NCERT Solutions for Class 12 Hindi Aroh Chapter 17 शिरीष के फूल Easy Summary

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मैं खुद class 12 का टॉपर रह चुका हूं और साथ ही साथ वर्तमान में मैं एक शिक्षक भी हूं। वर्तमान मे, मेरे पास कक्षा 12वीं के काफी विद्यार्थी हैं । जिनको मैं  बारहवीं की तैयारी करवाता हूं । यह पोस्ट को मैं अपने अनुभव से लिख रहा हूं । इस लेख को मैंने CBSE, NIOS, CISCE, ICSE और अन्य राज्य के board  को ध्यान में रखते हुए तैयार किया। 


NCERT Solutions for Class 12 Hindi Aroh Chapter 17 शिरीष के फूल Easy Summary


कक्षा | Class12th 
अध्याय का नाम | Chapter Nameशिरीष के फूल
लेखक | writerहजारी प्रसाद द्विवेदी | Hazari Prasad Dwivedi
अध्याय संख्या | Chapter number17
अध्याय प्रकार | Chapter typeकहानी | Story
किताब | Bookहिंदी कोर | HINDI CORE
बोर्ड | Boardसभी बोर्ड | All India Board
किताब | Book एनसीईआरटी | NCERT
विषय | Subjectहिंदी | HINDI
अध्ययन सामग्री | Study Materialsप्रश्न उत्तर | Question Answer


हजारी प्रसाद द्विवेदी का जीवन-परिचय | Biography of Hazari Prasad Dwivedi


प्रश्न- हजारी प्रसाद द्विवेदी का जीवन-परिचय देते हुए उनकी रजचाओं, भाषा-शैली तथा साहित्यिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। 

उत्तर— जीवन-परिचय हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म 1907 ई. में उत्तर प्रदेश के बलिया ग्राम के आरत दुबे का छपरा ओझबलिया में हुआ था। इन्होंने संस्कृत महाविद्यालय काशी से शास्त्री परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद काशी हिंदू विश्वविद्यालय से 1930 ई. में ज्योतिष में आचार्य परीक्षा उत्तीर्ण की। 

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उसी वर्ष द्विवेदी जी शांति निकेतन में हिंदी अध्यापक बनकर कलकत्ता चले गए। यहाँ गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर और आचार्य क्षितिज मोहन सेन से प्रभावित होकर गंभीर साहित्य साधना में लीन हो गए। 

1950 ई. में ये काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी-विभाग में अध्यक्ष बनकर वाराणसी आ गए, जहाँ से कुछ अपरिहार्य कारणों से पद त्याग करके 1960 में पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ में हिंदी विभागाध्यक्ष का दायित्व संभाला। वहाँ से लौटकर ये काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्रो वाइस चांसलर बने। 

ये भारत सरकार की हिंदी संबंधी अनेक योजनाओं से जुड़े रहे हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय ने इनको डी. लिट् की मानक उपाधि से सम्मानित किया था और भारत सरकार ने इनको पद्मभूषण की उपाधि से अलंकृत किया था। आलोक पर्व पुस्तक पर इनको साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया था। 1979 ई. की 19 मई को द्विवेदी जी का स्वर्गवास हो गया।

रचनाएँ—द्विवेदीजी का रचना संसार बहुत विस्तृत है। इन्होंने उपन्यास, निबंध व आलोचना के क्षेत्रों में अनेक महत्वपूर्ण कृतियों का योगदान किया है इनकी महत्वपूर्ण रचनाएँ इस प्रकार है- निबंध संकलन- ‘अशोक के फूल’, ‘विचार और वितर्क’, ‘कल्पतता’, ‘कुटज’, ‘आलोक ‘पर्व’ आदि।

उपन्यास —‘चारुचंद्रलख’, ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’, ‘पुनर्नव’ तथा ‘अनामदास का पोथा’ ।

आलोचनात्मक ग्रंथ—‘सूर-साहित्य’, ‘कबीर’, ‘हिंदी साहित्य की भूमिका’, ‘कालिदास को लालित्य योजना आदि।

भाषा-शैली – आचार्य द्विवेदी की शैली आत्म कथात्मक, विवेचनात्मक एवं व्यंग्यात्मक है। विचारों की लड़ी पिरोते समय समास शैली एवं सूत्रात्मक विचारों की व्याख्या करते समय द्विवेदी जी ने न्यास शैली का भी प्रयोग किया है।

आचार्य द्विवेदी की भाषा प्रांजल होते हुए भी सरल है। तत्सम शब्दों के साथ ही अंग्रेजी, उर्दू के शब्दों तथा लोकोक्तियों, मुहावरों व संस्कृत के उद्धरणों का भी प्रयोग द्विवेदी जी ने किया है। साहित्यिक विशेषताएँ- द्विवेदी जी का अध्ययन क्षेत्र बहुत व्यापक था। 

संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, बंगला, हिंदी आदि भाषाओं एवं इतिहास, दर्शन, धर्म, संस्कृति आदि क्षेत्रों में उनका गहन अध्ययन रहा है। इसी कारण उनके साहित्य में भारतीय संस्कृति की गहरी पैठ और विषय-वैविध्य के दर्शन होते हैं। वे परंपरा के साथ आधुनिक प्रगतिशील मूल्यों के समन्वय को लेकर चले हैं। 

उनके निबंधों में विचार और भावना का अद्भुत सामंजस्य है। उन्होंने श्रेष्ठ कोटि के ललित निबंधों की रचना की है। विषय का चयन करते समय उन्होंने सरल व गूढ़ दोनों प्रकार के विषय लिए हैं। वे भारतीयता के विश्वासी है। यही कारण है कि उनकी कृतियों में भारतीय संस्कृति, भारतीय ज्ञान व भारतीय परंपराओं के प्रति अत्यधिक सम्मान भाव वर्णित हुआ है। 

प्राचीन विषयों का वर्णन करते समय वे वर्तमान की समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करते हैं। वे लोक मंगल को बहुत महत्व देते हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के बाद हिंदी के निबंध क्षेत्र में उनका सर्वप्रमुख स्थान है।


शिरीष के फूल पाठ का सारांश


शिरीष के फूल पाठ का सारांश: ‘शिरीष के फूल’ लेखक के संग्रह ‘कल्पलता’ में संकलित ललित निबंध है। शिरीष का पुष्प बहुत ही कोमल होता है। यह ग्रीष्म ऋतु में फूलता है। जब सारी वनस्पति लू व अंघड़ की मार से सूख रही होती है, तब शिरीष यौवन पर होता है। शिरीष के कोमल फूलों के माध्यम से लेखक मनुष्य को अजेय जिजीविषा और कर्तव्यशील बने रहने का संदेश देता है। 

