NCERT Solutions Class 12 Hindi Elective Chapter 9 Question Answer | अध्याय 9 पद (विद्यापति)

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NCERT Solutions Class 12 Hindi Elective Chapter 9 Question Answer | अध्याय 9 पद (विद्यापति)

कक्षा | Class12th 
अध्याय | Chapter09
अध्याय का नाम | Chapter Name(क) पद
कवि का नाम | Poet Nameविद्यापति
किताब | Bookअंतरा ऐच्छिक | Hindi Elective
खंड | Sectionकाव्य खंड | Poetry Section
बोर्ड | Boardसभी हिंदी बोर्ड
किताब | Book एनसीईआरटी | NCERT
विषय | Subjectहिंदी | HINDI
अध्ययन सामग्री | Study Materialsप्रश्न उत्तर | Question answer

विद्यापति का जीवन परिचय | Biography of Vidyapati

उत्तर-जीवन-परिचय-विद्यापति का जन्म 1380 ई. के आसपास बिहार के मधुबनी अले के विस्पी नामक गाँव में हुआ था। यद्यपि उनके जन्म काल के संबंध में प्रामाणिक सूचना उपलब्ध नहीं है तथा उनके आश्रयदाता मिथिला नरेश राजा शिव सिंह के राज-काल के आधार पर उनके जन्म और मृत्यु के समय का अनुमान किया गया है। विद्यापति साहित्य, संस्कृति, संगीत, ज्योतिष, इतिहास, दर्शन, न्याय, भूगोल आदि के प्रकांड विद्वान थे। सन् 1460 ई. में उनका देहावसान हो गया।

NCERT Solutions Class 12 Hindi Elective Chapter 9
image credit: jagran

विद्यापति बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि और तर्कशील व्यक्ति थे। उनके विषय में यह विवाद रहा है कि वे हिंदी के कवि हैं या बंगला भाषा के, किंतु अब यह स्वीकार्य तथ्य है कि वे मैथिली भाषा के कवि थे। वे हिंदी साहित्य के मध्यकाल के ऐसे कवि हैं जिनके काव्य में जनभाषा के माध्यम से जनसंस्कृति को अभिव्यक्ति मिली है। वे साहित्य, संस्कृति, संगीत, ज्योतिष, इतिहास,

दर्शन, न्याय, भूगोल आदि विविध विषयों का गंभीर ज्ञान रखते थे। उन्होंने संस्कृत, अपभ्रंश और मैथिली तीन भाषाओं में काव्य-रचना की है। इसके साथ ही उन्हें अपनी समकालीन कुछ अन्य बोलियों अथवा भाषाओं का ज्ञान था। वे दरबारी कवि थे, अतः दरबारी संस्कृति का प्रभाव उनकी महत्त्वपूर्ण रचनाओं— ‘कीर्तिलता’ व ‘कीर्तिपताका’ पर देखा जा सकता है। उनकी ‘पदावली’ उनको यशस्वी कवि सिद्ध करती हैं।

रचनाएँ विद्यापति की महत्त्वपूर्ण कृतियाँ हैं कीर्तिलता, कीर्तिपताका, पुरुष-परीक्षा, भू-परिक्रमा, लिखनावली और विद्यापति पदावली।

भाषा-शैली विद्यापति मूलतः मैथिली के कवि हैं। उन्होंने संस्कृत और अप में भी पर्याप्त साहित्य की रचना की है। उनकी भाषा लोक व्यवहार की भाषा है। वास्तव में उनकी रचनाओं में जनभाषा में जनसंस्कृति की अभिव्यक्ति हुई है। उनकी भाषा में आम बोलचाल के मैथिली शब्दों का पर्याप्त प्रयोग हुआ है।

