NCERT Solutions for Class 12 Hindi Aroh Chapter 14 पहलवान की ढोलक Easy Summary

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मैं खुद class 12 का टॉपर रह चुका हूं और साथ ही साथ वर्तमान में मैं एक शिक्षक भी हूं। वर्तमान मे, मेरे पास कक्षा 12वीं के काफी विद्यार्थी हैं । जिनको मैं  बारहवीं की तैयारी करवाता हूं । यह पोस्ट को मैं अपने अनुभव से लिख रहा हूं । इस लेख को मैंने CBSE, NIOS, CISCE, ICSE और अन्य राज्य के board  को ध्यान में रखते हुए तैयार किया। 


NCERT Solutions for Class 12 Hindi Aroh Chapter 14 पहलवान की ढोलक Easy Summary


कक्षा | Class12th 
अध्याय का नाम | Chapter Nameपहलवान की ढोलक | Pahalwan ki Dholak
लेखक | writerफणीश्वर नाथ रेणु | Fanishwar Nath Renu
अध्याय संख्या | Chapter number14
अध्याय प्रकार | Chapter typeकहानी | Story
किताब | Bookहिंदी कोर | HINDI CORE
बोर्ड | Boardसभी बोर्ड | All India Board
किताब | Book एनसीईआरटी | NCERT
विषय | Subjectहिंदी | HINDI
अध्ययन सामग्री | Study Materialsप्रश्न उत्तर | Question Answer


फणीश्वर नाथ रेणु का जीवन परिचय Class 12 | Fanishwar Nath Renu Biography in hindi


प्रसिद्ध आंचलिक कथाकार के रूप में विख्यात श्री फणीश्वर नाथ रेणु का जन्म गाँव औराही हिंगना (जिला पूर्णिया अब अररिया, बिहार) में 4 मार्च, सन् 1921 ई. को हुआ। 

उनकी प्रारंभिक शिक्षा नेपाल में हुई। रेणु जी ने देशभक्ति के पथ पर चलते हुए सन् 1942 के आजादी के आंदोलन में प्रमुख सेनानी रहे। 

NCERT Solutions for Class 12 Hindi Aroh Chapter 14 पहलवान की ढोलक Easy Summary
फणीश्वर नाथ रेणु का जीवन परिचय Class 12

वे नेपाल की सशस्त्र क्रांति और राजनीति में भी सक्रिय भागीदार रहे। सन् 1 में नेपाल में राणाशाही विरोधी आंदोलन में भी उन्होंने अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। 

जीवन के अंतिम दिनों में उनका राजनीति से घनिष्ठ संबंध स्थापित हो गया । 11 अप्रैल, सन् 1977 ई. को पटना में वे चिर निद्रा में सो गए।

रचनाएँ ‘रेणु’ जी की प्रमुख साहित्यिक रचनाएँ निम्नलिखित हैं- 

(क) कहानी संग्रह — ठुमरी, आदिम रात्रि की महक, अग्निखोर ।

(ख) उपन्यास — मैला आँचल, परती परिकथा, कितने चौराहे, दीर्घतपा 

(ग) संस्मरण – ऋणजल, धनजल, वन तुलसी की गंध, श्रुत-अश्रुत पूर्व । 

(घ) रिपोतांज— नेपाली क्रांति कथा ।

साहित्यिक विशेषताएँ— ‘रेणु’ जी की कहानी सामग्री की विषय अंचल विशेष से संबंधित है। उनकी रचनाओं के लोकगीत, लोकोक्ति, लोकसंस्कृति, लोकभाषा एवं लोकनायक की धारणा ने किसी विशेष पात्र के चयन की अपेक्षा अंचल को ही नायक बना डाला। 

वे स्थानीय दृश्यों के चित्रण तथा पात्रों के व्यक्तित्व के अनुरूप भाषा प्रस्तुत करने में सफल रहे हैं। वे ग्रामीण क्षेत्र के अभावग्रस्त जीवन का चित्रण करने में सिद्धहस्त हैं। उनकी कहानियाँ यथार्थ की कसौटी पर सटीक उतरी हैं।

भाषा-शैली– रेणु जी की रचनाओं की भाषा में ग्रामीण अंचल के शब्दों की अधिकता रहती है। इसके साथ ही इन्होंने अंग्रेजी शब्दों के ग्राम्य रूपों को भी अपनाने का प्रयत्न किया है। 

इनकी शैली में चित्रात्मकता के साथ-साथ वर्णनात्मकता, संवादात्मकता तथा आत्मकथात्मकता के दर्श होते हैं। संक्षेप में कहा जा सकता है कि ग्रामीण वातावरण को सजीवता प्रदान करना इनकी भाषा-शैली की प्रमुख विशेषता है।


पहलवान की ढोलक पाठ का सारांश | pahalwan ki dholak summary


पहलवान की ढोलक पाठ का सारांश: ‘पहलवान की ढोलक’ फणीश्वर नाथ की प्रतिनिधि कहानियों में से एक है। रेणु गाँव, अंचल एवं संस्कृति के सजीव चित्रण करने की अद्भुत क्षमता रखते हैं। 

कहानी मुख्य रूप से एक पात्र के इर्द-गिर्द घूमती हुई व्यवस्था परिवर्तन के दुष्परिणाम का वास्तविक वर्णन करती है। राजा साहब की मृत्यु के बाद राजकुमार के आने पर सभ्यता के मान-मूल्य बदल जाते हैं। कलाकार निरीह बन जाता है। 


NCERT Solutions for Class 12 Hindi Aroh Chapter 14 पहलवान की ढोलक Easy Summary
पहलवान की ढोलक पाठ का सारांश

पाठक सोचने को विवश हो जाता है कि क्या कलाकार व्यवस्था का मुखापेक्षी ही बना रहेगा, क्या उसका कोई स्वतंत्र मूल्य भी है ? लोक कलाओं की रक्षा के लिए हमें क्या करना चाहिए।

महामारी की भयावह स्थिति — गाँव में हैजा व मलेरिया बुरी तरह से फैल रहा था। रात का अंधकार और भयावह निस्तब्धता। आकाश में तारे चमक रहे थे। 

इसके अतिरिक्त प्रकाश का नाम नहीं था क्योंकि रात्रि अमावस्या की थी। जंगल से गीदड़ व उल्लुओं की डरावनी आवाज वातावरण की निस्तब्धता को यदा-कदा भंग कर देती थी। झोपड़ियों में पड़े मरीज हरे राम । 

है भगवान’ की टेर लगा रहे थे। बच्चों के निर्बल कंठों से ‘माँ-माँ’ की चीत्कार के साथ रोने की आवाज आ रही थी। कुत्ते जाड़े के कारण राख की ढेरी पर शरीर को सिकोड़कर पड़े थे। ज वे रोते थे तो वातावरण में दहशत फैल जाती थी।

लुट्टन का बचपन लुट्टन की शादी बचपन में ही हो गई थी। जब वह नी वर्ष का था, तब माता-पिता की मृत्यु हो गई। अतः उसका लालन-पालन उसकी सास ने किया। बचपन में वह गाय चराता, धारोष्ण दूध पीता और कसरत किया करता था। 