शिरीष के फूल के बहाने लेखक इतिहास में और फिर मध्यकाल के सांस्कृतिक इतिहास में प्रवेश करता है। उसे दुख है कि अशोक के फूल के समान लोगों ने शिरीष के पुष्प को भी भुला दिया है। साहित्य, समाज व राजनीति में पुरानी व नई पीढ़ी के द्वंद्व की ओर भी संकेत हुआ है। यह निबंध लेखक के प्रतिनिधि निबंधों में से एक है।

शिरीष का परिचय — शिरीष के पेड़ों के नीचे बैठकर जेठ की धूप में लेखक अपना लेखन कार्य कर रहा है। पृथ्वी तप रही है किंतु शिरीष फूलों से लदा हुआ है। यों तो गर्मियों में कनेर, अमलतास, पलास भी खिलते हैं किंतु इनकी अवधि थोड़ी है। पलाश तो बसंत में ही निबट लेता है। 

शिरीष बसंत से लेकर आषाढ़ तक रहता है। अर्थात् ग्रीष्म के चारों महीनों में फूलता रहता है। आषाढ़ ही नहीं कभी-कभी तो भादों में भी फूलता रहता है। उस पर उमस या लू का कोई प्रभाव नहीं पड़ता । वह तो वाममार्गी तंत्र साधक बनकर अपनी अजेयता सिद्ध करता है। कवियों को भी इस फूल ने आकर्षित किया है।

शिरीष का वृक्ष बड़ा और छायादार होता है। रईसों की वाटिका में यह चार दीवारी के पास लगाया जाता था। संस्कृत साहित्य में शिरीष के फूल को बहुत कोमल माना गया है। कालिदास के साहित्य में शिरीष का वर्णन जगह-जगह मिलता है। शिरीष इतना कोमल है कि वह केवल भौरों के पैरों का ही दबाव सह सकता है, पक्षियों का नहीं। 

इसके फूल मतबूत होते हैं और बहुत समय तक पेड़ पर टिके रहते हैं। शिरीष मस्त वृक्ष है। जब धरती और आसमान जलते रहते हैं, तब का शिरोष फूलता है। यह वायुमंडल से अपना रस खींचता है। कालिदास की नायिकाएँ कानों में शिरीष के फूल लगाती थीं। वह शिरीष कोमलता व कठोरता का उदाहरण प्रस्तुत करती है। 

पुराने व नए का संघर्ष — शिरीष के फल अर्थात् फली इतने काल तक वृक्ष पर लटकी रहती है कि नई फली आ जाती है। इसके माध्यम से लेखक यह कहना चाहता है कि पुरानों को समय रहते चले जाना चाहिए, अन्यथा नए उनको धक्का मारकर निकाल देंगे। 

पुराने अधिकार-लिप्सा क्यों नहीं छोड़ते। जरा और मृत्यु तो अनिवार्य सत्य है। जीर्ण-शीर्ण को तो झड़ना ही पड़ेगा। मूर्ख समझते हैं कि जहाँ बने हैं, वहीं देर तक बने रहें तो शायद काल देवता से बच जाएँगे। अच्छा यही है कि आगे की ओर बढ़ते रहो। जमोगे तो मरना निश्चित है। एक कवि की पंक्तियाँ देखें-

प्रकृति के यौवन का श्रृंगार करेंगे कभी ना बासी फूल। मिलेंगे वे जाकर अति शीघ्र आहा! उत्सुक है उनकी धूल ।।

कालिदास – कवि और शिरीष लेखक शिरीष को अवचूत मानता है। कवियों में उसे कबीर और कालिदास अवधूत दिखाई देते हैं। हजारी प्रसाद जी का प्रिय कवि कालिदास है। वह कालिदास को अनासक्त योगी मानते हैं। उनके विचार से मेघदूत जैसा काव्य किसी अवधूत कवि के हृदय से ही निकल सकता है। फक्कड़ ही कवि बन सकता है। वह किए कराए का लेखा-जोखा नहीं करता।

कालिदास को छंद का ज्ञान था, क्योंकि वे अनासक्त योगी की स्थिर-प्रज्ञता और विदग्ध प्रेमी का हृदय पा चुके थे। लेखक कालिदास के एक-एक श्लोक को देखकर हैरान हो जाता है। शकुंतला बहुत सुंदर है किंतु लेखक उसकी सुदंरता का राज कालिदास के हृदय को मानता है। 

शकुंतला, पर विधाता व कवि दोनों की ही कृपा रही है। शकुंतला इतनी सुंदर है कि दुष्यंत उसका चित्र बनाने का प्रयास करता है किंतु सफलता नहीं मिलती। बाद में उसे ध्यान आया कि कानों में शिरीष-पुष्प देना भूल गए हैं।

कालिदास सौंदर्य के बाह्य आवरण को भेद कर उसके भीतर तक पहुँच सकते थे। सुख हो या दुख वे अपना भाव रस निकाल लेते हैं। लेखक के अनुसार कालिदास महान थे, क्योंकि वे अनासक्त रह सकते थे। कालिदास के समान आधुनिक कवियों में रविंद्रनाथ व सुमित्रा नंदन पंत लेखक को अनासक्त लगते हैं।

शिरीष का लेखक पर प्रभाव-लेखक के मन में शिरीष तरंगें जगा देता है। उसे शिरीप अवधूत लगता है। उसे आश्चर्य है कि इस चिलकती धूप में शिरीष इतना सरस कैसे बना रहता है जब शिरीष धूप, वर्षा, आँधी, लू में स्थिर रह सकता तो देश मार-काट, अग्निदाह, लूट-पाट, खन-खच्चर के होते हुए भी स्थिर क्यों नहीं रह सकता। 

गाँधी तो इन्हीं परिस्थितियों में स्थिर रहे थे। लेखक को लगता है कि गाँधी भी अवधूत था। उसने भी शिरीष के समान वायु-मंडल से रस खींचा था। तभी तो गाँधी इतना कोमल व इतना कठोर हो सकता था। शिरीष के अवधूत पाक देख कर लेखक को बार-बार गाँधी की याद आती है। तब हुक उठती है-हाय, वह अवधूत आज कहाँ है।


शिरीष के फूल पाठ का शब्दार्थ


धरित्री पृथ्वी। निर्धूम-धुआँ रहित। कर्णिकार-कनेर। आरग्वध-अमलतास। पलाश ढाका लहकना-खिलना। खंखड़-ठूंठ, शुष्क। दुमदार-पूँछ वाले लँडूरे-पूँछ विहीन निर्यात- बिना आघात या दाया के । उमस-गर्मी। लू गर्म हवाएँ। एकमात्र एकलौता कालजयी – समय को पराजित करने वाला। अवधूत-सांसारिक बंधनों व विषय-वासनाओं से ऊपर उठा हुआ संन्यासी,

वाममार्गी तंत्र सायक। नितांत पूरी तरह से हिल्लोल-लहर। मंगल-जनक- शुभदायक अरिष्ट-री नामक वृक्ष। पुन्नाग-एक बड़ा सदाबहार वृक्ष घनमसूण घना चिकना, गहरा चिकना, मुलायम हरीतिमा हरियाली। परिवेष्टित ढका हुआ। 