काव्य-सौन्दर्य विद्यापति के पद मिथिला क्षेत्र के लोक व्यवहार व सांस्कृतिक अनुष् में खुलकर प्रयुक्त होते हैं। उन पदों में लोकानुरंजन व मानवीय प्रेम के साथ व्यावहारिक जीवन के विविध रूपों को बड़े मनोरम व आकर्षक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। राधा-कृष्ण को माध्यम बनाकर लौकिक प्रेम के विभिन्न रूपों को वर्णित किया गया है, किंतु साथ ही विविध देवी-देवताओं की भक्ति से संबंधित पद भी लिखे हैं जिससे एक विवाद ने जन्म लिया कि विद्यापति श्रृंगारी कवि हैं या भक्त कवि विद्यापति को आज श्रृंगारी कवि के रूप में मान्यता प्राप्त है।

विद्यापति के काव्य में प्रकृति के मनोरम रूप भी देखने को मिलते हैं। ऐसे पदों में पद- साति के साथ कवि के अपूर्व कौशल, प्रतिभा तथा कल्पनाशीलता के दर्शन होते हैं। समस्त काव्य में प्रेम व सौंदर्य की निश्छल व अनूठी अभिव्यक्ति देखने को मिलती है। विद्यापति मूलतः श्रृंग के कवि हैं, माध्यम राधा व कृष्ण हैं। इन पदों में अनुपम माधुर्य है।

ये पद गीत-गोविंद के अनुकर करते हुए लिखे गए प्रतीत होते हैं। उन्होंने भक्ति व शृंगार का ऐसा सम्मिश्रण प्रस्तुत किया। जैसा अन्यत्र मिलना संभव नहीं है। निष्कर्ष रूप में कहें तो यह कहना अनुचित न होगा कि विद्यापति के वर्ण्य विषय के तीन क्षेत्र है अधिकांश पदों में राधा और कृष्ण के प्रेम के ि पक्षों का वर्णन हुआ है। कुछ पद शुद्ध रूप से प्रकृति के सौंदर्य का वर्णन करते हैं और कु

पद विभिन्न देवी– देवताओं की स्तुति में लिखे गए हैं। ध्वन्यात्मकता विद्यापति के पद संगीतात्मक होने के कारण गेय हैं। उनमें ध्वन्यात्मकत का गुण अत्यंत आकर्षक है। चित्रात्मकता विद्यापति की रचनाओं में प्रकृति अथवा मानवीय रूप के सौन्दर्य-वर्णन चित्रात्मकता का गुण प्रबलता से प्रकट हुआ है। जैसे—’भोरहि सहचरि कातर दिठि देऊ, लोचन पानि ।’

बिंब-विधान—उनकी रचनाओं में विशेष दृश्यों के वर्णन में उत्कृष्ट बिंब-सृजन हुआ है जैसे- “एकसरि भवन पिआ बिनु रे मोरी रहलो न जाए”, “जनम अवधि हम रूप निहारत न तिरपित भेल”।

अलंकार-योजना विद्यापति के पदों में अलंकारों का बड़ा ही सुंदर प्रयोग हुआ है। 

अनुप्रास “मोर मन हरि हर लए गेल”, “कोकिल-कलरव मधुकर धुनि सुनि” आदि। 

रूपक — ‘हेरि कमलमुखि’ ।

पुनरुक्ति प्रकाश-हरि-हरि’, ‘छन-छन’, ‘तिल-तिल’, ‘लाख-लाख’, ‘सुन-सन’ पद-लालित्य-सुंदर शब्द चयन से अनुपम पद- लालित्य की रचना हुई है। जैसे- “कुसुमित कानन हेरि कमलमुखि, मुदि रहए दुनयान कोकिल-कलरव, मधुकर-धुनि सुनि, कर दे कान।”

प्रतीक योजना विद्यापति ने अपने काव्य में आकर्षक प्रतीक योजना की है।

प्रकृति का मानवीकरण—विद्यापति की रचनाओं में प्रकृति का मानवीकरण अत्यंत मनोहारी रूप में हुआ है। जैसे- “तोहर बिरह दिन छन-छन तनु छिन चौदसि चाँद-समान” । 

