NCERT Solutions Class 12 Hindi Elective Chapter 6 Question Answer | अध्याय 6 रघुवीर सहाय

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मैं खुद 12वीं का टॉपर रहा हूं और मुझे पता है कि 12वीं की परीक्षा में किस तरह के प्रश्न पूछे जाते हैं। वर्तमान में, मैं एक शिक्षक की भूमिका भी निभा रहा हूँ, और अपने छात्रों को कक्षा 12वीं की महत्वपूर्ण जानकारी और विषयों का अभ्यास भी कराता हूँ। मैंने यह लेख 5 वर्षों से अधिक के अपने अनुभव के साथ लिखा है। इस पोस्ट की मदद से आप परीक्षा में इस अध्याय से भूगोल में बहुत अच्छे अंक प्राप्त कर सकेंगे।

NCERT Solutions Class 12 Hindi Elective Chapter 6 Question Answer | अध्याय 6 रघुवीर सहाय

कक्षा | Class12th 
अध्याय | Chapter06
अध्याय का नाम | Chapter Name(क) वसंत आया
(ख) तोड़ो
कवि का नाम | Poet Nameविष्णु खरे
किताब | Bookअंतरा ऐच्छिक | Hindi Elective
खंड | Sectionकाव्य खंड | Poetry Section
बोर्ड | Boardसभी हिंदी बोर्ड
किताब | Book एनसीईआरटी | NCERT
विषय | Subjectहिंदी | HINDI
अध्ययन सामग्री | Study Materialsप्रश्न उत्तर | Question answer

रघुवीर सहाय का जीवन परिचय 12th | Biography of Raghuveer Sahai

उत्तर- रघुवीर सहाय का जन्म 9 दिसम्बर, 1929 ई. को लखनऊ में हुआ। लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एम.ए. किया। तत्पश्चात् उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में पदार्पण किया कुछ समय तक वे ‘प्रतीक’ मासिक के सहायक सम्पादक रहे। उसके बाद अपने आकाशवाणी के हिंदी समाचार विभाग में कार्य किया। एक वर्ष तक हैदराबाद से प्रकाशित ‘कल्पना’ सम्पादन किया। उसके बाद अपने ‘दिनमान’ का सम्पादन किया।

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Image credit ; SOCIAL MEDIA

रघुवीर सहाय नई कविता के कवि है। उनकी कुछ कविताएँ ‘अज्ञेय’ द्वारा संपादित दूसरा ‘सप्तत में संकलित है। कविता के अलावा उन्होंने रचनात्मक और विवेचनात्मक गद्य भी लिखा है। उनके काव्य संसार में आत्मपरक अनुभवों की जगह जनजीवन के अनुभवों की रचनात्मक अभिव्यक्ति अधि है। वे व्यापक सामाजिक संदर्भों के निरीक्षण, अनुभव और बोध को कविता में व्यक्त करते है

सन् 1990 ई. में उनका निधन हो गया। रघुवीर सहाय ने काव्य-रचना में पत्रकार की दृष्टि का सर्जनात्मक उपयोग किया है। वे मानते कि अखबार की खबर के भीतर दबी और छिपाई हुई ऐसी अनेक खबरें होती हैं, जिनमें मानवी पीड़ा छिपी रह जाती है। उस छिपी हुई मानवीय पीड़ा की अभिव्यक्ति करना कविता क दायित्व है।

इस काव्य दृष्टि के अनुरूप ही उन्होंने नई काव्य-भाषा का विकास किया है। उनकी काव्य भाषा सही, दो-टूक और विवरण-प्रधान है। वे अनावश्यक शब्दों के प्रयोग से प्रयासपूर्वक वचते हैं। भयाक्रांत अनुभव की आवेगरहित अभिव्यक्ति उनकी कविता की प्रमुख विशेषता है

रघुवीर सहाय ने मुक्त छंद के साथ-साथ छंद में भी काव्य-रचना की है। जीवनानुभवों क अभिव्यक्ति के लिए वे कविता की संरचना में कथा या वृत्तांत का उपयोग करते हैं।

उनकी मुख्य कृतियाँ हैं—सीढ़ियों पर धूप में, आत्महत्या के विरुद्ध, हँसो हँसो जल्दी हँसो और लोग भूल गए हैं। छह खंडों में रघुवीर सहाय रचनावली प्रकाशित हुई है, जिसमें उनकी लगभग सभी रचनाएँ संगृहित हैं। ‘लोग भूल गए हैं’ काव्य संग्रह पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था।

पहली कविता ‘हँसो हँसो जल्दी हँसो’ में कवि पाठक को संबोधित करते हुए, उसे विभिन्न अनुकूल तथा प्रतिकूल स्थितियों में हँसने की सलाह देता है। हँसी मनुष्य को मुक्त करती है। यद्यपि हंसी एक निर्मल भाव है, परंतु आज के समय में उसमें धूर्तता, कायरता और निर्ममत आदि का समावेश हो गया है। लोग चाटुकारिता के लिए भी हँसी का प्रयोग करते हैं। इन बातें की ओर संकेत के कारण इस कविता में तीखा व्यंग्य व्यक्त हुआ है।

