NCERT Solutions for Class 12 Hindi Aroh Chapter 18 श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज Easy Summary

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मैं खुद class 12 का टॉपर रह चुका हूं और साथ ही साथ वर्तमान में मैं एक शिक्षक भी हूं। वर्तमान मे, मेरे पास कक्षा 12वीं के काफी विद्यार्थी हैं । जिनको मैं  बारहवीं की तैयारी करवाता हूं । यह पोस्ट को मैं अपने अनुभव से लिख रहा हूं । इस लेख को मैंने CBSE, NIOS, CISCE, ICSE और अन्य राज्य के board  को ध्यान में रखते हुए तैयार किया। 


NCERT Solutions for Class 12 Hindi Aroh Chapter 18 श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज


कक्षा | Class12th 
अध्याय का नाम | Chapter Nameश्रम-विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज
लेखक | writerबाबा साहेब भीमराव आंबेडकर | Babasaheb Bhimrao Ambedkar
अध्याय संख्या | Chapter number18
अध्याय प्रकार | Chapter typeकहानी | Story
किताब | Bookहिंदी कोर | HINDI CORE
बोर्ड | Boardसभी बोर्ड | All India Board
किताब | Book एनसीईआरटी | NCERT
विषय | Subjectहिंदी | HINDI
अध्ययन सामग्री | Study Materialsप्रश्न उत्तर | Question Answer


बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर जीवन परिचय


प्रश्न- याया साहेब भीमराव अंबेडकर का जीवन परिचय दीजिए। 

उत्तर- डॉ. अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल, सन् 1891 ई. को मध्य प्रदेश में महुछावनी में हुआ। उनके पिता श्री राम जी सेना में सूबेदार थे और माता भी माबाई एक मेजर की लड़की थी। वे मूलरूप से महाराष्ट्र में रत्नागिरी जन पद के अम्बादे ग्राम की दलित महा जाति से संबंधित थे। उनके बचपन का नाम सुकपाल था। बाद में वे अपने गाँव के नाम के आधार पर ही ‘अंबेडकर’ नाम से प्रसिद्ध हुए।

NCERT Solutions for Class 12 Hindi Aroh Chapter 18 श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज Easy Summary

उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा बड़े संघयों में प्राप्त की। बाद में मुंबई से बी. ए. पास किया। बड़ौदा के नरेश ने उन्हें छात्रवृत्ति देकर अमेरिका भेज दिया। वहाँ से उन्होंने कई विषयों में एम.ए. व पीएच. डी. उपाधियों प्राप्त की। ये स्वदेश लौटकर उच्च पदों पर कार्यरत रहे। अपने जीवन में संघर्षों के कारण उन्होंने नोकरी न करने का निर्णय लिया। इसके बाद वे दलित, अछूत, दीन-हीन और गरीबों के उद्धार में लग गए।

वे दलितों को उनके अधिकार दिलाने के लिए आजीवन संघर्ष करते रहे। वे कानून के महान ज्ञाता थे। उन्होंने भारत का संविधान बनाया। ये भारत के प्रथम कानून मंत्री थे। बाद में उन्होंने बौद्ध धर्मग्रहण कर लिया। 6 दिसंबर, सन् 1956 ई. को दिल्ली में उनका नियन हो गया।

रचनाएँ– कास्ट्स इन इंडिया, देयर मेकेनिज्म, जेनोसिस एंड डेवलपमेंट, द अनटचेबल्स, हू आर दे ?; हुआर द शूद्रजः बुद्धधा एंड हिज धम्मा; घाट्स ऑन लिंग्युस्टिक स्टेट्स, द एवोलुशन ऑफ प्रोविंशियल फायनांस इन ब्रिटिश इंडिया; दें राइज एंड फॉल ऑफ द हिंदू वीमेन, एनीहिलेशन ऑफ कास्ट; लेबर एंडपर्लियामेंट्री डेमोक्रेसी; बुद्धिज्म एंड कंग्युनिज्म मूक नायक, बहिष्कार भारत आदि।

साहित्यिक विशेषताएँ– डॉ. अंबेडकर ने अपने साहित्य के माध्यम से दलित और शोषित वर्ग की आवाज उठाने का प्रयत्न किया है। उन्होंने अपने साहित्य के माध्यम से सामाजिक दासता के व्यापक तथा गहन रूप के प्रति लोगों को सतर्क किया। उनका सम्पूर्ण साहित्य मानव मुक्ति एवं जन कल्याण के लिए था।

भाषा-शैली– डॉ. अंबेडकर ने मूल रूप से अंग्रेजी भाषा में लेखन किया। उनकी लेखन शैली चिंतन परक और वर्णनात्मक है।


श्रम विभाजन और जाति प्रथा पाठ का सारांश


श्रम विभाजन और जाति प्रथा पाठ का सारांश,: प्रस्तुत पाठ डॉक्टर साहब के विख्यात भाषण ‘एनीहिलेशन ऑफ कास्ट’ (1936) का हिंदी रूपांतर ‘श्रम विभाजन और जाति प्रथा’ नामक पुस्तक के दो प्रकरण हैं। यह रूपांतर ललई सिंह यादव ने किया था। 

डॉक्टर साहब ने जाति प्रथा की मीमांसा करते हुए समता मूलक समाज बनाने के लिए स्वतंत्रता, समता व बंधुता को आवश्यक माना है। लेखक को यह बात खटकती है कि व्यक्ति को जाति बदलने का अधिकार नहीं है। वह चाहता है कि आर्थिक उत्थान, सामाजिक व राजनीतिक संघटन और जीवन-यापन के तमाम भौतिक पहलुओं के परिप्रेक्ष्य में जातिवाद का

