NCERT Solutions Class 12 Hindi Elective Chapter 7 Question Answer | अध्याय 7 तुलसीदास

WhatsApp Group (Join Now) Join Now
Telegram Group (Join Now) Join Now

क्या आप NCERT Solutions Class 12 Hindi Elective Chapter 7 Question Answer का समाधान खोज रहे हैं? ताकि अपने class 12 Hindi के परीक्षा में काफी अच्छे अंक प्राप्त कर सकें | तो यह वेबसाइट आपके लिए है | यहां पर आपको class 12 की तैयारी के लिए अति आवश्यक समाधान उपलब्ध कराया जाता है |

तो छात्रों, इस लेख को पढ़ने के बाद, आपको इस अध्याय से परीक्षा में बहुत अधिक अंक प्राप्त होंगे, क्योंकि इसमें सभी परीक्षाओं से संबंधित प्रश्नों का वर्णन किया गया है, इसलिए इसे पूरा अवश्य पढ़ें।

मैं खुद 12वीं का टॉपर रहा हूं और मुझे पता है कि 12वीं की परीक्षा में किस तरह के प्रश्न पूछे जाते हैं। वर्तमान में, मैं एक शिक्षक की भूमिका भी निभा रहा हूँ, और अपने छात्रों को कक्षा 12वीं की महत्वपूर्ण जानकारी और विषयों का अभ्यास भी कराता हूँ। मैंने यह लेख 5 वर्षों से अधिक के अपने अनुभव के साथ लिखा है। इस पोस्ट की मदद से आप परीक्षा में इस अध्याय से भूगोल में बहुत अच्छे अंक प्राप्त कर सकेंगे।

NCERT Solutions Class 12 Hindi Elective Chapter 7 Question Answer | अध्याय 7 तुलसीदास

कक्षा | Class12th 
अध्याय | Chapter07
अध्याय का नाम | Chapter Name(क) ‘भरत राम का प्रेम’
(ख) पद
कवि का नाम | Poet Nameतुलसीदास
किताब | Bookअंतरा ऐच्छिक | Hindi Elective
खंड | Sectionकाव्य खंड | Poetry Section
बोर्ड | Boardसभी हिंदी बोर्ड
किताब | Book एनसीईआरटी | NCERT
विषय | Subjectहिंदी | HINDI
अध्ययन सामग्री | Study Materialsप्रश्न उत्तर | Question answer

तुलसीदास का जीवन परिचय CLASS 12TH | Biography of Tulsidas

उत्तर – हिंदी साहित्य के कवियों में तुलसीदास का विशिष्ट स्थान है। ये रामभक्ति के महान कवि माने जाते हैं। वास्तव में, तुलसीदास जी राममार्गी शाखा के प्रतिनिधि कवि, हिंदी साहित्य के गौरव तया भारतीय संस्कृति के रक्षक माने जाते हैं। 

NCERT Solutions Class 12 Hindi Elective Chapter 7
Image credit: social media

उनकी रचनाएँ, भारतीय धर्म एवं आस्था की प्रतीक इन गई हैं। तुलसीदास जी का जन्म सम्वत् 1554 में उत्तर प्रदेश के बांदा जिला के राजापुर ग्राम में हुआ था। वे जाति से सरयूपारी ब्राह्मण थे। उनके पिता का नाम आत्माराम दूबे और माता का नाम हुलसी था।

तुलसीदास जी का शैशव बड़ी कठिनाइयों में व्यतीत हुआ। उनके माता-पिता ने उन्हें मूल नक्षत्र में पैदा होने के कारण त्याग दिया था। शेष सनातन जी की कृपा से उन्होंने पुराण, वेद, इतिहास एवं दर्शन का खूब अध्ययन किया। कहते हैं कि तुलसीदास जी अपने यौवनकाल में अपनी पत्नी पर विशेष अनुरक्त थे। 

पत्नी की फटकार ने तुलसी की जीवन-दशा को बदल दिया। उन्होंने अपना जीवन राम के चरणों में अर्पित कर दिया। भगवान राम के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा थी। उन्होंने अपनी रचनाओं के द्वारा राम काव्य को उत्कर्ष प्रदान किया। संवत् 1680 में इनका देहावसान हो गया।

तुलसीदास जी ने अपना सारा जीवन राम की आराधना में लगा दिया। उनकी बारह रचनाएँ है जिनमें रामचरितमानस तथा विनयपत्रिका विशेष उल्लेखनीय हैं। रामचरितमानस प्रबंधकाव्य का आदर्श प्रस्तुत करता है तो विनयपत्रिका मुक्तक शैली में रचा गया उत्कृष्ट नीति काव्य है।

तुलसीदास जी के काव्य की सबसे बड़ी विशेषता समन्वय की भावना है। उनके काव्य से समन्वय की विराट चेष्टा कहा गया है। अपने समन्वयवादी दृष्टिकोण के कारण ही तुलसीदास जी लोकनायक के आसन पर आसीन हुए। 

लोकसंग्रह का भाव तुलसीदास जी की भक्ति का अभिन्न अंग था। इसीलिए उनकी भक्ति कृष्णभक्त कवियों के समान एकांगी न होकर सर्वांगपूर्ण है। तुलसीदास जी का भाव-जगत पर पूर्ण अधिकार था। 

