंगे।

NCERT Solutions Class 12 Hindi Elective Chapter 5 Question Answer | अध्याय 5 विष्णु खरे

कक्षा | Class12th 
अध्याय | Chapter05
अध्याय का नाम | Chapter Name(क) एक कम
(ख) सत्य
कवि का नाम | Poet Nameविष्णु खरे
किताब | Bookअंतरा ऐच्छिक | Hindi Elective
खंड | Sectionकाव्य खंड | Poetry Section
बोर्ड | Boardसभी हिंदी बोर्ड
किताब | Book एनसीईआरटी | NCERT
विषय | Subjectहिंदी | HINDI
अध्ययन सामग्री | Study Materialsप्रश्न उत्तर | Question answer

विष्णु खरे का जीवन-परिचय | Biography of Vishnu Khare

उत्तर- मानव जीवन की सार्थकता से जुड़े कवि विष्णु खरे का जन्म छिंदवाड़ा, मध्य प्रदेश में सन् 1940 ई. में हुआ। क्रिश्चियन कॉलेज, इंदौर से 1963 ई. में उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में एम. ए. किया।

पद और मर्यादा-1962-63 ई. में दैनिक इंदौर समाचार में उप-संपादक रहे। 1963- 75 ई. तक मध्य प्रदेश तथा दिल्ली के महाविद्यालयों में अध्यापन से भी जुड़े। इसी बीच 1966- 67 ई. में लघु पत्रिका ‘व्यास’ का संपादन किया। 

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Image credit: aaj tak

तत्पश्चात् 1976-84 ई. तक साहित्य अकादमी में उप-सचिव (कार्यक्रम) पद पर पदासीन रहे। 1985 ई. से ‘नवभारत टाइम्स’ में प्रभारी कार्यकारी संपादक के पद पर कार्य किया। बीच में लखनऊ संस्करण तथा रविवारीय नवभारत टाइम्स (हिंदी) और अंग्रेजी ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ में भी संपादन कार्य से जुड़े रहे। 

1993 ई. में जयपुर नवभारत टाइम्स के संपादक के रूप में भी कार्य किया। इसके बाद ‘जवाहर ताल नेहरू स्मारक संग्रहालय तथा पुस्तकालय’ में दो वर्ष वरिष्ठ अध्येता रहे। अब स्वतंत्र लेखन | तथा अनुवाद कार्य में रत हैं।

विशिष्टता — उन्होंने विदेशी कविताओं का हिंदी तथा हिंदी-अंग्रेजी अनुवाद अत्यधिक किया है। उनको फिनलैंड के राष्ट्रीय सम्मान ‘नाइट ऑफ दि आर्डर ऑफ दि व्हाइट रोज’ से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त रघुवीर सहाय सम्मान, शिखर सम्मान, हिंदी अकादमी दिल्ली का साहित्यकार सम्मान मैथिलीशरण गुप्त सम्मान मिल चुका है।

रचनाएँ—–कविता-संग्रह — मरू प्रदेश और अन्य कविताएँ (टी.एस. इलियट का अनुवाद), एक गैर-रूमानी समय में, खुद अपनी आँख से, सबकी आवाज के परदे में, पिछला बाकी, काल और अवधि के दरमियान ।

आलोचना -आलोचना की पहली किताब । काव्य-शिल्प की विशेषताएँ: भाव-पक्ष-विष्णु खरे की कविताओं में अभ्यस्त जड़ताओं और अमानवीय स्थितियों के विरुद्ध सशक्त नैतिक स्वर को अभिव्यक्ति दी गई है। 

उनकी कविताएँ आपसी विश्वास, सौहार्द और जन-कल्याण का आग्रह करती हैं। उन्होंने अपनी रचनाओं में मानवीय मूल्यों की स्थापना, संबंधों के निर्वाह, ईमानदारी और सामूहिकता की भावना अभिव्यक्ति दी है।

कला-पक्ष-भाषा-शैली– विष्णु खरे की भाषा में सरलता, सजीवता एवं प्रवाहमयता है। उन्होंने अपनी भाषा में विषयानुरूप तत्सम शब्दों का भी प्रयोग किया है। जैसे- गतिशील, निकांशी, अति इनिश्यामी निर्निमिष, प्रतिबिंब आदि। 

छंद-विधान -विष्णु खरे ने मुक्त कविताएँ लिखी है। 

अलंकार—उनकी कविताओं में यत्र-तत्र अलंकारों का भी सुंदर प्रयोग हुआ हैं। जैसे—- 

अनुप्रास- ‘पच्चीस पैसे’, ‘नंगा निर्लज्ज’, ‘हर होड़’ ‘देखती दृष्टि’ आदि। 

उपमा – उसी का हलका सा प्रकाश जैसा आकार’। पुनरुक्ति प्रकाश धीरे-धीरे’, ‘कभी-कभी’, ‘बार-बार’ आदि।

प्रतीक योजना– विष्णु खरे अपनी कविताओं के कथ्य को अनेक प्रतीकों के माध्यम से व्यक्त करते हैं। बिंब विधान उनकी कविताओं में सुंदर बियों की रचना हुई है। 

व्यंजना-शक्ति-विष्णु खरे ने व्यंजनात्मक प्रयोगों के द्वारा भाव को गहरी अभिव्यक्ति प्रदान की है।

एक कम कविता का सारांश | Summary Of The Poem ek kam

NCERT Solutions Class 12 Hindi Elective Chapter 5

‘एक कम’ शीर्षक कविता समाज के वंचित वर्ग की निराशा एवं जीवन-संघर्ष की और ध्यान केन्द्रित करती है। इस कविता के माध्यम से कवि ने स्वातंत्र्योत्तर भारतीय समाज में प्रचलित हो रही जीवन शैली को रेखांकित किया है। 