दूसरी कविता ‘रामदास’ रघुवीर सहाय की अत्यंत प्रसिद्ध लोकप्रिय कविताओं में से एक है। इसमें भीड़ और शहर में व्यक्ति के एकाकीपन और उसकी असहाय दशा को व्यक्त किए गया है। आम आदमी की असहायता और हत्यारों की निश्चिंतता की अभिव्यक्ति करते हुए, कवि समाज में फैले आतंक को मूर्तरूप में चित्रित किया है। कविता की लयात्मकता उस आतंक को और अधिक प्रगाढ़ बनाती है।

अलंकार-रघुवीर सहाय ने अपने काव्य में अलंकारों का पर्याप्त प्रयोग किया है । जैसे- 

अनुप्रास—पियराए पत्ते’, ‘मदन महीना’, ‘रंग-रस’, ‘मन के मैदानों में’, ‘हुई हवा”

उपमा-‘फिरकी-सी आई । आदि।

पुनरुक्ति प्रकाश ‘चलते चलते चलते’, ‘तोड़ो तोड़ो तोड़ो’, ‘बड़े-बड़े’, ‘दहर-दहर’ आदि।

बिंब-योजना रघुवीर सहाय ने बिंबों की आकर्षक रचना की है। प्रतीकात्मकता उनकी कविताओं में प्रतीकों का सुंदर प्रयोग हुआ है। जैसे—’पत्थर’ और बहन को उन्होंने बाधक तत्त्वों के प्रतीक के रूप में चित्रित किया है।”

वसंत आया कविता का सारांश | Summary Of The Poem vasant aaya

प्रकृति के प्रभाव से बेखबर मानव आज आधुनिक जीवन शैली अपनाने में इतना तल्लीन होता जा रहा है कि उसे ऋतु परिवर्तन की जानकारी कैलेण्डर देखकर, छुट्टी पाकर, पत्र-पत्रिका पड़कर मिलती है। यही कारण है कि ‘वसंत आया’ कविता में कवि ने प्रकट किया है कि आज का प्रकृति से रिश्ता टूट गया है। 

NCERT Solutions Class 12 Hindi Elective Chapter 6

वसंत ऋतु का आना अब अनुभव करने के बजाय कैलेंडर से जाना जाता है। ऋतुओं में परिवर्तन पहले की तरह ही स्वभावतः घटित होते रहते हैं। पते झड़ते हैं, कोपलें फूटती हैं, हवा बहती है, ढाक के जंगल दहकते हैं, कोयल और भ्रमर अपनी मस्ती में झूमते हैं, पर हमारी निगाह उन पर नहीं जाती। हम निरपेक्ष बने रहते है। वास्तव में कवि ने आज के मनुष्य की आधुनिक जीवन शैली पर व्यंग्य किया है।

इस कविता की भाषा में जीवन की विडंबना छिपी हुई है। प्रकृति से अंतरंगता को व्यक्त करने के लिए कवि ने देशज (तद्भव शब्दों और क्रियाओं का भरपूर प्रयाग किया है। 

अशोक, मदनमहीना, पंचमी, नंदनवन, जैसा परंपरा में रचे-बसे जीवनानुभवों की भाषा ने इस कविता आधुनिकता के सामने एक चुनौती की तरह खड़ा कर दिया है। कविता में बिंबों और प्रतीकों का भी प्रयोग हुआ है।

तोड़ो कविता का सारांश | Summary Of The Poem todo

तोड़ो उदबोधनपरक कविता प्रतीत होती है। इसमें कवि सृजन हेतु भूमि को तैयार करने के लिए चट्टानें, ऊसर और बंजर को तोड़ने का आह्वान करता है। परती को खेत में बदलना सृजन की आरंभिक परंतु अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है। 

यहाँ कवि विध्वंस के लिए नहीं उकसाता, वरन् सृजन के लिए प्रेरित करता है। कविता का ऊपरी ढाँचा सरल प्रतीत होता है, परंतु प्रकृति से मन की तुलना करते हुए कवि ने इसको नया आयाम दे दिया है। यह बंजर प्रकृति में है, तो मानव-मन में भी है। 

कवि मन में व्याप्त ऊब तथा खीज को भी तोड़ने की बात करता है अर्थात् उसे भी उर्वर बनाने की बात करता है। मन के भीतर की ऊब सृजन में बाधक है। कवि वह आकांक्षी है, इसलिए उसको भी दूर करने की बात करता है। इसलिए कवि मन के बारे में प्रश्न उठाकर आगे बढ़ जाता है। इससे कविता का अर्थ विस्तार होता है। 

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वसंत आया सप्रसंग व्याख्या एवं शब्दार्थ | वसंत आया सप्रसंग व्याख्या NCERT

1.जैसे बहन ‘दा’ कहती है

ऐसे किसी बंगले के किसी तरु (अशोक ?) पर कोई चिड़या कुलकी चलती सड़क के किनारे लाल बजरी पर चुरमुराए पाँव तले ऊँचे तरुवर से गिरे