वे अपनी रचनाओं में विशेषकर ‘मानस’ में मार्मिक स्थलों के चयन में विशेष सफल रहे हैं। तुलसीदास जी ने शृंगार रस का चित्रण मर्यादा के भीतर रहकर किया है। वात्सल्य रस के चित्रण में भी तुलसीदास जी को पूर्ण सफलता मिली है। तुलसी काव्य में शांत रस एवं करुणरस की प्रधानता रही है। 

अन्य रसों का भी प्रसंगानुकूल दर्शन मिलता है। तुलसीदास जी ने धर्म का स्वस्थ रूप सामने रखकर अपने काव्य की रचना ये है। विनयपत्रिका में तुलसीदास जी का दास्य भाव की भक्ति का आदर्श निहित है। भाषा, अर्थ-गौरव एवं पांडित्य तीनों दृष्टियों से विनयपत्रिका अपना विशिष्ट स्थान रखती है।

तुलसीदास जी ने अपने पात्रों में आदर्श की प्रतिष्ठा दिखाकर उनके चरित्र को अनुकरण का विषय बना दिया है। उन्होंने पात्रों के माध्यम से अनेक आदर्श हमारे सामने रखे। सामाजिक मर्यादाओं के प्रकाश में उन्होंने धर्म को नवीन रूप प्रदान किया। 

उन्होंने ‘मानस’ में व्यक्ति-धर्म तथा राष्ट्र-धर्म की स्थापना की। राम के चरित में विविध आदर्शों की स्थापना की। राम एक आदर्श ३. आदर्श भाई, आदर्श मित्र, आदर्श शत्रु तथा आदर्श राजा के रूप में हमारे सामने आते हैं।

काव्य– शैलियों को अपनाया है जिनमें छप्पय, कवित्त, सवैया-पद्धति विशेष उल्लेखनीय सीदास जी ने अपने समय में प्रचलित अवधी तथा ब्रज भाषाओं को अपनाया है। अवधी भाषा तथा विनयपत्रिका में ब्रज भाषा का प्रयोग हुआ है। 

तुलसीदास ने अलंकारों का भी समुचित प्रयोग किया है। रूपक, निर्देशना, उपमा, व्यतिरेक अप्रस्तुत प्रशंसा आदि अनेक अलंकारों का प्रयोग है। इन अलंकारों के प्रयोग से तुलसीदास की काव्य-शैली की श्रेष्ठ स्थान प्राप्त है। 

रस योजना-तुलसीदास के काव्य का फलक अत्यंत विस्तृत होने के कारण उनकी रचनाओं में शांत, श्रृंगार, वीर, हास्य, करुण, रौद्र, वात्सल्य आदि सभी रसों का सुंदर परि हुआ है। 

अलंकार—तुलसीदास का काव्य तो अलंकारों से पूरी तरह सजा-पजा है। 

अनुप्रास, उपमा रूपक, सांगरूपक, उत्प्रेक्षा, उल्लेख, रूपकातिशयोक्ति, दृष्टांत, अन्वय, व्यतिरेक आदि अलंकार उनके काव्य में सहज ही समाए हुए हैं।

अनुप्रास—“नीरज, नयन, नेठ”, “खेलत खुनिस”, “मोर मन”, “मातु मंदिर मैं”, “हृदये हेरि हारेऊ”, “साघु सभा”, “जिजत जीव जह”, ” तासु तनय तजि” आदि।

उपमा– “वित्रतिखी-सी”, “प्रीति सिखी-सी” आदि। रूपक “नीरज नमन”, “नेह जल” आदि। 

उत्प्रेक्षा– “मनहुँ कमल हिममारे”। पुनरुक्ति प्रकाश बार-बार उर नेननि”। 

समग्रतः तुलसीदास मानव स्वभाव और जीवन-जगत की गहरी अंतर्दृष्टि रखने वाले भक्त-कवि, आदर्श समाज सुधारक, दार्शनिक एवं युग प्रवर्तक थे।

पाठ का सारांश | lesson summary

पाठ्य-पुस्तक में दिए गए दोहे तथा चौपाई ‘भरत राम का प्रेम’ तुलसीदास की सर्वश्रेष्ठ रचना रामचरितमानस के अयोध्या कांड से अवतरित है। इन छंदों में राम के वन चले जाने के बाद भरत की पीड़ा का चित्रण किया गया है। पाठ में ‘पद’ शीर्षक के अन्तर्गत दो पद दिए गए हैं जो गीतावली से अवतरित हैं। इसमें माता कौशल्या के हृदय की पीड़ा का मार्मिक चित्रण किया गया है।

class 12th NotesMCQ
HistoryPolitical Science
EnglishHindi

भरत राम का प्रेम आया सप्रसंग व्याख्या एवं शब्दार्थ | भरत राम का प्रेम आया सप्रसंग व्याख्या NCERT

1.पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढ़े। 

नीरज नयन नेह जल बाढ़े ॥

कहब मोर मुनिनाथ निबाहा। 

एहि तें अधिक कहाँ मैं काहा ॥ 

मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ । 

अपराधिह पर कोह न काऊ ॥ 

मो पर कृपा सनेह बिसेखी। 

खेलत खुनिस न कबहूँ देखी ॥ 

सिसुपन तें परिहरेठं न संगू कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंगू ।। मैं प्रभु कृपया रीति जियें जोही। 