गाँव वालों से सास को मिली तकलीफों का बदला लेने की आकांक्षा ने उसे पहलवान बना दिया। अब कुश्ती लड़ने लगा था।

श्याम नगर का दंगल—–— एक बार लुट्टन श्याम नगर में होने वाले कुश्ती के दंगल को देखने गया। दंगल में पंजाब से अपने गुरु पहलवान बादल सिंह के साथ चाँद सिंह नाम का पहलवान भी आया था। उसने अपनी उम्र के सभी पहलवानों को पछाड़कर ‘शेर के बच्चे’ की उपाधि प्राप्त की थी । 

चाँद सिंह से भिड़ने की हिम्मत किसी पहलवान की न थी। वह अजीब किलकारी भरता हुआ अखाड़े में लंगोट घुमाकर अपने अविजयी होने की घोषणा करता था । श्याम नगर के राजा चाँद सिंह को अपने दरबार में रखने की सोच ही रहे थे कि लुइन ने चाँद सिंह को चुनौती दी। दर्शकों ने लुट्टन को पागल ही समझा था। 

कुश्ती प्रारंभ होते ही चाँद सिंह बाज की तरह उस पर टूट पड़ा। राजा साहब ने कुश्ती रुकवाकर लुट्टन को समझाया और कुश्ती से हटने को कहा किंतु लुट्टन ने राजा से लड़ने की इजाजत माँगी। 

लुट्टन को मैनेजर से लेकर सिपाहियों तक ने समझाया, किंतु लुट्टन ने राजा से कहा सरकार, यदि आपकी आज्ञा न मिली, तो मैं पत्थर पर सिर मारकर मर जाऊँगा। 



भीड़ में अधीरता थी। पंजाबी पहलवानों का समूह लुट्टन को गाली दे रहा था। चाँद सिंह खड़ा मुसकुरा रहा था। कुछ लोग लुट्टन को लड़ने की अनुमति चाहते थे। विवश राजा साहब ने अनुमति दे दी।

बाजे बजने लगे किंतु लुट्टन का ढोल भी अपनी धुन में बज रहा था। चाँद सिंह ने लुट्टन को कसकर दबा लिया था। वह गर्दन पर कोहनी डालकर चित्त करने की कोशिश कर रहा था। 

दर्शक व चाँद सिंह का गुरु बादल सिंह चाँद सिंह को उत्साहित कर रहे थे। लुट्टन की आँखें बाहर निकल रही थीं, छाती फटने को हो रही थी। उसके साथ केवल ढोल की आवाज थी जिसकी तल पर वह अपनी शक्ति, हिम्मत व दाँव-पेंच की परीक्षा ले रहा था।

ढोल ने ‘धाक-घिना’, तिरकट-तिना की आवाज दुहराई जिसका अर्थ लुट्टन ने लगाया – दाँव काटो, बाहर हो जा। और लुट्टन ने नीचे से निकलकर चाँद सिंह की गर्दन कब्जा ली। ढोल ने चटाकू था (उठा पटका दे ) कहा कि लुट्टन ने चाँद सिंह को जमीन पर दे मारा। 

ढोलक ने ‘धिना-धिना, थिक धिना’ की आवाज निकाली कि चाँद सिंह को लुट्टन ने चारों खाने चित्त कर दिया। ढोलक ने ‘ध-गिड-गिड (वाह बहादुर) का ध्वनि की तो जनता ने ‘माँ दुर्गा की’ ‘महावीर जी की’ राजा श्यामनंद की जय-जयकार कर दी। लुट्टन ने श्रद्धापूर्वक ढोल को प्रणाम किया और राजा साहब को गोद में उठा लिया। 

साहब ने लुट्टन को शाबाशी दी और लुइन को सदा के लिए अपने दरबार में रख लिया। पंजाबी पहलवान चाँद सिंह के आँसू पोंछ रहे थे और दूसरी ओर राज-पंडित व क्षत्रिय मैनेजर दबी जवान से नियुक्त का विरोध कर रहे थे। उनका तर्क था कि लुट्टन पत्रिय नहीं दुसाध है। 

राजा ने तर्कों को खारिज कर दिया और लुट्टन के लिए सभी व्यवस्था करपी गई। लुट्टन ने भी कुछ ही दिनों में सभी पहलवानों को आसमान दिखा दिया जिनमें ‘काला खाँ’ नाम का प्रसिर पहलवान भी था ।

राजा दरबार के पंद्रह वर्ष — क्षेत्र के सभी पहलवान लुट्टन से हार चुके थे। अतः अब लुट्टन दर्शनीय जीव बन गया था। मेलों में घुटने तक लंबा चोगा पहने, अस्त-व्यस्त पगड़ी बाँधकर वाले हाथी की तरह घूमता चलता। हलवाई के आग्रह पर वह दो सेर रसगुल्ला खा जाता। आठ इस पान एक बार में ही मुँह में रख लेता। बच्चों जैसे शेर करता। 

यथा- आँखों पर रंगीन अवरख का चश्मा, हाथ में खिलौने को नचाता, मुख से पीतल की सीटी बजाता, हँसता हुआ लौटता। दंगल में उससे न तो कोई लड़ने की हिम्मत करता था और यदि कोई लड़ना चाहता तो राजा साहब अनुमति नहीं देते। इस प्रकार पंद्रह वर्ष बीत गए। 

उधर पहलवान की सास व पत्नी दोनों मर चुकी थी लुहन के दो पुत्र थे। दोनों ही पहलवान लड़कों को देखकर लोग कहते- वाह बाप से भी बढ़कर निकलेंगे। दोनों ही लड़के राज-दरवार के भावी पहलवान घोषित हो चुके थे। 

तीनों का भरण पोषण दरबार से हो रहा था। लुट्टन ने लड़कों से कहा- मेरा गुरु कोई आदमी नहीं ढोल है। अतः अखाड़े में उतरने से पहले ढोल प्रणाम करना। लड़कों को पहलवानी के सब गुर सिखा दिए ।

राजा की मृत्यु — अचानक राजा का स्वर्गवास हो गया और नए राजकुमार ने विलायत से लीटकर राज काज अपने हाथ में ले लिया। राजकुमार ने प्रशासन को चुस्त-दुरुस्त करने की दृष्टि से तीनों पहलवानों की छुट्टी कर दी। अतः तीनों बाप-बेटे ढोल कंधे पर रखकर अपने गाँव लौट आए। 

गाँव वाले किसानों ने इनके लिए एक झोपड़ी डाल दी जहाँ ये गाँव के नौजवानों व ग्वालों को कुश्ती सिखाने लगे। खाने-पीने के खर्च की जिम्मेदारी गाँव वालों ने ली थी। किंतु गाँव वालों की व्यवस्था भी ज्यादा दिन न चल सकी। अतः अब लुट्टन के पास सिखाने के लिए अपने दोनों पुत्र ही थे। 