कामसूत्र वात्स्यायन के ग्रंथ का नाम बकुल-मौलसिरी का वृक्ष दोला झूला तुदिल तोंद वाला, मोटे पेट वाला परवती-बाद के मर्मरित पत्ती की खड़ाहट या सरसराहट ध्वनि से युक्त सपासप ध्वन्यात्मक शब्द जो कोड़े पड़ने की आवाज है लिए प्रयुक्त होता है यहाँ ‘जल्दी-जल्दी’ अर्थ रखता है। जीर्ण-पुराने, बूढ़ा उर्ध्वमुखी प्रगति की और दुरंत जिसका विनाश होना मुश्किल है। सर्वव्यापक सर्वत्र व्याप्त कालाग्नि-म आग। 

हजरत श्रीमान (यहाँ व्यंग्यात्मक स्वर है) अनासक्त विषय भोग से ऊपर उठा हुआ, – मृत्यु को चिंताओं से निर्लिप्त। अनाविल-स्वच्छ, शुद्ध उन्मुक्त द्वंद्व रहित फक्कड़-संसार की लापरवाह और अपने आप में मस्त । कर्णाट-प्राचीन काल का कर्नाटक राज्य उपालंभ उत् स्थिर प्रज्ञता अविचल बुद्धि की अवस्था। विदग्ध अच्छी तरह से तपा हुआ। 

मुग्ध-आनंदिता विस्मय-विमूढ़-आश्चर्यचकित। कार्पण्य-कृपणता, कंजूसी। गंडस्थल कपोल, गाल। शरच्चंद्र- शरद् ऋतु का चंद्रमा शुभ्र श्वेत मृणाल-कमलनाल। कृपीवल-किसान। निर्दलित-भली-भांति निचोड़ा हुआ। इक्षुदंड – गन्ना अभ्रभेदी-गगन चुबी। गंतव्य लक्ष्य। खून खच्चर लड़ाई-झगड़ा। 


शिरीष के फूल पाठ का प्रश्नोत्तर


प्रश्न 1. लेखक ने शिरीष को कालजयी अवधूत (संन्यासी) की तरह क्यों माना है ? 

उत्तर—शिरीष का पेड़ अवधूत (संन्यासी) की भाँति वसंत के आगमन से लेकर भद्रपद मास तक बिना किसी बाधा के पुष्पित होता रहता है। जब ग्रीष्म ऋतु में सारी पृथ्वी धुआँ रहित अग्नि कुंड की भाँति बन जाती है, सभी के प्राण उबलने लगते हैं, लू के कारण हृदय सूखने लगता है, तो ऐसा लगता है । 

जैसे शिरीष का पेड़ करल जैसी अवधूत की भाँति जीवन की अजेयता के मंत्र का प्रचार कर रहा हो। वह संसार के समस्त प्राणियों को धैर्यशील, चिंता रहित एवं कर्त्तव्यशील बने रहने के लिए प्रेरित करता है। इसी कारण लेखक ने उसे संन्यासी की तरह माना है। 

प्रश्न 2. हृदय की कोमलता को बचाने के लिए व्यवहार की कठोरता भी कभी-कभी जरूरी हो जाती है-प्रस्तुत पाठ के आधार पर स्पष्ट करें। 

उत्तर – शिरीष के फूल कोमल होते हैं। ये केवल भौरों के पैरों का कोमल भार ही सहन कर सकते हैं। इस पर पक्षियों का भार असहनीय हो जाता है। इस प्रकार की अवस्था पाकर ये तुरंत टूटकर जमीन पर आ गिरते हैं।

किंतु इसी शिरीष के फूल बड़े मजबूत और कठोर होते हैं। वे नए फूलों के निकल आने पर भी अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए स्थान नहीं छोड़ते। इस प्रकार शिरीष का वृक्ष एक अवधूत की भाँति बना रहता है। 

इससे स्पष्ट है कि हृदय की कोमलता को बचाने के लिए व्यवहार की कठोरता भी कभी-कभी जरूरी हो जाती है। 

प्रश्न 3. द्विवेदी जी ने शिरीष के माध्यम से कोलाहल व संघर्ष से भरी जीवन-स्थितियों में अविचल रह कर जिजीविषु बने रहने की सीख दी है। स्पष्ट करें।

उत्तर—शिरीष का वृक्ष एक अवधूत की भाँति होता है। वह दुख और सुख में हार नहीं मानता है। ग्रीष्म ऋतु में जब असहनीय गर्मी पड़ती रहती है, धरती और आसमान जलते रहते। हैं, तब भी यह वायुमंडल से रस खींचकर हरा-भरा बना रहता है। वह मस्त, बेपरवाह, सरस और मादक बना रह कर कोलाहल व संपर्क से भरी जीवन स्थितियों में अविचल रहकर जिजीविषु बने रहने की सीख देता है।

प्रश्न 4. हाय वह अवधूत आज कहाँ है। ऐसा कहकर लेखक ने आत्मबल पर देह-बल के वर्चस्व की वर्तमान सभ्यता के संकट की ओर संकेत किया है। कैसे ? 

उत्तर- लेखक के अनुसार शिरीष का वृक्ष धूप, वर्षा, आँधी, लू आदि विषम परिस्थितियों में भी अविचल बना रहता है। उस ऋतु परिवर्तन का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। इसी प्रकार आज हमारा देश मार-काट, अग्निदाह, लूट-पाट, हत्या आदि समस्याओं से ग्रस्त है। ऐसे समय में राष्ट्रीय एकता और धर्म निरपेक्षता स्थापित कर सकने वाले साहसी, दृढ़-संकल्पी और आत्म-विश्वासी चरित्र की आवश्यकता है।

प्रश्न 5. कवि (साहित्यकार) के लिए अनासक्त योगी की स्थिर प्रज्ञता और विदग्ध प्रेमी का हृदय एक साथ आवश्यक है। ऐसा विचार प्रस्तुत कर लेखक ने साहित्य-कर्म के लिए बहुत ऊँचा मानदंड निर्धारित किया है। विस्तारपूर्वक समझाएँ । 

उत्तर- कवि (साहित्यकार) के लिए अनासक्त योगी की स्थिर-प्रज्ञता का होना आवश्यक है। उसे मस्त, चिंतारहित, सरस एवं अहंकाररहित व्यवहार करना चाहिए। उसे अपनी बुद्धि को स्थिर रख कर काव्य की रचना करनी चाहिए। 

उसका हृदय स्वच्छ एवं स्वतंत्र होना चाहिए। उसे सांसारिक मोह माया से दूर रहना चाहिए। किंतु इसके साथ ही उसे सौंदर्य वर्णन के लिए एक सच्चा प्रेमी भी बना रहना चाहिए, क्योंकि प्रेम में अच्छी तरह से तपा हुआ हृदय ही सौंदर्य में डुबकी लगाकर बाहर निकलने के बाद उसका वर्णन कर सकता है।