हारेहु खेल जितावहि मोही ॥

महू सनेह सकोच बस सनमुख कही न बैन । 

दरसन तृपित न आजु लगि पेम पिआसे नैन ।

शब्दार्थ : पुलकि—पुलकित होकर। ठाढ़े खड़े होना। नीरज कमल | नेह— प्रेम | बादे – बढ़ना, बाढ़ आना। मोर—मेरा। निवाहा निवाह दिया, कर दिया। काहा-क्या। सुभाक स्वभाव खुनिस क्रोध, अप्रसन्नता। कोह कोष काऊ कभी। परिहरेउ — छोड़ा। जियं हृदय में जोही देखी। मोही मुझे महूँ मैंने भी सकोच संकोच सनमुख- सामने। प्रेम प्रेम ।

प्रसंग – प्रस्तुत काव्यांश अंतरा’ (भाग-2) के ‘भरत-राम का प्रेम’ नामक शीर्षक से अवतरित है। उक्त काव्यांश ‘रामचरितमानस’ के ‘अयेच्या कांड’ से समाकलित है। उसके रचयिता हिंदी के लोकनायक, कवि शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास है। श्रीराम को वन से लौटाने के लिए भरत चित्रकूट पहुंचे हुए हैं। मुनिवर वशिष्ठ जी के उद्बोधन के पश्चात् सभा में भरत की भावुकता छलक उठती है। भरत अपने भाव इस प्रकार प्रकट कर रहे है-

व्याख्या – चित्रकूट में सभा लगी हुई है। मुनिवर वशिष्ठ जी अपना वक्तव्य रख चुके हैं। वे भरत को आदेश देते हैं कि तुम अपने मन की बात कह दो। संकोच मत करो। तब भरत भाव-विभोर हो उठते हैं। उनका शरीर रोमांचित हो जाता है। मुनि व स्वामी श्रीराम की अनुकूलता जानकर वे खड़े हो जाते हैं। 

उनके (भरत के) कमल रूपी नेत्रों से जल की बाढ़ आ चुकी ये कहते हैं कि मैं जो कहना चाहता था, वह सारा मुनिश्रेष्ठ (वशिष्ठ जी) कह चुके हैं। मैं (भरत) इससे अधिक क्या कह सकता हूँ? मैं अपने स्वामी श्रीराम के क्षमाशील स्वभाव को जानता हूँ दे कभी भी अपराधी पर क्रोध नहीं करते हैं। 

मुझ (भरत) पर तो इनकी अत्यधिक कृपा है। बचपन में जब हम साथ-साथ खेलते थे, तब वे कभी अप्रसन्न नहीं हुए। बचपन से इन्होंने मेरा साथ कभी नहीं छोड़ा है। इन्होंने कभी भी मेरे मन को ठेस नहीं पहुँचाई। मैंने इपने स्वामी श्रीराम की कृपा का सदैव अपने हृदय में अनुभव किया है। इनकी कृपा की रीति विशेष ही है। बचपन

में ये मुझे हारा हुआ खेल भी जितवा देते थे। मैंने भी प्रभु श्रीराम के अगाध प्रेम के कारण संकोचवश कभी भी अपना मुँह नहीं खोला। मैं इनके सामने पड़कर कभी नहीं बोला। इनके दर्शन के प्रेम के प्यासे मेरे नेत्र आज तक भी नहीं हुए तृप्त हैं। आज भी मेरी आँखें इन्हें ही तलाशती रहती हैं।

सौन्दर्य-बोध– उक्त काव्यांश में अवधी भाषा का प्रांजल प्रयोग हुआ है। यहाँ भरत का श्रीराम के प्रति जो प्रेम है, उसका अलौकिक रूप द्रष्टव्य है। कवि की भाषा सहजता और अभिव्यक्ति की दृष्टि से अनुपम है। यह वर्णन भक्ति रस की निर्मल गंगा का प्रतीक है। यहाँ यह कहत मोहि आजु न सोभा। 

अपनी समुझि साधु सुचि को भा ॥ मातु मंदि मैं साधु सुचाली । उर अस आनत कोटि कुचाली | फरइ कि कोदव बालि सुसाली मुकता प्रसवस कि संबुक काली || अनुप्रास और रूपक अलंकारों का उत्कृष्ट विवेचन किया गया है। 

2. विधि न सकेउ सहि मोर दुलारा। 

नीच बीचु जननी मिस पारा ॥ 

सपनेहूँ दोसक लेसु न काहू । 

मोर अभाग उदधि अवगाहू ॥ 

बिनु समुझें निज अघ परिपाकू । 

जारिउँ जायँ जननि कहि काकू ॥ 

हृदय हेरि हारे सब ओरा एकहि भाँति भर्लेहि भल मोरा ॥ गुर गोसाइँ साहिब सिय रामू । 

लागत मोहि नीक परिनामू ।

साधु सभाँ गुर प्रभु निकट कहउँ सुथल सति भाउ । 

प्रेम प्रपंच कि झूठ फुर जानहिं मुनि रघुराठ ॥

शब्दार्थ : बिधि—–विधाता, ईश्वर। मिस — बहाने से। यह यह । सुचि – पवित्र । को- कान। भा हुआ है। मंदि—अथम, निकृष्ट सुचाली – सदाचारी । उर—हृदय। अस—यह। कुचाली—–दुराचार। फरइ—फलता है। कोदव— मोटे जंगली चावल की एक किस्म । सुसाली- उत्तम धान । मुकता—मोती। प्रसव — उत्पन्न करना। संबुक—घोंघा । लेसु-लेश मात्र, जरा-सा । उदधि—तमुद्र । अवगाहू—अवाह, अत्यधिक गहरा । अघ पाप । परिपाकू—परिणाम । जारिक- मैंने जलाया, तपाया। काकू— कटु वचन । हेरि—देखकर। नौक—सही, ठीक। सुथल—–पवित्रः स्थान, तीर्थ-स्थान। सति भाठ — शुद्ध / पवित्र भाव से । प्रपंचु—छल-कपट । फुर—सत्य ।