लुट्टन का अंतिम समय — गाँव पर भयानक संकट आया। पहले सूखा पड़ी जिससे अन्न की कमी हुई और फिर मलेरिया और हैजे का आक्रमण हुआ। गाँव में घर के घर खाली हो गाए। प्रतिदिन दो-तीन मौत होने लगी। लोग एक दूसरे को ढाढस बँधाते। सूर्यास्त होते ही घरों में घुस जाते। सब चुप रहते। ऐसे में केवल पहलवान की ढोलक ही बजती। 

गाँव के अर्द्धमृत, औषधि उपचार- पथ्य विहीन प्राणियों में ढोलक की आवाज संजीवनी शक्ति ही भरती थी। ऐसी स्थिति में एक दिन पहलवान के दोनों बेटे भी चल बसे। 

एक लंबी साँस लेकर लुट्टन ने कहा— ‘दोनों बहादुर गिर पड़े।’ उस दिन लुट्टन ने राजा साहब द्वारा दी गई रेशमी जंधिया पहनी, शरीर में मिट्टी मलकर कसरत की और फिर दोनों पुत्रों को कंधे पर लादकर नदी में बहा आया। 

इस घटना से गाँव वालों की भी हिम्मत टूट गई। चार-पाँच दिन बाद जब एक दिन रात को ढोलक नहीं बोली, तब प्रातः जाकर शिष्यों ने देखा कि पहलवान की लाश चित्त पड़ी है। पहलवान अखाड़े। में किसी से चित्त नहीं हुआ था। अतः अपने गुरु की इच्छा अनुसार लुट्टन को चिता पर चित्त लिटा दिया किंतु ढोल नहीं बजा सके क्योंकि वह अब चमड़ा विहीन था।


पहलवान की ढोलक पाठ कठिन शब्दों के अर्थ


अमावस्या—भारतीय महीने का पंद्रहवाँ दिन । भयार्त्त — डरा हुआ। शिशु बालक । निस्तब्धता ——घोर शांति। शेष— समाप्त। सियार – गीदड़ । पेचक—उल्लू पक्षी। ताड़ना समझाना । ताल ठोकना—चुनौती देना। संजीवनी — मरे हुए को जीवित करने वाली। होल इंडिया – समस्त भारत । 

अनुसरण करना — पीछे-पीछे चलना । कसरत व्यायाम । नियमित — नियम से । सीना- वक्ष, छाती। दंगल –— कुश्ती का आयोजन। अंग-प्रत्यंग — समस्त शारीरिक अवयव । अजीब- विचित्र। किंचित—–तनिक, थोड़ा-सा । स्पर्धा – मुकाबला। 

हिम्मत—हीसला। प्रशंसा – बड़ाई । गिड़गिड़ाना – प्रार्थना करना, खुशामद करना। जमायत—समूह। व्यर्थ बेकार। विवश- लाचार । कोलाहल—शोर । दफनाना – जमीन में गाड़ना। विजयी — विजेता। गद्गद होना— कंठ भर आना। पुरस्कृत करना—इनाम देना। क्लीन शेव्ड — चेहरे पर दाढ़ी-मूंछ साफ रखने वाला।

स्नेह-दृष्टि-प्रेममयी निगाह लकवा मारना निष्क्रिय होना। चुहल मजाक तनी-मनी——थोड़ी उदरस्थ- खा लेना। अबरख-एक तरह का कागज अजेय-जिसे कोई न जीत सके। तगड़े स्वस्थ, मजबूत भावी भविष्य काल के विलायत-ब्रिटेन। परिवर्तन बदलाव । 

चरवाहे ग्वाले। अकस्मात अचानक । वज्रपात कुठाराघात, गंभीर चोट अनावृष्टि-सूखा। भूना — भूनना सूना जनशून्य, खाली। कलरव-शोर। विदारक विदोष करने वाला, फाड़ने वाला। बावजूद बाद प्रभा प्रकाश, चमक। विभीषिका भयानकता। 

अर्द्धमृत मरे जैसे औषधि दवा। उपचार इलाज पथ्य-विहीन— रोगानुसार भोजन का अभाव। स्पंदन-शक्ति—चेतना शून्य-रहित स्नायुओं- शिराओं। असह्य वेदना न सहते योग्य कष्ट। संतप्त—दुखी। डेढ़ हाथ का कलेजा होना बहुत हिम्मत वाला आदमी।


पहलवान की ढोलक पाठ का प्रश्नोत्तर | pahalwan ki dholak question answer


प्रश्न 1. कुश्ती के समय ढोल की आवाज और लुट्टन के दाँव-पेंच का क्या तालमेल था ? पाठ में आए ध्वन्यात्मक शब्द और ढोल की आवाज आपके मन में कैसी ध्वनि पैदा करते हैं, उन्हें शब्द दीजिए।

उत्तर – कुश्ती के समय ढोल की आवाज और लुट्टन सिंह के दाँव-पेंच में एक गहरा तालमेल था। सभी दर्शकों का बहुमत चाँद सिंह के पक्ष में था। लुट्टन सिंह के पक्ष में सिर्फ ढोल की आवाज थी, जिसकी ताल पर वह अपनी शक्ति और दाँव-पेंच की परीक्षा ले रहा था और अपनी हिम्मत को बढ़ा रहा था। 

प्रश्न 2. कहानी के किस-किस मोड़ पर लुट्टन के जीवन में क्या-क्या परिवर्तन आए ?

उत्तर— कहानी के निम्नलिखित मोड़ों पर लुट्टन के जीवन में परिवर्तन आए

(i) बचपन में – लुट्टन के माता-पिता उसे नौ वर्ष की उम्र में ही अनाथ बनाकर चल बसे थे। किंतु अल्पायु में ही उसकी शादी कर दी थी। फलस्वरूप उसका पालन-पोषण उसकी विधवा सास ने ही किया।

(ii) शादी के बाद— माता-पिता की मृत्यु के बाद वह अपनी ससुराल में ही रहने लगा। वहाँ गाँव के लोग उसकी सास को तरह-तरह की तकलीफ दिया करते थे। लोगों से बदला लेने की धुन के कारण ही उसने कसरत करनी शुरू की। 

(iii) राज-पहलवान की उपाधि लुट्टन सिंह के जीवन में ये खुशी के क्षण थे। श्यामनगर के राजा ने उसे राज-पहलवान घोषित कर दिया और उसका और उसके खाने-पीने का खर्च स्वयं वहन किया।

(iv) पत्नी की मुत्यु — लुट्टन सिंह की पत्नी दो पुत्रों को जन्म देने के बाद स्वर्ग सिधार गई। इससे ऊपर उन दोनों लड़कों की चिंता और सवार हो गई। 

(v) राज-पहलवान से हटना — श्यामनगर के राजा की मृत्यु के बाद राजकुमार के शासन ग्रहण करने के बाद उसे राज-पहलवान के पद से हटा दिया गया फलस्वरूप वह गाँव में रहकर किसान और खेतिहर मजदूरों के बच्चों को कुस्ती सिखाने लगा। 

(vi) पुत्रों की मृत्यु — गाँव में अनावृष्टि, अन्न की कमी, मलेरिया और देने के कारण अन्य लोगों के साथ उसके दोनों पुत्र भी काल के ग्रास बन गए। किंतु फिर भी उसने हिम्मत नहीं हारी। अंत में वह स्वयं भी इसी में मारा गया।

प्रश्न 3. लुट्टन पहलवान ने ऐसा क्यों कहा होगा कि मेरा गुरु कोई पहलवान नहीं, यही डोल है ?