बड़े-बड़े पियराए पत्ते

कोई छह बजे सुबह जैसे गरम पानी से नहाई हो-

खिली हुई हवा आई, फिरकी-सी आई, चली गई। ऐसे, फुटपाथ पर चलते चलते चलते । 

कल मैंने जाना कि वसंत आया।

शब्दार्थ तरु-वृक्ष, पेड़। कुळकना-चिड़िया की स्वाभाविक आवाज कुहुकना का तद्भव रूप चुरमुराए चरमराने की आवाज तरुवर-छायादार वृक्ष। फिरकी- लकड़ी का लि जो जमीन पर गोल-गोल घूमता है। 

प्रसंग प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘अंतरा’ (भाग-2) में संकलित कविता ‘वसंत आया’ से उद्धृत है। इसके रचयिता प्रसिद्ध कवि रघुवीर सहाय हैं। इस काव्यांश में कवि ने वसंत के आगमन पर प्रकृति में आए आकर्षक परिवर्तन का भावपूर्ण चित्रण किया है। यहाँ पत्तों के झड़ने, हवा के मस्ती में झूमने और चिड़ियों के चहचहाने का सुंदर वर्णन हुआ है।

व्याख्या कवि कहता है कि जिस प्रकार बहन अपने भाई को स्नेह भरे स्वर में ‘दा’ कहकर पुकारती है, वैसी ही मिठास भरी आवाज में कोई चिड़िया किसी बंगले के किसी वृक्ष, शायद अशोक पर बैठी हुई कुहुकने लगी। चहल-पहल भी सड़क के किनारे बिछी लाल बजरी पर ऊँ अपने पेड़ों से गिरे हुए बड़े-बड़े पीले पत्ते चरमर की ध्वनि करते पाँव के नीचे आ गए। 

सुबह के लगभग छह बजे गरम पानी से नहाकर आई हुई-सी खिली-खिली हवा गोल-गोल घूमने वाली फिरको जैसे आई और चली गई। इस तरह सड़क के फुटपाथ पर चलते-चलते ही कल मैंने जाना कि वसंत आ गया है। भाव यह है कि प्रकृति में परिवर्तन स्वाभाविक रूप से ही हो रहा है। 

वसंत ऋतु के आने पर चिड़ियों का चहचहाना, पेड़ों से सूखे पत्तों को झड़ना और नई कोंपलों का आना, सुबह-सुबह शरीर में स्फूर्ति भरती ताजी हवा का मस्ती में बहना, सब कुछ पहले जैसा ही हो रहा है, परंतु

शहरी संस्कृति में हमारा प्रकृति से रिश्ता टूट सा गया है। हम प्रकृति से निरपेक्ष बने रहते हैं, इसीलिए हम अपने भीतर वसंत का उल्लास नहीं महसूस करते। बस, राह चलते उसका जाना भर जान लेते हैं।

सौन्दर्य-बोध-इन पंक्तियों में मनुष्य के प्रकृति से विमुख होने के साथ ही उसकी आधुनिक जीवन-शैली पर भी करारा व्यंग्य किया गया है। भाषा में सरलता, सरसता एवं प्रवाहमयता है।

‘बड़े-बड़े’ और ‘चलते चलते चलते’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है। ‘पियराए पत्ते’ और ‘हुई ‘हवा’ में अनुप्रास अलंकार है। ‘जैसे गरम पानी से नहाई हो’ में उत्प्रेक्षा अलंकार है। ‘फिरकी-सी आई’ में उपमा अलंकार है। कविता की रचना मुक्त छंद में हुई है। कवि ने आकर्षक बिंब का सृजन किया है। चित्रात्मकता का गुण दर्शनीय है।

2.और यह कैलेंडर से मालूम था

अमुक दिन अमुक बार मदनमहीने की होवेगी पंचमी दफ्तर में छुट्टी थी यह था प्रमाण

और कविताएँ पढ़ते रहने से यह पता था कि दहर दहर दहकेंगे कहीं डाक के जंगल

आम बौर आयेंगे

रंग-रस-गंध से लदे-फँदे दूर के विदेश के वे नंदनवन होवेंगे यशस्वी मधुमस्त पिक भौर आदि अपना-अपना कृतित्व

अभ्यास करके दिखायेंगे यही नहीं जाना था कि आज के नगण्य दिन जानूँगा

जैसे मैंने जाना, कि वसंत आया ।

शब्दार्थ : मदनमहीने— कामदेव का महीना (वसंत) । दहर दहर—थक पथक कर । दहकना लपट के साथ जलना। ढाक पलाश। लदे फंभार से आक्रांत नंदन वन- मी वन (इंद्र का उद्यान) । मधुमस्त – पुष्पों का रस र्प कर मस्त । पिक – कोयल । कृतित्व- अर्प। नगण्य जो गिनती योग्य न हो, तुच्छ ।

प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य पुस्तक ‘अंतरा’ (भाग 2) में संकलित कविता ‘वसंत से ली गई हैं। इसके रचयिता प्रसिद्ध कवि रघुवीर सहाय हैं।