आजादी हासिल करने के बाद सब कुछ वैसा ही नहीं रहा, जिसकी आजादी के सेनानियों ने कल्पना की थी। पूरे देश में आस्थावान, ईमानदार और संवेदनशील माना जाने वाला जनता का मोहभंग हुआ। परिणाम यह हुआ कि आपसी विश्वास, परस्पर भाईचारा और सामूहिकता का स्थान धोखाधड़ी, आपसी खींच-तान ने ले लिया और नितांत स्वार्थपरता का माहौल बनता चला गया। 

कवि इस माहौल में स्वयं को असमर्थ पाते हुए भी हाथ फैलाने के लिए विवश ईमानदारों के प्रति अपनी सहानुभूति स्पष्ट रूप से रखता है। कुछ न करने की स्थिति होने के कारण वंचित को वर्ग को प्रगति की दौड़ में लगे लोगों के जीवन संघर्ष में वायक नहीं बनाना चाहता। 

इसलिए वह कम से कम उनके रास्ते का एक व्यवधान तो कम कर ही सकता है जो कि वह करता है, यही कविता का संदेश भी है।

सत्य कविता का सारांश | Summary Of The Poem saty

‘सत्य’ कविता में कवि ने महाभारत के पौराणिक संदर्भों और पात्रों के द्वारा जीवन में सत्य की महत्ता को स्पष्ट करना चाहा है। यह कविता इसका प्रमाण है कि अतीत की कथा का आधार लेकर अपनी बात प्रभावशाली ढंग से कही जा सकती है। 

युधिष्ठिर, विदुर और खांडवप्रस्थ-इंद्रप्रस्व के द्वारा सत्य को, सत्य की महत्ता को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य के साथ प्रस्तुत करना ही यहाँ कवि का अभीष्ट है।

इस कविता में यह स्पष्ट किया गया है कि सत्य भी सापेक्ष होता है। अतः जिस समय और मान ने फाद जी रहा है, उसमें सत्य की पहचान और उसकी पकड़ कितनी मुश्किल होती। जा रही हैं सत्य कभी दिखता है और कभी ओझल हो जाता है। 

आज सत्य का कोई एक स्थिर रूप, आकार या पहचान नहीं है, जो उसे स्थायी बना सके। सत्य के प्रति संशय का विस्तार होने के बावजूद वह हमारी आत्मा की आंतरिक शक्ति है-यह भी इस कविता का संदेश है। सत्य का रूप वस्तु, स्थिति और घटनाओं, पात्रों के अनुसार बदलता रहा है। 

जो एक व्यक्ति के लिए सत्य है, वही शायद दूसरे के लिए सत्य नहीं है। बदलते हालात और मानवीय संबंधों में हो रहे निरंतर परिवर्तनों से सत्य की पहचान और उसकी पकड़ मुश्किल होते जाने के सामाजिक को कवि ने ऐतिहासिक-पौराणिक घटनाक्रम के द्वारा प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।

class 12th NotesMCQ
HistoryPolitical Science
EnglishHindi

एक कम सप्रसंग व्याख्या एवं शब्दार्थ | एक कम सप्रसंग व्याख्या NCERT

1. 1947 के बाद से 

इतने लोगों के इतने तरीकों से 

आत्मनिर्भर मालामाल और गतिशील होते देखा है

कि अब जब आगे कोई हाथ फैलाता है पच्चीस पैसे एक चाय या दो रोटी के लिए

तो जान लेता हूँ

मेरे सामने एक ईमानदार आदमी औरत या बच्चा खड़ा है।

मानता हुआ कि हाँ मैं लाचार हूँ कंगाल या कोढ़ी

या मैं भला चंगा हूँ और कामचोर और

एक मामूली धोखेबाज

लेकिन पूरी तरह तुम्हारे संकोच लज्जा परेशानी या गुस्से पर आश्रित तुम्हारे सामने बिलकुल नंगा निर्लज्ज और निराकांक्षी

मैं अपने को हटा लिया है हर होड़ से

मैंने तुम्हारा विरोधी प्रतिद्वंद्वी या हिस्सेदार नहीं मुझे कुछ देकर या न देकर भी तुम

कम से कम एक आदमी से तो निश्चित रह सकते हो 

शब्दार्थ : आश्रित- किसी के सहारे निर्लज्ज-सज्जा-रहित, बेशर्म निराकांक्षी- इच्छारहित, जिसे किसी चीज की इच्छा न हो। प्रतिद्वंद्वी विपक्षी, शत्रु, विरोधी निश्चित- – चिंतारहित, बेफिक्र । 

प्रसंग — प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘अंतरा’ (भाग-2) में संकलित कविता ‘एक कम’ से ली गई हैं। इसके रचयिता प्रसिद्ध कवि विष्णु खरे हैं। इसमें स्वतंत्रता के बाद ईमानदार लोगों की विवशता भरी जिंदगी का चित्र प्रस्तुत किया गया है। 

इन पंक्तियों में कवि ने यह स्पष्ट किया है कि ऐसे लाचार लोग विकास की दौड़ से बाहर हो चुके हैं और समर्थ लोगों की दया पर निर्भर हो गए हैं। इनकी इच्छाएँ भी समाप्त हो चुकी हैं, अतः प्रगति के पथ पर बढ़ रहे लोगों से ये किसी भी प्रकार की स्पर्धा करने में असमर्थ हैं। 