उत्तर- लुट्टन पहलवान का कोई गुरु नहीं था। बल्कि वह ढोलक की आवाज के आधार पर ही अपनी शक्ति और दाँव-पेंच की परीक्षा लेता था। 

वह स्वयं भी ढोल की आवाज के आधार पर कुश्ती लड़ता था और अपने पुत्रों और शिष्यों को ढोलक की आवाज पर ही पूरा ध्यान देने के लिए प्रेरित करता था। 

वह दंगल में उतरकर सबसे पहले ढोलों को प्रणाम करता । इसी कारण उसने कहा होगा कि उसका गुरु कोई पहलवान नहीं यही ढोल है।

प्रश्न 4. गाँव में महामारी फैलने और अपने बेटों के देहांत के बावजूद लुट्टन पहलवान ढोल क्यों बजाता रहा ? 

उत्तर – लुट्टन पहलवान गाँव में महामारी फैलने और अपने बेटों के देहांत के बावजूद ढोल में अपने आपको जिलाए रखने और भूख व महामारी से दम तोड़ रहे गाँव को मीत से लड़ने की ताकत देने के लिए ढोल बजाता रहा।

प्रश्न 5. ढोलक की आवाज का पूरे गाँव पर क्या असर होता था ? 

उत्तर – ढोलक की आवाज सुनकर गाँव के अर्द्धमृत, औषधि उपचार पथ्य-विहीन प्राणियों में संजीवनी शक्ति भर जाती थी। बूढ़े, बच्चे और जवानों की शक्तिहीन आँखों में आगे दंगल का दृश्य नाचने लगता था। 

स्पंदन-शक्ति शून्य स्नायुओं में भी बिजली दौड़ जाती थी। ढोलक की आवाज के कारण ही गाँव के मरते हुए प्राणियों को आँख मूंदते समय कोई तकलीफ नहीं होती थी और वे मृत्यु से भी नहीं डरते थे।

प्रश्न 6. महामारी फैलने के बाद गाँव में सूर्योदय और सूर्यास्त के दृश्य में क्या अंतर होता था ? 

उत्तर- महामारी फैलने के बाद गाँव में सूर्योदय होते ही लोग काँखते-खते – कराहते अपने-अपने घरों से बाहर निकलकर अपने पड़ोसियों और आत्मीय जनों को परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु पर ढाढस देते थे।

सूर्यास्त होते ही लोग अपनी-अपनी झोपड़ियों में घुस जाते तो यूँ भी नहीं करते। उनकी बोलने की शक्ति भी जाती रही थी। पास में दम तोड़ते हुए पुत्र को अंतिम बार ‘बेटा’ कहकर पुकारने की भी हिम्मत माताओं की नहीं होती थी। 

प्रश्न 7. कुश्ती या दंगल पहले लोगों और राजाओं का प्रिय शौक हुआ करता था। पहलवानों को राजा एवं लोगों के द्वारा विशेष सम्मान दिया जाता था-

(क) अब ऐसी स्थिति क्यों नहीं है ? 

(ख) इसकी जगह अब किन खेलों ने ले ली है ?

(ग) कुश्ती को फिर से प्रिय खेल बनाने के लिए क्या-क्या कार्य किए जा सकते हैं ? 

उत्तर—

(क) आधुनिक युग में लोगों के खान-पान और व्यवहार में बहुत अधिक परिवर्तन आ गया है। लोगों के पास कुश्ती के दाँव सीखाने तक का समय नहीं है। 

इसके साथ ही आज के भौतिकवादी युग में कुश्ती के पहलवानों की इतनी आय नहीं हो पाती है कि वे अपना और परिवार का गुजारा ढंग से कर सकें तथा आज के युग में कला-प्रेमी भी नहीं है। इन्हीं कारणों से आज कुस्ती या दंगल की ऐसी स्थिति नहीं है।

(ख) आज के युग में कुश्ती की जगह क्रिकेट, हॉकी, फुटबॉल, वालीबॉल आदि खेलों ने ले ली है।

(ग) कुश्ती को फिर से प्रिय खेल बनाने के लिए निम्नलिखित कार्य किए जा सकते हैं- 

(i) पहलवानों के आर्थिक स्थिति सुदृढ़ की जाए। 

(ii) उनके खाने-पीने की समुचित व्यवस्था हो । 

(iii) उनके रोजगार आदि के अवसर सुनियोजित किए जाएँ।

(iv) लोगों को कला के प्रति जागरूक किया जाए।

प्रश्न 9. पाठ में अनेक स्थलों पर प्रकृति का मानवीकरण किया गया है। पाठ में से ऐसे अंश चुनिए और उनका आशय स्पष्ट कीजिए । 

उत्तर—पाठ के निम्नलिखित अंशों में प्रकृति का मानवीकरण किया गया है : 

(i) आकाश से टूटकर यदि कोई भावुक तारा पृथ्वी पर जाना भी चाहता तो उसकी ज्योति और शक्ति रास्ते में ही शेष हो जाती थी। अन्य तारे उसकी भावुकता अथवा असफलता पर खिलखिलाकर हँस पड़ते थे।

(i) चिड़िया में पिंजड़े और जंजीरों को झकझोर कर बाघ दहाड़ता है-

(iii) चटाकू चट-घा, चटाकू-चट-धा सारी रात ढोलक पीटता रहा पहलवान ।

नोट- आशय के लिए व्याख्या भाग देखें।

प्रश्न 10. पाठ में मलेरिया और हैजे से पीड़ित गाँव की दयनीय स्थिति को चिति किया गया है। आप ऐसे किसी अन्य आपदा स्थिति की कल्पना करें और लिखें कि आप ऐसी स्थिति का सामना कैसे करेंगे / करेंगी ?

उत्तर—हैजा और मलेरिया की भाँति प्लेग एक ऐसी महामारी है जिसके फैलने पर अनगिनत संख्या में मृत्यु होने लगती है। ऐसी स्थिति का सामना करने के लिए तुरंत चिकित्सा विभाग को सूचित करेंगे। लोगों के आने-जाने पर प्रतिबंध लगवा देंगे। लोगों में साहस रखने हेतु हिम्मत बँधवाएँगे तथा लोगों को स्वयं भी सावधानी रखने के लिए प्रेरित करेंगे।

प्रश्न 11. हर विषय क्षेत्र, परिवेश आदि के कुछ विशिष्ट शब्द होते हैं। पाठ में कु से जुड़ी शब्दावली का बहुतायत प्रयोग हुआ है। उन शब्दों की सूची बनाइए। साथ ही नीचे दिए गए क्षेत्रों में इस्तेमाल होनेवाले कोई पाँच-पाँच शब्द बताइए- चिकित्सा, क्रिकेट, न्यायालय या अपनी पसंद का कोई क्षेत्र । 

