NCERT Solutions Class 12 Hindi Elective Chapter 8 Question Answer | अध्याय 8  मलिक मुहम्मद जायसी

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मैं खुद 12वीं का टॉपर रहा हूं और मुझे पता है कि 12वीं की परीक्षा में किस तरह के प्रश्न पूछे जाते हैं। वर्तमान में, मैं एक शिक्षक की भूमिका भी निभा रहा हूँ, और अपने छात्रों को कक्षा 12वीं की महत्वपूर्ण जानकारी और विषयों का अभ्यास भी कराता हूँ। मैंने यह लेख 5 वर्षों से अधिक के अपने अनुभव के साथ लिखा है। इस पोस्ट की मदद से आप परीक्षा में इस अध्याय से भूगोल में बहुत अच्छे अंक प्राप्त कर सकेंगे।

NCERT Solutions Class 12 Hindi Elective Chapter 7 Question Answer | अध्याय 7 तुलसीदास

कक्षा | Class12th 
अध्याय | Chapter08
अध्याय का नाम | Chapter Name(क) बारहमासा 
कवि का नाम | Poet Nameमलिक मुहम्मद जायसी
किताब | Bookअंतरा ऐच्छिक | Hindi Elective
खंड | Sectionकाव्य खंड | Poetry Section
बोर्ड | Boardसभी हिंदी बोर्ड
किताब | Book एनसीईआरटी | NCERT
विषय | Subjectहिंदी | HINDI
अध्ययन सामग्री | Study Materialsप्रश्न उत्तर | Question answer

मलिक मुहम्मद जायसी का जीवन परिचय | Biography of Malik Muhammad Jayasi

उत्तर- जीवन परिचय मलिक मुहम्मद जायसी का जन्म सन् 1492 ई. में उत्तर-प्रदेश के जायस (अमेठी के निकट) नामक स्थान पर हुआ था। जायसी कुरूप, परंतु योग्य एवं पहुँचे हुए फकीर थे। सैयद अशरफ और शेख बुरहान इनके गुरु थे। संत होने के साथ ही ये सूक प्रेममार्गी शाखा के सर्वश्रेष्ठ कवि भी थे। सन् 1542 ई में इनका देहावसान हो गया।।

रचनाएँ – इनकी प्रमुख काव्यकृतियाँ हैं—पद्मावत, अखरावट और आखिरी कलाम ।।

NCERT Solutions Class 12 Hindi Elective Chapter 8
image credit: social media

इनकी कुछ अन्य रचनाएँ हैं—चित्रलेखा, कहनामा, मसलानामा और कान्हावत । भाषा-शैली — जायसी की भाषा लोक प्रचलित बोलचाल की अवधी है। इसमें संस्कृत के तत्सम एवं अरबी-फारसी के शब्दों का भी प्रयोग हुआ है। भाषा पूर्णतः विषयानुकूल है। सूक्तियों एवं लोकोक्तियों का भी प्रयोग हुआ है। 

जायसी ने फारसी में प्रचलित ‘मसनवी’ शैली का प्रयोग किया है। इनकी काव्य शैली अत्यंत प्रीड एवं गंभीर है। जायसी की भाषा सरल, सरस एवं अत्यंत मार्मिक है। शब्दावली सामान्य बोलचाल की है तथा भावाभिव्यक्ति में समर्थ है। जायसी ने दोहा-चौपाई छंद का प्रयोग किया है। अलंकारों में उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा,

अन्योक्ति, अतिशयोक्ति का सुंदर प्रयोग है। समासोक्ति तो ‘पद्मावत’ का प्रमुख अलंकार है। काव्यगत विशेषताएँ — जायसी सूफी कवि हैं अर्थात् सूफी विचारधारा के कवि हैं। इन्होंने प्रेम की पीड़ा का वर्णन किया है। सूफी विचारधारा में ईश्वर की कल्पना नारी रूप में की है। 

आत्मा पुरुष है परमात्मा नारी परमात्मा को पाने के लिए आत्मा को प्रयास करना पड़ता है। सिंहल द्वीप शासक गंधर्वसेन की पुत्री पद्मावती ईश्वर की प्रतीक है और चित्तौड़गढ़ के महाराणा रत्नसेन आत्मा के प्रतीक हैं। राजा रत्नसेन परमात्मा रूपिणी पद्मावती को पाने के लिए सात समुद्र पार करके सिंहलद्वीप जाते हैं।