1. श्रम विभाजन और जाति-प्रथा

समूल उच्छेदन होना चाहिए। आज के जाति-मजहब आधारित विषाक्त सामाजिक, राजनीतिक माहौल में पाठ की प्रासंगिता बढ़ गई है। जाति-प्रथा का आधार—जातिवाद के समर्थक इस प्रथा का समर्थन करते हुए कुछ तर्क देते

हैं। उनका कहना है कि जाति-प्रथा के मूल में श्रम विभाजन आवश्यक है। इस दृष्टि से जाति प्रथा में उनको कोई बुराई नहीं दीखती ।

जाति-प्रथा की बुराई—लेखक ने यह भाषण ‘जाति-पाँति तोड़क मंडल’ लाहौर के वार्षिक सम्मेलन में अध्यक्षीय भाषण देने के लिए तैयार किया था। अतः उसे जाति प्रथा में निम्न दोष दीखते हैं- 

(i) इस जाति प्रथा ने रम-विभाजन के साथ-साथ श्रमिक विभाजन का भी कार्य किया है।

(ii) श्रमिकों का विभिन्न वर्गों में विभाजन अस्वाभाविक है। 

(iii) श्रमिक को वर्गों में विभाजित करने के बाद जाति प्रथा ने उनमें ऊँच-नीच का भेद पैदा किया है। विश्व के किसी भी समाज में ऐसा भेद नहीं पाया जाता। 

(iv) श्रम विभाजन श्रमिक की रुचि पर आधारित नहीं है। यह माता-पिता से जन्म लेने के आधार पर ही निश्चित हो जाता है। इसमें व्यक्ति की रुचि व क्षमता को स्थान नहीं है। 

(v) यह जाति प्रथा मनुष्य को उसकी पीढ़ियों सहित सदैव के लिए उसे एक पेशे से ही बाँधती है। वह पेशा चाहे अनुपयुक्त या अपर्याप्त हो। प्रतिकूल परिस्थितियों में भी पेशा बदलने का मौका नहीं मिलता। 

अतः भूखा मरना पड़ता है। किसी पेशे में पारंगत होने पर भी हिंदू जाति प्रथा पेशा परिवर्तन की अनुमति नहीं देती जिससे बेरोजगारी बढ़ती है। 

(vi) श्रम विभाजन मनुष्य की स्वेच्छा पर आधारित नहीं है।

(vii) मनुष्य निर्धारित कार्य को विवशता में करता है। अतः वह कार्य में रुचि नहीं लेता। 

(viii) जाति प्रथा के कारण कुछ कार्य घृणित व त्याज्य माने जाते हैं। ऐसे काम को करने वाले उस काम में दिल-दिमाग से नहीं लग पाते। 

(ix) जाति-प्रथा आर्थिक पहलू से भी हानिकारक है क्योंकि यह मनुष्य की स्वाभाविक रुचि व आत्मशक्ति को दबाकर अस्वाभाविक नियमों में जकड़कर उसे निष्क्रिय बनाती है।

2. मेरी कल्पना का आदर्श समाज

डॉ. साहेब के विचार से आदर्श समाज का आधार स्वतंत्रता, समता व भ्रातृता है। भाईचारे से तो किसी को आपत्ति नहीं हो सकती। मेरे आदर्श समाज में परिवर्तन का लाभ सबको मिलना चाहिए। ऐसे समाज में बहुविध हितों में सबकी सहभागिता हो इस समाज के हित के प्रति सभी सजग होंगे। समाज में अबाध संपर्क के अवसर होंगे। समाज में भाई चारा दूध और पानी के मिश्रण के समान होना चाहिए। इसी को लोकतंत्र कहते हैं।

लोकतंत्र से आशय — लेखक के अनुसार लोकतंत्र केवल शासन की एक पद्धति ही नहीं है, लोकतंत्र मूलतः सामूहिक जीवनचर्या की एक रीति तथा समाज के सम्मिलित अनुभवों के आदान-प्रदान के नाम हैं। इसमें यह आवश्यक है कि अपने साथियों के प्रति श्रद्धा व सम्मान का भाव हो।

स्वतंत्रता—आने-जाने की स्वाधीनता, जीवन तथा शारीरिक सुरक्षा की स्वाधीनता पर किसी को आपत्ति नहीं है। संपत्ति नहीं है। संपत्ति के अधिकार, शरीर को स्वस्थ रखने के अधिकार, जीविकोपार्जन के लिए आवश्यक औजार व सामग्री रखने की भी स्वतंत्रता पर आपत्ति नहीं हो सकती तो मनुष्य की शक्ति के प्रभावशाली उपयोग की स्वतंत्रता को क्यों बाधित किया जाता है। इसी आधार पर व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता मिलती हैं

दासता — जब व्यक्ति को दूसरे लोगों के द्वारा निर्धारित व्यवहार एवं कर्तव्यों का पालन करने के लिए विवश होना पड़े, तब वह स्थिति दासता की ही होगी। जाति प्रथा के कारण कानूनी प्रावधान होने के बाद भी दासता में रहना पड़ता है। अपना व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता न देना दासता ही है। समता सैद्धांतिक रूप से समता पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती। समता की

आलोचना होती है। समता के आलोचक कहते हैं कि सभी मनुष्य बराबर नहीं होते। यह तर्क एक तथ्य है क्योंकि क्षमता तीन बातों पर निर्भर करती है और इन तीन दृष्टियों से मनुष्य समान नहीं होते।