उत्तर- चिकित्सा याइरस, साइड इफेक्ट, अल्ट्रासाउंड, जर्म्स, रेडियोथेरेपी आदि। क्रिकेट आत राउन्डर बाउण्ड्री, फालोआन, गुगली, हैट्रिक आदि। न्यायालय दीवानी फौजदारी, मुजरिम, वकील, यारा आदि। वायुमंडल ः ट्रोपोस्फीयर, स्ट्रेटोस्फीयर, आयनोस्फीयर, साइक्लोन, हरीकेन आदि ।

प्रश्न 12. पाठ में अनेक ऐसे अंश हैं जो भाषा के विशिष्ट प्रयोगों की बानगी प्रस्तुत करते हैं। भाषा का विशिष्ट प्रयोग न केवल सृजनात्मकता को बढ़ावा देता है बल्कि क को भी प्रभावी बनाता है। यदि उन शब्दों, वाक्यांशों के स्थान पर किन्हीं अन्य का प्रक्षेत  “किया जाए तो संभवतः वह अर्थगत चमत्कार और भाषिक सौंदर्य उद्घाटित न हो सके । कुछ प्रयाग इस प्रकार हैं-

फिर बाज़ की तरह उस पर टूट पड़ा। राजा साहब की स्नेह-दृष्टि ने उसकी प्रसिद्धि में चार चाँद लगा दिए ।

पहलवान की स्त्री भी दो पहलवानों को पैदा करके स्वर्ग सिधार गई थी। इन विशिष्ट भाषा प्रयोगों का प्रयोग करते हुए एक अनुच्छेद लिखिए।

उत्तर— लुट्टन सिंह नाम का एक प्रसिद्धि पहलवान था। उससे आस पास के अच्छे-अच्छे पहलवान भी कुश्ती लड़ने से घबराते थे। एक बार श्यामनगर के मेले में वह चाँद सिंह पहलवान के साथ भिड़ गया। चाँद सिंह पर वह बाज की तरह टूट पड़ा। 

दर्शक उसके पराक्रम को देखकर दंग रह गए। इसी पराक्रम को देखकर वहाँ के राजा श्यामानंद ने उसे राज-पहलवान घोषित कर दिया। इस प्रकार राजा साहब की स्नेह-दृष्टि ने उसकी प्रसिद्धि में चार चाँद लगा दिए। वह अपनी पत्नी के साथ राजा के आश्वय में ही रहने लगा। वहाँ उसके दो पुत्रों ने जन्म लिया। 

वे भी लुट्टन सिंह की भाँति पहलवान जैसे ही दिखाई देते थे। किंतु यह खुशी उसके लिए ज्यादा नहीं चल सकी। कुछ दिन बाद ही पहलवान की स्त्री भी दो पहलवानों को पैदा करके स्वर्ग सिधार गई थी। फिर भी लुट्टन सिंह ने हार नहीं मानी। 

प्रश्न 13. जैसे क्रिकेट की कमेंट्री की जाती है वैसे ही इसमें कुश्ती की कमेंट्री की गई है ? आपको दोनों में क्या समानता और अंतर दिखाई पड़ता है ? 

उत्तर—समानता दोनों ही खेलों की कमेंट्री में खिलाड़ियों के प्रदर्शन का तत्कालीन वर्णन किया जाता है। अंतर—क्रिकेट में एक साथ कई खिलाड़ियों के प्रदर्शन का वर्णन होता है जबकि कुश्ती में केवल दो खिलाड़ियों के प्रदर्शन का वर्णन होता है। 


पहलवान की ढोलक पाठ का गद्यांश प्रश्नोत्तर


1. अँधेरी रात चुपचाप आँसू बहा रही थी। निस्तब्धता करुण सिसकियों और जहों को बलपूर्वक अपने हृदय में ही दबाने की चेष्टा कर रही थी। आकाश में तारे चमक रहे थे। पृथ्वी पर कहीं प्रकाश का नाम नहीं। 

आकाश से टूटकर यदि कोई भावुक तारा पृथ्वी पर जाना भी चाहता तो उसकी ज्योति और शक्ति रास्ते में ही शेष हो जाती थी। अन्य तारे उसकी भावुकता अथवा असफलता पर खिलखिलाकर हँस पड़ते थे। 

सियारों का क्रंदन और पेचक की डरावनी आवाज़ कभी-कभी निस्तव्यता को अवश्य भंग कर देती थी। गाँव की झोपड़ियों से कहारने और के करने की आवाज़, ‘हरे राम! हे भगवान!’ की टेर अवश्य सुनाई पड़ती थी। 

बच्चे भी कभी-कभी निर्बल कंठों से ‘माँ-माँ’ पुकारकर रो पड़ते थे। पर इससे रात्रि की निस्तब्धता में विशेष बाधा नहीं पड़ती थी।

प्रश्न – 

(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखिए।

(ख) रात आँसू क्यों बहा रही थी ? 

(ग) रात्रि की निस्तब्धता को कौन भंग कर रहा था ?

(घ) हरे राम! हे भगवान! की टेर कहाँ से आ रही थी ? 

(ङ) रात्रि की निस्तब्धता में विशेष बाधा क्यों नहीं पड़ती थी ?

उत्तर—

(क) पाठ-पहलवान की ढोलक ,लेखक फणीश्वर नाथ रेणु

(ख) सारा गाँव मलेरिया व हैजा से पीड़ित होने के कारण एकदम शांत था। कहीं कोई चहल-पहल नहीं थी। ऐसा प्रतीत होता था कि मानो रात्रि भी इस दुख के अवसर पर आँसू बहा है।

(ग) गीदड़ों का शोर और उल्लुओं की डरावनी आवाज़ कभी-कभी रात्रि की निस्तव्यता गंग कर देती थी।

(घ) गाँव की झोपड़ियों में पड़े मरीज दुख की अधिकता अथवा उल्टी (वमन) करते समय ‘हरे राम हे भगवान’ की टेर लगाते थे। 

(ङ) मरीजों की ‘हरे राम । हे भगवान !’ तथा बच्चों की ‘माँ माँ’ की पुकार निर्बल कंटों से निकलने के कारण इतनी मंदी होती थी कि रात्रि की निस्तव्यता पर कोई अंतर नहीं पड़ता था। 


2. लुट्टन के माता-पिता उसे नौ वर्ष की उम्र में ही अनाथ बनाकर चल बसे थे। सौभाग्यवश शादी हो चुकी थी, वरना वह भी माँ-बाप की अनुसरण करता। विधवा सास ने पाल-पोस कर बड़ा किया। बचपन में वह गाय चराता, धारोष्ण दूध पीता और कसरत किया करता था। 

गाँव के लोग उसकी सास को तरह-तरह की तकलीफ दिया करते थे; लुट्टन के सिर पर कसरत की पुन लोगों से बदला लेने के लिए ही सवार हुई थी। नियमित कसरत ने किशोरावस्था में ही उसके सीने, बाँहों को सुडौल तथा मांसल बना दिया था। 

जवानी में कदम रखते ही वह गाँव में सबसे अच्छा पहलवान समझा जाने लगा। लोग उससे डरने लगे और वह दोनों हाथों को दोनों ओर 45 डिग्री की दूरी पर फैलाकर, पहलवानों की भांति चलने लगा। वह कुश्ती भी लड़ता था।

प्रश्न – 

(क) पाठ तथा पाठ के लेखक का नाम लिखिए। 

(ख) लुट्टन किस आयु में अनाथ हुआ और उसका पालन-पोषण किसने किया ? 