समग्रतः विद्यापत कि काव्य में भक्ति, प्रेम और सौन्दर्य की श्रृंगारपूर्ण अभिव्यक्ति जितनी निश्छलता से हुई है, वह अन्यन्त्र दुर्लभ है। मिथिला क्षेत्र की लोक-संस्कृति का मनमोहक चित्रण करने के कारण ही विद्यापति के पद वहाँ के लोक व्यवहार और सांस्कृतिक अनुष्ठानों में रच-बस गए हैं। अपने अनुपम भाव-सौन्दर्य एवं आकर्षक काव्य-शिल्प के कारण कवि विद्यापति का हिंदी काव्य-जगत में उत्कृष्ट स्थान है।

जॉर्ज अब्राहम गियर्सन कहते हैं-“हिंदू धर्म का सूर्य अस्त हो सकता है, वह समय भी आ सकता है जब कृष्ण में विश्वास और श्रद्धा का अभाव हो जाए, कृष्ण-प्रेम की स्तुतियों के प्रति जो भवसागर के रोग की दवा है-विश्वास जाता रहे, तो भी विद्यापति के गीतों (पद) के प्रति, जिनमें राधा और कृष्ण के प्रेम का वर्णन है, लोगों की आस्था और श्रद्धा कभी कम न होगी।”

पाठ का सारांश | lesson summary

प्रस्तुत पाठ में विद्यापति के तीन पद लिए गए हैं। प्रथम पद में विरहिणी के हृदय की पीड़ा का हृदयस्पर्शी चित्रण किया गया है। दूसरे पद में प्रियतमा अपनी सखी से चर्चा करती है कि वह जन्मों से अपने प्रिय का दर्शन करती आ रही है परन्तु उसे अभी तक संतुष्टि नहीं मिली है। तीसरे पद में कवि ने विरहिणी की घोर पीड़ा का चित्रण किया है जिसके कारण उसके नेत्रों से अश्रुओं की धारा बही जा रही है।

class 12th NotesMCQ
HistoryPolitical Science
EnglishHindi

पद सप्रसंग व्याख्या एवं शब्दार्थ | पद सप्रसंग व्याख्या NCERT

1.के पतिआ लए जाएत रे मोरा पिअतम पास । 

हिए नहि सहए असह दुख रे भेल साओन मास ।।

एकसरि भवन पिआ बिनु रे मोहि रहलो न जाए। 

सखि अनकर दुख दारुन रे जग के पतिआए । 

मोर मन हरि हर लए गेल रे अपने मन गेल । 

गोकुल तेज मधुपुर बस रे कन अपजस लेल ॥

विद्यापति कवि गाओल रे धनि धरु मन आस ।

आओत तोर मन भावन रे एहि कार्तिक मास ।। 

शब्दार्थ : के—कौन । पतिआ— पत्र, चिट्ठी । लए जाएत ले जाए। मोरा— मेरे। पिअतम- प्रियतम, प्रेमी। हिए— हृदय में। सहए—सहना। असह—असहनीय, न सहने योग्य। भेल—हो गया। साओन-सावन, श्रावण । एकसरि अकेली । पिआ— प्रिया, प्रियतम। रहलो― रह सकना । अनकर—अन्यतम, अत्यधिक दारुन दारुण, भयंकर। पतिआए विश्वास करे। हर लए गेल—हर कर ले गए। अपनो— मेरा। गेल गए, चले गए। तेजि—तज कर, छोड़कर। मधुपुर- मथुरा। बस-बस गए। अपजस अपयश गाओलगाइए। आओत-आ रहा है। तोर-तेरा मन भावन-मन को भाने वाला, प्रियतम। एहि – इसी ।

प्रसंग — प्रस्तुत पद मैथिल कोकिल विद्यापति द्वारा विरचित ‘पदावली’ से संकलित है। यह हिंदी की पाठ्य-पुस्तक में विद्यापति पाठ के ‘पद’ में उल्लिखित है। शृंगार और प्रेम के उदात्त चितेरे विद्यपाति इस पद में उस नायिका (राधा) के विरह का रहे हैं. जिसके प्रितम श्रीकृष्णले गए हैं।