‘प्रसंग प्रस्तुत काव्यांश ‘अंतरा’ (भाग-2) के ‘भरत-राम का प्रेम’ नामक पाठ से संकलित है। इसके रचयिता गोस्वामी तुलसीदास है। उक्त पाठांग रामचरितमानस के अयोध्या कांड से समाकलित है। यहाँ चित्रकूट में राम-भरत-समागम के समय भरत की भावुकता का मार्मिक चित्रण वर्णित है।

व्याख्या– श्रीराम के प्रिय अनुज भरत की मनोदशा भाव-विश्वलता से प्रभावित है। श्रीराम का मेरे प्रति दुलार सह नहीं सका । उस (विचा) ने पद्मयंत्र किया जो मिला है। लेकर मेरे तथा मेरे स्वामी के बीच अंतर डाल दिया। ईश्वर तथा माता के प्रति ऐसे भी मुझे (भरत को शोभा नहीं दे रहा है। 

वास्तव में अपनी समझ के आधार पर कोई और पवित्र नहीं होता है। इसका निर्णय दूसरे लोग की करते हैं। मेरे द्वारा स्वयं को माता (कैकेयी) को अथम मानने का विचार भी हृदय में लाना करोड़ों दुराचारों के वस्तुतः माँ को दोष देना पूर्णतः अनुचित है। क्या जंगली थान उत्तम चावल (धान) की बन स्थान ले सकता है ? क्या काली घोंघी उत्तम कोटि का मोती उत्पन्न कर सकती है। मेरा दुर्भाग्य ही प्रबल है। 

मैं सपने में भी किसी को दोष नहीं दे सकता हूँ। मेरा दुर्भाग्य समुद्र की भाँति है। मैंने अपने (पूर्व जन्मों के) पापों का परिणाम समझे बिना ही माता है। वचन कहकर बहुत जलाया / तपाया है। मैंने अपने हृदय में बहुत खोज की और (अपने कर्मों/साधनों की तलाश कर करके) में सब ओर से हार गया। निश्चित रूप से एक ही मेरा भला है कि मेरे गुरु महाराज सर्वसमर्थ हैं और मेरे स्वामी सीता राम हैं। इन्हीं की उ के कारण मुझे मेरा परिणाम अच्छा लग रहा है। अर्थात् इन्हीं के कारण मेरा कल्याण संभ

भरत कहते हैं—सज्जनों की इस सभा में गुरुदेव (वशिष्ठ जी) और मेरे स्वामी श्री उपस्थित हैं। यह स्थान (चित्रकूट) एक पवित्र तीर्थ है। में इन सबके निकट पूर्ण सत्य माव कह रहा हूँ कि मेरा यह आचरण प्रेम है या प्रपंच (छल-कपट), झूठ है या सच ? इसे तो गुरुदेव (वशिष्ठ जी) और रघुकुल शिरोमणि श्रीराम जी ही जानते हैं। 

सौन्दर्य-बोध– प्रकृत काव्यांश की भाषा अवधी है। भरत की भाव-विह्वलता तथा को अकिंचन बताने की मार्मिकता अनिर्वचनीय है। भरत के द्वारा सारे घटनाक्रम के लिए के दुर्भाग्य को दोषी बताना उनके चरित्र की उदात्त भावना को प्रकट करता है। यहाँ करुण

का वर्णन है। 

उपमा, रूपक और दृष्टांत अलंकारों का आकर्षक निरूपण है।

3. भूपति मरन पम पेनु राखी जननी कुमति जगतु सबु साखी ।। 

देखि न जाहिं विकल महतारीं । 

जरहिं दुसह जर पुर नर नारी ॥ 

महीं सकल अनरथ कर मूला । 

सो सुनि समुझि सहिउँ सब सूला || 

सुनि बन गवनु कीन्ह रघुनाथा। 

करि मुनि वेष लखन सिय साथा ॥ 

चिन पानहिन्ह पयादेहि पाएँ। 

संकरु साथि रहे ऐहि घाएँ । 

बहरि निहारि निषाद सनेह कुलिस कठिन उर भवन बेह अब सबु

आँखिन्ह देखें आई जित जीव जड़ सबड़ सहाई जिन्हहि निरखि मग साँपिनि बीछी । 

तजहिं विषम विषु तामस तीछी ॥ 

तेइ रघुनंदनु लखनु सिय अनहित लागे जाहि । – 

तासु तनय तजि दुसह दुख दैव सहावड़ काहि ॥

शब्दार्थ पनुप्रण, निश्चय साखी-साथी विकल व्याकुल, दुधी ह 1 सह सकने योग्य ज्वर/ताप। महीं— मैं ही। सकल—सारे, सभी। सूला— दुख। पानहिन्दू जुटे। पयादेहि पैदल ही संकर भगवान शिव घाएँ याद । निहारि देखकर कुलिस बेहू-छेद होना, फटना निरखि देखा। बीछी मादा बिच्छू विषम कर विषुविष, जहर विषय भयंकर, जटिल विषुविष, जहर सीधी-सी समस तनय — पुत्र । दैव—भाग्य ।