(ग) बचपन में लुट्टन क्या करता था ?

(घ) लुट्टन पर कसरत की धुन क्यों सवार थी ? 

(ङ) कसरत का लुट्टन को क्या लाभ मिला ?

उत्तर—

(क) पाठ पहलवान की ढोलक लेखक फणीश्वर नाथ रेणु। 

(ख) लुट्टन नौ वर्ष की आयु में अनाथ हो गया था। उसका पालन पोषण उसकी सास ने किया।

(ग) बचपन में लुट्टन गाय चराता, दूध पीता और कसरत किया करता था।

(घ) गाँव के लोग लुट्टन की विधवा सास को तरह-तरह की तकलीफ देते थे। उनलोगों से बदला लेने के लिए उसके सिर पर कसरत की धुन सवार हुई थी।

(ङ) कसरत करने से लुट्टन को निम्न लाभ हुए-

(i) किशोरावस्था में ही उसके सीने और बाँहें सुडील तथा माँसल हो गए थे । 

(ii) जवान होते ही वह गाँव का सबसे अच्छा पहलवान समझा जाने लगा। 

(iii) गाँव के लोग उससे डरने लगे। 

(iv) वह कुश्ती लड़ने लगा।


3. ‘शेर के बच्चे’ की असल नाम था चाँद सिंह। वह अपने गुरु पहलवान बादल सिंह के लगे।  साथ, पंजाब से पहले-पहल श्यामनगर मेले में आया था। सुंदर जवान, अंग-प्रत्यंग से सुंदरता टपक पड़ती थी। तीन दिनों में ही पंजाबी और पठान पहलवानों के गिरोह के अपनी जोड़ी और उन्न के सभी पट्ठों को पछाड़कर उस ने ‘शेर के बच्चे’ की टायटिल प्राप्त कर ली थी। 

इसलिए वह दंगल के मैदान में लँगोटे लगाकर एक अजीव किलकारी भरकर छोटी दुलकी लगाया करता था। देशी नौजवान पहलवान, उससे लड़ने की कल्पना से भी घबराते थे। अपनी टायटल को सत्य प्रमाणित करने के लिए ही चाँद सिंह बीच-बीच में दहाड़ता फिरता था।

प्रश्न – 

(क) पाठ तथा पाठ के लेखक का नाम लिखिए । 

(ख) ‘शेर के बच्चे’ का नाम क्या था और वह कहाँ से आया था ?

(ग) ‘शेर के बच्चे’ नाम कैसे मिला?

(घ) देशी पहलवान से क्या आशय है ?

(ङ) अपने टायटिल को प्रमाणित करने के लिए चाँद सिंह क्या करता था ? 

उत्तर- 

(क) पाठ पहलवान की ढोलक , लेखक फणीश्वर नाथ रेणु –

(ख) शेर के बच्चे का नाम चाँद सिंह था और वह पंजाब से आया था। 

(ग) चाँद सिंह ने अपनी जोड़ी और उम्र के सभी पट्ठों को कुश्ती में हराकर ‘शेर के बच्चे’ की टायटिल प्राप्त कर ली थी।

(घ) चाँद सिंह व उसके गिरोह के पहलवान पंजाब और अफगानिस्तान (पठान) से आए थे। श्यामनगर के आस-पास के पहलवान देशी कहलाते थे।

(ङ) अपने टायटिल को सत्य प्रमाणित करने के लिए चाँद सिंह दंगल के मैदान में लंगोट लगाकर एक अजीव किलकारी भरकर छोटी दुलकी लगाया करता था। बीच-बीच में वह मैदान में दहाड़ता फिरता था। 


4. विजयी लुट्टन कूदता फाँदता, ताल ठोंकता सबसे पहले बाजे वालों की ओर दौड़ा और ढोलों को श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया। फिर दौड़कर उसने राजा साहब को गोद में उठा लिया। राजा साहब के कीमती कपड़े मिट्टी में सन गए। मैनेजर साहब ने आपत्ति की ” है…अरे-रे।”

किंतु राजा साहब ने स्वयं उसे छाती से लगाकर गद्गद होकर कहा “जीते रहो बहादुर तुमने मिट्टी की लाज रख ली।”

पंजाबी पहलवानों की जमायत चाँद सिंह की आँखें पोंछ रही थी। लुट्टन को राजा साहब ने पुरस्कृत ही नहीं किया, अपने दरबार में सदा के लिए रख लिया। 

तब से लुटूटन राज-पहलवान हो गया और राजा साहब उसे लुट्टन सिंह कहकर पुकारने लगे। राज- पंडितों ने मुँह बिचकाया- “हुजूर। जाति का सिंह 1”

प्रश्न- 

(क) पाठ तथा पाठ के लेखक का नाम लिखिए । 

(ख) लुट्टन ने सबसे पहले ढोलों को क्यों प्रणाम किया ?

(ग) लुट्टन ने राजा साहब को गोदी में क्यों उठाया ?

(घ) राजा साहब का लुट्टन के प्रति क्या व्यवहार रहा ?

(ङ) लुट्टन के दरबार का पहलवान बनने पर किसको क्या आपत्ति थी ? 

उत्तर—

(क) पाठ – पहलवान की ढोलक , लेखक – फणीश्वर नाथ रेणु

(ख) लुट्टन व्यक्ति को नहीं, अपितु ढोल को ही गुरु मानता था। अतः उसने सबसे पहले ढोलों को श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया। 

(ग) लुट्टन ने राजा साहब को गोदी में उठाकर उनके प्रति सम्मान और कृतज्ञता प्रकट की। राजा साहब की अनुमति से ही उसे चाँद सिंह से लड़ने का मौका मिला था।

(घ) राजा साहब की कीमती कपड़े मिट्टी में सन गए थे। तब भी उन्होंने लुट्टन को पुरस्कृत किया और अपने दरबार में सदा के लिए रख लिया।

(ङ) लुट्टन के दरबार का पहलवान बनने पर राजपंडितों को आपत्ति थी क्योंकि वह क्षत्रिय होकर दुसाध था। 


5. दोनों ही लड़के राज दरबार के भावी पहलवान घोषित हो चुके थे। अतः दोनों का भरण-पोषण दरबार से ही हो रहा था। प्रतिदिन प्रातः काल पहलवान स्वयं ढोलक बजा-बजाकर दोनों से कसरत करवाता। 

दोपहर में, लेटे-लेटे दोनों को सांसारिक ज्ञान की भी शिक्षा देता- “समझे ! ढोलक की आवाज पर पूरा ध्यान देना, हाँ, मेरा गुरु कोई पहलवान नहीं, गही ढोल समझे ढोल की आवाज के प्रताप से ही में पहलवान हुआ। 

दंगल में उतरकर सबसे पहले ढोलों को प्रणाम करना, समझे 1″ ऐसी ही बहुत-सी बातें यह कहा करता फिर मालिको कैसे खुश रखा जाता है, कब कैसा व्यवहार करना चाहिए, आदि की शिक्षा वह नित्य दिया करता था। 

प्रश्न- 

(क) पाठ तथा पाठ के लेखक का नाम लिखिए।

(ख) लुट्टन के लड़कों के दरबार से भरण-पोषण किस आधार पर होता था ?