व्याख्या अलौकिक प्रणय सूत्र में बँधी नायिका (राधा) का विरह हृदय को उद्वेलित कर रहा है। वह कहती है-मेरे प्रियतम (श्री कृष्ण के पास कौन मेरा प्रणय-पत्र ले जाएगा? मेरा हृदय उनके वियोग का असहनीय दुख नहीं सह पा रहा है। सावन का महीना आ गया है। पूरे (विशालकाय भवन में प्रियतम के बिना मुझसे अकेले रहा ही नहीं जा रहा है। हे सखी। यह विरह एक अन्यतम और भयंकर दुख है। 

संसार में मेरे इस दुख का कौन विश्वास करे? मेरा मन हरि (भगवान श्री कृष्ण) हर कर ले गए हैं। मेरा मन उनके साथ ही चला गया है। उन्होंने गोकुल त्याग दिया है। वे अब मुथरा (मधुपुर) में रह रहे हैं। ऐसा करके उन्होंने कितना अपयश लिया है? अथवा मै वहाँ जाकर भला कैसे अपयश ले लूँ? विद्यापति कवि कह से हैं कि तुम अपने मन में आशा और विश्वास रखो। तुम्हारे मन को भाने वाले प्रियतम इसी कार्तिक के महीने में तुम्हारे पास आ रहे हैं।

सौन्दर्य-बोध — उक्त पद में प्राचीन मैथिली भाषा का प्रयोग हुआ है। इसमें ब्रजभाषा का भी अंतर्निहित मिश्रण है। प्रियतम के वियोग में विरहिणी नायिका को कवि द्वारा उसके मिलन का आश्वासन देना एक अन्यतम प्रयोग है। भाषा में भाव, प्रकरण और दशा के अनुकू शब्दावली का प्रयोग हुआ है। इसमें करुण, शांत और भक्ति का अनुपम समन्वय है। इसमें तद्भव के साथ-साथ तत्सम शब्दों का भी प्रयोग हुआ है। यहाँ अनुप्रास अलंकार का प्रयोग है।

2.सखि है, कि पुछसि अनुभव मोए । 

सेह पिरिति अनुराग बखनिअ तिल-तिल नूतन होए ।।

जनम अवधि हम रूप निहारल नयन न तिरपित भेल ॥

सेहो मधुर बोल स्त्रवनहि सूनल स्रुति पथ परस न गेल ।। 

कत मधु-जामिनी रभस गमाओलि न बूझक कइसन केलि ॥ 

लाख लाख जुग हिअ हिअ राखल तइओं हिअ जरनि न गेल ॥ 

कत बिदगध जन रस अनुमोदए अनुभव काहु न पेख ॥

विद्यापति कह प्रान जुड़ाइते लाखे न मीलल एक ॥

शब्दार्थ  पिरिति—प्रीति, प्रेम। अनुराग आसक्ति। बखानिअ – बखान करना। नूतन—नया। सेहो वही । स्त्रवनहि — कानों से । सूनल-सुनना। स्स्रुति-पथ — श्रवण मार्ग । कत—कितनी । मधु-जामिनी — मधुर रात्रि । रभस— रमण । गमाओलि बिता दी, गुजार दी, गवाँ दी। कइसन – कैसा हिअ हृदय जरनि-जलन। गेल गई। विदगथी, विदय अनुमोदर अनुमोदन पेख देख जुदाइने—जुड़ाने के लिए।

प्रसंग — प्रस्तुत पद हिंदी की पाठ्य पुस्तक ‘अंतरा भाग-2’ के विद्यापति पाठ से संकलित है। उक्त पद विद्यापति की ‘पदावली’ से संगृहीत है। प्रियतम के विरह में जन्म-जन्मांतर की निरंतर प्रतीक्षा का अनिर्वचनीय व मार्मिक विवेचन यहाँ किया गया है।

व्याख्या- अपने प्रियतम के वियोग में व्याकुल नायिका की व्यथा देखते ही बनती है। वह अपनी सहेली को बता रही है-हे सखी तुम मेरा क्या अनुभव पूछ रही हो ? अपने प्रियतम के उसी अनुराग (प्रेम) का आज भी अनुभव करती हूँ। उसका बखान करते ही वह प्रतिपत नया होता रहता है।