जायसी भारतीय थे और वैज्ञानिक दृष्टि से सूफी थी। भारतीय मान्यतानुसार परमात्मा की पुरुष रूप में कल्पना की गई है। जायसी ने भारतीय एवं जायसी दोनों प्रेम-पद्धतियों को अपनाया है। 

पद्मावती को पाने का प्रयास, पद्मावती का नखशिख वर्णन सुनकर तथा सिंहलद्वीप में प्रथम चार पद्मावती को देखकर रत्नसेन का बेहोश होना, राघव चेतना तथा अलाउद्दीन का भी चेतना शून्य होना आदि वर्णन सूफी प्रेम-पद्धति के कारण हैं, किंतु रत्नसेन के चले जाने के बाद नागमती विरह-वर्णन तथा रत्नसेन के बंदी होने के बाद ‘नागमती पद्मावती विलाप” भारतीय प्रेम-पद्धति के अनुसार है। अर्थात् पद्मावत के पूर्वार्द्ध में के उत्तरार्द्ध में रत्नसेन का ईश्वर के रूप में वर्णन हुआ है। समस्त ग्रंथ में लौकिक व अत्यधिक अर्थ जगह-जगह मिल जाता है, जिसके कारण इस ग्रंथ को आलोचकों ने समासोक्ति भी कहा है।

जायसी ने इस ग्रंथ में जीवन के विविध रूपों का वर्णन किया है। प्रकृति-चित्रण, आखेट, राजसुख, भोग सामग्री, रमणी-विहार, पर्व, उत्सव, नख-शिख, यात्रा आदि का विशुद्ध वर्णन है। 

अतः शृंगार रस के संयोग एवं वियोग दोनों पक्षों का वर्णन हुआ है। एक ओर पद्मावती का नख – शिख वर्णन साहित्य की अनुपम धरोहर है, तो दूसरी ओर ‘नागमती विहार वर्णन’ हिन्दी | मुख्य की अनुपम निधि है। मानसरदोक आध्यात्मिक संकेतों से भरपूर है। पद्मावती-नागमती विलाप- खण्ड में रामसेन ईश्वर है, उसकी रनिया और दिल्ली परमात्मा अर्थात् रत्नसेन का भाव अर्थालंकारों का समुचित प्रयोग किया गया है। भावों की तीव्रता के लिए जायसी ने इनका प्रयोग

में वर्णित है। वास्तव में, जायसी के काव्य में शाश्वत प्रेम के लौकिक एवं अतरिक्त गाया की अभिव्यक्ति के साथ ही भाषा अलंकार प्रतीकात्मक इत्यादि का सुन्दर निवास स्थान रूप जनसी के संबंध में प्राप्त जानकारी के अनुसार बोलचाल की अवधी भाषा, जायसी की सामंजस्य हुआ है।  

जायसी की कविता का आधार लोकजीवन का व्यापक अनुभव है। जायसी ने छोटे-छोटे वाक्यों का प्रभावशाली प्रयोग किया है। जायसी के काव्य में शब्दालंकारों और किया है। 

जैसे- “जैन सीप आँसू तस भरे जानो मोती गिरहिं सब ठरे कवि ने संवादों का कुशलतापूर्वक प्रयोग किया है। जायसी की भाषा भावपूर्ण है। भाषाप्रयोग की दृष्टि से वे कुशल कवि है।

पाठ का सारांश | lesson summary

पाठ्य-पुस्तक में जायसी के प्रसिद्ध प्रवन्धकाव्य ‘पद्मावत’ के ‘बारहमासा’ के एक अंश का वर्णन है। कवि ने नायिका नागमती के विरह का वर्णन किया है। पद में कवि ने शीत ऋतु के पीष और अगहन मास में नायिका की विरह दशा का सजीव चित्रण प्रस्तुत किया है। 

प्रथम पद में प्रेमी के वियोग में विरहिणी नायिका विरहाग्नि में जल रही है तथा भ्रमर और कौए के समक्ष अपनी विरह व्यथा का वर्णन कर रही है। दूसरे पद में प्रेयसी का विरह के साथ-साथ ठंड से शरीर के कँपकँपाने का तथा विरह से हृदय के काँपने का सजीव चित्रण प्रस्तुत किया गया है। 

तीसरे पद में माघ के महीने में सर्दी से काँपती विरहिणी नायिका नागमती की विरह व्यथा का वर्णन किया गया है। वरसात और हवा के कारण विरह की आग और भी तेज हो जाती है। 