तीन आधार-

(क) शारीरिक वंश परंपरा 

(ख) सामाजिक उत्तराधिकार 

(ग) मनुष्य के अपने प्रयत्नः । 

परंतु इन आधारों पर भी समाज को असमान व्यवहार का अधिकार नहीं मिल जाता ।। असमान प्रयत्न के कारण असमान व्यवहार तो स्वाभाविक है किंतु पहली दो बातों के आधार पर आधारित असमान व्यवहार अनुचित है, क्योंकि उत्तम कुल, शिक्षा, पारिवारिक ख्याति, पैतृक संपदा तथा व्यावसायिक प्रतिष्ठा के आधार पर तो सुविधा संपन्न लोग ही उत्तम व्यवहार के अधिकारी रहेंगे। अतः यदि तीसरे आधार के कारण मनुष्यों में असमानता उचित है, तो पहले दो आधार पर की गई असमानता को अनुचित मान लेना चाहिए। उचित तो यह होगा कि समाज के सभी सदस्यों को समान अवसर एवं समान व्यवहार उपलब्ध हो।

अंत में लेखक राजनीतिज्ञों से भी समता की अपेक्षा करता हुआ यह चाहता है कि राजनीतिज्ञों को सब मनुष्यों के साथ समान व्यवहार करना चाहिए। भले ही सब लोग समान नहीं होते किंतु राजनेता को वर्गीकरण व श्रेणीकरण नहीं करना चाहिए। यह समता काल्पनिक जगत की वस्तु है किंतु सही मार्ग यही है। ये समता व्यावहारिक हो सकती है और नेता के व्यवहार की यही कसोटी है।


शब्दार्थ


विडंबना—हँसी उड़ाना, उपहास करना। पोषक पक्ष लेने वाले। श्रम विभाजन—–कार्य निर्धारण । आवश्यकता —— जरूरत। रुचि-लगाव, इच्छा पेशा व्यवसाय प्रशिक्षण – ट्रेनिंग दृष्टिकोण – नजरिया। पूर्व निर्धारण – पहले से निश्चित । 

निरंतर – लगातार । अकस्मात- अचानक । प्रतिकूल — विपरीत। स्वतंत्रता – आजादी अनुमति आज्ञा । पैतृक — माता-पिता से प्राप्त । पारंगत—चतुर । स्वेच्छा — अपनी इच्छा। निर्भर – आश्रित । विवशता – लाचारी। दुर्भावना बुरे विचार। टालू काम—चलता कार्य। 

निष्क्रिय – कर्म-विहीन । भ्रातृता—भाईचारा। संचारित— प्रवाहित। अबाध – निरंतर, बिना रुकावट। गमनागमन आना जाना । जकड़कर रखना — बाँध कर रखना। वजन — प्रभावी क्षमता सामर्थ्य। अपेक्षा—तुलना। विशिष्टता—महत्ता। 

हक- अधिकार। ख्याति–प्रतिद्धि संपदा – धन-दौलत प्रतिष्ठा सम्मान संपन्न — युक्त, घनी । तकाजा—माँग। नितांत — पूरी तरह से । उपलब्ध प्राप्त। वांछित—अपेक्षित। व्यवहार्य- व्यवहार में आने योग्य। एकमात्र अकेली कसौटी-परखने का पैमाना ।


पाठ्य पुस्तक के प्रश्नोत्तर पाठ्य-पुस्तक


प्रश्न 1. जाति प्रथा को श्रम विभाजन का ही एक रूप न मानने के पीछे अंबेडकर के क्या तर्क हैं? 

उत्तर- जाति प्रथा को श्रम विभाजन का ही एक रूप न मानने की पीछे अंबेडकर के तर्क अग्रलिखित हैं–

(i) भारतीय हिंदू समाज में जाति प्रथा श्रम विभाजन के साथ-साथ श्रमिक विभाजन का भी रूप लिए हुए है। यह श्रम के आधार पर विभाजित विभिन्न वर्गों को एक-दूसरे की अपेक्षा ऊँच-नीच भी करार देती है, जो कि विश्व के किसी भी समाज में नहीं पाया जाता है। 

(ii) जाति प्रथा का दूषित सिद्धांत स्वाभाविक विभाजन नहीं है। यह व्यक्ति की निजी क्षमता की अपेक्षा माता-पिता के सामाजिक स्तर के अनुसार पहले से ही अर्थात् गर्भधारण के समय से ही मनुष्य का पेशा निर्धारित कर देता है।

(iii) जाति प्रथा मनुष्य को जीवन भर के लिए एक पेशा में ही बाँध देती है, चाहे उसे पेशे से उसके भूखों मरने की स्थिति ही क्यों न उत्पन्न हो जाए। इस प्रकार जाति प्रथा प्रतिकूल परिस्थितियों में भी मनुष्य को अपना पेशा बदलने की स्वतंत्रता प्रदान नहीं करती है।

प्रश्न 2, जाति प्रथा भारतीय समाज में बेरोजगारी व भुखमरी का भी एक कारण कैसे बनती रही है? क्या यह स्थिति आज भी है? 

उत्तर- जाति प्रथा मनुष्य को जीवन भर के लिए एक ही पेशे में बाँध देती है। भले ही वह पेशा अनुपयुक्त या अपर्याप्त होने के कारण वह भूखों मर जाए। आधुनिक युग में उद्योग-धंधों की प्रक्रिया तथा तकनीक में निरंतर विकास और अकस्मात् परिवर्तन के कारण मनुष्य को पेशा बदलने की आवश्यकता पड़ सकती है। 

किंतु भारतीय हिंदू धर्म की जातिप्रथा किसी भी ऐसे व्यक्ति को पारंगत होने पर भी ऐसा पेशा चुनने की अनुमति नहीं देती, जो उसका पैतृक पेशा न हो। इस प्रकार पेशा परिवर्तन की अनुमति न देकर जाति प्रथा भारतीय समाज में बेरोजगारी व भुखमरी का कारण भी बनती है।

किंतु आज स्थिति में परिवर्तन आ गया है। सरकार ने पिछड़े वर्गों और दलितों के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण की सीमा निर्धारित कर दी है। ऐसे पदों पर केवल इन्हीं लोगों की

नियुक्ति हो पाती है। इस प्रकार वे भी अन्य वर्गों की भाँति समानता का अधिकार पा चुके हैं।

वे अपनी कार्य कुशलता एवं दक्षता के आधार पर कार्य का चुनाव कर सकते हैं।

प्रश्न 3. लेखक के मत से ‘दासता’ की व्यापक परिभाषा क्या है?