कालिदास द्वारा रचित ‘मेघदूत’ काव्य उनके अनासक्त योगी, तथा ‘अभिज्ञानशाकुंतलम्’ में दुष्यंत को आकर्षित करने के लिए शकुंतला का सौंदर्य वर्णन उनके विदग्ध प्रेमी हृदय को दर्शाता है। यदि ये दोनों प्रकार की विशेषताएँ कालिदास में नहीं होतीं तो वे इस प्रकार की रचना कर सकने में समर्थ नहीं होते। अतः स्पष्ट है कि कवि (साहित्यकार) के लिए अनासक्त योगी की स्थिर प्रज्ञता और विदग्ध प्रेमी का हृदय एक साथ होना आवश्यक है। 

प्रश्न 6. सर्वग्रासी काल की मार से बचते हुए वही दीर्घजीवी हो सकता है, जिसने अपने व्यवहार में जड़ता छोड़कर नित बदल रहित स्थितियों में निरंतर अपनी गतिशीलता बनाए रखी है। पाठ के आधार पर स्पष्ट करें। 

उत्तर – लेखक के अनुसार आज के युग में लोगों के अधिकार लिप्सा की भावना प्रबल हो चुकी है। वे नवीनता को स्वीकार करने की अपेक्षा उसी पद या स्थान पर बने रहने के लिए उत्सुक रहते हैं। 

किंतु हमें ऐसा करने की अपेक्षा साहित्य, समाज एवं राजनीति में नएपन या नयी पीढ़ी के अस्तित्व को मानने के लिए तैयार रहना चाहिए क्योंकि संसार में वृद्धावस्था और मृत्यु, ये दोनों अच्छी तरह से प्रमाणित और प्रमाणिक सत्य हैं। यदि हम नएपन को स्वीकार नहीं करते हैं तो नई पीढ़ी हमें धकियाकर बाहर करने को विवश हो जाती है।

प्रश्न 7. आशय स्पष्ट कीजिए- (क) दुरंत प्राण धारा और सर्वव्यापक कालाग्नि का संघर्ष निरंतर चल रहा है। मूर्ख समझते हैं कि जहाँ बने हैं, वहीं देर तक बने रहें तो कालदेवता की आँख बचा पाएँगे। भोले हैं वे । हिलते-डुलते रहो, स्थान बदलते रहो, आगे की ओर मुँह किए रहो तो कोड़े की मार से बच भी सकते हो। जमे कि मरे।

उत्तर—इस गद्यांश के आशय के लिए महत्त्वपूर्ण गद्यांशों की व्याख्या का खंड देखें। 

(ख) जो कवि अनासक्त नहीं रह सका, जो फक्कड़ नहीं बन सका, जो किए कराए का लेखा-जोखा मिलाने में उलझ गया, वह भी क्या कवि है? मैं कहता हूँ कि कवि बनना है मेरे दोस्तों, तो फक्कड़ बने । उत्तर – आशय : लेखक के अनुसार सांसारिक विषय-वासनाओं में पड़कर कवि (साहित्यकार)

कविता या साहित्य की रचना नहीं कर सकता। वह मानता है कि कवि को एक संन्यासी की भाँति संसार से विरक्त होकर रहना पड़ता है। अतः सांसारिक मोह-माया में फँसने की अपेक्षा फक्कड़ बनने वाली व्यक्ति ही कवि बन सकता है और उत्तम कविताओं की रचना कर सकता है। 

(ग) फल हो या पेड़, वह अपने आप में समाप्त नहीं है। वह किसी अन्य वस्तु को दिखाने के लिए के लिए उठी हुई अंगुली हैं वह इशारा है। उत्तर—–इस गद्यांश के आशय के लिए महत्त्वपूर्ण गंयाशों की व्याख्या का खंड देखें।

प्रश्न 8. शिरीष के पुष्प को शीतपुष्प भी कहा जाता है। ज्येष्ठ माह की प्रचंड गरमी में फूलने वाले फूल को शीतपुष्प संज्ञा किस आधार पर दी गई होगी? 

उत्तर-शिरीष का पुष्प सहनशील है। वह मौसम में आए प्रत्येक परिवर्तन को सहर्ष स्वीकार करता है और अपना संतुलन बनाए रखता है। वह वसंत के आगमन के साथ खिल जाता है और ग्रीष्म की तपती धूप में भी मस्त बना रहता है। ऐसा लगता है कि उसके लिए धूप, वर्षा, आँधी, लू आदि ऋतु परिवर्तन का कोई महत्त्व नहीं है इसलिए इसे शीत पुष्प कहा जाता है।

प्रश्न 9. कोमल और कठोर दोनों भाव किस प्रकार गाँधी जी के व्यक्तित्व की विशेषता बन गए।

उत्तर—गाँधी जी हिंसा, मार-काट, विद्वेष, घृणा आदि विचार-धाराओं में विश्वास नहीं रखते थे। वे सत्य, अहिंसा, प्रेम आदि कोमल भावों को ही मनुष्य के हथियार मानते थे। वे मानते थे कि स्वतंत्रता के लिए हिंसायुक्त आंदोलन की आवश्यकता नहीं है। हमें अंग्रेजों के समक्ष ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करनी चाहिए जिनके कारण वे स्वयं भारत छोड़ने को विवश हो जाएँ। इस प्रकार उनका हृदय कोमल था।

किंतु दूसरी तरफ उनका हृदय कठोर भी था। वे किसी विषय पर एक बार निर्णय ले लेते, तो ऐसी कोई भी ताकत, शक्ति या बल नहीं था जो उन्हें उनके मार्ग से हटा सकता था। 

उनके द्वारा किए गए सत्याग्रह आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन आदि इसके प्रमाण हैं, जिनसे बाध्य होकर अंग्रेजों को भारत छोड़कर भागने को विवश होना पड़ा था। इस प्रकार कोमल और कठोर दोनों भाव उनके व्यक्तित्व की विशेषता बन गए थे। 

प्रश्न 10 द्विवेदी जी की वनस्पतियों में ऐसी रुचि का क्या कारण हो सकता है? आज साहित्यिक रचना-फलक पर प्रकृति की उपस्थिति न्यून से न्यून होती जा रही है। तब ऐसी रचनाओं का महत्त्व बढ़ गया है। प्रकृति के प्रति आपका दृष्टिकोण रुचिपूर्ण है या उपेक्षा मय । इसका मूल्यांकन करें।

उत्तर—द्विवेदी जी के युग में समाज में अनेक बुराइयाँ व्याप्त थीं, जिनमें जात-पात, बाल-विवाह, सतीप्रथा, स्त्रियों के प्रति अत्याचार आदि प्रमुख हैं। लेखक स्वयं गाँधीवादी विचार धारा के हैं। उनमें वनस्पतियों के माध्यम से मनुष्य को प्रेरित करने की क्षमता है। वे सदी, लू वर्षा आदि में अविचल बने रहकर मनुष्य को सभी प्रकार की परिस्थितियों में स्थिर बने धूप, गर्मी, रहने की प्रेरणा देते हैं। 