व्याख्या— कवि कहता है कि सन् 1947 ई. में देश के स्वतंत्र होने के बाद से मैंने बहुत सारे लोगों के अनेक तरीकों से आत्मनिर्भर होते, संपन्न होते और उन्नति के पथ पर आगे बढ़ते हुए देखा है। यहाँ कवि के कथन का भाव यह है कि स्वतंत्रता के पश्चात् आर्थिक संपन्नता और उन्नति के लिए लोगों ने झूठ, छल-कपट, बेईमानी, धोखाधड़ी आदि का रास्ता अपना लिया। इससे चारों ओर स्वार्थपरता का वातावरण बनता चला गया।

इस माहौल में जब कोई पच्चीस पैसे एक चाय या दो रोटी के लिए हाथ फैलाता है, तब मैं जान लेता हूँ कि मेरे सामने हाथ फैलाने वाला एक ईमानदार आदमी औरत या बच्चा खड़ा है।

उसके हाथ फैलाने में यह स्वीकार करने का भाव भी निहित होता है कि मैं विवश हूँ, एक कंगाल या कोढ़ी हूँ अथवा यह भाव होता है कि में अच्छा भला स्वस्थ हूँ, कामचोर और एक साधारण धोखेबाज हूँ। तात्पर्य यह है कि भीख माँगने वाला व्यक्ति या तो वास्तव में अत्यन्त लाचार होता है या स्वस्थ होते हुए भी कामचोरी के कारण छोटा-मोटा धोखेबाज हो सकता है।। परंतु बिना किसी बनावट के वह अपनी यथास्थिति को प्रकट कर देता है।

कवि आगे कहता है कि उस याचक के मन में यह स्वीकृति का भाव भी होता है कि मैं पूर्णरूप से तुम्हारे संकोचपूर्वक या लज्जा के साथ अथवा परेशान होकर या क्रोधित होकर दिए दान देते समय मनुष्य के मन में कैसी भी भावना रही हो। 

आत्मसम्मान खो दिया है। मैंने लज्जा का भी त्याग कर दिया है और मैंने अपनी सारी आकांक्षाओं इस तरह हाथ फैलाते हुए वह यह भाव प्रकट करता है कि मैंने तुम्हारे सामने अपना छोड़ दिया है। इस प्रकार मैंने प्रगति की हर प्रतिस्पर्धा से अपने आपको हटा लिया है। 

विरोधी प्रतिद्वंद्वी या हिस्सेदार नहीं हूँ अर्थात् तुम्हारी धन कमाने की लालसा, उन्नति दान के सहारे ही जीवित हूँ अर्थात् उसका जीवन दूसरों के दान पर ही निर्भर है, चाहे उसे करने की आकांक्षा के रास्ते से मैंने अपने आपको पूरी तरह से हटा लिया है। में तुम्हारी का बाधक नहीं हूँ। 

तुम चाहो तो मुझे कुछ दो या न चाहों तो कुछ मत दो, परंतु तुम कम-से-कम एक आदमी से तो चिंतामुक्त रह सकते हो अर्थात् तुम्हारे साथ प्रतिस्पर्धा से मेरे हट जाने कारण तुम्हारी महत्त्वाकांक्षा के रास्ते का एक बाधक तो कम हो ही गया है। 

सौन्दर्य-बोध– इन पंक्तियों में कवि ने जीवन-संघर्ष में लगे निर्बल और वंचित वर्ग असहायता के साथ ही विकास के रास्ते में उनके पिछड़ जाने की त्रासदी का भी अत्यंत भावपूर्ण चित्रण किया है। भाषा सहज, प्रभावपूर्ण एवं प्रवाहमयी है। 

पच्चीस पैसे’, ‘एक ईमानदार आदमी औरत’, ‘कंगाल या कोड़ी’, ‘नंगा निर्लज्ज’ और ‘हर होड़’ में अनुप्रास अलंकार है। व्यंजन शब्द-शक्ति का अकार्षक प्रयोग हुआ है। शब्दों का सटीक चयन हुआ मुक्त छंद में हुई है। है । 

सत्य सप्रसंग व्याख्या एवं शब्दार्थ | सत्य सप्रसंग व्याख्या NCERT

1.जब हम सत्य को पुकारते हैं

तो वह हमसे परे हटता जाता है 

जैसे गुहारते हुए युधिष्ठिर के सामने से 

भागे थे विदुर और भी घने जंगलों में 

सत्य शायद जानना चाहता है।

कि उसके पीछे हम कितनी दूर तक भटक सकते हैं

शब्दार्थ : परे दूर। गुहारते हुए-गुहार लगाते हुए, रक्षा के लिए पुकारते हुए, उच्च स्वर में पुकारते हुए।

प्रसंग — प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘अंतरा’ (भाग-2) में संकलित कविता ‘सत्य’ उद्धृत है। इसके रचयिता प्रसिद्ध कवि विष्णु खरे हैं। इन पंक्तियों में कवि ने युधिष्ठिर और विदुर के प्रसंग के माध्यम से यह बताया है कि सत्य को पुकारने पर वह और दूर होता जाता है। 

व्याख्या -कवि कहता है कि जब हम सत्य को पुकारते हैं, तब वह हमसे और अधिक दूर होता चला जाता है। उसी तरह जैसे युधिष्ठिर द्वारा दीनतापूर्वक ऊँचे स्वर में पुकारने पर विदुर उनके सामने से ही और भी घने जंगलों में भागे थे। सत्य शायद यह जानना चाहता है कि हम उसके पीछे-पीछे कितनी दूर तक भटक सकते हैं।