उत्तर- लेखक के मतानुसार ‘दासता’ केवल कानूनी पराधीनता को ही नहीं कहा जा सकता बल्कि इसमें वह स्थिति भी सम्मिलित है जिससे कुछ व्यक्तियों को दूसरे लोगों के द्वारा निर्धारित व्यवहार एवं कर्त्तव्यों का पालन करने के लिए विवश होना पड़ता है। 

इस प्रकार की दासता की स्थिति कानूनी पराधीनता न होने पर भी पाई जा सकती है। उदाहरणार्थ जाति प्रथा की तरह ऐसे वर्ग होना संभव है, जहाँ कुछ लोगों को अपनी इच्छा के विरुद्ध पेशे अपनाने पड़ते हैं।

प्रश्न 4. शारीरिक वंश परंपरा और सामाजिक उत्तराधिकार की दृष्टि से मनुष्यों में असमानता संभावित रहने के बावजूद अंबेडकर ‘समता’ को एक व्यवहार्य सिद्धान्त मानने का आग्रह क्यों करते हैं? इसके पीछे उनके क्या तर्क हैं?

उत्तर- डॉ. अंबेडकर के अनुसार समाज में शारीरिक वंशपरंपरा तथा सामाजिक वंश परंपरा की समता को तो सभी स्वीकार करने के लिए तैयार हो जाते हैं, किंतु मनुष्य के अपने प्रयत्न के अनुसार प्राप्त की गई समता को मानने के लिए तैयार नहीं होते। 

डॉ अंबेडकर के व्यक्ति के दृष्टिकोण से असमान व्यवहार को अनुचित नहीं कहा जा सकता, किंतु इसके साथ ही अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता का विकास करने का पूरा प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए और कार्य कुशल व्यक्तियों के प्रति समान व्यवहार करना चाहिए।

डॉ. आंबेडकर ने समता को एक व्यवहार्य सिद्धांत मानने का अग्रह करने के पीछे तर्क देते हुए कहा कि यदि समाज को अपने सदस्यों से अधिकतम उपयोगिता प्राप्त करनी है, तो यह तभी संभव है जब समाज के सदस्यों को आरंभ से ही समान अवसर एवं समान व्यवहार उपलब्ध कराए जाए। 

प्रश्न 5. सही में आंबेडकर ने भावनात्मक समत्व की मानवीय दृष्टि के तहत जातिवाद का उन्मूलन चाहा है, जिसकी प्रतिष्ठा के लिए भौतिक स्थितियों व जीवन-सुविधाओं का तर्क दिया है। क्या इससे आप सहमत हैं ?

उत्तर- डॉ. आंबेडकर द्वारा दिए गए इस तर्क से पूर्णतया सहमत हुआ जा सकता है क्योंकि एक आदर्श समाज की रूप रेखा समाज के दलित और शोषित वर्ग के आर्थिक, सामाजिक तथा राजनैतिक उत्थान द्वारा ही तैयार की जा सकती है। ऐसे समाज में सभी वर्गों के हितों का ध्यान रखा जाना चाहिए।  उन्हें समान रूप से साधन व अवसर उपलब्ध होने चाहिए। 

प्रश्न 6. आदर्श समाज के तीन तत्त्वों में से एक ‘भ्रातृता’ को रखकर लेखक ने अपने आदर्श समाज में स्त्रियों को भी सम्मिलित किया है अथवा नहीं? आप इस ‘भ्रातृता’ शब्द से कहाँ तक सहमत हैं? यदि नहीं तो आप क्या शब्द उचित समझेंगे/ समझेंगी ?

उत्तर- आदर्श समाज में तीन तत्त्वों में एक ‘भ्रातृता’ को रखकर लेखक ने आदर्श समाज में स्त्रियों को सम्मिलित नहीं किया है। ऐसे ‘भ्रातृता’ शब्द से हम पूर्णतया सहमत नहीं हैं क्योंकि लोकतंत्र में सभी वर्गों की, स्त्रियों और पुरुषों की समान रूप से भागीदारी होनी चाहिए। इसके अभाव में आदर्श समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती। समता की इस प्रकार की असमान भावना के लिए ‘भ्रातृता’ के स्थान पर ‘सामाजिकता’ शब्द को उचित माना जा सकता है।

प्रश्न 7. आंबेडकर ने जाति प्रथा के भीतर पेशे के मामले में लचीलापन न होने की जो बात की है- एस संदर्भ में शेखर जोशी की कहानी ‘गलता लोहा’ पर पुनर्विचार कीतिए ।

उत्तर- डॉ. आंबेडकर ने जाति प्रथा के भीतर पेशे के मामले में उसकी दोषपूर्ण पद्धति का वर्णन किया है। उनके अनुसार जाति प्रथा मनुष्य को जीवन भर के लिए एक ही पेशे में बाँध देती है। इससे कभी-कभी मनुष्य के भूखों मरने की हालत भी पैदा हो जाती है, क्योंकि आधुनिक युग में उद्योग-धंधों और नई-नई तकनीकों का विकास हो रहा है। 

अतः मनुष्य को समय, आवश्यकता और उसकी कार्य कुशलता के आधार पर अपना पेशा चुनने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। इससे बेरोजगारी को दूर करने के साथ-साथ व्यक्ति तथा देश की उन्नति भी की जा सकती है।