इसी कारण से द्विवेदी जी की वनस्पतियों में ऐसी रुचि हो सकती है। आधुनिक युग भी चुनौतीपूर्ण है। आज संसार में जातिवाद, क्षेत्रवाद, सांप्रदायिकता जैसे तत्त्व सिर उठाए हुए हैं। ऐसे समय में प्रकृति ही मनुष्य के जीवन में प्रेरणा भरकर प्रेम, सौहार्द, सहिष्णुता आदि भावों से युक्त कर जीना सिखला सकती है। अतः ऐसी परिस्थितियों में वनस्पति जगत से संबंधित रचनाओं का महत्त्व और भी बढ़ गया है। 

प्रश्न 11. दस दिन फूले और फिर खंखड़-खंखड़ इस लोकोक्ति से मिलत-जुलते कई वाक्यांश पाठ में हैं। उन्हें छाँट कर लिखें ।

उत्तर- भाषा को बल देने के लिए लोकोक्ति व मुहावरों का प्रयोग किया जाता है। लेखक ने भी ऐसे ही कुछ प्रयोग किए हैं। 

यथा- 

(i) ऐसे दुमदारों से तो लडुरे भले 

(ii) दूँठ होना 

(iii) सपासप कोड़े चलाना 

(iv) नऊचो का लेना, न माधो का देना 

(v) मीज में मस्त रहना 

(vi) फक्कड़ाना मस्ती 

(vii) किसी की न सुनना ।

अशोक वृक्ष – भारतीय साहित्य में बहुचर्चित एक सदाबहार वृक्ष। इसके पत्ते आम के पत्तों से मिलते हैं। वसंत ऋतु में इसके फूल लाल-लाल गुच्छों के रूप में आते हैं। इसे काम देव के पाँच पुष्प वाणों में से एक माना गया है। इसके फल सेम की तरह होते हैं। इसके सांस्कृतिक महत्त्व का अच्छा चित्रण हजारी प्रसाद द्विवेदी ने निबंध अशोक के फूल में किया है। अनवश आज एक दूसरे वृक्ष को अशोक कहा जाता रहा है और मूल पेड़ (जिसका वानस्पतिक नाम सराका इंडिका है।) को लोग भूल गए हैं। इसकी एक जाति श्वेत फूलों वाली भी होती है।

अरिष्ठ वृक्ष रीटा नामक वृक्ष। इसके पत्ते चमकीले हरे होते हैं। फल को सुख्खाकर पेड़ की डालियों व तने पर जगह-जगह काँटे उभरे होते हैं, जो बाल और कपड़े धोने के काम भी आता है। आरग्वध वृक्ष – लोक में उसे अमलतास कहा जाता है। भीषण गरमी की दशा में जब इसका पेड़ पत्र हीन दूँठ सा हो जाता है, पर इस पर पीले-पीले पुष्प गुच्छे लटके हुए मनोहर दृश्य उपस्थित करते हैं। इसके फल लगभग एक डेढ़ फुट के बेलनाकार होते हैं जिसमें कठोर बीज होते हैं।

शिरीष वृक्ष – लोक में शिरीष नाम से मशहूर पर एक मैदानी इलाके का वृक्ष है। आकार में विशाल होता है पर पत्ते बहुत छोटे-छोटे होते हैं। इसके फूलों में पंखुड़ियों की जगह रेशे – रेशे होते हैं। 


शिरीष के फूल पाठ का गद्यांश संबंधी प्रश्नोत्तर


1. जहाँ बैठ के यह लेख लिख रहा हूँ उसके आगे-पीछे, दाएँ-बाएँ, शिरीष के अनेक पेड़ हैं। जेठ की जलती धूप में जबकि घरित्री निर्धूम अग्निकुंड बनी हुई थी, शिरीष नीचे से ऊपर तक फूलों से लद गया था। 

कम फूल इस प्रकार की गरमी में फूल सकने की हिम्मत करते हैं। कर्णिकार और आरवय (अमलतास) की बात में भूल नहीं रहा हूँ। ये भी आस-पास बहुत है। लेकिन शिरीष के साथ आरग्वय की तुलना नहीं की जा सकती। वह पंद्रह दिन के लिए लड़क उठना पसंद नहीं था। 

यह भी क्योंकि दस दिन फूले और फिर खंखड़ के खखड़-दिन दस फूला फूलि के खखड़ भया पलास!’ ऐसे दुमदारों से तो लँडूरे मले। फूल है शिरीष वसंत के आगमन के साथ लहक उठता है, आसाढ़ तक जो निश्चित रूप से मस्त बना रहता है। 

मन रम गया तो भरे भादों में भी निर्घात फूलता रहता है। जब उससे प्राण उबलता रहता है और ल से हृदय सूखता रहता है, एक मात्र शिरीष कालजयी अवधूत की भांति जीवन की अजयता का मंत्र प्रखर करता रहता है।

यद्यपि कवियों की भांति हर फूल-पत्ते को देखकर मुग्ध होने लायक हृदय विधाता ने नहीं दिया है, पर नितांत ठूंठ भी नहीं हूँ। शिरीष के पुष्प मेरे मानस में थोड़ा हिल्लोल जरूर पैदा करते हैं।

प्रश्न –

(क) पाठ तथा पाठ के लेखक का नाम लिखिए ।

(ख) यह पाठ लेखक के किस ग्रंथ में संकलित है ?

(ग) शिरीष कूलों से कब लदा हुआ था ? 

(घ) आरग्बध व पलाश से शिरीष की तुलना क्यों नहीं की जा सकती ? 

(ङ) शिरीष कब से कब तक खिलती है ?

(च) लेखक अपने को नितांत ठूंठ क्यों नहीं मानता ?

उत्तर

(क) पाठ – शिरीष के फूल लेखक हजारी प्रसाद द्विवेदी

(ख) यह पाठ लेखक के ‘कल्पलता’ नामक संग्रह ग्रंथ में संकलित है।

(ग) जेठ की जलती ग्रूप में, जब पृथ्वी अग्निकुंड के समान तप रही थी, तब शिरीष नीचे से ऊपर तक फूलों से लद गया था।

(घ) आरग्वध (अमलतास) केवल पंद्रह-बीस दिन के लिए फूलता है। पलाश ग्रीष्म में नहीं वसंत में फूलता है और यह भी बहुत थोड़े दिनों तक तभी तो उसके विषय में कहा गया। ‘दिन दस फूला फूलिके संखड़ भया पलाश।’ शिरीष तो वसंत से लेकर भादों तक खिलता है। अतः उसके साथ अमलताश व पलाश की तुलना नहीं की जा सकती। 

(ङ) वसंत ऋतु चैत्र मास से प्रारंभ होती है और वर्षा भादों में समाप्त होती है। इस प्रकार

शिरीष वसंत से भावों तक खिलता है। आशय है कि छह महीन चैत, बैसाख, जेठ, आषाढ़, सावन भादो तक शिरीष खिलता है।