प्रसंग-प्रकृति पद्यांश ‘अंतरा’ (भाग-2) के ‘भरत-राम का प्रेम’ शीर्षक से अ इसे रामचरितमानस के आयोध्या कांड से लिया गया है। इसके रचयिता गोस्वामी तुलसीदास है। यहाँ भरत सारे घटनाक्रम के लिए अपने-आपको दोषी ठहरा रहे हैं।

व्याख्या– अपनी भावुकता को प्रकट करते हुए भरत कहते हैं-पिताजी महाराज ने प्रेम के को निबाहते हुए अपने प्राण त्याग दिये। इसके साथ ही माता की कुबुद्धि का चक्र चला। इन दोनों के लिए संसार साक्षी है। इसके कारण मेरी सभी माताएँ अत्यधिक व्याकुल व दुखी है। नगर के सभी नर-नारी दुसह दुख से जल रहे हैं। 

में ही इन सब अनथों का मूल जिम्मेदार उत्तरदायी हूँ। यह सब सुनकर और समझकर मैंने असहनीय दुख सहा है। भगवान साक्षी है कि “श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजी ने मुनि का वेष धारण करके वन को प्रस्थान कर लिया। ये जूतों के बिना पैदल ही बन को गए। यह सूचना मेरे लिए घाव को भांति निरंतर पेड़ादायक है। 

इस सारे प्रकरण के साथ निषादराज का अलोकिक प्रेम देखकर भी मेरा हृदय नहीं फटा क्योंकि मेरा हृदय वज्र से भी कठोर है। में एक निर्दयी व हेय व्यक्ति हूँ। अब यहाँ जाकर मैंने सब कुछ अपनी आँखों से देख लिया है। यह जड़ जीव जीवित रहते हुए वह सब कुछ सहन करवाएगा, जिसको देखकर रास्ते की सर्पिनियों और मादा बिच्छू भी अपने भयंकर पिंप और तीव्र क्रोध को त्याग देती है।

वे मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम, लक्ष्मण और सीता जिसे शत्रु जान पड़ते हैं (शत्रु प्रतीत होते. इ) उस कैकेयी के पुत्र भरत को छोड़कर यह भाग्य (देव) भला असहनीय दुख किस प्रकार सहन कराएगा ? अर्थात् देव मुझ अधम को ही दुख देगा । 

सौन्दर्य-बोध– उक्त पद्यांश की भाषा अवधी है। भरत का स्वयं को अकिंचन मानना उसके चरित्र की उदात्त भावना को प्रकट करता है। भाषा में भावानुकूलता, सहजता, प्रभावोत्पादकता आदि का प्राचुर्य है। यहाँ शांत और करुण रस का वर्णन है। 

अनुप्रास, उपमा और रूपक अलंकार वर्णित हैं।

4.जननी निरखति बान धनुहियाँ।

बार बार डर नैननि लावति प्रभुजू की ललित पनहियाँ ॥

कबहुँ प्रथम स्यों जाइ जगावति कहि प्रिय बचन सवारे।

“उठहु तात ! बलि मातु बदन पर, अनुज सखा सब द्वारे ” ॥

कबहुँ कहति यों “बड़ी बार भइ जा भूप पहें भैया

बंधु बोलि जॅइय जो भावै गई निछावरि मैया”

कबहुँ समुझि वनगमन राम को रहि चकि चित्रलिखी-सी ।

तुलसीदास वह समय कहे तें लागति प्रीति सिखी-सी ॥ 

शब्दार्थ : धनुहियाँ छोटे पनूप उर हृदय पहियाँ छोटी जूतियाँ बार—३०१ इय — जीमना, भोजन करना । निछावरि-बलिहारी। सवारे—सवेरे । चकि—चकित। प्रीति——प्रेम। सिखी मोरनी।

प्रसंग — प्रस्तुत पद ‘अंतरा’ (भाग-2) के ‘तुलसीदास’ शीर्षक (पाठ) के ‘पद’ से संकलित है। उक्त काव्यांश तुलसीदास जी की ‘गीतावली’ से समाकलित है। यहाँ कौशल्या राम-वन-गमन है पश्चात् उनके बचपन की वस्तुओं को देखकर दुखी हो रही हैं।

व्याख्या— श्रीराम वन को जा चुके हैं। माता कौशल्या उनके विरह में व्याकुल हैं। वे रघुनंदन के बचपन की वस्तुओं को देख-देखकर उनका स्मरण कर रही हैं। ये श्रीराम के बचपन के पर लगा रही हैं। कभी-कभी सवेरे शयन कक्ष में सबसे पहले उन्हें जगाने जाती हैं। वहाँ मोहवश छोटे-छोटे धनुष-बाण को देख रही हैं। 

प्रभु श्रीराम के शैशव की जूतियाँ बार-बार अपने हृदय हे पुत्र उठी तुम्हारे मुख पर मां बलिहारी न्यौछावर है तुम्हारे सभी अनुज और द्वार पर खड़े है तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे है।” कभी माता कौशल्या कहती है-” बहुत देर हो गई है। महाराज के पास जाओ। भाइयों को बुला लो। जो मन भावे, सो खा लो। मिया ” तुम पर बलिहारी (निछावर) है।” कभी वे राम के वन-गमन का स्मरण करके चित्र के समान स्तव्य और चकित रह जाती है। 