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प्रश्न 8  हिंद स्वराज नामक पुस्तक में गाँधी ने कैसे आदर्श समाज की कल्पना की है,उसे भी पढ़ें

उत्तर—– ‘हिंद स्वराज’ नामक पुस्तक में गाँधीजी ने ऐसे समाज की कल्पना की है जिसमें समाज के सभी वर्गों को समान महत्त्व दिया जाए। आपस में मेल-जोल की भावना लोगों में पाई जाए तथा किसी भी वर्ग के लोगों को किसी भी सामाजिक बुराई का कोपभाजन नहीं होना पड़े। वे अपना शासन स्वयं चलाएँ एवं उसमें सभी की समान रूप से भागीदारी हो। उनमें ऊँच-नीच से रहित भावना का विकास हो तथा वे आपस में एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ दें। 


श्रम विभाजन और जाति प्रथा पाठ गद्यांश 


1. जाति-प्रथा को यदि श्रम विभाजन मान लिया जाए तो यह स्वाभाविक विभाजन नहीं है, क्योंकि यह मनुष्य की रुचि पर आधारित नहीं है। कुशल व्यक्ति का सक्षम-श्रमिक-समाज का निर्माण करने के लिए यह आवश्यक है कि हम व्यक्तियों की क्षमता इस सीमा तक विकसित करें,

जिससे वह अपना पेशा या कार्य का चुनाव स्वयं कर सके। इस सिद्धांत के विपरीत जाति प्रथा का दूषित सिद्धांत यह है कि इससे मनुष्य के प्रशिक्षण अथवा उसकी निजी क्षमता का विचार किए बिना, दूसरे ही दृष्टिकोण जैसे माता-पिता के सामाजिक स्तर के अनुसार, पहले से ही अर्थात गर्भ धारण के समय से ही मनुष्य का पेशा निर्धारित कर दिया जाता है।

प्रश्न – 

(क) पाठ तथा पाठ के लेखक का नाम लिखिए।

(ख) यह पाठ किस पुस्तक से हिंदी में रूपांतरित हुआ है ? 

(ग) लेखक जाति प्रथा को श्रम विभाजन क्यों नहीं मानता ?

(घ) सक्षम-श्रमिक-समाज का निर्माण कैसे हो सकता है ? 

(ङ) जाति प्रथा में क्या दोष है ?

उत्तर—

(क) पाठ श्रम विभाजन और जाति प्रथा लेखक बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर। 

(ख) यह पाठ लेखक की पुस्तक ‘एनीहिलेशन ऑफ कास्ट’ के दो प्रकरणों का हिंदी रूपांतर है।

(ग) जाति प्रथा के आधार पर श्रम विभाजन स्वाभाविक नहीं है, क्योंकि यह मनुष्य की रुचि पर आधारित नहीं है। अतः लेखक जाति प्रथा को श्रम विभाजन नहीं मानता।

(घ) जाति-कुशल व्यक्ति या सक्षम श्रमिक समाज के निर्माण के लिए यह आवश्यक है कि व्यक्तियों की क्षमता को इस सीमा तक विकसित किया जाए कि वे अपना पेशा या व्यवसाय का चुनाव स्वयं कर सकें। 

(ङ) जाति प्रथा का यह दोष है कि वह मनुष्य के प्रशिक्षण अथवा उसकी निर्जी क्षमता का विचार किए बिना माता-पिता के सामाजिक स्तर के अनुसार गर्भधारण के समय से ही मनुष्य के पेशा या व्यवसाय का निर्धारण कर देती है। 


2. जाति-प्रथा पेशे का दोष-पूर्ण पूर्व निर्धारण ही नहीं करते बल्कि मनुष्य को जीवन-भर के लिए एक पेशे में बाँध भी देती हैं। भले ही पेशा अनुपयुक्त या अपर्याप्त होने के कारण वह भूखों मर जाए। 

आधुनिक युग में यह स्थिति प्रायः आती है, क्योंकि उद्योग-धंधों की प्रक्रिया व तकनीक में निरंतर विकास और कभी-कभी अकस्मात परिवर्तन हो जाता है, जिसके कारण मनुष्य को अपना पेशा बदलने की आवश्यकता पड़ सकती है और यदि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी मनुष्य को अपना देश बदलने की स्वतंत्रता न होते इसके लिए भूखों मरने के अलावा क्या चारा रह जाता है ? 

हिंदू धर्म की जाति प्रथा किसी भी व्यक्ति को ऐसा पेशा चुनने की अनुमति नहीं देती है, जो उसका पैतृक पेशा न हो, भले ही वह उसमें पारंगत हो। इस प्रकार पेशा परिवर्तन की अनुमति न देकर जाति प्रथा भारत में बेरोजगारी का एक प्रमुख व प्रत्यक्ष कारण बनी हुई है। 

प्रश्न – 

(क) पाठ तथा पाठ के लेखक का नाम लिखिए ।

(ख) जाति प्रथा में लेखक ने क्या दोष देखा है ? 

(ग) मनुष्य को अपना पेशा बदलने की आवश्यकता क्यों पड़ती है ? 

(घ) पेशा बदलने की स्वतंत्रता के अभाव का परिणाम क्या होगा ?

(ङ) जाति प्रथा बेरोजगारी का प्रमुख व प्रत्यक्ष कारण कैसे है ?