बीचे पद में फाल्गुनी हवा ठंड को चौगुना कर रही है। सभी फागुन के रंग में उल्लसित (आनंदित) हो रहे हैं किंतु विरहिणी नायिका विरह की अग्नि में और अधिक जल रही है।

class 12th NotesMCQ
HistoryPolitical Science
EnglishHindi

बारहमासा सप्रसंग व्याख्या एवं शब्दार्थ | बारहमासा सप्रसंग व्याख्या NCERT

॥ अगहन देवस घटा निसि बादी दूभर दुख सो जाइ किमि काढ़ी || 

अब धनि देवस बिरह भा राती जरै बिरह ज्यों दीपक बाती ॥ 

काँपा हिया जनावा सीऊ तौ पै जाइ होइ सँग पीऊ ॥ घर घर चीर रचा सब काहूँ । 

मोर रूप रँग लै गा नाहू || 

पलटि न बहुरा गा जो बिछोई। 

अबहूँ फिर फिर रंग सोई । 

सियरि अगिनि बिरहिनि हिय जारा। 

सुलगि सुलगि दगधै भै छारा ।। 

यह दुख दगध न जानै कंतू । 

जोबन जरम करै भसमंतू ॥

पिय सी कहेहु संदेसरा ऐ भँवरा ऐ काग सो धनि बिरहें जारे गई तेहिक धुआँ हम लाग ॥

शब्दार्थ देवस दिवस, दिन। निशि निशा, यत दूभर मुश्किल जनावा-प्रतीत हुआ, मालूम हुआ। सीऊ—शीत, ठंड । पीक – प्रिय, प्रेमी । रूप- सुंदरता । बाहू— नाथ, मालिक। बहूरा-लौटकर । बिछोई—बिछुड़ना। सियरि-शीतल दगधै— जलन में हुई। कंतू कांत,

प्रसंग प्रस्तुत पद्य-खंड मलिक मुहम्मद जायसी विरचित ‘पद्मावत’ के ‘बारहमासा’ प के अंतर्गत संकलित किया गया है। इसमें कवि ने विरहाग्नि में जलती हुई नायिका की मनोदशा का वर्णन किया है।

 व्याख्या कवि कहता है विरहिणी नायिका ठंड के मौसम में वियोगातुर होकर कह रही है कि जगन के महीने में निशा (रात) में काली काली घटाएँ बढ़ी चली आ रही है। मेरा दि रूपी दुख बढ़ रहा है। इस वियोग रूपी दुख को में किस प्रकार दूर करू ? पिया बिन मेरी काटे नहीं कटती। मुझे कोई रास्ता नहीं सूझ रहा। में कहा जाऊ, क्या करू, मेरी समझ में न आता यस्ता सूझेन में जाऊँ कहाँ ? हे प्रियतम । 

तुम्हारी पत्नी अगहन के इन ठडे दिनों में तुम्हारे वियोग में ऐसे जल रही है, जैसे दीपक की बत्ती जलती है। ये विरह के दिन काहे नही कहते। मेरा कलेजा काँपता है। ऐसा मालूम होता है कि ठंड लग रही है। ऐसे मौसम में तुम्हारी पिया पास हो, तभी चैन मिल सकता है। घर-घर में हर एक व्यक्ति चीर (वस्त्र) लेकर मौज मन रहा है। हे मेरे नाथ। मेरे मालिक। तुम जल्दी से आ जाओ। मेरी सुंदरता किस काम की ? तुम जो गए, तो लौट के फिर नहीं आए। अब तो लौटकर आ जाओ। 

यह ठंडी आग विरहिणी प्रियतमा के दिल को जलाती रहती है। इस दारुण दुख को है प्रीतम । तुम क्या जानो ? ये दिए की जगन मेरे यौवन (जवानी) को पल-पल भस्म कर रही है, जला रही है। मेरा यौवन तुम दिन जला जा रहा है। विरहिणी नायिका भँवरे तथा कीए को लक्ष्य करके कह रही है कि है भँवरे। हे कीए। मेरा ये संदेशा मेरे पिया से कहना कि तुम्हारी चाहनेवाली तुम्हें याद कर-करके ज जा रही है। 

जली क्या जा रही है, जल चुकी है तुम्हारी प्राण प्यारी पत्नी तुम्हारे वियोग में जल मरी है। उसकी विरह रूपी अगन में जलने से जो धुआं उठा, वही धुआँ हमें लगा है। इसी कारण हम काले हो गए हैं। कौआ और भँवरा तो घूमते रहते हैं, अतः मेरा संदेशा मेरे प्रिय तक पहुँचा यदि