तुलसीदास जी कहते हैं कि है राम वह समय तुम्हारी माता के लिए अकथनीय है। तुम्हारे प्रति उनका प्रेम मोरनी की भाँति है। मोरनी प्रसन्न हो नायती रहती है, अंत में वह कदमों की ओर देखकर रो लेती है। इसी तरह कौशल्या भी आपके विरह में अचेत है। 

सौन्दर्य बोध इस पद में ब्रजभाषा का सहज प्रयोग उपलब्ध है। यहां माता कौशल्या पुत्र राम के प्रति अलौकिक प्रेम चित्रित है। यहाँ वात्सल्य रस का विवेचन है। अनुप्रास, रूपक और उठप्रेक्षा अलंकारों का प्रयोग द्रष्टव्य है। 

पद सप्रसंग व्याख्या एवं शब्दार्थ | पद सप्रसंग व्याख्या NCERT

1. राधौ ! एक बार फिर आवौ । 

ए बर बाजि विलोकि आपने बहुरो बनहिं सिधावा ॥ 

जे पथ प्याइ पोखि कर पंकज वार वार चुचुकारे क्यों जीवहिं, मेरे राम लाडिले ! 

ते अब निपट बिसारे ॥ 

भरत दोगुनी सार करत हैं अति प्रिय जानि तिहारे ।

तदपि दिनहिं दिन होत झाँवरे मनहुँ कमल हिममारे ।। सुनहु पथिक ! 

जो राम मिलहिं वन कहियो मातु सदसो । 

तुलसी मोहिं और सबहिन तें इन्हको बड़ो अंदेसो ॥ 

शब्दार्थ : राघौ—हे राघव, राम फिरि—फिर से, पुनः। सिधावौ चले जाओ। पय- जल। प्याइ पिलाकर। पोखि हाथ फेरना, सहलाना। कर पंकज कमल रूपी हाथ निपट बिल्कुल। सार—देखभाल। झाँवरे कुम्हलाना, मलिन होना। अंदेसो-अंदेशा, चिंता ‘प्रसंग प्रस्तुत पंद ‘अंतरा’ (भाग-2) के ‘तुलसीदास’ शीर्षक पाठ के ‘पद’ से अवतरित है। उक्त पद ‘गीतावली’ से उद्धृत है। यहाँ माता कौशल्या राम-वन-गमन से दुखी घोड़े को देखकर अपने हृदय की व्यथा को इस प्रकार व्यक्त कर रही हैं।

व्याख्या माता कौशल्या राम के बन-गमन के बाद दुखी हैं। वे राम से संबंधित सभी वस्तुओं और प्राणियों में उनकी विरह वेदना का अनुभव कर रही हैं। वे कहती हैं-है राधव । एक बार वापस लौट आओ अपने इस प्रिय घोड़े को एक बार देखकर फिर से वन को चले जाना। जिसे (तुम) जल पिलाकर अपने कमल रूपी कोमल हाथों से सहलाते थे, बार-बार पुचकारते थे, वह घोड़ा तुम्हारे विरह में दुखी है। 

मेरे लाड़ले राम ! वह तुम्हारे बिना भला क्यों जीवित रहे ? क्योंकि उसे तुमने इन दिनों पूरी तरह छोड़ दिया है। यह तुम्हारा अति प्रिय घोड़ा है। यह विचार कर भरत उसकी सौ गुनी देखभाल करते हैं। फिर भी यह दिनों-दिन मुरझाता जा रहा है, सुस्त होता जा रहा है। यह ऐसा शिथिल हो गया है मानो कमल पर हिमपात हो गया हो है पचिक सुनो, यदि मार्ग में कहीं पर भी तुम्हें राम मिल जाएँ, तो उनसे माता का यह संदेश कह देना। तुलसीदास जी कहते हैं कि मुझे और सबकी अपेक्षा इन प्राणियों की बड़ी चिंता लगी हुई है। अतः हे राम! एक बार आकर इन्हें दर्शन देकर वापस लौट जाओ।

सौन्दर्य-बोध — यह पद ब्रजभाषा की रचना है। यहाँ वात्सल्य रस का अद्वितीय विवेचन है। भाषा में सहजता, भावानुकूलता, प्रभावोत्पादकता आदि का प्राचुर्य है। यहाँ अनुप्रास, संपर्क, उत्प्रेक्षा आदि अलंकारों का विवेचन है।

भरत राम का प्रेम के प्रश्न उत्तर | NCERT Solutions Class 12 Hindi Elective Chapter 7 Question Answer

प्रश्न 1, ‘हारेँहु खेल जितावहिं मोही’ भरत के इस कथन का क्या आशय है ? 

उत्तर- इस कथन का आशय यह है कि श्रीराम अपने अनुज भरत से इतना प्रेम करते कि ये खेल में जीतते हुए भी अपने भाई को प्रसन्नता है। यह उनके अगाध प्रेम का उदाहरण है। दिलाने हेतु जान-बूझकर हार जाते. 

प्रश्न 2. मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ’ में राम के स्वभाव की किन विशेषताओं की और संकेत किया गया है ?