उत्तर—

(क) पाठ श्रम विभाजन और जाति-प्रथा लेखक – बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर 

(ख) जाति प्रथा के लेखक ने निम्न दोष बताए हैं-जाति प्रथा पेशे का पूर्वनिर्धारण करती है। जीवनभर के लिए मनुष्य को एक पेशे से बाँध देती है। पेशा अनुपयुक्त या अपर्याप्त होने पर भूखा मरना पड़ता है। 

(ग) आज उद्योग-धंधों की प्रक्रिया व टेकनीक में निरंतर विकास के कारण अकस्मात परिवर्तन होने पर पेशा बदलने की आवश्यकता पड़ जाती है।

(घ) यदि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी मनुष्य को अपना पेशा बदलने की स्वतंत्रता नहीं मिली, तो उसे भूखा मरना पड़ेगा। 

(ङ) जाति प्रथा किसी भी व्यक्ति भी व्यक्ति को ऐसा पेशा चुनने की अनुमति नहीं देती जो उसका पैतृक पेशा न हो, भले ही वह उसमें पारंगत हो। इस प्रकार पेशा परिवर्तन की अनुमति न देकर जाति प्रथा भारत में बेरोजगारी का एक प्रमुख व प्रत्यक्ष कारण है। 


3. मेरा आदर्श समाज स्वतंत्रता, समता, भ्रातृता पर आधारित होगा। क्या यहीं नहीं है, भ्रातृता अर्थात भाईचारे में किसी को क्या आपत्ति हो सकती है? किसी भी आदर्श समाज में इतनी गतिशीलता होनी चाहिए जिससे कोई भी वांछित परिवर्तन समाज के एक छोर से दूसरे तक संचारित हो सके। 

ऐसे समाज के बहुविधि -हितों में सबका भाग होना चाहिए तथा सबको उनकी रक्षा के प्रति सजग रहना चाहिए। सामाजिक जीवन में अबाध संपर्क के अनेक साधन व अवसर उपलब्ध रहने चाहिए। तात्पर्य यह कि दूध पानी के मिश्रण की तरह भाईचारे का यही वास्तविक रूप है।

प्रश्न – (क) पाठ तथा पाठ के लेखक का नाम लिखिए।

(ख) लेखक के आदर्श समाज का आधार क्या है ?

(ग) आदर्श समाज की क्या विशेषताएँ होती हैं ? (घ) दूध-पानी के मिश्रण का आशय स्पष्ट

कीजिए।

उत्तर- (क) पाठ श्रम विभाजन और जाति-प्रथा -लेखक बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर

(ख) लेखक के आदर्श समाज का आधार स्वतंत्रता, समता व आतृता है। 

(ग) लेखक के अनुसार आदर्श समाज में ऐसी गतिशीलता होनी चाहिए कि परिवर्तन से समाज के सभी लोग लाभान्वित हो। बहुविध हितों में सबकी भागीदारी होनी चाहिए और सबको ही सामाजिक हितों की रक्षा के प्रति सजग रहाना चाहिए। सामाजिक जीवन में अबाय संपर्क के अनेक धन व अवसर उपलब्ध रहने चाहिए। 


(घ) दूध भले ही श्रेष्ठ हो, हवा पानी को मिलाकर उसे दूध का ही रूप दे देता है। पानी का पृथक् रूप नहीं रहता। इसी प्रकार जाति प्रथा में भी ऊँच-नीच के भेद को मिटा कर ऐसा समाज बनना चाहिए कि ऊँच-नीच का ज्ञान ही न रहे।

4. जाति प्रथा के पोषक, जीवन, शारीरिक सुरक्षा तथा संपत्ति के अधिकार की स्वतंत्रता को तो स्वीकार कर लेंगे, परंतु मनुष्य के लक्षण एवं प्रभावशाली प्रयोग की स्वतंत्रता देने के लिए जल्दी तैयार नहीं होंगे, क्योंकि इस प्रकार की स्वतंत्रता का अर्थ होगा अपना व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता किसी को नहीं है, 

तो उसका अर्थ उसे ‘दासता’ में जकड़कर रखना होगा, क्योंकि ‘दसता’ केवल कानूनी पराधीनता को ही नहीं कहा जा सकता। ‘दासता’ में वह स्थिति भी सम्मिलित है जिससे कुछ व्यक्तियों को दूसरे लोगों के द्वारा निर्धारित व्यवहार एवं कर्त्तव्यों का पालन करने के लिए विवश होना पड़ता है। 

यदि स्थिति कानूनी पराधीनता न होने पर भी पाई जा सकती है। उदाहरणार्थ जाति प्रथा की तरह उसे वर्ग होना संभव है, जहाँ कुछ लोगों की अपनी इच्छा के विरुद्ध पेशे अपनाने पड़ते हैं। 

प्रश्न – (क) पाठ तथा पाठ के लेखक का नाम लिखिए।

(ख) जाति प्रथा के पोषक क्या स्वीकार अस्वीकार करते हैं ? 

(ग) ‘दासता’ किसे कहते हैं ?

(घ) कानूनी पराधीनता होने पर इच्छा के विरुद्ध पेशे क्यों अपनाने पड़ते हैं ?

 उत्तर- (क) पाठ – श्रम विभाजन और जाति-प्रवा- लेखक बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर 

(ख) जाति प्रथा के पोषक शारीरिक सुरक्षा तथा संपत्ति के अधिकार को स्वीकार करते हैं के लक्षण एवं प्रभावशाली प्रयोग की स्वतंत्रता को अस्वीकार करते हैं।

(ग) कुछ व्यक्तियों को दूसरे लोगों के द्वारा निर्धारित व्यवहार एवं कर्तव्यों का पालन करने के लिए विवश करना दासता है। 

(घ) जाति प्रथा में कुछ ऐसे वर्ग हैं, जहाँ कानूनी पराधीनता न होने पर भी अपनी इच्छा के विरुद्ध पेशे अपनाने पड़ते हैं। उदाहरण के लिए, सफाई कर्मचारी परंपरा से ही यह कार्य करने को वाप्प है।


श्रम विभाजन और जाति प्रथा पाठ का प्रश्नोत्तर


प्रश्न 1. लेखक ने पूरे पाठ में जाति-प्रथा की किन-किन बुराइयों का वर्णन किया है? 