भाव यह है कि जिस प्रकार युधिष्ठिर के पुकारने पर भी सत्य का पालन करने वाले विदुर घने जंगलों में चले गए थे, उसी प्रकार जब हम सत्य को दीनतापूर्वक पुकारते हैं तब वह और अधिक दूरी बना लेता है। संभवतः वह सत्य के प्रति हमारी निष्ठा की परीक्षा लेना चाहता है। 

सौन्दर्य-बोध – इन पंक्तियों में कवि ने सत्य को पकड़ने में आ रही कठिनाई का वर्णन किया है। भाषा में सरलता, सजीवता और प्रवाहमयता है। काव्यांश में दृष्टांत अलंकार है। सत्य का मानवीकरण किया गया है। मुक्त छंद की कविता का अंश है। 

2. कभी दिखता है सत्य 

और कभी ओझल हो जाता है

और हम कहते रह जाते हैं कि रुको यह हम हैं 

जैसे धर्मराज के बार-बार दुहाई देने पर

कि ठहरिए स्वामी विदुर

यह मैं हूँ आपका सेवक कुंतीनंदन युधिष्ठिर

वे नहीं ठिक 

शब्दार्थ स्वामी मालिक

प्रसंग– प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘अंतरा’ (भाग-2) में संकलित कविता ‘सत्य’ से की गई है। इसके रचयिता प्रसिद्ध कवि विष्णु खरे हैं। सोडुन पंक्तियों में कवि ने युधिष्ठिर और विदुर के पौराणिक संदर्भ के माध्यम से यह बताया है कि आज सत्य का कोई रूप नहीं है।

व्याख्या– कवि कहता है कि हमें सत्य कभी दिखाई देता है और कभी हमारी आँखों के

आगे से ओझल हो जाता है। हम उससे यह कहते ही रह जाते हैं कि रुको, यह हम हैं अर्थात् सत्य का कोई एक स्थिर रूप, आकार या पहचान नहीं है। 

हम जब तक उसे अनुभूत कर पाते 1. तबतक वह लुप्त हो चुका होता है और हम उसे रुकने के लिए पुकारते ही रह जाते हैं। “धर्मराज युधिष्ठिर और भीतिज्ञ विदुर के खादास्य के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कवि कहता है कि जिस प्रकार धर्मराज युधिष्ठिर बार-बार दुहाई देते रहे कि स्वामी विदुर ठहर जाइए! मैं आपका सेवक कुंतीपुत्र युधिष्ठिर हूँ। परंतु वे उनकी पुकार को अनसुना कर देते हैं और वहाँ नहीं रुकते। उसी प्रकार हमारे रोकने पर भी सत्य नहीं रुकता और हमारी आँखों के सामने से ओझल हो जाता है।

सौन्दर्य-बोध– इन पंक्तियों में यह भाव प्रकट किया गया है कि सत्य की कोई निश्चित पहचान नहीं है। परिस्थितियों के अनुसार ही सत्य का स्वरूप निर्धारित होता है। काव्यांश की भाषा में सरलता, प्रवाहमयता एवं संप्रेषणीयता है। ‘बार बार’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है। पंक्तियों में दृष्टांत अलंकार का सुंदर प्रयोग हुआ है। ‘सत्य’ का मानवीकरण किया गया है। कविता की रचना मुक्त छंद में हुई है।

3.यदि हम किसी तरह युधिष्ठिर जैसा संकल्प पा जाते हैं तो एक दिन पता नहीं क्या सोचकर रुक ही जाता है सत्य

लेकिन पलटकर सिर्फ खड़ा ही रता है वह दृढनिश्चयी

अपनी कहीं और देखती दृष्टि से हमारी आँखों में देखता हुआ

अंतिम बार देखता सा लगता है वह हमें और उसमें से उसी का हल्का सा प्रकाश जैसा आकार समा जाता है

शब्दार्थ : दृढनिश्चयी दृढ़ निश्चय करने वाला दृष्टि- नजर । प्रसंग प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘अंतरा’ (भाग-2) में संकलित कविता ‘सत्य’ से उद्धृत है। इसके रचयिता प्रसिद्ध कवि विष्णु बरे हैं। 

इन पंक्तियों में यह भाव प्रकट किया गया है कि जो व्यक्ति दृढनिश्चयी होता है उसे ही सत्य का साक्षात्कार होता है। सत्य को पाने का संकल्प ही हमें सत्य से परिपूर्ण कर सकता है। 

व्याख्या— कवि कहता है कि यदि हम युधिष्ठिर के समान दृढ़ संकल्प करते हुए सत्य की खोज में उसके पीछे लग जाते हैं तो एक दिन पता नहीं क्या सोचकर सत्य रुक जाता है। परंतु दृढ निश्चय वाला वह सत्य घूमकर केवल खड़ा ही रह जाता है। अर्थात् हम उसे केवल देख पते हैं, उससे कोई संवाद नहीं कर पाते।

उस समय वह कहीं और देखती हुई नजर से हमारी आँखों में देखता हुआ ऐसा लगता है जैसे अंतिम बार देख रहा हो। इस प्रकार सत्य से हमारा वह आखिरी साक्षात्कार होता है। उस समय उसी का हल्का सा प्रकाश जैसा आकार उसमें से निकलकर हममें प्रवेश कर जाता है अर्थात् जब हम सत्य को अनुभूत कर लेते हैं, तब सत्य हमें अपने प्रकाश से भर देता है। 