इन पंक्तियों में कवि ने यह भाव प्रकट किया है कि अब वसंत ऋतु के आना अनुभव है द्वारा नहीं बल्कि कैलेंडर से जाना जाता है। मनुष्य आधुनिक नगरीय सम्पता में रचा-बसा इतना निरपेक्ष हो गया है कि प्रकृति में आया परिवर्तन, वसंत का स्वाभाविक उल्लास उसके अंतर्मन को प्रभावित ही नहीं कर पाता। ये बातें उसके लिए किताबी ज्ञान होकर रह गई हैं। 

व्याख्या— कवि कहता है मुझे कैलेंडर से इस बात की जानकारी हुई थी कि अमुक दिन अमुक वार को कामदेव के महीने अर्थात् वसंत की पंचमी तिथि होगी। इस बात का प्रमाण यह कि उस दिन हमारे ऑफिस में छुट्टी थी। तात्पर्य यह है कि आधुनिक जीवन शैली में वसंत कसे केवल सूचना मिल पाती है, उसका वास्तविक अनुभव नहीं हो पाता।

कवि आगे कहता है कि कविताएँ पढ़ते रहने से मुझे यह पता था कि वसंत के आने पर कहीं पलाश के जंगल धधक धधक कर जल उठेंगे, अर्थात् वन-प्रदेश पलाश के लाल-लाल फूलों के सौन्दर्य से दमकने लगेगा। आम के पेड़ मंजरियों से भर जाएँगे। दूर देश के आनंददायी बन आकर्षक रंगों, फूलों-फलों के रस और गंध के भार से लदे हुए अत्यंत शोमा पाते हुए यश को प्राप्त करेंगे अर्थात् दूर-दूर तक प्रसिद्ध हो जाएँगे। फूलों का रस पीकर मस्त हुई कोयल और मोरे आदि अपने-अपने कार्यों का अभ्यास करके दिखाएँगे अर्थात् कोयल और भरि तथा दूसरे पक्षी भी अपने मदमाते स्वर में अपने-अपने मधुर गीत गाएँगे।

कवि कहता है कि वसंत के बारे में ये सारी बातें में कैलेंडर और किताबों से जानता था। परंतु बस, यही बात में नहीं जानता था कि आज के तुच्छ दिन वसंत का आगमन इस प्रकार से भी जानूँगा, जिस तरह से आज मैंने जाना। आर्थात् मुझे वसंत के आगमन पर होने वाले | प्राकृतिक परिवर्तन और उसकी उमंग का पुस्तकीय ज्ञान तो था, परंतु आज पहली बार मैंने वसंत के आगमन को हृदय से अनुभूत किया। तात्पर्य यह है कि पुस्तकीय ज्ञान के बजाय प्रकृति के साहचर्य की अनुभूति ही हमें जीवन का वास्तविक आनंद दे सकती है।

सौन्दर्य-बोध इन पंक्तियों में कवि ने आधुनिक जीवन शेती की कृत्रिमताको प्रकट करते हुए कहा है कि प्रकृति से संबंध जोड़े बिना हम जीवन रस की वास्तविक अनुभूति नहीं कर सकते। यहाँ सरस, प्रवाहपूर्ण और जीवनानुभवों से रची-बसी भाषा का प्रयोग हुआ है। 

मदन- महीना, जंगल का दहकना, मधुमस्त पिक भीरे आदि का चित्रण कर कवि ने भाषा में विशेष नाकर्षण उत्पन्न कर दिया है। यहाँ अत्यंत आकर्षक व भावपूर्ण बिंबों की रचना हुई है। ‘दहर-दहर दहकेंगे’, ‘रंग-रस’ में अनुप्रास अलंकार है। ‘अपना-अपना’ में पुनरुक्ति प्रकाश नकार है। वर्णन में चित्रात्मकता है। बिंबों का सुंदर प्रयोग हुआ है ‘होगी’, ‘गे’ ‘दिखावेंगे’ ‘दहर-दहर दहकेंगे’, ‘लदे-फँदे’ आदि देशज शब्दों के प्रयोग से प्रकृति से साथ अंतरंगता महसूस होती है।

तोड़ो सप्रसंग व्याख्या एवं शब्दार्थ | तोड़ो सप्रसंग व्याख्या NCERT

1. तोड़ो तोड़ो तोड़ो 

ये पत्थर ये चट्टानें 

ये झूठे बंधन टूटें तो परती को हम जायें.

सुनते हैं मिट्टी में रस है जिससे उगती दूध है। 

अपने मन के मैदानों पर व्यापी कैसी कब है

आधे आधे गाने

शब्दार्थ : व्यापी – फैली हुई, व्याप्त ऊब अरुचि, नीरसता, व्याकुलता ।

प्रसंग-स्तुत कार्व्याश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘अंतरा’ (भाग-2) में संकलित कविता ‘तो’ से उद्धृत है। इसके रचयिता प्रसिद्ध कवि रघुवीर सहाय हैं। इन पंक्तियों में कवि ने मानव मन की तुलना धरती से करते हुए कहा है कि जिस तरह पत्थर की चट्टानों को तोड़कर हटाने से ही रस से परिपूर्ण धरती मिलती है, उसी तरह मन में व्याप्त जय आदि झूठे बंधनों को तोड़ने पर ही सृजनात्मक भाव उत्पन्न हो सकता है। 