देंगे, यही विरहिणी का आशय है। सौन्दर्य-बोध-यहाँ कवि ने विरहिणी नायिका नागमती की विरह वेदना को अत्यन्त मार्मिक रूप में चित्रित किया है। ‘दूमर दुख’, ‘किमि काढ़ी’, ‘रूप रंग’, ‘दुख दगव’, ‘जोवन जरम’ इन स्थलों पर अनुप्रास अलंकार की छटा देखने योग्य है। 

फिरे फिरे’, ‘सुलगि सुलगि में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार का प्रयोग हुआ है। ‘जरे विरह ज्यों दीपक बाती’ में रूपक अलंकार को प्रस्तुत किया गया है। बोलचाल में अवधी भाषा का प्रयोग किया गया है। भीर तथ कौए के माध्यम से विरहिणी ने अपनी मार्मिक दशा का सजीव चित्रण प्रस्तुत किया है। संदेश भेजने का यह नायाब तरीका कवियों की अपनी विशेषता है।

2. पूस जाड थरथर तन काँपा सुरुज जड़ाइ लंक दिसि तापा ॥ 

विरह वादि भा दारून सीऊ। 

कपि कपि मरों लेहि हरि जीऊ ॥ 

कंत कहाँ हाँ लागों हियरें। 

पंथ अपार सूझ नहिं नियरें । 

सौर सुपेती आवै जुड़ी जानहं सेज हिवंचल बूढ़ी ॥ चकई निसि बिछुरे दिन मिला। 

हौं निसि बासर बिरह कोकिला | 

रकत डरा माँसू गरा हाइ भए सब संख धनि सारस होइ ररि मुई आइ समेटहु पंख ॥

रैनि अकेलि साथ नहि सखी। 

कैसें जिओ विछोही पंखी ॥ 

विरह सैचान भवे तन चाँड़ा। 

जीवत खाइ मुएँ नहि छाँड़ा ॥

शब्दार्थ : सूरुज – सूरज, सूर्य। लंक– लंका की ओर, दक्षिण दिशा। दिसि दिशा में। भा हो गया। दारुन दारुण, कठिन, अधिक। हियर हृदय । नियरें— निकट, नजदीक । सौर ओढ़नी सुपेती-हल्की हिवंचल-हिम-अंचल, हिमाचल । बूढ़ी-डूबी हुई। बासर बार, दिन। पँखी —— पक्षी। सैचान बाज, श्येन। चाँड़ा-भोजन । रकत – रक्त, खून। गरा-गला, गल गया। ररि-चीख-चीखकर । 

प्रसंग– इस पद में विरहिणी नायिका की शारीरिक तथा मानसिक अवस्था का चित्रण प्रस्तुत किया गया है। यह पद भी ‘पद्मावत’ प्रवन्धकाव्य के ‘बारहमासा’ शीर्षक के अंतर्गत संकलित किया गया है।

व्याख्या-कवि कहता है कि पूस के महीने में इतनी सर्दी पड़ रही है कि शरीर थरथर काँप भी ठंडा मालूम होता है। वह दक्षिण दिशा की ओर चला गया है। इतनी भयंकर ड पड़ रही है। यह विरहिणी की विरह वेदना को और भी बढ़ा रही है। हरेक जीव, प्रत्येक प्राणी है। सूरज औप-कॉप मर रहा है। 

विरहिणी नायिका कहती है-मेरे प्रीतम, तुम कहाँ हो ? तुम आकर मेरे लेने से लग जाओ। मुझे कुछ तो चैन मिले। रास्ता बड़ा लंबा है, मुझे कुछ भी नहीं सूझता। मेरी ओढ़नी हल्की लगती है, मुझे बहुत ठंड लग रही है। ऐसा लगता है जैसे शय्या बर्फ में डूब हो। ठंड इतनी अधिक है कि विस्तर भी बर्फ से ठंडा हुआ लगता है। चकवी रात को बिधुड़कर दिन में मिलती है। कोयल रात-दिन विरह-वेदना में तड़प रही है। 

अकेली ही रात बितानी पड़ती है, उसका दोस्त उसके साथ नहीं है। बिछड़ा हुआ पक्षी कैसे जिए ? विरह के कारण लाकुल बाज पक्षी शरीर का भोजन कर रहा है। वह जिंदा प्राणियों को ही खा रहा है। मरे हुए ही भी नहीं छोड़ता। खून सूख गया है, मांस गल गया है, हड्डियाँ शंख समान पतली हो गई हैं। सारस की पत्नी चीख-चीखकर कह रही है कि मैं मरी जा रही हूँ, आकर मेरे पंख समेट लो । 