(च) लेखक निबंधकार, उपन्यास लेखक व आलोचक है। कवि रूप में उसकी प्रसिद्धि नहीं है किंतु वह यह मानने को तैयार नहीं है कि उसके पास हृदय नहीं है। वह यह मानता है कि उसकी सहृदयता भले ही कवियों के समान नहीं है किंतु वह शुष्क हृदय नहीं है। प्रकृति के सौंदर्य को देखकर उसके हृदय में भी हिलोर उठती हैं।


2. मैं सेचता हूँ कि पुराने की यह अधिकार लिप्सा क्यों नहीं समय रहते सावधान हो जाती ? जरा और मृत्यु, ये दोनों ही जगत के अतिपरिचित और अतिप्रमानिक सत्य है। 

तुलसीदास के अफसोस के साथ इनकी सच्चाई पर मुहर लागई थी- ‘घरा को प्रमान यही तुलसी जो फरासो झरा, जो बरा सो बुताना!’ में शिरीष के फूलों को देख कर कहता हूँ कि क्यों नहीं फलते ही समझ लेते बाबा कि झड़ना निश्चित है। सुनता कौन है ? 

महाकाल देवता सपासप कोड़े चला रहे हैं, जीर्ण और दुर्बल झड़ रहे हैं, जिनमें प्राण कण थोड़ा भी ऊर्ध्वमुखी है, वे टिक जाते हैं। दुरंत प्राणधारा और सर्वव्यापक कालाग्नि का संघर्ष निरंतर चल रहा हैं। 

मूर्ख समझते हैं कि जहाँ बने हैं, वही देर तक बने रहें तो कालदेवता की आँख बचा। भोले हैं वे हिलते-डुलते रहो, स्थान बदलते रहो, आगे की ओर मुँह किए रहो तो कोड़े की मार से बच भी सकते हो। जमे के मरे !

प्रश्न – 

(क) पाठ तथा पाठ के लेखक का नाम लिखिए । 

(ख) यह पाठ लेखक के किस संकलन में संकलित है ?

(ग) तुलसीदास ने किस सच्चाई को प्रमाणित किया है ? (घ) कालदेवता क्या करता है ?

(ङ) मूर्ख क्या समझते हैं ?

उत्तर- (क) पाठ लेखक शिरीष के फूल हजारी प्रसाद द्विवेदी –

(ख) यह पाठ लेखक के संग्रह ‘कल्पलता’ में संकलित है। 

(ग) तुलसीदास मानते थे कि जरा और मृत्यु दोनों ही सत्य हैं। इस सत्य को प्रमाणित करते हुए ये कहते हैं -धरा को प्रमान यही तुलसी जो फरा सो झरा, जो बरा सो घुताना ।

(घ) कालदेवता पुराने को नष्ट करता है वह दिन-रात जीर्ण व दुर्बल को नीचे गिराता है। कुछ लोग टिकने के लिए संघर्ष में एक दिन विजय कालदेवता को ही मिलती है। 

(ङ) मूर्ख यह समझते हैं जहाँ बने हैं, वहीं देर तक बने रहें तो कालदेवता की आँख से बच जाएंगे। किंतु जमे रहने से मृत्यु और जल्दी आती है।


3. कालिदास सौंदर्य के बाह्य आवरण को भेदकर उसके भीतर तक पहुँच सकते थे, दुख हो कि सुख, वे अपना भाव रस उस अनासक्त कृपीवल की भाँति खींच लेते थे जो निर्दलित ईसु-दंड से रस निकाल लेता है। कालिदास महान थे, क्योंकि वे अनासक्त रह सके थे। कुछ इसी श्रेणी की अनासक्ति आधुनिक हिंदी कवि सुमित्रानंदन पंत में है। 

विवर रवींद्र नाथ में यह अनासक्ति थी। एक जगह उन्होंने लिखा-‘राजोद्यान का सिंहद्वार कितना ही अभ्रभेदी क्यों न हो, उसकी शिल्प कला कितनी ही सुंदर क्यों न हो, वह यह नहीं कहता कि हममें आकर ही सारा रास्ता समाप्त हो गया। 

असल गंतव्य स्थान उसे अतिक्रम करने के बाद ही है, यही बताना उसका कर्तव्य है।’ फूल हो या पेड़, वह अपने आप में समाप्त नहीं है। वह किसी अन्य वस्तु को दिखाने के लिए उठी हुई अंगुली का वह इशारा है।

प्रश्न – 

(क) पाठ तथा पाठ के लेखक का नाम लिखिए। 

(ख) यह पाठ लेखक के किस संग्रह में संकलित है ?

(ग) इस गद्यांश में कालिदास के किस गुण का वर्णन है ?

(घ) कालिदास से आधुनिक युग के किन कवियों से किस आधार पर तुलना की है ? 

(ङ) फूल या पेड़ क्या संकेत करते हैं ?

उत्तर- 

(क) पाठ शिरीष के फूल लेखक हजारी प्रसाद द्विवेदी

(ख) यह पाठ लेखक के संग्रह ‘कल्पलता’ में संकलित है।

(ग) कालिदास की विशेषता बताते हुए लेखक कहता है कि कालिदास सौंदर्य के बाह्य आवरण को भेद कर उसके भीतर पहुँचने की शक्ति रखते थे। दुख हो अथवा सुख वह अपना भाव-रस उसी प्रकार निकाल लेते थे जिस प्रकार किसान गन्ने को भली-भाँति निचोड़ कर उसमें से रस निकाल लेता है।

(घ) लेखक ने कालिदास के समान आधुनिक युग के दो कवि बताए हैं-..

(i) रवींद्रनाथ टैगोर (ii) सुमित्रानंदन पंत

लेखक इन दोनों कवियों को कालिदास के समान आनासक्त व फक्कड़ मानता है। 

(ङ) फूल या पेड़ यह बताते हैं कि हमारे सौंदर्य से आगे भी कुछ और है। हमारे तक आकर ही सौंदर्य समाप्त नहीं होता। हमें पार करके ही असल गंतव्य तक पहुँचा जा सकता है।


4. शिरीष तरु सचमुच पक्क अवधूत की भाँति मेरे मन में ऐसी तरंगें जगा देता है जो ऊपर की ओर उठती रहती है। इस चिलकती धूप में इतना सरस वह कैसे बना रहता है? पया ये बाह्य परिवर्तन-धूप, वर्षा, आंधी, लू अपने आप में सत्य नहीं है? 

हमारे देश के ऊपर से जो यह मार-काट, अग्निदाह, लूट-पाट, खून खच्चर का बवंडर वह गया है, उसके भीतर भी पा स्थिर रहा जा सकता है? शिरीष रह सका है अपने देश का एक पूड़ा रह सका था। 

योगे मन पूछता है कि ऐसा क्यों संभव हुआ? क्योंकि शिरीष भी अवधूत है। शिरीष वायुमंडल से खींच कर इतना कोमल और इतना कठोर है। गाँधी भी वायु मंडल से इस खींचकर इतना कोमल और इतना कठोर हो सका था। में जब-जब शिरीष की ओर देखता हूँ तब तब हूक उदी है-हा, वह अवधूत आज कहाँ है। पाठ के लेखक का नाम बताइए ।

प्रश्न- 

(क) पाठ तथा पाठ के लेखक का नाम लिखिए। 

(ख) यह पाठ लेखक के किस संग्रह से लिया है ?