उत्तर—लेखक ने जाति-प्रथा में निम्न बुराई देखी हैं-

1. जाति-प्रथा ने श्रम-विभाजन भी किया है। यह विभाजन स्वाभाविक नहीं है। 

2. जाति प्रथा श्रमिकों में भेद पैदा करती है। 

3. श्रमिकों में विभाजन के कारण ऊँच-नीच का भेद पैदा हो गया है।

4. जाति प्रथा पर आधारित श्रम विभाजन श्रमिक की रुचि पर आधारित नहीं है।

5. श्रम विभाजन माता-पिता के आधार पर गर्म में ही तय करना जाति प्रथा की देन है। इस विभाजन में व्यक्ति की रुचि व क्षमता का ध्यान नहीं रखा जाता। 

6. जाति-प्रथा व्यक्ति को सदैव के लिए एक व्यवसाय से बाँध देती है। भले ही वह पेशा अनुपयुक्त एवं अपर्याप्त हो ।

7. जाति-प्रथा विपरीत परिस्थितियों में व्यवसाय बदलने की अनुमति नहीं देती। अतः व्यक्ति को भूखा मरना पड़ता है। 

8. जाति प्रथा व्यक्ति को रुचि व भावना पर ध्यान नहीं देती।

9. जाति प्रथा के कारण विवशता में किए गए कार्यों में व्यक्ति रुचि नहीं लेता।

10. जाति प्रथा के कारण कुछ कार्य त्याज्य व घृणित माने जाते हैं। अतः लाचारी में इन कार्यों को करने वाले वयक्ति कर्म के प्रति लापरवाही बरतते हैं। 

11. जाति प्रथा आर्थिक दृष्टि से भी हानि कारण है क्योंकि यह मनुष्य की स्वाभाविक रुचि व आत्मशक्ति के दबाकर अस्वाभाविक नियमों में कड़ाकर उसे निष्क्रिय बनाती है।

प्रश्न 2. लेखक का लोकतंत्र से क्या आशय है?

उत्तर- लेखक के मत से समाज में स्वतंत्रता, समानता व भाईचारे की ऐसी भावना हो कि समाज के निर्माण में सबका सहयोग हो। समाज में आनेवाले परिवर्तन का सबको लाभ मिले। सभी लोग समाज के हित में लगे रहे। कहीं भी भेद-भाव न हो। दूध पानी के समान सामाजिक मिश्रण से बना भाईचारा ही लोकतंत्र है।

इसी का दूसरा नाम लोकतंत्र है। क्योंकि लोकतंत्र केवल शासन की एक पद्धति ही नहीं है, लोकतंत्र मूलतः सामूहिक जीवन-चर्या की एक रीति तथा समाज के सम्मिलित अनुभवों के आदान-प्रदान का नाम है। इनमें यह आवश्यक है कि अपने साथियों के प्रति श्रद्धा व सम्मान का भाव हो। 

प्रश्न 3. मनुष्य की क्षमता किन बातों पर निर्भर है? इनके विषय में लेखक का क्या मत है?

उत्तर- लेखक लिखता है मनुष्यों की क्षमता तीन बातों पर निर्भर रहती है। 

(i) शारीरिक वंशपरंपरा, 

(ii) सामाजिक उत्तराधिकार अर्थात् सामाजिक परंपरा के रूप में माता-पिता की कल्याण कामना, शिक्षा तथा वैज्ञानिक ज्ञानार्जन आदि सभी उपलब्धियाँ जिनके कारण सभ्य समाज, जंगली लोगों की अपेक्षा विशिष्टता प्राप्त करता है और अंत में ।

(iii) मनुष्य के अपने प्रयत्न । इन तीनों दृष्टियों से निस्संदेह मनुष्य समान नहीं होते। किंतु इन विशेषताओं के कारण, समाज को भी उनके राय असमान व्यवहार नहीं करना चाहिए।

व्यक्ति-विशेष के दृष्टिकोण से, असमान प्रयत्न के कारण, असमान व्यवहार को अनुचित नहीं कहा जा सकता। साथ ही प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता का विकास करने का पूरा प्रोत्साहन देना सर्वथा उचित है। परंतु यदि मनुष्य प्रथम दो बातों में असमान है, तो क्या इस आधार पर उनके साथ भिन्न व्यवहार उचित है? 

उत्तम व्यवहार के हक की प्रतियोगिता में वे लोग निश्चय हो बाजी मार ले जाएँगे जिन्हें उत्तम कुल, शिक्षा, पारिवारिक ख्याति, पैतृक संपदा तथा व्यावसायिक प्रतिष्ठा का लाभ प्राप्त है। इस प्रकार पूर्ण सुविधा संपन्नों को ही उत्तम व्यवहार’ का हकदार माना जाना वास्तव में निष्पक्ष निर्णय नहीं कहा जा सकता। 

क्योंकि यह सुविधा संपन्नों के पक्ष में निर्णय देना होगा। अतः न्याय का तकाजा यह है कि जहाँ हम तीसरे (प्रयासों की समानता, जो मनुष्यों के अपने वश की बात है) आधार पर मनुष्यों के साथ असमान व्यवहार नितांत अनुचित है। हमें ऐसे व्यक्तियों के साथ यथा संभव समान व्यवहार करना चाहिए। 

दूसरे शब्दों में समाज की यदि अपने सदस्यों से अधिकतम उपयोगिता प्राप्त करनी है, तो यह तभी संभव है, जब समाज के. सदस्यों को आरंभ से ही समान अवसर एवं समान व्यवहार उपलब्ध कराए जाएँ। 

प्रश्न 4. प्रस्तुत पाठ के आधार पर स्पष्ट करें कि श्रम विभाजन समाज की उन्नति के लिए आवश्यक है जबकि श्रमिक विभाजन उसे अवनति की ओर ले जाता है। 