फिर हमें उसे ढूंढने की आवश्यकता नहीं रहती। वह हमारे अंदर से ही हमारा मार्गदर्शन करता रहता है। प्रकाशित हो उठती है। भाषा अत्यंत सरस, सहज एवं प्रवाहमयी है। ‘यदि हम … पा जाते हैं । 

सौन्दर्य-बोध– इस काव्यांश में सत्य की अनुभूति के लिए दृढ़ संकल्प की आवश्यकता बताई गई है। यहाँ यह भी स्पष्ट किया गया है कि सत्य की अनुभूति होने पर हमारी आत्मा अहंकार है। देखती दृष्टि एवं और उसमें से उसी का में अनुप्रास अलंकार की छटा मुक्तछंद की कविता है। सत्य को मानवीय क्रियाएँ करते हुए दिखाया गया है, मानवीकरण अलंकार है। 

4. जैसे शमी वृक्ष के तने से टिककर

पहचानने में पहचानते हुए विदुर ने धर्मराज को

निर्निमेष देखा था अंतिम बार और उनमें से उनका आलोक धीरे-धीरे आगे बढ़कर

सिर झुकाए निराश लौटाते हैं हम कि सत्य अंत तक हमसे कुछ नहीं बोला

मिल गया था युधिष्ठिर में हाँ हमने उसके आकार से निकलता वह प्रकाश-पुंज देखा था

हम तक आता हुआ

वह हममें विलीन हुआ या हमसे होता हुआ आगे बढ़ गया

हम कह नहीं सकते

शब्दार्थ : निर्निमेष– पलक झपकाए बिना। आलोक- प्रकाश प्रकाश-पुंज- रोशनी का समूह विलीन-लुप्त हुआ, समा गया। 

प्रसंग प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘अंतरा’ (भाग-2) में संकलित कविता ‘सत्य’ से ली गई हैं। इसके रचयिता प्रसिद्ध कवि विष्णु खरे हैं। इस काव्यांश में युधिष्ठिर और विदुर की खांडवप्रस्थ में मुलाकात का संदर्भ देते हुए कवि ने यह स्पष्ट किया है कि सत्य हमारे अंदर अपना प्रकाश तो भर देता है, परंतु वह हमसे कोई संवाद नहीं करता। उस समय हमें अपने अंदर उसकी उपस्थिति के प्रति संशय उत्पन्न हो जाता है।

व्याख्या -कवि कहता है कि सत्य का प्रकाश हमारे अंदर वैसे ही समा जाता है जैसे विदुर शमी वृक्ष के तने के सहारे खड़े होकर धर्मराज युधिष्ठिर को अनजान जैसे देखते हुए भी पहचानकर अंतिम बार पलक झपकाए बिना देखा था और उनमें से उनका प्रकाश निकलकर धीरे-धीरे आगे बढ़कर युधिष्ठिर में मिल गया था। 

भाव यह है कि जब हम दृढ़ संकल्प के साथ सत्य को तलाशते हैं, तब वह हमारे अंदर अपना प्रकाश भर देता है। कवि कहता है कि सत्य का साक्षात्कार होने के बाद भी हम सिर झुकाए हुए निराश होकर ही लौटते हैं, यह सोचते हुए कि सत्य अंत तक हमसे कुछ नहीं बोला। 

हमने उसके आकार से निकलकर अपने पास आता हुआ वह प्रकाश पुंज देखा था। वह प्रकाश पुंज हमारे पास आकर हममें विलीन हो गया या हमसे होता हुआ आगे बढ़ गया, यह बात हम कह नहीं सकते। अर्थात् सत्य की उपस्थिति के प्रति हमारे मन में संशय बना रहता है।

कवि के इस प्रकार कहने का भाव यह है कि हमारे दृढ़ संकल्प के कारण हमें सत्य का साक्षात्कार तो हो जाता है, परंतु इससे यह सुनिश्चित नहीं होता कि हमने उस सत्य को धारण भी कर लिया है। इस प्रकार हमारे अंदर यह संशय बना रहता है कि सत्य हमारे भीतर मौजूद है या नहीं।

सौन्दर्य-बोध– इन पंक्तियों में कवि ने सत्य के प्रति संशय होने के मनोभाव को युधिष्ठिर और विदुर की दृष्टि के माध्यम से व्यक्त किया है। भाषा में सजीवता, प्रवाहमयता एवं गंभीरता है। ‘और उनमें से उनका आलोक’, ‘हो हमने’, ‘उसके आकार’ तथा ‘हमसे होता हुआ’ में अनुप्रासः अलंकार है। ‘धीरे-धीरे’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है। काव्यांश में दृष्टांत अलंकार है। ‘यह हममें विलीन ‘कह नहीं सकते’ में संदेहालंकार है। सत्य पर मानवीय वृत्तियों का आरोप होने से काव्यांश में मानवीकरण अलंकार है। 

5. तो हममें कोई स्फुरण हुआ और न ही कोई

जर किंतु शेष सारे जीवन हम सोचते रह जाते हैं। कैसे जानें कि सत्य का वह प्रतिबिंब हममें समाया या नहीं

हमारी आत्मा में जो कभी-कभी दमक उठता है क्या वह उसी की छुअन है

जैसे विदर कहना चाहते तो वही बता सकते थे सोचा होगा माथे के साथ अपना मुकुट नीचा किए