सौन्दर्य-बोध– कवि ने इस पद में विरहिणी प्रिया की विरह-दशा का भावपूर्ण वर्णन प्रस्तुत किया है। ‘विरह बाढ़’, ‘कंत कहाँ’, ‘नहिं नियरें’, ‘सीर सुपेती’, ‘बासर विरह’ में अनुप्रास अलंकार की छटा दर्शनीय है। भावों के अनकूल भाषा का प्रयोग उचित रूप से किया गया है। कंप कंपि’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार का प्रयोग है। वियोगिनी नायिका अपनी कथा ‘चकवी” और ‘कोयल’ के द्वारा प्रदर्शित कर रही है।

3. लागेउ माँह पर अब पाला। 

बिरहा काल भएउ जड़काला ।। 

पहल-पहल तन कई जो झाँप हहलि हहलि अधि की हिय काँपै ॥ 

आई सूर होइ तपु रे नाहीं । 

तेहि बिनु जाड़ न छूटै माहाँ ।। 

एहि मास उपजै रस मूलू। 

बिरह पवन होइ मारें झोला ॥ 

नैन चुवहिं जस माहुर नीरू। 

गियँ नहिं हार रही होइ डोरा ॥ 

टूटहिं बुंद परहिं जस ओला । 

तेहि जल अंग लाग सर चीरू ।। 

केहकि सिंगार को पहिर पटोरा लूँ सो भँवर मोर जोबन फूल ॥

तुम्ह बिनप कंता धनि हरुई तन तिनुवर भा डोल। तेहि पर बिरह जराह के चहे जड़ावा झोल ॥

‘शब्दार्थ : माँह-माघ का महीना । पाला ओस। जड़काला— मृत्यु । सूर—सूर्य, सूरज । नाहाँ—पति । मूलू जड़ों में। पवन – हवा। माहुर – बादलों की वर्षा । नीरू — जल, नीर। गिय- झोला- झकझोरना। पटोरा रेशमी वस्त्र तिनुबर तिनका । 

प्रसंग — प्रस्तुत पद्य जायसी विरचित ‘पद्मावत’ से लिया गया है। इसमें कवि ने विरहिणी नायिका की विरह-वेदना को बहुत सुंदर तरीके से वर्णित किया है। व्याख्या – कवि विरहिणी प्रेयसी की विरह वेदना को इस प्रकार व्यक्त कर रहा है-वियोगरत नायिका कि अब माघ का महीना शुरू हो गया है और पाला (ओस) पड़ने लगा है। 

विरह का समय ऐसे लगता है उ ले-पहले तो शरीर पर रुई, रजाई आदि बोलने पर और भी अधिक ठंड लगती है और सर्दी से शरीर के निकलने पर पति को गर्मी लगती है और उसके बिना माघ में जाड़ा दूर नहीं होता, ठंड नहीं टिबी, सर्दी नहीं मिटती। इस माघ के महीने में पेड़ों की जड़ों में रस उत्पन्न होता है। 

पेड़ों और अधिक दुख देती है। पति के वियोग में आँखें इस प्रकार बरसती हैं मानो बादल बरस रहे हो। में रस पैदा होने लगता है। विरह की हवा झकझोरने वाली है अतः वह हमें और ठंड के मारे गरदन नहीं हिलती। ऐसा लगता है मानो धागा हिल रहा हो। बूँद गिरती है, तो ऐसे है मानो ओले पड़ रहे हो। आँसुओं का जल जब अन्य अंगों पर पड़ता है तो ऐसे प्रती होता है मानो बाण शरीर को चीर रहे हों। 

रेशमी वस्त्रों का सिंगार में किसके लिए करूँ ? मेरे सरजू पिया ही जब मेरे पास नहीं है तो इन रेशमी वस्त्रों को पहनने से क्या लाभ? मेरा जवानी फूल की तरह है और तुम भार की तरह हो। भौरा एक फूल से दूसरे फूल प रहता है फूलों का रस चूसता है और उड़ जाता है। 

अन्त में विरहिणी नायिका त नाथ, तुम्हारे बिना तुम्हारी कांता (पत्नी) शरीर से हार गई है, कमजोर हो गई है की तरह हिल रही है। उस पर विरह रूपी अग्नि उसे जला रही है। ऐसा लगता है उड़ा देना चाहती है, समाप्त करना चाहती है। मैं विरह की अगन में जल रही हूँ । है मेरे तुम आ जाओ और अपनी प्राण-प्यारी को बर्बाद होने से बचा लो। और मानी है अलका