उत्तर- लेखक के अनुसार समाज एवं देश के विकास के लिए श्रम का विभाजन किया जाना चाहिए। श्रमिकों को उनकी योग्यता, रुचि एवं कार्य कुशलता के आधार पर कार्य करने के साधन एवं अवसर उपलब्ध किए जाने चाहिए। इससे उनमें काम करने की रुचि का विकास होगा। वे कार्य को समर्पित भावना से सम्पन्न करने का प्रयास करेंगे।

किंतु कार्य के आधर पर यदि श्रमिकों का विभाजन हो जाता है तो उनमें ऊँच-नीच की भावना पनपने लग जाती है। ऐसी भावना होनता को जन्म देती है। उनको कार्य करने के प्रति अरुचि होती है। वे कार्य को एक बोझ समझकर ढोते हैं। अतः स्पष्ट है कि समाज एवं देश के विकास के लिए श्रम विभाजन आवश्यक है जबकि श्रमिक-विभाजन उसे अवनति की ओर ले जाता है।

प्रश्न 5. मनुष्य को एक ही पेशे में बाँधे रखना जाति प्रथा का सबसे बड़ा दोष है। कैसे। स्पष्ट कीजिए। 

उत्तर- मनुष्य को एक ही पेशे में बाँधे रखना जाति प्रथा का सबसे बड़ा दोष है क्योंकि इससे उसे कार्य कुशलता होने पर भी अन्य क्षेत्रों में जाने के अवसर नहीं मिलते। ऐसे पेशे के अनुपयुक्त और अपर्याप्त होने के कारण उसके समक्ष भूख मरने की नौबत भी आ सकती है। 

क्योंकि आधुनिक युग में उद्योग-धंदों की प्रक्रिया एवं तकनीक में निरंतर विकास और कभी-कभी अकस्मात् परिवर्तन हो जाता है, जिसके कारण मनुष्य को अपना पेशा बदलने की आवश्यकता पड़ सकती है, 

अतः यदि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी मनुष्य को अपना पेशा बदलने की स्वतंत्रता न हो तो उसके लिए भूखों मरने के अलावा और कोई चारा नहीं है, जबकि हिंदू धर्म की जाति-प्रथा किसी भी व्यक्ति को ऐसा पेशा चुनने की अनुमति नहीं देती। 

अतः स्पष्ट है कि मनुष्य को एक ही पेशे में बाँधे रखना जाति प्रथा का सबसे बड़ा दोष है।

प्रश्न 6. श्रम विभाजन की दृष्टि से भी जाति-प्रथा गंभीर दोषों से युक्त है। तर्क सहित स्पष्ट कीजिए। 

उत्तर—श्रम विभाजन की दृष्टि से भी जाति प्रथा गंभीर दोषों से युक्त है। इस विषय में निम्नलिखित तर्क द्रष्टव्य हैं

(i) जाति प्रथा का श्रम विभाजन मनुष्य की स्वेच्छा पर निर्भर नहीं रहता। मनुष्य की व्यक्तिगत भावना और रुचि का कोई स्थान अथवा महत्त्व नहीं होता।

(iii) जाति-प्रथा द्वारा श्रम विभाजन मनुष्य की दुर्भावना से ग्रस्त कर चालू काम करने व कम काम करने के लिए प्रेरित करती है। 

(iv) जाति-प्रथा के कारण श्रम विभाजन होने पर निम्न कार्य समझे जाने वाले कार्य को करने वाले श्रमिक को भी हिंदू समाज घृणित एवं त्याज्य समझता है।

प्रश्न 7. लेखक ने कितने प्रकार की स्वतंत्रता का उल्लेख किया है?

उत्तर- लेखक ने निम्न स्वतंत्रताओं का उल्लेख किया है-

(i) आने-जाने की स्वाधीनता। 

(ii) जीवन तथा शारीरिक सुरक्षा की स्वाधीनता । 

(iii) संपत्ति रखने की स्वतंत्रता 

(iv) जीवकोपार्जन के लिए आवश्यक आजार व सामग्री रखने की स्वतंत्रता । 

(v) मनुष्य की शक्ति के प्रभावशाली उपयोग की स्वतंत्रता अर्थात् अपना व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता। ऐसी स्वतंत्रता से मनुष्य का जीवन आदर्शमयी बन जाता है। 

प्रश्न 8. आदर्श समाज के विषय में लेखक की क्या मान्यता है?

उत्तर- लेखक का आदर्श समाज स्वतंत्रता, समता व भ्रातृता पर आधारित होगा। लेखक के आदर्श समाज में परिवर्तन का लाभ सभी को मिलेगा। ऐसे समाज में बहुविध हितों में सबकी सहभागिता होगी। समाज के हित के लिए सभी सजग होंगे। सामाजिक जीवन में सबके लिए अबाच संपर्क के अनेक साधन व अवसर मिलें। समाज में भाई-चारा दूध और पानी के मिश्रण के समान एकमेव होगा।


लेखक के द्वारा


नमस्कार Students, मैंने इस पोस्ट को (Class 12 Hindi Aroh Chapter 18 ) CBSE, NIOS,  CISCE, ICSE और अन्य राज्य के board के मुताबिक इस पोस्ट को तैयार किया है, तथा भविष्य में जो भी लेटेस्ट अपडेट आएंगी उसके अनुसार यह पोस्ट अपडेट भी होता रहेगा । इसलिए मुझे यह आशा है कि यह पोस्ट आपके लिए काफी जानकारी पूर्ण होगा और आपके परीक्षा के लिए काफी सहायता प्रदान करेगा । तो मेरा आपसे यही आग्रह है कि आप इस लेख को पूरा अवश्य पढ़ें


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