उत्तर– उक्त कथन से राम के स्वभाव की निम्नलिखित विशेषताओं है-

(i) श्रीराम अपराधी पर भी कभी क्रोध नहीं रते हैं।

(ii) खेलते हुए सदैव प्रसन्न रहते हैं। 

(ii) सदैव साथ रहते हैं। कभी साथ नहीं छोड़ते हैं।

(iv) अनुज को हारता हुआ खेल भी (स्वयं हारकर ) जितवा देते हैं।

प्रश्न 3. भरत का आत्म-परिताप उनके चरित्र के किस उज्ज्वल पक्ष की ओर संकेत करते हैं? 

उत्तर- भारत का आत्म-परिताप उनके चरित्र के निम्नलिखित उज्ज्वल पक्ष की ओर संकेत करता है-

(i) भरत निर्मल हृदय व उदात्त व्यक्ति हैं। 

(ii) उनका भ्रातृप्रेम भक्ति से ओत-प्रोत है।

(iii) माता व परिस्थितियों की अपेक्षा स्वयं के दुर्भाग्य को दोषी ठहराकर वे उदारता एवं | विशाल हृदयता के धनी हो गए हैं।

प्रश्न 4. राम के प्रति अपने श्रद्धाभाव को भरत किस प्रकार प्रकट करते हैं? स्पष्ट कीजिए ।

उत्तर- राम के प्रति भरत का श्रद्धाभाव इस प्रकार स्पष्ट है-

(i) श्रीराम से मिलकर भरत का शरीर पुलकित है और नेत्रों से प्रेमजल की बाढ़ निकल पड़ी है।

(ii) ज्येष्ठ भ्राता के साथ बचपन की घटनाओं का उदात्त भाव से स्मरण करते हैं। 

(iii) श्रीराम के प्रति सर्वस्व निछावर तथा पूर्ण रूप से दास-भाव प्रकट करते हैं। 

(iv) वन-गमन के लिए माता व परिस्थितियों को कारण न मानकर स्वयं के दुर्भाग्य को दोषी मानना उनकी उदात्त भावना की पराकाष्ठा है। 

प्रश्न 5. ‘महीं सकल अनरथ कर मूला’ पंक्ति द्वारा भरत के विचारों भावों का स्पष्टीकरण कीजिए ।

उत्तर- उक्त पंक्ति से स्पष्ट है कि भरत स्वयं को (अपने आपको) ही सभी अनर्थों का मूल कारण मानते हैं। वे माता कैकेयी तथा अन्य परिस्थितियों के कारण हुए अप्रिय घटनाक्रम (राम-ब-गमन, पिता का स्वर्गवास आदि) के लिए केवल अपने दुर्भाग्य को ही दोषी मानते हैं। 

प्रश्न 6. ‘फरे कि कोदव बालि सुसाली मुकुता प्रसव कि संबुक काली पंक्ति में ये भाव और शिल्प सौन्दर्य को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर— भाव- सौन्दर्य-भरत उक्त दृष्टांत देकर यह सिद्ध करने का प्रयास कर रहे हैं कि मदन-गमन इत्यादि घटनाक्रम के लिए एकमात्र रूप से ये स्वयं दोषी हैं। जैसे जंगली पान कता, उसी प्रकार भरत जैसे व्यक्ति से किसी उत्तम कार्य की संभावना नहीं की जा सकती।” आम चावल का मुकाबला नहीं कर सकता तथा काली घोंघी से उत्तम मोती उत्पन्न नहीं हो इस प्रकार के भाव को प्रकट करके भरत ने अपने चरित्र की उदात्त भावना को प्रकट कर दिया।

शिल्प सौन्दर्य 

(i) वर्णों की आवृत्ति के कारण अनुप्रास अलंकार है।

(ii) दृष्टांत अलंकार का आकर्षक उदाहरण है। 

(iii) ब्रजभाषा की भावानुकूल प्रस्तुति है। 

(iv) भाषिक प्रयोग किंचित जटिल होने पर भी चित्ताकर्षक है।

पद के प्रश्न उत्तर | NCERT Solutions Class 12 Hindi Elective Chapter 7 Question Answer

प्रश्न 1. राम के वन-रामन के बाद उनकी वस्तुओं को देखकर माँ कौशल्या क्षेत्र अनुभव करती हैं? अपने शब्दों में वर्णन कीजिए। 

उत्तर- राम के वन-गमन के बाद उनकी वस्तुओं को देखकर माता कौशल्या का अनुमत निम्नलिखित है—

(i) वे उनकी वस्तुओं को बार-बार हृदय से लगाती हैं।

(ii) उनका स्मरण करके स्वयं को भूल जाती हैं। 

(iii) मोहवश उन्हें जगाने उनके शयनकक्ष में पहुँच जाती हैं।

(iv) उन्हें पुकारती हैं।

(v) बन-गर्मन का स्मरण करके अवाक रह जाती हैं।

प्रश्न 2. ‘रहि चकि चित्रलिखी-सी’ पंक्ति का मर्म अपने शब्दों में स्पष्ट कीजिए।

उत्तर—श्रीराम के वन-गमन की घटना का स्मरण करके कौशल्या पूर्णतः यक्ति वस्त हो जाती हैं, वे अवाक् रह जाती हैं। वे उस घटना पर विश्वास ही नहीं करना चाहती हैं। उनकी मार्मिक दशा देखते ही बनती है। 

प्रश्न 3. गीतावली से संकलित पद ‘राधी एक वर फिरि आवा’ में निहित करुणा और संदेश को अपने शब्दों में स्पष्ट कीजिए। 