सौन्दर्य-बोध– ‘तेहि जल अंग लाग सर चीरू’ में रूपक अलंकार का प्रयोग किया है। ‘हूँ सो भँवर मोर जोबन फूलू’ में उपमा अलंकार का सुंदर प्रयोग हुआ है। पति को तथा पत्नी को ‘फूल’ के समान कवि ने चित्रित किया है। कवि का काव्य-सौन्दर्य विशेष देने योग्य है। ‘पहल-पहल’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार का प्रयोग किया गया है। भावानुकूल प्रयुक्त की गई है। ‘पहिर पटोरा’ में अनुप्रास अलंकार का प्रयोग किया गया है। तिनुदर में भी अस अलंकार की शोमा दर्शनीय है।

4. फागुन पवन झकोरै बहा। 

चौगुन सीउ जाइ किमि सहा ॥ 

तन जस पियर पाता भा मोरा। 

बिरह न रहै पवन होइ झोरा ॥ 

तरिवर झरझर वन ढाँखा । 

भइ अनपत्त फूल फर साखा ॥ 

करिन्ह बनाफति कीन्ह हुलासू। 

मो कहँ भा जग दून उदासू ।। 

फाग करहि सब चाँचर जोरी। 

मोहिं जिय लाइ दीन्हि जसि होरी जौं मै पियहि जरत अस भावा । 

जरत मरत मोहि रोस न आवा ॥ 

राति देवस इहै मन मोरें। लागों कंत छार ? जेऊँ तोरें ॥

यह तन जारों छार के कहाँ कि पवन उड़ाउ । 

मकु तेहि मारग होइ परौं कंत घरें जहँ पाठ ।।

शब्दार्थ : अनपत्त – पत्तों से रहित। फर-फल। बनाफति वनस्पति। हुलास उत्साह दून— द्विगुण, दुगुना । चाँचरिहोली के समय खेला जाने वाला ‘चरचरि’ नामक एक खेर जिसमें सभी एक दूसरे पर रंग डालते हैं। होरी – होली। पियहि पिया। रोस रोष, क्रष राति–रात्रि, रात म मानो, काचिपा पाँव पैर प्रसंग प्रस्तुत प्रसंग ‘पद्मावत’ से लिया गया है। इसमें कवि ने विरहिणी की मनो वर्णन करते हुए कहा है कि फाल्गुन में सभी होली खेल रहे हैं, किंतु विरहिणी नारी विरह-वेदन से दुखी हो रही है।

व्याख्या— फागुनी हवा झकझोर रही है। उसके चलने से ठंड चौगुनी हो गई है। वह कै सही जाए, क्योंकि पिया के बिना, यह पवन अत्यंत दुखदायी लग रहा है। मेरा शरीर तो पत्ते को तरह हो गया है। जैसे हवा पत्ते को उड़ा ले जाती हैं, ऐसे ही मेरे तन को उड़ा ले जाए विरह न रहे। वृक्ष झड़ने लगे हैं। जंगल में ढाक के पत्ते झड़ने लगे हैं। 

शाखाए फूल और पत्तों से रहित हो रही हैं। मोटु छ की कि संसार में दुगुनी उदासी छा गई है। लोग फागुन में एक-दूसरे को रंगदे वे हैं। मेरे मन में तो ऐसा लग रहा है कि जैसे होली जल रही हो। पिया से अलग होकर, उसके ई है। ये सभी जैसे बिना मेरे भाव जैसे जल रहे हैं, ऐसी अवस्था में मुझे जलते-मरते हुए क्रोध नहीं आ रहा। 

दिन- उत मेरे मन में इसी तरह के भाव उठते रहते हैं। अपने पति को छोड़कर मैं कहाँ जाऊँ ? भा विरहिणी नायिका कहती है कि या तो इस शरीर को प्राण छोड़ जाएँ या हवा इसे आ है है जाए। वियोगिनी नार कहती है कि कदाचित् मुझे वह रास्ता मिल जाए, जहाँ मेरे पिया के पाँव पड़े हों। मेरे प्रीतम ने पैर रखे हों, तो मैं उस रास्ते पर चली जाऊँ। क्या पता मुझे मेरे पिया मिल ही जाएँ? इस पद द्वारा नायिका की विरह-वेदना की मार्मिकता का पता चलता है!