(ग) लुट्टन प्रतिदिन अपने पुत्रों से क्या करवाता था ?

(घ) लुट्टन ने अपनी सफलता का क्या कारण बताया ?

(ङ) लुट्टन अपने पुत्रों को कैसी शिक्षा देता था ?

उत्तर- 

(क) पाठ- पहलवान की ढोलक , लेखक- फणीश्वर नाथ रेणु

(ख) लट्टन के दोनों पुत्रों को राज दरबार से भरण-पोषण मिलने का आधार यह था कि वे दोनों ही लड़के राज दरबार के भावी पहलवान घोषित हो चुके थे। 

(ग) लुट्टन प्रतिदिन प्रातःकाल स्वयं ढोलक बजा-बजाकर दोनों पुत्रों से कसरत करवाता था। पर ध्यान देकर ही मैं पहलवान बना हूँ। ढोल की आवाज का प्रताप ही मेरी सफलता का कारण है।

(घ) लुट्टन ने बताया मेरा गुरु कोई पहलवान नहीं है, यही ढोल है। इस ढोल की आवाज

(ङ) लुट्टन ने अपने पुत्रों को यह शिक्षा दी ढोलक की आवाज पर पूरा ध्यान देना। दंगल में उतरकर सबसे पहले ढोलों को प्रणाम करना। मालिक को खुश रखना।

यह भी बताया कि कब कैसा व्यवहार करते हैं ? इस तरह की बहुत-सी बातें उसने अपने पुत्रों को बताई।


6. रात्रि की विभीषिका को सिर्फ पहलवान की ढोलक ही ललकार कर चुनौती देती रहती। थी। पहलवान संध्या से सुबह तक, चाहे जिस ख्याल से ढोल बजाता हो, किंतु गाँव के अर्द्धमृत, औषधि उपचार- पथ्य-विहीन प्राणियों में वह संजीवनी शक्ति ही भरती थी। 

बूढ़े बच्चे जवानों की ‘शक्तिहीन आँखों के आगे दंगल का दृश्य नाचने लगता था। स्पंदन-शक्ति-शून्य स्नायुओं में भी बिजली दौड़ जाती थी। 

अवश्य ही ढोलक की आवाज में न तो बुखार हटाने का कोई गुण था और न महामारी की सर्वनाश शक्ति को रोकने की शक्ति ही, पर इसमें संदेह नहीं कि मरते हुए प्राणियों को आँख मूँदते समय कोई तकलीफ नहीं होती थी, मृत्यु से वे डरते नहीं थे। 

प्रश्न – 

(क) पाठ तथा पाठ के लेखक का नाम लिखिए।

(ख) रात्रि की विभीषिका को कौन चुनौती देता था ? 

(ग) गाँव के लोगों पर ढोलक का क्या प्रभाव पड़ता था

(घ) ढोलक की आवाज क्या नहीं कर सकती थी ? 

उत्तर—

(क) पाठ पहलवान की ढोलक , लेखक – फणीश्वर नाथ रेणु

(ख) रात्रि की विभीषिका को सिर्फ पहलवान की ढोलक ही ललकार कर चुनौती देती रहती थी पहलवान संध्या से सुबह तक ढोलक बजाता था।

(ग) गांव के अर्द्धमृत, औषधि उपचार- पथ्य विहीन लोगों में ढोलक संजीवनी शक्ति भरती थी। बूढ़े बच्चों जवानों की शक्तिहीन आँखों के आगे दंगल का दृश्य नाचने लगता था। स्पंदन-शक्ति शून्य स्नानुओं में भी बिजली दौड़ जाती थी। मरते हुए प्राणियों को अंतिम बार आँख मूँदते समय कोई तकलीफ नहीं होती थी। वे मृत्यु से डरते भी नहीं थे।

() ढोलक की आवाज में बुखार हटाने का कोई गुण न था और न उसमें महामारी की सर्वनाश शक्ति को रोकने की ही सामर्थ्य थी। 


पहलवान की ढोलक प्रश्न उत्तर | pahalwan ki dholak question answer


प्रश्न 1. गाँव में व्याप्त महामारी की भयावहता का वर्णन कीजिए।

उत्तर- जाड़े की ऋतु में गाँव में मलेरिया व हैजे का प्रकोप इतना भयावह था कि गाँववासी भयभीत होकर थर-थर काँपते थे। रात्रि में गीदड़ों का क्रंदन व उल्लू पक्षियों की आवाज और डरा देती थी। कुत्ते भावी आशंका में रोने लगते थे। अनावृष्टि के कारण अन्न की कमी थी। निर्धनता में औषधि या पथ्य कहाँ मिलता ?

प्रायः प्रतिदिन दो-तीन लाशें उठने लगी थीं। गाँव सूना लगता था। दिन में हाहाकार और सदन का स्वर सुनाई देता था। रात्रि में तो सब अपनी-अपनी झोपड़ियों में छिप जाते थे। मरे हुए लोगों को कफन नसीब नहीं था। अतः मुर्दों को नदी में बहा दिया जाता था। 

प्रश्न 2. लुट्टन के बचपन का वर्णन कीजिए ।

उत्तर—लुट्टन की शादी बचपन में ही हो गई थी। जब वह नौ वर्ष का था, तब माता-पिता की मृत्यु हो गई। अतः उसका लालन-पालन उसकी सास ने किया। बचपन में वह गाय चराता, धारोष्ण दूध पीता और कसरत किया करता था। गाँव वालों से सास को मिली तकलीफों का बदला लेने की इच्छा ने उसे पहलवान बना दिया और वह कुश्ती लड़ने लगा।


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Historyइतिहास
Geography भूगोल
Political science राजनीति विज्ञान
English SubjectResult
Hindi SubjectHistory answer keys

प्रश्न 3. श्यामनगर के दंगल का वर्णन कीजिए। 

उत्तर- राजा श्यामनगर ने अपने यहाँ दंगल का आयोजन किया था। लुट्टन भी दंगल देखने गया था। पंजाब के पहलवान चाँद सिंह ने अपनी जोड़ी व उम्र के सब पहलवानों को हराकर ‘शेर के बच्चे’ की उपाधि हासिल की थी उसका लंगोट पकड़ने की किसी में हिम्मत नहीं थी। 

लुट्टन ने उससे लड़ने की इच्छा प्रकट की। राजा साहब ने बहुत आग्रह के बाद लुट्टन को कुश्ती लड़ने की स्वीकृति दे दी। हाथ मिलाते ही चाँद सिंह लुट्टन पर बाज के समान टूट पड़ा। अब लुट्टन जमीन पर पड़ा था और चाँद सिंह उसकी गर्दन पकड़कर चित्त करना चाहता था । लुट्टन की हालत बहुत खराब थी। 