व्याख्या -कवि कहता है कि इन पत्थरों को इन चट्टानों को तोड़ डालो। ये झूठे बंधन टूट जाएँ, ताकि हम धरती को जान सके। हम सुनते हैं कि मिट्टी में रस है, जिससे दूब उगती है। हमारे मन रूपी मैदानों पर कैसी ऊब अर्थात् अठधि व्याप्त हो गई है। इस पर आये आये गानो

काही सृजन हो सका है। भाव यह है कि जिस तरह उपजाऊ धरती पर पत्थर की चट्टानें आ जाने से उसके अंदर रस भरा होने पर भी वह सृजन करने अर्थात् पेड़-पौधों को उत्पन्न करने में असमर्थ हो जाती है, उसी प्रकार मन के भीतर की जब भी सृजन में बाधक बन जाती है। 

यदि उस दशा में सृजन का प्रयास भी किया जाए, तो वह आधा-अधूरा ही हो पाता है। व्यक्ति के मन की उर्वर भावनाओं का रस प्राप्त होने पर ही एक संपूर्ण व प्रभावशाली रचना का सृजन किया जा सकता है।

सौन्दर्य-बोध– इन पंक्तियों में ‘परती’ और ‘चट्टानों’ के प्रतीक के माध्यम से मनुष्य को सृजनात्मक क्षमता की बाधाओं को दूर करने की प्रेरणा दी गई है। भाषा में सरलता, सजीवता व प्रवाहमयता है। ‘तोड़ो तोड़ो तोड़ो’ और ‘आधे-आये में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है। ‘मन के मैदानों में अनुप्रास अलंकार की छटा है। ‘पत्थर’, ‘चट्टानों’ और ‘धरती’ का प्रतीकात्मक चित्रण दर्शनीय है। मन को ऊब से व्याप्त मैदान के रूप में चित्रित का सुंदर बिंद का सृजन किया गया है।

2.तोड़ो तोड़ो तोड़ो ये ऊसर बंजर तोड़ो

ये चरती परती तोड़ो सब खेत बनाकर छोड़ो

मिट्टी में रस होगा ही जब वह पोसेगी बीज को हम इसको क्या कर डालें इस अपने मन की खीज को ?

गोड़ो गोड़ो गोड़ो 

शब्दार्थ : ऊसर-बंजर—अनुपजाऊ जमीन। चरती परती—पशुओं के लिए चरागाह आदि के लिए छोड़ी गई जमीन । 

प्रसंग—प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘अंतरा’ (भाग-2) में संकलित कविता ‘तोड़ो से उद्धृत है। इके रचयिता प्रसिद्ध कवि रघुवीर सहाय हैं। इसमें कवि ने यह भाव प्रकट किया है कि जिस प्रकार ऊसर, बंजर भूमि को खेत में बदलना ही सृजन की आरंभिक क्रिया है, उसी प्रकार अपने मन से खीज को निकालकर ही सृजन की भाव-भूमि तैयार की जा सकती है।

व्याख्या— कवि कहता है कि इस ऊसर-बंजर को तोड़ डालो, अर्थात् अनुपजाऊ जमीन की ऊपरी सतह को तोड़ दो। इस घरागाह और खाली छोड़ी गई भूमि को भी तोड़ दो। इन सबसे खेत बनाकर ही छोड़ो। तात्पर्य यह है कि अनुपजाऊ और खाली पड़ी सारी भूमि को खोदकर खेत बनाकर ही दम लो। मिट्टी के अंदर तो रस होता ही है, उससे वह बीज का पोषण करेगी।

कवि आगे कहता है कि हम अपने मन की खीज का क्या करें। अर्थात् धरती को कैसे संभव है ? इसीलिए कवि कहता है कि मन की खीज की भी गुड़ाई कर दो। जिस कार मिट्टी को खोदकर भुरभुरी बना देने से वह उर्वरा बन जाती है, उसी प्रकार मन से कृजन मुझलाहट को जड़ से खोदकर निकाल देने से वह भी उर्वर हो जाएगा और सृजन कार्य करने सक्षम हो जाएगा।

सौन्दर्यबोध इन पंक्तियों में कवि ने मन से खीज को निकालकर उसे सृजनशील बनने ही प्रेरणा दी है। भाषा में सरलता, सजीवता एवं प्रवाहमयता है। ‘तोड़ो तोड़ो तोड़ो’ और गोड़ो बेड़ो गोड़ो’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है। ‘ऊसर बंजर’ और ‘चरती परती’ में पद-मैत्री है। क्या कर’ में अनुप्रास अलंकार की छटा है। काव्यांश में ध्वन्यात्मकता है।

वसंत आया के प्रश्न उत्तर | NCERT Solutions Class 12 Hindi Elective Chapter 6 Question Answer

प्रश्न 1. वसंत आगमन की सूचना कवि को कैसे मिली ? 