युधिष्ठिर ने खांडवप्रस्थ से इंद्रप्रस्थ लौटते हुए ।

शब्दार्थ स्फुरण कँपकँपी प्रतिबिंब परछाई, प्रतिच्छाया 

प्रसंग प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘अंतरा’ (भाग-2) में संकलित कविता ‘सत्य’ उद्धत है। इसके रचयिता प्रसिद्ध कवि विष्णु बरे हैं।

इन पंक्तियों में कवि ने यह भाव प्रकट किया है कि सत्य के आकार से निकलता प्रकाश-पुंज हमारे पास तो आता हैं, परंतु हमारे मन में यह संदेह बना रहता है कि वह हमारे अंदर विलीन हुआ या बाहर चला गया। इस संशय के बावजूद सत्य हमारी आत्मा की आंतरिक शक्ति है। 

व्याख्या -कवि कहता है कि सत्य का प्रकाश हमारे पास आया तो हमारे अंदर न तो कोई कँपकँपी हुई न ही कोई ज्वर आया अर्थात् हमारे भीतर कोई कंपन नहीं हुआ और किसी विशेष ऊना की अनुभूति भी नहीं हुई। इस कारण हम कोई परिवर्तन नहीं महसूस करते हुए बाकी सारा जीवन यह सोचते रह जाते हैं कि हम इस बात को कैसे जानें कि सत्य की वह प्रतिच्छाया हममें समा गई अथवा नहीं।

हमारी आत्मा में कभी-कभी जो विशेष दीप्ति आ जाती है, क्या वह उसी सत्य के प्रतिबिम्ब का स्पर्श है ? अर्थात हमारी आत्मा की आंतरकि शक्ति सत्य से उसके प्रधशित हो जाने के कारण ही कभी-कभी दमक उठती है। जैसे खांडवप्रस्थ से इंद्रप्रस्थ लौटते हुए युधिष्ठिर ने मुकुट पहने सिर को नीचा किए हुए सोचा होगा कि यदि विदुर कहना चाहते, तो वहीं बता देते । 

कवि का भाव यह है कि युधिष्ठिर ने अपने अहं का त्याग करते हुए यह सोचा होगा कि उनकी अंतरात्मा में जो सत्य और न्याय का प्रकाश है, वह उसी अनकहे सत्य के प्रकाश का प्रतिबिम्ब है। उस सत्य के स्पर्श ने ही उनकी आत्मा को कांतिमान बना दिया है।

सौन्दर्य-बोध– इस काव्यांश में कवि यह भाव प्रकट कर रहा है कि हम अपने अंदर सत्य की उपस्थिति पर चाहे कितने भी संशयग्रस्त रहें, परंतु उसका प्रकाश हमारी अंतरात्मा को अवश्य की प्रतिभासित कर देता है। भाषा में गंभीरता, सजीवता एवं प्रवाहमयता है कवि ने विचारात्मक वैसी का प्रयोग किया है। ‘कभी-कभी’ में पुनरुक्तिप्रकाश उलंकार है। काव्यांश में दृष्टांत अलंकार है। मानवीकरण अलंकार का आकर्षक प्रयोग हुआ है।

एक कम के प्रश्न उत्तर | NCERT Solutions Class 12 Hindi Elective Chapter 5 Question Answer

प्रश्न 1. कवि ने लोगों के आत्मनिर्भर, मालामाल और गतिशील होने के लिए किन तरीकों की ओर संकेत किया है ? अपने शब्दों में लिखिए। 

उत्तर-

(i) कवि ने लोगों के आत्मनिर्भर, मालामाल और गतिशील होने के अनैतिक व अनुचित तरीकों की ओर संकेत किया है।

(ii) अनेक लोग सामर्थ्यवान बनने के लिए ईमानदारी का त्याग कर बेईमानी का सहारा लेते हैं।

(iii) वे इसके लिए बड़े से बड़ा झूठ बोलने से भी नहीं ह (iv) तरह-तरह की धोखाधड़ी करके लोग धन-सम्पत्ति अर्जित करने की कोशिश में लगे रहते हैं।

(v) वे किसी से भी विश्वासघात करने से बाज नहीं आते। 

(vi) इस तरह के लोग आपसी भाईचारा और समाज के प्रति अपने दायित्व को धनवान बनने के यत्न में लगे रहते हैं। 

प्रश्न 2. हाथ फैलाने वाले व्यक्ति को कवि ने ईमानदार क्यों कहा है ? स्पष्ट कीजिए भल

उत्तर-

(i) हाथ फैलाने वाले व्यक्ति को कवि ने ईमानदार इसलिए कहा है क्योंकि अपनी वास्तविक स्थिति को नहीं छिपाता ।

(ii) यदि वह लाचार, कंगाल या कोढ़ी होता है, तो उसे प्रत्यक्ष देखकर इसका पता जाता है। 

(ii) यदि वह शरीर से स्वस्थ होते हुए भी हाथ फैलाता है, तब इस बात का पता ह जाता है कि वह कामचोर और साधारण धोखेबाज है।

(iv) इस प्रकार अपनी वास्तविकता को प्रकट करना उसकी ईमानदारी को दर्शाता है।

प्रश्न 3. कवि ने स्वयं को लाचार, कामचोर, धोखेबाज क्यों कहा है ?

उत्तर—

(i) कवि द्वारा ऐसा कहने का कारण यह है कि हाथ फैलाने वाला या तो वास्तव में विवश होता है या वह धोखे से लोगों को मूर्ख बनाकर पैसा ऐंठना चाहता है। 

(ii) यदि वह वास्तव में मजबूर होता है, तो वह स्वयं को लाचार बताते हुए मदद माँगता है। 

(iii) यदि वह भला-चंगा होते हुए भी हाथ फैलाता है, तो वह मेहनत से जी चुराने वाला कामचोर और धोखेबाज होता है।

प्रश्न 4. ‘मैं तुम्हारा विरोधी, प्रतिद्वंद्वी या हिस्सेदार नहीं’ से कवि का क्या अभिप्राय है?