(ग) शिरीष के बारे में लेखक क्या सोचता है ? 

(घ) अपने देश के बारे में लेखक की चिंता क्या है ? 

(ङ) शिरीष को देखकर लेखक की चिंता क्या है ?

उत्तर- 

(क) पाठ शिरीष के फूल लेखक हजारी प्रसाद द्विवेदी

(ख) यह पाठ लेखक के संग्रह ‘कल्पलता’ नामक संग्रह से लिया गया है। 

(ग) शिरीष के बारे में लेखक सोचता है कि यह वृक्ष पक्क अवधूत की भाँति मेरे मन में ऐसी तरंगे जगाता है जो ऊपर की ओर उठती रहती है। यह चिलकती धूप में भी इतना सरस कैसे बने रहता है। वह सोचता है कि धूप, वर्षा, आंधी, लू का इस पर कोई असर क्यों नहीं होता। 

(घ) लेखक को चिंता है कि हमारे देश में मारकाट, अग्निदाह, लूटपाट, खून-खच्चर का बवंडर है। ऐसे में देश कैसे स्थिर रह सकेगा। फिर सोचता है जब विपरीत परिस्थिति में शिरीष स्थिर रह सकता है, बूढ़ा गाँधी रह सकता है, तो भारत क्यों नहीं रह सकता।

(ङ) शिरीष को देखकर लेखक को वृद्ध गाँधी की याद आती है। याद आने का कारण यह है कि गाँधी विपरीत परिस्थितियों में स्थिर रहना जानता था। देश को आज की विषम परिस्थितियों में गाँधी से स्थापित्व मिल सकता था।


शिरीष के फूल पाठ का प्रश्न


प्रश्न 1. शिरीष के पुष्प ने लेखक को क्यों आकर्षित किया?

उत्तर—–जेठ का महीना था। लेखक वृक्षों के नीचे बैठा था। वहाँ उसके आगे-पीछे, दाँये-बाँये शिरीष के अनेक वृक्ष थे। ऐसी स्थिति में वह सोचने लगा कि है इस भयंकर गरमी में, जब पृथ्वी अग्नि कुंड बनी हुई है, गरम हवाएँ चल रही हैं, तब भी यह शिरीष फूल रहा है। अब तो विद्वान

लेखक के मन में अनेक विचार कौंध आए। यथा-

(i) शिरीष की कोई समानता नहीं कर सकता। 

(ii) इसका फूल-फल बनकर बहुत समय तक वृक्ष पर टिका रहता है। 

(iii) भयंकर गरमी भी इसका कुछ नहीं बिगाड़ पाती। (iv) इसके खिलौने का समय भी छह महीने तक है। (v) यह वृक्ष बड़ा भी है और छायादार भी 

(vi) इसका फूल बहुत कोमल हैं। 

(vii) संस्कृत साहित्य में नारियाँ इसके पुष्पों से श्रृंगार करती थीं। 

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प्रश्न 2. लेखक ने किन-किन वृक्षों का उल्लेख किया है ? संदर्भ सहित बताएँ । 

उत्तर— लेखक ने शिरीष के बहाने कुछ अन्य वृक्षों का भी उल्लेख किया है। कनेर व अलम तास का वर्णन इस संदर्भ में है कि वह भी ग्रीष्म में फूलते हैं किंतु इनकी तुलना शिरीष से नहीं करता क्योंकि ये कम समय के लिए फूलते हैं। बसंत में पलाश फूलता है किंतु वह न तो गरमी झेलता है और उसकी अवधि भी बहुत सीमित है। रईसों की वाटिकाओं के प्रसंग में लेखक ने अशोक, अरिष्ठ (रीठा नाकम वृक्ष ) पुलाग (एक सदाबहार बड़ा-सा पेड़), बकुल (मौलसिरी का पेड़) का उल्लेख किया है। ये सभी वृक्ष भारतीय हैं।

प्रश्न 3. संसार की सबसे सरस संरचनाओं के लिए लेखक की क्या धारणा है ? 

उत्तर- लेखक इस विषय में इस प्रकार लिखता है—

अवधूतों के मुँह से ही संसार की सबसे सरस रचनाएँ निकली है। कबीर बहुत कुछ इस शिरीष के समान ही थे, मस्त और बेपरवाह, पर सरस और मादक। 

कालिदास जी जरूर अनासक्त योगी रहे होंगे। शिरीष के फूल पक्कड़ाना मस्ती के हो उपज सकते हैं और ‘मेघदूत’ का काव्य उसी प्रकार उसके अनासक्त अनाविल उन्मुक्त हृदय उमड़ सकता है। 

जो कवि अनासक्त नहीं रह सका, जो फक्कड़ नहीं बन सका, जो किए-कराए हा लेखा-जोखा मिलाने में उलझ गया, वह भी क्या कवि है?

जागे लेखक लिखता है- “मैं कहता हूँ कवि बनना है मेरे दोस्तों, फक्कड़ बनो।” “कालिदास महान थे, क्योंकि ये जनाय रह सके थे। कुछ इसी श्रेणी कही अनासक्ति आधुनिक हिंदी कवि सुमित्रानंदन पंत में है। कवि रवीन्द्रनाथ में यह अनासक्ति थी” 

प्रश्न 4. कालिदास के विषय में लेखक ने क्या बताया है ?

उत्तर— कालिदास आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का प्रिय कवि है, अतः उनके लेखन में स्थान-स्थान पर कालिदास का उल्लेख मिलता है। प्रस्तुत पाठ में लेखक कालिदास के विषय में बताता है- 

(i) लेखक का मानना है कि कालिदास का शिरीष पुष्प के प्रति पक्षपात का भाव था। 

(ii) कालिदास ने शिरीष के पुष्प की कोमलता का सर्वप्रथम वर्णन किया। 

(iii) कालिदास अनासक्त योगी व फक्कड़ स्वभाव के थे। 

(vi) अनासक्त, अनाविल, उन्मुक्त हृदय से ‘मेघदूत’ जैसा काव्य निकल सकता है। 

(v) कालिदास को छंद का ज्ञान था। 

(Vi) कालिदास में अनासक्त योगी की स्थिर-प्रज्ञता और विदग्ध प्रेमी का हृदय था। 

(vii) ‘अभिज्ञानशाकुंतलम्’ की शकुंतला कालिदास के हृदय से निकल कर ही इतनी सुंदर व सरस बन सकी है। 