उत्तर- 

(i) कवि जब सुबह के छह बजे सड़क के फुटपाथ पर चला जा रहा है, तब उसने प्रकृति में कुछ परिवर्तन महसूस किया। 

(ii) उसे किसी बँगले के अशोक के पेड़ पर बैठी चिड़िया के कुहुकने का मीठा स्वर सुनाई पड़ा।

(iii) सड़क के किनारे खड़े घने वृक्षों से गिरे हुए पीले-पीले सूखे पत्ते उसके पाँव के नीचे दबकर ‘चरमर’ की आवाज करने लगे। 

(iv) गरमाहट ली हुई ताजी हवा फिरकी-सी नाचती हुई आई और चली गई। 

(v) इस तरह फुटपाथ पर चलते-चलते ही इन परिवर्तनों पर ध्यान देने से कवि को यह सूचना मिल गई कि वसंत का आगमन हो गया है। 

प्रश्न 2. ‘कोई छह बजे सुबह फिरकी सी आई, चली गई’-पंक्ति में निहित भाव स्पष्ट कीजिए । 

उत्तर— (i) सुबह के लगभग छह बजे कवि सड़क के फुटपाथ पर जा रहा था।

(ii) उस समय गरमाहट ली हुई ताजी हवा ऐसी लग रही थी, जैसे वह गरम पानी से नहाकर आई हो।

(iii) हवा मस्ती में फिरकी की तरह नाचती हुई आई और चली गई। तब कवि को इस दात का अहसास हुआ कि वसंत आ गया है। 

प्रश्न 3. वसंत पंचमी के अमुक दिन होने का प्रमाण कवि ने क्या बताया और क्यों ?

उत्तर- (i) वसंत पंचमी के अमुक दिन होने का प्रमाण कवि ने यह बताया कि उस दिन उसके दफ्तर में छुट्टी थी । 

(ii) उसके ऐसा बताने का कारण यह है कि आधुनिक जीवन शैली ने मनुष्य को आत्मपरक बना दिया है।

(iii) उसकी दुनिया घर से दफ्तर और दफ्तर से घर तक में सिमट कर रह गई है।

(iv) प्रकृति से उसका रिश्ता टूट गया है। अतः प्रकृति में आए परिवर्तनों से वह अनजान रहता है। 

(v) इसी कारण कवि ने अपने दफ्तर में होने वाली छुट्टी से ही वसंत पंचमी की प्रामाणिकता आम बौर आयेंगे’ में नि व्यंग्य को सिद्ध किया। 

प्रश्न 4. ‘और कविताएँ पढ़ते रहने से पर पलाश के वन धथक-धथक कर जल उठेंगे और आम के पेड़ मंजरियों से लद जाएंगे। 

उत्तर- 

(i) कवि ने कहा है कि कविताएँ पड़ते रहने से उसे यह पता था कि के स्पष्ट कीजिए ।

(ii) इस कथन के माध्यम से कवि ने यह व्यंग्य किया है कि आज के मनुष्य का का प्रत्यक्ष अनुभव नहीं है। उसने तो सिर्फ कविताओं में ही पड़ा है कि वसंत ऋतु मे के लाल-लाल फूल खिल उठते हैं, आम पर बौर आ जाते हैं। 

(iii) आज का मनुष्य प्रकृति से दूर होकर आडंबरपूर्ण जीवन व्यतीत कर रहा है। उसने प्राकृतिक परिवर्तनों के बारे में केवल सुना पड़ा है, उन्हें अनुभूत नहीं किया है।

प्रश्न 5. अलंकार बताइए- (क) बड़े-बड़े पियराए पत्ते

(ख) कोई छह बजे सुबह जैसे गरम पानी से नहाई हो. (ग) खिली हुई हवा आई, फिरकी-सी आई, चली गई कि दहर दहर दहकेंगे कहीं डाक के जंगल

उत्तर- 

(क) अनुप्रास अलंकार एवं पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार ।

(ख) उत्प्रेक्षा अलंकार। 

(ग) उपमा अलंकार एवं अनुप्रास अलंकार ।

(घ) अनुप्रास अलंकार एवं पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार।

प्रश्न 6. किन पंक्तियों से ज्ञात होता है कि आज मनुष्य प्रकृति के नैसिर्गिक सौन्दर्य की अनुभूति से वंचित है ?

उत्तर— (i) यह नहीं जाना था कि आज के नगण्य दिन जानूँगा, जैसे मैंने जाना, कि वसंत आया। 

प्रश्न 7. प्रकृति मनुष्य की सहचरी है। इस विषय पर विचार व्यक्त करते हुए आज के संदर्भ में इस कथन की वास्तविकता पर प्रकाश डालिए।

उत्तर- प्रकृति मनुष्य की सहचरी है- 

(i) प्रकृति संसार में जीवन का मूल आधार है।

(ii) मनुष्य का अस्तित्व प्रकृति पर निर्भर है, तो प्रकृति का स्वरूप मनुष्य पर ।

(iii) प्राचीन काल से ही प्रकृति की पूजा करने की परंपरा रही है। इसका कारण यह रहा है कि मनुष्य आदि काल में ही प्रकृति की महत्ता को समझ चुका था।

(iv) प्रकृति द्वारा मानव को जीवन प्रदान करने के कारण ही उसे मनुष्य की सहचरी माना गया है।