जन्म से लेकर अब तब उनके रूप का दर्शन (अपने अंतर्मन में ही कर रही हूँ तब भी मेरे को संतुष्टि (तृप्ति) नहीं हो रही है। उनका वही प्रय आज भी अपने कानों से सुन रही हूँ। इस दशा में भी मेरा श्रवण मार्ग संतृप्त नहीं है। मैंने अपने प्रियतम के साथ कितनी ही (असंख्य) मधुर राते विताई हैं। मत पूछो वह कामक्रीड़ा कैसी थी। लाखों युगों से उसे हृदय में धारण किया हुआ है, तब भी हृदय में से जलन नहीं गई है। इतनी

अधिक व्याकुलता होने पर भी रस का अनुमोदन है। ऐसा अनुभव कौन च सकता है ? विवा कहते हैं कि प्राणों को धारण किए रहने के लिए उसके एक बार मिलने की प्रतीक्षा है। 

सौन्दर्य-बोध यहाँ प्राचीन मैथिली का प्रांजल प्रयोग सराहनीय है। भाषा में भायें यथावत् प्रस्तुत करने की अनूठी अभिव्यक्ति है। नायक से मिलन कि लिए जन्म-जन्मांतर तक निरंतर प्रतीक्षारत रहने के माध्यम से प्रेम के अलौकिक तथा अनिर्वचनीय श्रेष्ठत्व को प्रदर्शित किया गया है। 

भाषा में कोमलकांत पदावली, भाव-प्रबलता, सहज अभिव्यक्ति आदि के कारण अनुपम योजना लक्षित है। विप्रलंभ शृंगाररस की विलक्षण योजना की गई है। ‘तिल-तिल’, लाख-लाख’, ‘हिअ-हिअ’ आदि में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है। प्रेम के उदात्त और विलक्षण रूप को प्रदर्शित किया गया है। भाव-शिल्प तथा कला-शिल्प की दृष्टि से यह उत्तम काव्य का उदाहरण है।

3. कुसुमित कानन हेरि कमलमुखि

मूदि रहए दुनयान ।

कोकिल-कलरव, मधुकर धुनि सुनि

कर देइ झापड़ कान ॥ 

माधब सुन-सुन वचन हमारा।

तुअ गुन सुंदरि अति भेल दूबरि- गुनि गुनि प्रेम तोहारा ॥

घरनी धरि धनि कत बेरि बइसइ,

पुनि तहि उठड़ न पारा। 

कातर दिठि करि, चौदिस हेरि-हेरि

नयन गरए जल-धारा ॥

तोहर बिरह दिन छन-छन तनु छिन चौदसि चाँद समान ।

भनइ विद्यापति सिवसिंह नर-पति

शब्दार्थ : कुसमित- फूलों से लदे। कानन–जंगल, वन हेरि—देखकर। कमलमुखि- हे कमल जैसे मुख वाली। मूदि-मींच कर बंद करके। नयान- नेत्र, नयन। कोकिल — कोयल । मधुकर-भीरा झाँप बंद कर दे। सुंदरि सुंदरी नायिका। गुनि-गुनि सोच-सोचकर । घरनि— धरती । धनि स्त्री । धारि— पकड़कर, घरकर। कातर—दुखी। दिठि दृष्टि। हेरि हेरि- देख रही है। बइसइ बैठ जाती है। चौदिस-चारों दिशाएँ । गरए— गिरना । जलधारा- अश्रुधारा । रमान – रमण। चौदसि― चौदस, चतुर्दशी । 

प्रसंग — प्रस्तुत पद वियोग में विरहिणी नायिका कह रही है-है सखी । उपवन पूर्ण रूप से फूलों से लदा हुआ है। यहाँ कवि ने विरहातुर नायिका का दुखभरा चित्रण किया है। 