(viii) कालिदास सौंदर्य के दाह्य आवरण को भेदकर उसके भीतर तक पहुँच सकते थे। 

(ix) कालिदास सुख-दुख दोनों के मध्य से भाव-रस निकाल लेते थे।

प्रश्न 5. लेखक ने कालिदास के ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ व ‘मेघदूत’ दो ग्रंथों का उल्लेख किया है। इनका अत्यंत संक्षेप में परिचय दें। 

उत्तर—‘अभिनशाकुन्तलम्’ कालिदास का विश्व प्रसिद्ध नाटक है। इसकी नायिका शकुन्तला कर ऋषि की पालित पुत्री है जिसका रूप सौंदर्य अनुपम है। इसने राजा दुष्यंत से गांधर्व विवाह किया था। इनके पुत्र भरत के नाम पर ही अपने देश का नाम भारत पढ़ा।

 ‘मेघदूत’ संदेश काव्य है। अलका धिपति कुबेर ने अपने सेवक यक्ष को कार्य में प्रसाद के कारण राज्य से निष्कासित कर दिया था। एक वर्ष की शापकी अविध के आठ मास बीत जाने के बाद आषाढ़ के प्रथम दिन बादल को देखकर प्रेम-विहल यक्ष ने बादल के द्वारा ही अपनी पत्नी को संदेश दिया था। मेघदूत काव्य में देवगिरि से अलका तक के मार्ग के वर्णन के साथ यक्ष के संदेश का वर्णन है।

प्रश्न 6. द्विवेदी जी ने शिरीष के माध्यम से कोलाहल व संघर्ष से भरी जीवन स्थितियों में अविचल रहकर जिजीविषा बनाए रखने की सीख दी है और क्या आप इससे सहमत हैं। पक्ष-विपक्ष में तर्क दें।

उत्तर – शिरीष के माध्यम से कोलाहल व संघर्ष से भरी जीवन स्थितियों अविचल रहकर जिजीविषा बनाए रचाने की जो सीख लेखक ने दी हैं, उससे हम पूर्णतया सहमत हैं। लेखक ने ही देश में व्याप्त मार-काट, अग्निदाह, लूट-पाट, खून-खराबे के बवंडर का उल्लेख किया है। 

इसे देखकर क्या व्यक्ति आत्महत्या कर लें। आए दिन समाचारों में सामूहित नरसंहार, दुर्घटनाओं, धोखा-घड़ी, बेईमानी, रिश्वतखोरी, अनाचार, व्यभिचार, राष्ट्रचार-द्रोह की खबरें पढ़ते हैं किंतु फिर भी जीवन की लालसा समाप्त नहीं होती। 

प्रश्न 7. कालिदास कृत शकुंतला के सौंदर्य वर्णन को महत्त्व को महत्त्व देकर लेखक- ‘सौन्दर्य’ को स्त्री के एक मूल्य के रूप में स्थापित करता प्रतीत होता है। क्या यह सत्य है? यदि हाँ तो क्या ऐसा करना उचित है?

उत्तर- यह कटुसत्य है कि सौंदर्य नारी को विधाता का वरदान है। कालिदास की शकुंतला सौंदर्य का अनुपम उदाहरण है। उसे लेखक ने महत्त्व नहीं दिया है अपितु उसका उल्लेख माम किया है। अतः प्रश्न में लगाया गया आरोप सही नहीं है। इसके बाद भी यह कहना अनुचित न होगा कि नारी का सौंदर्य प्रशंसनीय होता है।

प्रश्न 8. शिरीष के पुष्प लेखक के मन में किस प्रकार हिल्लोल पैदा करते हैं? 

उत्तर—लेखक के अनुसार शिरीष के पेड़ बड़े और छायादार होते हैं। इनकी डाल अपेक्षाकृत बकुल (मौलसिरी) आदि से कमजोर होती है किंतु फिर भी यह झूलने वालों के वजन से कमजोर नहीं हैं। 

इनके फूल संस्कृत साहित्य में बहुत कोमल माने गए हैं, किंतु ये सौंदर्य में वृद्धि करते हैं। इनके फूल नएपन के स्वागत को आमंत्रण देने जैसी शिक्षा देते हैं। इस प्रकार शिरीष के पुष्प लेखक के मन में हिल्लोल पैदा करते हैं। 

प्रश्न 9. शिरीष के फूलों के प्रतिपरवर्ती कवियों का दृष्टिकोण किस प्रकार का था? लेखक ने उनके तर्कों का खंडन किस प्रकार किया? 

उत्तर – शिरीष के फूलों की कोमलता को देखकर परवर्ती कवियों ने सोचा कि उनके सभी भाग ही कोमल हैं। लेखक ने उनके इस तर्क को एक भूल करार किया। उसके अनुसार शिरीष के फूल इतने मतबूत होते हैं कि नए फूलों के निकल आने पर भी स्थान नहीं छोड़ते। 

जब तक नए फल-पत्ते मिलकर और चकिया कर उन्हें बाहर नहीं कर देते, तब तकवे डटे रहते हैं। वसंत के आगमन पर भी शिरीष के पुराने फल खड़ खड़ाते रहते हैं।

प्रश्न 10. वनस्पतिशास्त्री ने लेखक को शिरीष के विषय में क्या बताया? 

उत्तर— वनस्पतिशास्त्री ने लेखक को शिरीष के विषय में बताया कि वह उस श्रेणी का पेड़ है जो वायुमंडल से अपना रस खींचता है। इसी कारण ही वह भयंकर लू के समय में भी हरा-भरा बना रहता है। पर लेखक ने कवि की किस

प्रश्न 11. ‘वह भी क्या कवि है?” पंक्ति के आधार विशेषता की ओर संकेत किया है?

उत्तर- लेखक के अनुसार एक कवि को सांसारिक विषय-वासनाओं में पड़कर जीवन व्यतीत करने की अपेक्षा स्वतंत्र और फक्कड़ जीवन जीना चाहिए। उसके मन में स्वतंत्रा विचारों की अभिव्यक्ति संसार के चक्रव्यूह में पड़कर नहीं हो सकती है। अतः उसे शिरीष के पुष्प की भाँति मस्त, चिंता रहित और मोह-माया से दूर रहना चाहिए। इसलिए लेखक के अनुसार सांसारिक विषय-वासनाओं, मोह-माया आदि में पड़ने वाला व्यक्ति कवि नहीं बन सकता।


लेखक के द्वारा


नमस्कार Students, मैंने इस पोस्ट को (Class 12 Hindi Aroh Chapter 17) CBSE, NIOS,  CISCE, ICSE और अन्य राज्य के board के मुताबिक इस पोस्ट को तैयार किया है, तथा भविष्य में जो भी लेटेस्ट अपडेट आएंगी उसके अनुसार यह पोस्ट अपडेट भी होता रहेगा । इसलिए मुझे यह आशा है कि यह पोस्ट आपके लिए काफी जानकारी पूर्ण होगा और आपके परीक्षा के लिए काफी सहायता प्रदान करेगा । तो मेरा आपसे यही आग्रह है कि आप इस लेख को पूरा अवश्य पढ़ें


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