(v) आज के संदर्भ में यह कथन और भी अधिक प्रासंगिक हो गया है। 

(vi) आधुनिक मानव प्राकृतिक संसाधनों का अधिकाधिक दोहन कर अपनी सुख-सुविधाओं को बढ़ाने में लगा हुआ है। मानव जीवन के विकास क्रम में प्रकृति के दुरुपयोग ने विनाशकारी स्थिति पैदा कर दी है।

(vii) वन, जल, भूमि आदि के दोहन तथा औद्योगिकीकरण के कारण उत्पन्न प्रदूषण से मानव अस्तित्व के लिए खतरा उत्पन्न हो गया है। 

(viii) अतः अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए मनुष्य को प्रकृति का स्वरूप भी बचाए ‘रखना होगा। इस प्रकार आज के संदर्भ में यह बात और भी प्रासंगिक हो गई है कि प्रकृति मनुष्य की सहचरी है।

प्रश्न 8. ‘वसंत आया’ कविता में कवि की चिंता क्या है? उसका प्रतिपाद्य लिखिए । 

उत्तर——-(i) ‘वसंत आया’ कविता में कवि की चिंता यह है कि मनुष्य का प्रकृति से रिश्ता टूटता जा रहा है, उसे पुनः कैसे जोड़ा जाए।

(ii) कवि यह विचार प्रकट करता है कि आज भी पहले की तरह ही ऋतुओं में स्वाभाविक रूप से परिवर्तन होता रहता है, परंतु हम उस पर ध्यान नहीं देते और निरपेक्ष बने रहते हैं। 

(iii) आज भी पत्ते झड़ते हैं, कोंपलें फूटती हैं, पलाश के वन लाल-लाल फूलों से दहक उढ़ते हैं। कोयल, भ्रमर-मस्ती भरे गीत गाते हैं, परंतु हमारी निगाह उन पर नहीं जाती।

(iv) आधुनिक जीवन शैली ने मनुष्य को इतना आत्मपरक और भावहीन कर दिया है कि प्रकृति के परिवर्तनों को अनुभूति से नहीं बल्कि कैलेंडर और दफ्तर की छुट्टी से जान पाता है। 

(v) का इस बात के लिए चिंतित है कि मनुष्य का प्रकृति से रागात्मक संबंध समाप्त होता जा रहा है, जिसे पुनः स्थापित करना अत्यंत आवश्यक है।

तोड़ो के प्रश्न उत्तर | NCERT Solutions Class 12 Hindi Elective Chapter 6 Question Answer

प्रश्न 1. ‘पत्थर’ और ‘चट्टान’ शब्द किसके प्रतीक हैं ? 

उत्तर- ‘पत्थर’ और ‘चट्टान’ शब्द सृजन में बाधा उत्पन्न करने वाली वस्तुओं के प्रतीक हैं।

प्रश्न 2. कवि को धरती और मन की भूमि में क्या-क्या समानताएँ दिखाई पड़ती हैं ?

उत्तर- धरती और मन की भूमि में समानताएँ—

(i) धरती और मन की भूमि दोनों ही सृजनात्मक शक्तियों से परिपूर्ण हैं। 

(ii) पत्थर और चट्टानें धरती की सृजन करने की प्रक्रिया को रोक देते हैं, जबकि मन की भूमि पर व्याप्त नीरसता या अरुचि मन के सृजनात्मक कार्यों को रोक देती है। 

(iii) बंजर या ऊसर हो जाने पर धरती अपने अदंर बीज का पोषण नहीं कर पाती, उसी प्रकार मन भी भूमि की चिढ़ या झुंझलाहट के कारण भावों और विचारों का पोषण नहीं कर पाती।

(iv) जिस प्रकार धरती की गुड़ाई करके उसे उर्वरा बनाया जाता है, उसी प्रकार मन की भूमि से खीज को खोदकर निकालने से वह भी सृजन के योग्य बन जाती है। 

प्रश्न 3. भाव सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए-

मिट्टी में रस होगा ही जब वह पोसेगी बीज को हम इसको क्या कर डालें इस अपने मन की खीज को ? 

उत्तर— भाव-सौन्दर्य 

(i) यहाँ कवि ने यह भाव प्रकट किया है कि जिस प्रकार मिट्टी गोड़ो गोड़ो गोड़ो में रस होने पर वह बीज का पोषण करती है, उसी प्रकार मन के द्वारा भी तभी सृजन कार्य संभव हो सकता है, जब उसमें भाव रूपी रस भरा हो।

(ii) खीज यानिझुंझलाहट को कवि ने सृजन में बाधक बताया है। कवि उसे खोदकर बाहर निकालने की बात कर रहा है। 

(iii) ‘गोड़ो’ शब्द की बार-बार आवृत्ति कर कवि ने यह संदेश दिया है कि मन रूपी, भकि की बार-बार गुड़ाई अत्यंत आवश्यक है, तभी उसमें से बाधक तत्त्वों को क्षमता को बढ़ाया जा सकता है। 