दोहरे हरे में पुन प्रकाश अलंकार है। फूल फरम इन पदों में अनुप्रास अलंकार की शोभा दर्शनीय है। भाषा का प्रयोग भावों अनुरूप किया गया है। ‘कत घरे जह पाउ’ के द्वारा नायिका की मार्मिक दशा का सजीव चित्रण सुत किया गया है।

बारहमासा के प्रश्न उत्तर | NCERT Solutions Class 12 Hindi Elective Chapter 8 Question Answer

प्रश्न 1. अगहन मास की विशेषता बताते हुए विरहिणी (नागमती) की व्यथा-कथा का अपने शब्दों में कीजिए। चित्रण

“उत्तर – अगहन के महीने में ठंड अधिक पड़ती है। दिन में भी आसमान वादलों से घिरा ता है। उन्हें देखकर ऐसा लगता है मानो रात सी है। विरहिणी काले बादलों को देखकर कहती  कि यह दारुण-दुख कैसे दूर किया जाए। इस महीने में आग भी ठंडी लगती है और यह के जिया और भी अधिक जलाती है विरहिणी पति वियोग में ऐसे जलती रहती है, दीपक की बाती जलती रहती है।

प्रश्न 2. ‘जीवत खाइ मुएँ नहिं छाँड़ा’ पंक्ति के संदर्भ में नायिका की विरह-दशा का वन अपने शब्दों में कीजिए । 

उत्तर- ‘जीयत खाइ मुएँ नहिं छाँड़ा’ पंक्ति में यह बताया गया है कि चील, कीए बाज आदि क्षी मुर्दे के माँस को नहीं छोड़ते अर्थात् मरे हुए आदमी तथा पशु इत्यादि का माँस खाते हैं, केतु विरह रूपी बाज पक्षी तो मुझ जीवित का ही माँस खाए जा रहा है। यहाँ विरह की उपमा बाज पक्षी से की गई है। 

बाज पक्षी मरे हुए का माँस खाते हैं किंतु विरह-दशा में आदमी जीते-जी कमरे हुए के समान बन जाता है। विरहिणी की मनोदशा को कवि ने चकवी और कोयल से उपमित किया है। चकवी अपने साथी से रात को बिछुड़ जाती है और दिन में मिलती है। कोयल बात-दिन वियोग में तड़पती है। इसी तरह विरहिणी की दशा है।

प्रश्न 3. माघ महीने में विरहिणी को क्या अनुभूति होती है ? 

उत्तर— माघ महीने में पाला पड़ने के कारण विरहिणी नायिका पिया वियोग में जड़वत् हो जाती है। पति के बिना भयानक ठंड रजाई ओढ़ने से भी दूर नहीं होती। विरहिणी कहती है कि मेरा जिया पिया बिन काँपता रहता है। वह कहती है कि विरह के कारण मेरी आँखों से आँसू बहते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे बादल जल बरसा रहे हो। उनका पानी शरीर के अन्य अंग पर बाण से चीरने के समान कष्टदायी लगता है। इस पद में विरहिणी की वेदना का मार्मिक चित्रण प्रस्तुत किया गया है।

प्रश्न 4. वृक्षों से पत्तियाँ तथा वनों से ढाँखें किस माह में गिरते हैं ? इससे विरहिणी का क्या संबंध है ?

उत्तर- वृक्षों से पत्तियाँ तथा वनों से ढाँखें फागुन मास में गिरते हैं। जैसे वे गिरते हैं, ऐसी ही मनोदशा विरहिणी नायिका की इस मास में होती है। इस मास में जैसे शाखाएँ फलों तथा फूलों से रहित हो जाती है और वन ढाखों से रहित होते हैं, ऐसी ही स्थिति विरहिणी की होती है। 

वनस्पतियाँ उदास हो जाती हैं, किन्तु वियोगिनी तो दुगुनी उदास हो रही है। एक तो वह फागुन मास में रंग नहीं खेल पाती, दूसरा पति वियोग की वेदना। वह कहती है कि सब रंग खेल रहे. है किंतु मुझे लगता है, जैसे होती जल रही है। 

प्रश्न 5. निम्नलिखित पंक्तियों की व्याख्या कीजिए-

(क) पिय साँ कहे संदेसरा ऐ भँवरा ऐ काग । सो धनि विरहें जरि गई तेहिक धुआँ हम लाग। 

(ख)रकत ढरा माँसू गरा हाड़ भए सब संख। धनि सारस होइ ररि मुई आइ समेटहु पंख || 

(ग) तुम्ह बिनु कता हरुई तन तिनुवर भा डोल। केहि पर बिरह जलाई के यह उड़ावा झोला ॥

(घ) यह तन जारौं छार के कहौं कि पवन उड़ाउ । मकु तेहि मारग होई परौं कत धरै जह पाठ ।