उत्तर-

(i) ‘मैं तुम्हारा विरोधी, प्रतिद्वंद्वी या हिस्सेदार नहीं’ से कवि का यह अभिप्राय है। कि समाज में हाशिए पर चला गया व्यक्ति विकास की दौड़ से बाहर हो गया है।

(ii) वह समाज के संपन्न वर्ग की दया पर आश्रित हो चुका है।

(iii) वह अत्यंत निर्धन है व सभी आकांक्षाओं से रहित हो चुका है।

(iv) वह पूर्णतया असमर्थ हो चुका है, इस कारण उन्नति के रास्ते पर चलने के योग्य नहीं रह गया है।

(v) इस वस्तुस्थिति को स्वीकार करते हुए ही वह स्वयं को ऐश्वर्य और सामर्थ्य की स्पर्धा में लगे हुए लोगों का विरोधी, प्रतिद्वंद्वी या हिस्सेदार नहीं मानता।

सत्य के प्रश्न उत्तर | NCERT Solutions Class 12 Hindi Elective Chapter 5 Question Answer

प्रश्न 1. सत्य क्या पुकारने से मिल सकता है ? युधिष्ठिर विदुर को क्यों पुकार रहे हैं ? महाभारत के प्रसंग से सत्य के अर्थ खोलें।

उत्तर-

(i) सत्य पुकारने से नहीं मिल सकता है। (ii) सत्य को पाने के लिए हमें दृढ़ संकल्प के साथ उसके पीछे दूर तक जाना पड़ता है। तब हमारी अंतरात्मा में उसका प्रकाश भरता है, जो जीवन भर हमारा मार्गदर्शन करता है।

(iii) युधिष्ठिर सत्य को जानने के लिए विदुर को पुकार रहे थे। विदुर भागे यते जा रहे थे। परंतु युधिष्ठिर के दृढ़ संकल्प को देखकर उन्हें रुकना पड़ा। उन्होंने एक बार अपलक नेत्रों से युथिष्ठिर की ओर देखा और उनके सत्य का प्रकाश युधिष्ठिर की अंतरात्मा में समा गया, जिसकी दमक से उनकी आत्मा दीप्त हो उठीं फिर भी उन्हें संशय बना रहा कि मेरे अंदर सत्य का प्रकाश भर गया अथवा नहीं।

(iv) महाभारत के इस प्रसंग से यह स्पष्ट हो जाता है कि दृढ़ संकल्प ही हमें सत्य का साक्षात्कार करा सकता है। यद्यपि आज के समय में सत्य का स्थिर रूप नहीं है, फिर भी उसका प्रकाश हमारे भीतर रहता है।

प्रश्न 2. सत्य का दिखना और ओझल होना से कवि का क्या तात्पर्य है ? 

उत्तर- 

(i) कवि कहता है कि सत्य कभी दिखता है और कभी ओझल हो जाता है। 

(ii) इस कथन से कवि का तात्पर्य यह है कि आज हम जिस समाज में जी रहे हैं सत्य की पहचान और पकड़ मुश्किल होती जा रही है। 

(iii) आज सत्य का कोई एक स्थिर रूप, आकार या पहचान नहीं है, जो उसे स्थायी उसने सके। इसी कारण कभी हमें सत्य प्रत्यक्ष दिखाई दे जाता है, तो कभी हमें उसके प्रति संशय उत्पन्न हो जाता है।

प्रश्न 3. सत्य और संकल्प के अंतर्संबंध पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।

उत्तर- 

(i) सत्य सरलता से नहीं प्राप्तं होता, वह पुकारने पर भी नहीं मिलता। 

(ii) सत्य को प्राप्त करने के लिए दृढ़ संकल्प की आवश्यकता होती है। 

(iii) सत्य के प्रति निष्ठा रखना और उस पर अडिग रहना अत्यंत कठिन होता है। 

(iv) मनुष्य का व्यक्तिगत स्वार्थ उसे सत्य के मार्ग से विचलित कर सकता है। 

(v) जो व्यक्ति सत्य पर अडिग रहने का दृढ़ संकल्प करता है, वह किसी भी परिस्थिति में सत्य को नहीं छोड़ता। 

(vi) सत्य का रूप वस्तु, स्थिति और घटनाओं, पात्रों के अनुसार बदलता रहता है। ऐसी स्थिति में संकल्प के द्वारा ही व्यक्ति सत्य की सही पहचान कर सकता है। 

(vii) इस प्रकार सत्य की प्राप्ति संकल्प की दृढ़ता पर ही आश्रित है।

प्रश्न 4. ‘युधिष्ठिर जैसा संकल्प’ से, क्या अभिप्राय है ?