प्रश्न 4. कविता का आऐ क्यों किया ? दुलाह और अंत ‘गोड़ो गोड़ो गोड़ो’ 

उत्तर- (1) कविता का आरंभ ‘तोड़ो तोड़ो तोड़ो’ से हुआ है और अंत ‘गोड़ो गोड़ो गोड़ो’ से। 

(ii) कवि का मानना है कि धरती की सृजन-शक्ति को बनाए रखने के लिए पत्थर चट्टाने ऊसर, बंजर, परती आदि को तोड़ना अनिवार्य है। साथ ही मन की सृजनात्मक क्षमता के लिए अरुचि, नीरसता, व्याकुलता आदि को तोड़ना आवश्यक है। 

(iii) इसी प्रकार धरती की गुड़ाई करके ही बीज का पोषण किया जा सकता है तथा मन मैं माथों और विचारों के पोषण के लिए झुंझलाहट, चिक, कुड़न आदि को खोदकर निकालना बेहद जरूरी होता है।

प्रश्न 5. ये झूठे झूठे बंधन टूटें तो धरती को हम जानें

उत्तर- (i) यहाँ पर झूठे बंधनों के टूटने से यह अभिप्राय है कि पत्थर और चट्टानें धरती यहाँ पर झूठे बंधनों और धरती को जानने से क्या अभिप्राय है? की उर्वरा शक्ति को बाधित तो करते है, परंतु वह वाया स्थायी नहीं होती । उन्हें तोड़कर को पुनः उपजाऊ बनाया जा सकता है। 

(ii) इसी प्रकार अरुचि, झुंझलाहट आदि मनोवृत्तिया मन रूपी धरती को क्षणिक रूप से सुजन करने से रोक सकती हैं। ये झूठे बंधनों की तरह हमारे मन को कुछ समय के लिए द लेती है, परंतु उन बेपनों को तोड़कर मन का सृजन के लिए प्रेरित किया जा सकता है। इस प्रकार मन की बायाओं को दूर कर हम उसमें अंतर्निहित शक्तियों को जान जाएंगे।

प्रश्न 6. ‘आधे आधे गाने के माध्यम से कवि क्या कहना चाहता है ? 

उत्तर –

(i) ‘आपे आये गाने’ के माध्यम से कवि यह कहना चाहता है कि जब व्यक्ति है। मन में मैबैनी, नीरसता या अरुचि आ जाती है तब उसकी सृजनात्मक शक्ति आधी-अधूरी है रह जाती है। 

(ii) इस प्रकार उसके मन में स्पष्ट भावों का सृजन नहीं हो पाता। पूर्ण सृजनात्मक क्षमता के लिए मन की बाधाओं को दूर करना आवश्यक है।



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FAQs

प्रश्न 1. कौन बदला प्रकृति या हम ? 

उत्तर- प्रकृति में आज भी पहले की तरह परिवर्तन होता रहता है। प्राकृतिक शोभा और क्रियाकलाप पूर्वयत् चल रहे हैं। बदले तो हम हैं। झूठी शान और दिखावे की जिन्दगी ने हमें काफी हद तक बदल डाला है। हम कोयल की कूक को शोर कहने लगे हैं।  हम कलेण्डर देखकर मौसम को पहचानते हैं। भ्रष्टाचार की उन्नत जीवन शैली मानने को बाध्य हैं। 

प्रश्न 2, वसंत के आगमन पर पेड़ों के पत्तों और हवा की चाल में क्या परिवर्तन आ गया ?

उत्तर— (i) वसंत के आगमन पर पेड़ों के पत्ते पीले पड़कर सूख गए। वे पेड़ों की शाखाओं से टूटकर सड़क के किनारे लाल बजरी पर गिर पड़े। 
(ii) लोगों के पैरों के नीचे पड़कर वे सूखे पत्ते ‘चरमर’ की आवाज करने लगे। (iii) हवा खिली हुई, गरमाहट से भरी फिरकी की तरह नाचती हुई चलने लगी, जैसे गरम पानी से नहाकर आई हो।

प्रश्न 3. ‘तोड़ो’ कविता का प्रतिपाद्य अपने शब्दों में लिख देना चाहता है ? 

उत्तर- (1) ‘तोड़ो’ कविता के माध्यम से कवि यह संदेश देना चाहता है कि धरती हो अथवा मन, दोनों की सृजनात्मकता के लिए बाधाओं को तोड़ डालना आवश्यक है।
(ii) कवि कहता है कि इन पत्थरों और चट्टानों को तोड़ने के बाद ही हम धरती की वास्तविक सृजन-क्षमता को जान सकते हैं, इसके अंदर दबे रस को पहचान सकते हैं। 
(ii) इसी प्रकार मन की अरुचि और नीरसता को दूर कर ही उसकी सृजन-शक्ति को प्राप्त किया जा सकता है।
(iv) ऊसर, बंजर, चरागाइ, परती आदि को तोड़कर र्खेत बनाने से ही बीज का पोषण होगा। 
(v) इसी प्रकार मन में व्याप्त झुंझलाहट और कुढ़न को समूल नष्ट करके ही मन के भावों को सृजनात्मक रूप दिया जा सकता है।

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