उत्तर— श्रीराम के प्रिय अश्व की राम-विरह में हुई दुरावस्था हृदय विदारक है। माता कौशल्या राम को केवल इसलिए एक बार लौटने को कहती हैं। क्योंकि वह अश्व उनके बिना निरंतर शिथिल हो रहा है। भरत उसे राम का प्रिय जानकर सी-गुनी देखभाल करते हैं, फिर भी वह ऐसे मुरझा रहा है जैसे हिमपात से कोमल कमल वे अपना करुण संदेश किसी भी पदिक के माध्यम से भेजने का आग्रह भी कर रही हैं।

प्रश्न 4. (क) उपमा अलंकार के दो उदाहरण छाँटिए । (ख) उत्प्रेक्षा अलंकार का प्रयोग कहाँ और क्यों किया गया है ? उदाहरण सहित उल्लेख कीजिए ।

उत्तर- (क) उपमा अलंकार- 

(i) रहि चकि चित्रलिखी-सी ।

(ii) लागति प्रीति सिखी-सी । 

(ख) उत्प्रेक्षा अलंकार-

तदपि दिनहि दिन होत झाँवरे मनहुँ कमल हिममारे। यहाँ ‘मनहुँ’ शब्द का प्रयोग होने से उठवा अलंकार है।

प्रश्न 5. पठित पदों के आधार पर सिद्ध कीजिए कि तुलसीदास का भाषा पर पूरा अधिकार था। 

उत्तर— 

(i) कवि की भाषा में भावों की अभिव्यक्ति के लिए सहजता, अनुकूलता आदि हैं।

(ii) शब्दावली भावों, कथानक, वर्णन तथा प्रकरण के अनुरूप है। 

(iii) काव्य की दियाओं का सम्यक् प्रयोग हुआ है। 

(iv) काव्य-शिल्प की दृष्टि से भी दोनों पद उत्तम हैं। 

(v) अतः स्पष्ट है कि तुलसीदास का व्रजभाषा पर पूरा अधिकार था। 

प्रश्न 6, पाठ के किन्हीं चार स्थानों पर अनुप्रास के स्वाभाविक एवं सहज प्रयोग उन्हें छाँटकर लिखिए। 

उत्तर-

(i) कबहुँ प्रथम ज्यो जाइ जगावति” 

(ii) एक बार बाजि बिलोक आपने बहुरो बनहिं सिधावी।

(iii) प्य प्याइ पोखि कर पंकजा 

(iv) तदपि दिन दिन होत है”



class12.in

FAQs

प्रश्न 1. प्रेम प्रपंच कि झूठ फुर जानहि मुनि रघुराठ’ का आशय स्पष्ट कीजिए। 

उत्तर–भरत अपने अग्रज श्रीराम के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं। वे अपनी मनोदशा भावना का निर्णय करने के लिए श्रीराम और मुनि वशिष्ठ को ही नियुक्त कर देते हैं। भरत श्रीराम से प्रेम करते हैं या दिखावा, तथा वे सच बोल रहे हैं या झूठ, इसके निर्णायक स्वयं राम तथा मुनि वशिष्ठ है। 

प्रश्न 2. “बिनु समुझे निज अघ परिपाक जारि जायें जननि कहि का।” इस से भरत की मनोदशा का वर्णन कीजिए।

उत्तर—यहाँ भरत का आत्म-परिताप स्पष्ट है। वे अपनी माँ को बुरा-भला कहकर उन्हें पीड़ित करने के कृत्य से पश्चाताप कर रहे हैं। वे कहते हैं इस घटनाक्रम के लिए मेरे पूर्वजन्मों के पाप उत्तरदायी हैं। मेरी माँ निर्दोष हैं।

प्रश्न 3. ” तदपि दिनहिं दिन होत झाँवरे मनहुँ कमल हिममारे ।” इस पंक्ति के माध्यम से कौशल्या क्या कहना चाहती हैं ? 

उत्तर- राम का प्रिय अश्व उनके विरह में निरंतर निर्बल व शिथिल हो रहा है। जबकि भरत उसकी सौ गुनी अधिक देखभाल कर रहे हैं। फिर भी वह इस तरह कुम्हलाता जा रहा है जैसे हिमपात होने से कमल कुम्हला जाता है।

प्रश्न 4. निम्नलिखित दोहे का काव्य-सौन्दर्य प्रकट कीजिए-
तेइ रघुनंदनु लखन सिय, अनहित लागे जाहि ।
तासु तनय तजि दुसह दुख, दैउ सहावड़ काहि ।

उत्तर- 
(i) यहाँ भरत का आत्म-परिताप स्वयं पर कटाक्ष के रूप में दर्शाया गया है। 
(ii) अवधी भाषा के इस प्रयोग में भावाभिव्यक्ति की दुरुहता लक्षित है। 
(iii) शब्द चयन जटिल, किंतु प्रभावोत्पादक है।
(iv) अनुप्रास अलंकार की मनोहर छटा के लिए दोहे की द्वितीय पंक्ति द्रष्टव्य है। 
(v) अवधी भाषा में ही तत्सम शब्द (तनय, दुसह, दुख आदि) का प्रयोग मणिकांचन संयोग है। 
(vi) भाषा, भाव, अलंकार आदि के गुंफन के कारण यह दोहा भाव शिल्प, भाषा-शिल्प आदि की दृष्टि से उदाहरणीय है

Leave a Comment