व्याख्या – प्रियतम के वियोग में विरहिणी नायिका कह रही है है सखी! उपवन पूर्ण रूप “से फूलों से लदा हुआ है। यहाँ कमल रूपी मुख को देखकर हृदय द्रवित हो गया। दोनों नेत्रों को अपने हाथों से ढाँप (ढक) लिया। कोयल का मधुर कलरव तथा भँवरे की कर्णप्रिय गुजार को सुनकर दोनों हाथों से कानों को झाँप (ढक) लिया। हे माधव! हमारे वचनों को सुन-सुनकर भी अनसुना कर लिया गया। तुम्हारे गुणों पर आकर्षित सुंदरी अधिक दुर्बल (दुवाली, कमजोर) हो गई है तुम्हारे प्रेम को सोच-सोचकर हमारी यह दशा (दुर्दशा) हो गई है। यह नारी इतनी शिथिल हो गई है कि धरती पर बैठे जाने के बाद उसी पर घरी (बेटी) रहती है। 

वहाँ से वह उठ नहीं पाती है। दुखी (आतुर) दृष्टि से चारों ओर देख रही है। इस अवस्था में नेत्रों से निरंतर अश्रुधारा बह रही है। तुम्हारे विरह के इन दिनों में प्रतिक्षण शरीर उसी तरह क्षीण हो रहा है जैसे चौदस का चाँद प्रतिदिन निरंतर क्षीण होता (घटता) रहता है। विद्यापति अपने आश्रयदाता राजा शिवसिंह से कहते हैं कि इन नायिका का नायक से रमण किस तरह से हो, यह विचारणीय है।

सौन्दर्य-बोध — पद की भाषा प्राचीन मैथिली है, किंचित् जटिल हो गई है। नायक के वियोग विरहातुर नायिका की मनोदशा का सजीव एवं मार्मिक चित्रण किया गया है। नायिका वोगावस्था में अपनी सुध-बुध खो बैठी है। यह विप्रलंभ शृंगार का मर्मस्पर्शी उदाहरण है। मलकांत पदावली द्वारा भावों की स्वाभाविक प्रस्तुति स्तुत्य है।

 ‘सुमित कानन’, ‘कोकिल-कलरव’, धरती धरि परि आदि में अनुप्रास अलंकार की सुंदर योजना द्रष्टव्य है। ‘कमलमुखि’ में रूपक अलंकार है। यहाँ नायिका की दशाओं का मानवीकरण किया गया है।  ‘तोहर में दृष्टांत अलंकार है। विप्रलंभ श्रृंगार के साथ करुण रस की हृदयस्पर्शी योजना है। 

पद के प्रश्न उत्तर | NCERT Solutions Class 12 Hindi Elective Chapter 9 Question Answer



प्रश्न 1. प्रियतमा के दुख के क्या कारण हैं ? 

उत्तर—प्रियतमा के पास उसका प्रियतम नहीं है। सावन का महीना होने पर भी वह भवन में अकेली है। उसके मन को प्रियतम हर कर ले गया है। वह संसार में किस पर विश्वास करे? उसके प्रियतम गोकुल को छोड़कर मथुरा चले गए हैं। अंततः वह बहुत दुखी है।

प्रश्न 2. कवि नयन न तिरपित भेल’ के माध्यम से विरहिणी नायिका की किस मनोदशा को व्यक्त करना चाहता है ? 

उत्तर—इस पंक्ति के माध्यम से स्पष्ट होता है कि विरहिणी नायिका जन्म-जन्मांतर से अपने नायक (प्रियतम) के रूप को अंतर्मन में निहार रही है। उसके दर्शन से नायिका तृप्त नहीं हो पा रही है। उसकी दर्शन-अभिलाषा अत्यधिक उत्कट है।

 प्रश्न 3. नायिका के प्राण तृप्त न हो पाने का कारण अपने शब्दों में लिखिए। 

उत्तर—विरहिणी नायिका अपने प्रियतम के दर्शन के लिए आतुर है। वह मात्र एक बार मिल लेने के लिए अपने प्राणों को धारण किए रखना चाहती है। 

प्रश्न 4. ‘सेह पिरित अनुराग बखानिअ तिल-तिल नूतन होए’ से कवि का क्या आशय है ?

उत्तर—– इससे कवि कहना चाहता है कि नायिका अपने प्रिय से मिलन की आशा में, उसके अनुराग में डूबी हुई है। उसका अनुराग (प्रेम) प्रतिक्षण नया रहा है। इस तरह उसकी आशा उत्तरोत्तर बलवती होती जा रही है। 

प्रश्न 5. कोयल और भौरों के कलरव का नायिका पर क्या प्रभाव पड़ता है ?