ढोलक से दाँव का स्वर सुनकर लुट्टन खड़ा हो गया और चाँद सिंह को गिराकर उसके ऊपर आ गया। ढोलक के आदेश पर लुट्टन ने चाँद को चित्त कर दिया। 

सभी ओर ‘माँ दुर्गा की जय’, ‘महावीर जी की जय’ की ध्वनि गूँज उठी। लुट्टन ने सबसे पहले ढोलक को प्रणाम किया और फिर राजा साहब को गोदी में उठा लिया। राजा साहब ने लुट्टन को पुरस्कृत किया और स्थायी रूप से दरबार का पहलवान बना लिया। 

प्रश्न 4. राज दरबार में लुट्टन के बीते हुए पंद्रह वर्षों का वर्णन कीजिए। 

उत्तर-राज-दरबार में आने के बाद एक-एक करके सभी पहलवानों को लुटन ने हरा दिया था। अतः अब उसके लिए कोई काम नहीं रह गया था। अब यह जनता के लिए दर्शनीय जीव मात्र रह गया था। मेलों में घुटने तक लंबा चोगा पहने, अस्त-व्यस्त पगड़ी बाँधकर मतवाले हाथी की तरह घूमता चलता। 

हलवाई के आग्रह पर वह दो सेर रसगुल्ला खा जाता। आठ दास पान एक बार में ही मुँह में रख लेता। बच्चों जैसे शौक करता। यथा— आँखों पर रंगीन अबरख का चश्मा, हाथ में खिलौने को नचाता, मुख से पीतल की सीटी बजाता हँसता हुआ लौटता। 

दंगल में न तो उससे कोई लड़ने की हिम्मत नहीं करता और यदि कोई लड़ना चाहता तो राजा साहब अनुमति नहीं देते। इस मध्य उसकी सास गुजर गई थी और पत्नी भी दो पुत्र पैदा करके मर गई थी। 

लुट्टन के दोनों पुत्र दरवार के भावी पहलवान घोषित हो चुके थे। तीनों का भरण-पोषण दरबार से हो रहा था। लुट्टन ने अपने पुत्रों को पहलवान की शिक्षा देनी आरंभ कर दी थी।

प्रश्न 5. राजा साहब की मृत्यु के बाद लुट्टन के जीवन में क्या बदलाव आया ? 

उत्तर- एक दिन अचानक राजा साहब का स्वर्गवास हो गया। नए राजकुमार ने विलायत से लौटकर राजकाज अपने हाथ में ले लिया। राजकुमार ने प्रशासन को चुस्त-दुरूस्त करने की दृष्टि से लुट्टन व उसके पुत्रों की दरबार से छुट्टी कर दी। 

अतः तीनों बाप-बेटे ढोल कंधे पर रखकर अपने गाँव लौट आए। गाँव वाले किसानों ने इनके लिए झोपड़ी डाल दी। जहाँ ये गाँव के नीज़वानों व ग्वालों को कुश्ती सिखाने लगे। 

खाने-पीने का भार गाँव वालों पर था किंतु यह व्यवस्था ज्यादा दिन न चल सकी। अब लुट्टन के पास कुश्ती के दाँव-पेंच सिखाने के लिए केवल अपने पुत्र ही रह गए थे।

प्रश्न 6. लुट्टन के अंतिम समय का वर्णन कीजिए। 

उत्तर—गाँव में हैजे व मलेरिया का प्रकोप था। सारा गाँव आतंकित था । केवल लुट्टन के ढोल की आवाज़ ही गाँव के लोगों को संजीवनी शक्ति देती थी। ऐसे अवसर पर एक दिन पहलवान के दोनों बेटे भी चल बसे। 

लुट्टन ने राजा साहब का दिया हुआ रेशमी जंघिया पहना और कसरत करने के बाद पुत्रों को कंधे पर रखकर नदी में बहा आया। चार-पाँच दिन बाद लुट्टन की मृत्यु • हो गई। उसके शिष्यों ने उसका अंतिम संस्कार किया।

प्रश्न 7. पाठ के आधार पर ग्रामीण वातावरण का रात्रि के समय का वर्णन कीजिए। 

उत्तर- जाड़े के दिनों में अमावस्या की ठंडी और काली रात में मलेरिया और हैज़े से पीड़ित गाँव भयभीत शिशु की तरह थर-थर काँप रहा था। पुरानी और उजड़ी बॉस- -फूस की झोपड़ियों में अंधकार और सन्नाटे का सम्मिलित साम्राज्य था। 

रात के सन्नाटे में सियारों का रुदन और पेचक (उल्लू) की डरावनी आवाजें भंग कर देती थीं। गाँव की झोपड़ियों से कहारने और वमन करने की आवाज की टेर अवश्य सुनाई देती थी। रात्रि के समय गाँव के सभी कुत्ते मिलकर रोते थे। 

प्रश्न 8. लुट्टन सिंह का बचपन किस प्रकार व्यतीत हुआ ?

उत्तर—लुट्टन सिंह का बचपन दुःखपूर्वक व्यतीत हुआ। उसके माता-पिता उसे नौ वर्ष की उम्र में ही अनाथ बनाकर चल बसे थे। मरने से पहले ही अल्पायु में ही उन्होंने उसकी शादी कर दी थी। 
फलस्वरूप उसकी विधवा सास ने ही उसे पाल-पोस कर बड़ा किया। वह बचपन में गाय चराता, थनों से निकला हुआ ताज़ा दूध पीता और कसरत किया करता था।

प्रश्न 9. ‘शेर के बच्चे’ के नाम से कौन प्रसिद्ध था ? वह श्यामनगर क्यों आया था ? 

उत्तर—’शेर के बच्चे’ के नाम से प्रसिद्ध पंजाब का पहलवान चाँद सिंह था। वह अपने इलाके का सबसे वीर और साहसी पहलवान था। 
उसने पंजाबी और पठान पहलवानों के गिरोह के अपनी जोड़ी और उम्र के सभी नवयुवकों को पछाड़ कर ‘शेर के बच्चे’ के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त की थी। वह श्यामनगर अपने गुरु पहलवान बादल सिंह के साथ दंगल में कुश्ती लड़ने के लिए गया था।


Conclusion


नमस्कार Students, मैंने इस पोस्ट को (Class 12 Hindi Aroh Chapter 14 ) CBSE, NIOS,  CISCE, ICSE और अन्य राज्य के board के मुताबिक इस पोस्ट को तैयार किया है, तथा भविष्य में जो भी लेटेस्ट अपडेट आएंगी उसके अनुसार यह पोस्ट अपडेट भी होता रहेगा । इसलिए मुझे यह आशा है कि यह पोस्ट आपके लिए काफी जानकारी पूर्ण होगा और आपके परीक्षा के लिए काफी सहायता प्रदान करेगा । तो मेरा आपसे यही आग्रह है कि आप इस लेख को पूरा अवश्य पढ़ें


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