उत्तर-

(i) ‘युधिष्ठिर जैसा संकल्प’ से अभिप्राय है, दृढ़ संकर करना।

(ii) युधिष्ठिर ने सत्य, धर्म और नीति पर चलने का दृढ़ संक प ले रखा था। इसीलिए वे किसी भी परिस्थिति में सत्य और धर्म के पथ से विचलित नहीं हु ।

(iii) जय और पराजय की चिंता किए बिना उन्होंने अपने पूरे जीवन में सत्य का पालन किया, यह उनके दृढ़ संकल्प के कारण ही संभव हो सका।

(iv) अतः मनुष्य यदि युधिष्ठिर के समान दृढ़ संकल्प कर ले, तो अपने सच्चे उद्देश्य को अवश्य प्राप्त कर लेगा। 

प्रश्न 5. सत्य की पहचान हम कैसे करें ? कविता के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए। 

‘उत्तर- 

(i) कविता ‘सत्य’ में यह भाव प्रकट किया गया है कि वर्तमान समय में सत्य की पहचान अत्यंत मुश्किल हो गई है। 

(ii) आज सत्य का कोई स्थिर रूप, आकार या पहचान नहीं है, जो उसे स्थायी बना सके।

(iii) बदलते हालात और मानवीय संबंधों में हो रहे परिवर्तन सत्य की पहचान में बाधक बन रहे हैं। 

(iv) ऐसे में सत्य की पहचान के लिए कविता में यह संकेत किया गया है कि किसी समय जिस बात, घटना या विचार पर हमारी आत्मा विशेष आभा लिए दमक उठे, उस समय हमे समझना चाहिए कि सत्य ने हमारा स्पर्श कर लिया है।

(v) इस प्रकार कविता में यह विचार प्रकट किया गया है कि हमारी अंतरात्मा ही सत्य को पहचानने में हमारी सहायता करती है। 

प्रश्न 6: कविता में बार-बार प्रयुक्त ‘हम’ कौन है और उसकी चिंता क्या है ? 

उत्तर—

(i) कविता में बार-बार प्रयुक्त ‘हम’ आज का मनुष्य है, जो सत्य की तलाश में जुटा हुआ है। 

(ii) उसकी चिंता यह है कि आज के बदलते हालात में जब सत्य का स्वरूप भी पल-पल परिवर्तित हो रहा है, तब सत्य की पहचान कैसे की जाए? सत्य को कैसे अपने अन्तर में धारण किया जाए ?

(iii) आज के परिवेश में सत्य का रूप वस्तु स्थिति और घटनाओं, पात्रों के अनुसार रहता है।  

प्रश्न 7. सत्य की राह पर चल। अगर अपना भला चाहता है तो सच्चाई को पकड़ । मनुष्य की चिंता है। के प्रकाश में कविता का मर्म खोलिए। 

उत्तर-

(i) ‘सत्य’ कविता हमें सच्चाई की राह पर चलने की प्रेरणा देती है।

(i) कविता में सत्य की सलाना में लगे मनुष्य की कठिनाइयों को ही युधिष्टिर और विदुर केवृष्यंत के माध्यम से प्रकट करने का प्रयास किया गया है। 

(ii) इसमें यह दर्शाया गया है कि युधिष्ठिर सत्य की तलाश में विदुर से गुहार लगाते हैं और दिदुर के सत्य का प्रकाश युधिष्ठिर के अंदर प्रवेश कर जाता है। उसी सत्य के बल पर मुष्ठिर के माथे पर विजय का मुकुट भी सुशोभित होता है। 

(iv) इस प्रकार कविता हमें यह संदेश देती है कि दृढ़ संकल्प करके यदि मनुष्य सत्य की यह पर चले तो उसका भला अवश्य होगा।

(v) अतः यह कविता सत्य की राह पर चलने की उपादेयता को प्रमाणित करती है। साथ ही यह भी संदेश देती है कि यदि मनुष्य अपना भला चाहता है तो उसे सच्चाई को पकड़े रहना चाहिए। 



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FAQs

प्रश्न 1. आजादी के बाद हमने क्या खोया और क्या पाया? 

उत्तर- आजादी के बाद भारत और भारतीयों का सांस्कृतिक चरित्र में उल्लेखनीय बदलाव आया। हमने पाया – झूठ बोलने की लत, ठगी, धोखाधड़ी, व्यभिचार, बेईमानी, भ्रम, भूख, गरीबी, लसंख्या, प्रदूषण। हमने खोया — ईमानदारी, दयावान, सत्य, ईमान, सहयोग ।

प्रश्न 2. कवि के आगे जब कोई हाथ फैलाता है, तब उसके मन में किस प्रकार का भाव आता है ? कवि के ऐसा सोचने का निहितार्थ क्या है ? ‘एक कम’ कविता के आधार पर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर— 
(i) जब कवि के आगे हाथ फैलाकर कोई उससे पच्चीस पैसे, एक चाय या दो रोटी मांगता है, तब कवि के मन में यह भाव आता है कि उसके सामने जो आदमी, औरत या बच्चा हा है, यह ईमानदार है। 
(ii) इस प्रकार कवि यह भाव प्रकट करता है कि वर्तमान समय में जो व्यक्ति ईमानदार होगा, उसके समक्ष आर्थिक संकट बना ही रहेगा। यही कवि के सोचने का निहितार्थ है।

प्रश्न 3. सत्य को पुकारने से कवि का क्या तात्पर्य है ? पुकारने पर सत्य दूर क्यों चला जाता है ? ‘सत्य’ कविता के आधार पर स्पष्ट कीजिए। 

उत्तर— (i) सत्य को पुकारने से कवि का तात्पर्य है अपने अंदर सत्य को धारण करने के लिए उसकी तलाश करना। जाता है। इसका आशय यह है कि ढूंढने पर सत्य हमारी पकड़ से बाहर हो जाता है। 
(ii) कवि का यह मानना है कि जब हम सत्य को पुकारते हैं तब वह हमसे दूर हटता चला पीछे कितनी दूर तक भटक सकते हैं, अर्थात् सत्य हमारे संकल्प की दृढ़ता की परीक्षा लेता है। 

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