उत्तर——कोयल और भौरों का कलरव सुनकर नायिका अत्यधिक आतुर हो उठती हैं। वह तत्काल अपने कानों पर हाथ रखकर उस ध्वनि को न सुनने का प्रयास करती है। 

प्रश्न 6. कातर दृष्टि से चारों तरफ प्रियतम को ढूंढने की मनोदशा को कवि ने किन शब्दों में व्यक्त किया है ?

उत्तर—“कातर दिठि करि, चौदिस हेरि-हेरि, नयन गरए जलधारा।” अर्थात् नायिका व्याकुल दृष्टि से चारो दिशाओं में प्रियतम के दर्शन की अभिलापा से देख रही है। उसके नेत्रों से अनुपा की बाढ़ उमड़ पड़ी है।



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FAQs

प्रश्न 1. “कातर दिठि करि, चौदिस हेरि हेरि नयन गरए जल धारा” से कवि का आशय है ? 

उत्तर- नायिका व्याकुल दृष्टि से अपने प्रियतम को तलाश रही है। उसकी दर्शन-अभिलाषा इतनी अधिक है कि आँसुओं की धारा निरंतर बह रही है।

प्रश्न 2. अकेलेपन में नायिका कहाँ और क्यों नहीं रह पा रही है ?

उत्तर- प्रियतम के वियोग में नायिका अकेलेपन में अपने भवन में नहीं रह पा रही है।

प्रश्न 3. नायिका अपने हाथों से आँखों और कानों को क्यों मूंद रही है ?

उत्तर—प्रियतम के विरह में फूलों से लदा हुआ वन उसकी विरहातुरता को और अधिक मड़का रहा है, अतः वह अपने नेत्र मूँद रही है। कोयल और भँवरों का कलरव भी उसकी विरहाग्नि को भड़का रहे हैं, अतः नायिका अपने कान मूँद रही है।

प्रश्न- निम्नलिखित पंक्तियों में निहित काव्य-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।
1. “जनम अवधि हम रूप निहारल, नयन न तिरपित भेल । सेहो मथुर बोल स्रवनहि सूनल स्रुति पथ परस न गेल ॥” 

उत्तर—काव्य-सौन्दर्य- 
(i) यहाँ प्राचीन मैथिली का उत्कृष्ट रूप प्रष्टव्य है।
(ii) सौन्दर्य के कोमल भावों का अनुपम विवेचन हुआ है।
(iii) जन्म-जन्मांतर तक दर्शन करते रहने पर भी तृप्ति नहीं होने से दर्शन की उत्कट अभिलाषा का मार्मिक चित्रण है। 
(iv) चिरकाल (जन्म काल) से दर्शन करने पर भी नेत्रों को तृप्ति नहीं। यहाँ अतिशयोक्ति अलंकार है।
(v) वर्णों की आवृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार भी है।
(vi) तत्सम (रूप, नयन, मधुर), तद्भव (जनम, अबधि, तिरपित) तथा मैथिली (सूनल, रस, गेल, भेल, निहारल) आदि शब्दों का अद्भुत सामंजस्य द्रष्टव्य है। 

2. “कुसुमित कानन हेरि कमलमुखि मूदि रहए तु नधान। कोकिल-कलरव, मधुकर धुनि सुनि, कर देइ झापड़ कान ।”

काव्य-सौन्दर्य- 
(i) यहाँ तत्सम शब्दों वाली संस्कृतनिष्ठ मैथिली का अद्वितीय प्रयोग द्रष्टव्य है। 
(ii) कोमलकांत पदावली के माध्यम से मानवीय भावों को मार्मिकता से प्रकट किया गया है। 
(iii) प्रकृति का सौन्दर्य नायिका की विरहाग्नि को उद्दीप्त कर रहा है। 
(iv) “कुसुमित कानन” “कोकिल कलरव” आदि में अनुप्रास अलंकार सराहनीय है।
(v) ‘कमलमुख’ में रूपक अलंकार है।

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