उत्तर—पंक्तियों का आशय-

(क) इस पद में विरहाग्नि के कारण कौए और भँवरे को काले रंग से चित्रित किया गया है। नायिका कहती है कि है, पक्षियो, तुम मेरे पिया को यह संदेश देना कि हम तुम्हारी पत्नी की विरहाग्नि से उत्पन्न चुएँ के कारण काले हुए हैं। तुम्हारी पत्नी जिस अग्नि में जल गई, उससे यहा धुआँ उठा है। इस कारण हमारा रंग काला हो गया है। अभिप्राय यह है कि तुम्हारी पत्नी तुम्हारे वियोग में बहुत व्याकुल है। 

(ख) खून ढल गया है, माँस गल गया है, हड्डियाँ शंख की तरह सूख गई हैं। तुम्हारे वियोग में तुम्हारी पत्नी सारस की तरह पतली हो गई है, आकर उसके पंख समेट लो। कहने का अभिपायः है कि पति वियोग में तुम्हारी प्रिया सूखकर काँटा हो गई है। तुम जल्दी से आ जाओ और उसको मरने से बचा लो। उसे तुम्हारा ही इंतजार है।

(ग) पति के बिना पत्नी पेड़ के सूखे पत्ते की तरह हो गई है। एक पवन का झोंका जैसे | पत्ते को उड़ा ले जाता है, ऐसे ही छोटा-सा दुख भी उसे नष्ट करने में समर्थ है। इस पर विरह रूपी अग्नि तुम्हारी विरहिणी को जलाती रहती है। कवि ने इस पद के द्वारा विरहिणी की मार्मिक दशा का चित्रण किया है।

(घ) कवि कहता है कि विरहिणी नारी इतनी दुखी होती है कि उसके मन में आता है कि पति बिन बेकार इस तन को मैं जलाऊँ या हवा इसे उड़ा कर ले जाए। मुझे अचानक ऐसा मार्ग मिल जाए, जिस पर मेरे पति के पाँव पड़े हों और में उस पर चल दूँ तथा मेरी उससे मुलाकात हो जाए। इसमें विरहिणी की पिया मिलन की तीव्र उत्कंठा की मार्मिक अभिव्यंजना की गई है। शोचनीय होती है। उसी को कवि ने बाज द्वारा खाया जाना कहा है। काव्य की दृष्टि से सटीक दी गई है।



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FAQs

प्रश्न 1. पूस के महीने में विरहिणी की क्या दशा होती है ? इसका वर्णन अपने शब्दों ३ कीजिए।

उत्तर- पूस के महीने में दारुण ठंड पड़ती है, जिस कारण विरहिणी का शरीर थरथर काँपता है। सूरज भी ठंड को दूर करने में समर्थ नहीं होता, क्योंकि इस मास में वह बहुत कम दर्शन देता है। वह दक्षिण दिशा में जाता है। दक्षिण में लंका है, वहाँ वह ताप और प्रकाश विशेष रूप से प्रदान करता है। विरहिणी कहती है कि हे मेरे प्रीतम, तुम मेरे पास आ जाओ, ताकि मेरी दूर हो सके। इस पद में अनुप्रास तथा पुनरुक्ति का व्यापक प्रयोग किया गया है तथा विरहिणी की माकुल मनोदशा का सजीव चित्रण प्रस्तुत किया गया है। 

प्रश्न 2. विरहिणी द्वारा अपने प्रीतम को भँवरा क्यों कहा गया है ? इसका वर्णन किस पद में किया गया है ? बताइए।

उत्तर–विरहिणी द्वारा अपने प्रेमी को भँवरा इसलिए कहा गया है क्योंकि वह बाहर रह रहा है और आने का नाम नहीं ले रहा। जैसे भँवरा एक फूल से दूसरे फूल पर मँडराता है, ऐसी ही स्थिति उसे अपने कंत की लगती है। नायिका अपने यौवन को फूल की तरह बताती है और अपने प्रीतम को संबोधित करके कहती है कि तुम हो तो में और मेरा पवन हैं, तुम आकर इस फूल का रस ले लो। फूल इस पद में रूपक अलंकार का प्रयोग किया गया है। नायिका ने अपनी उपमा फूल से की है तथा अपने प्रीतम की उपमा भँवरे से की है।

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