NCERT Solutions for Class 12 Hindi Aroh Chapter 4 कैमरे में बंद अपाहिज

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मैं खुद class 12 का टॉपर रह चुका हूं और साथ ही साथ वर्तमान में मैं एक शिक्षक भी हूं। वर्तमान मे, मेरे पास कक्षा 12वीं के काफी विद्यार्थी हैं । जिनको मैं  बारहवीं की तैयारी करवाता हूं । यह पोस्ट को मैं अपने अनुभव से लिख रहा हूं । इस लेख को मैंने CBSE, NIOS, CISCE, ICSE और अन्य राज्य के board  को ध्यान में रखते हुए तैयार किया। 

NCERT Solutions for Class 12 Hindi Aroh Chapter 4 कैमरे में बंद अपाहिज

कक्षा | Class12th 
अध्याय का नाम | Chapter Nameकैमरे में बंद अपाहिज
कवि | Poetरघुवीर सहाय | Raghuveer Sahay
अध्याय संख्या | Chapter number04
अध्याय प्रकार | Chapter typeकविता | POEM
किताब | Bookहिंदी कोर | HINDI CORE
बोर्ड | Boardसभी बोर्ड | All India Board
किताब | Book एनसीईआरटी | NCERT
विषय | Subjectहिंदी | HINDI
अध्ययन सामग्री | Study Materialsप्रश्न उत्तर | Question Answer


रघुवीर सहाय जीवन परिचय class 12 | Raghuveer Sahay Biography


कवि रघुवीर सहाय का जन्म 9 दिसंबर सन् 1929 ई. को लखनऊ में हुआ था। इनके पिता का नाम हरदेव सहाय था। वे साहित्य के अध्यापक थे। इनकी माता का नाम नाम देवी था। इन्होंने 1936 ई. में लखनऊ प्रीपरेटरी स्कूल में विद्यालयी शिक्षा प्रारम्भ की। 

1944 में मैट्रिक परीक्षा तथा 1946 ई. में इंटर परीक्षा उत्तीर्ण की। उन्होंने इसी वर्ष ‘कामना’ शीर्षक वाली पहली कविता लिखी। 1948 ई. में स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की और इसी वर्ष ‘नया वर्ष शीर्षक से पहली मुक्त छंद में कविता लिखी। 

NCERT Solutions for Class 12 Hindi Aroh Chapter 4 कैमरे में बंद अपाहिज
रघुवीर सहाय जीवन परिचय class 12

लखनऊ विश्व विद्यालय से इन्होंने अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर परीक्षा उत्तीर्ण की। 1951 ई. में ‘दूसरा सप्तक’ (अज्ञेय द्वारा संपादित) में इनकी कविताएँ भी प्रकाशित हुई। अगस्त 1959 ई. में वे आकाशवाणी में संवाददाता के रूप में जुड़े। 

तत्पश्चात् अगस्त 1963 ई. तक इससे जुड़े रहे। इससे अलग होने के बाद हैदराबाद से निकलने । वाली पत्रिका ‘कल्पना’ से तथा उसके बाद दैनिक ‘नवभारत टाइम्स’ तथा ‘दिनमान’ से संबद्ध रहे।

वे हिंदी के प्रबल पक्षधर थे। आमलोगों से जुड़ी जिन्दगी की समस्याओं को उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से बखूबी उजागर किया है। 

इस प्रकार मानवीय करुणा से ओत-प्रोत नई संवेदनाओं का पुनः सृजन करने वाले कवि रघुवीर सहाय का 1990 ई. में निधन हो गया। 

‘रचनाएँ—रघुवीर सहाय की रचनाएँ निम्न हैं-

(क) काव्य संग्रह — ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ (सन् 1967 में प्रकाशित), ‘हँसो हँसो जल्दी हँसो’ (सन् 1975 में प्रकाशित), ‘सीढ़ियों पर धूप’ में आदि। 

(ख) कहानी संग्रह ‘रास्ता इधर से है’ (सन् 1972 में प्रकाशित) ।

(ग) निबंध संग्रह — ‘लिखने का कारण’ (सन् 1978 में प्रकाशित) । साहित्यिक विशेषताएँ- रघुवीर सहाय की प्रतिभा लेखन के लगभग सभी संभव रूपों में प्रकट हुई। वह कवि, कथाकार, उपन्यासकार, निबंधकार, व्यंग्यकार, साहित्य समीक्षक, पत्रकार, आलोचक, अनुवादक, संपादन कला में कुशल, नाटककार, वैयाकरण और यात्रा विवरण लेखक भी थे। उन्होंने इन सभी रूपों में गहरी सूझ-बूझ, संवेदनशीलता, बौद्धिक प्रखरता तथा रचनात्मकता के साथ काम किया। उनकी रचनाओं में जातीय या वैयक्तिक भावना नहीं के बराबर है। 

भाषा-शैली 

रघुवीर सहाय की रचनाओं में छंदानुशासन है। उन्होंने अपनी रचनाओं में ज्यादातर बातचीत की सहज शैली को ही अपनाया। उन्होंने अत्यंत साधारण और अनायास-सी प्रतीत होने वाली शैली में सामाजिक विषमताओं को वर्णित करने का प्रयास किया है।


कैमरे में बंद अपाहिज का सारांश


इस कविता में दूरदर्शन के भौंडे कार्यक्रमों पर करारा प्रहार किया है। टेलीविजन पर कार्यक्रम प्रस्तुत करते समय एकर अथवा दूरदर्शन का पत्रकार जब उलटे-सीधे प्रश्न पूछता है, तो घर में दूरदर्शन के सामने बैठा दर्शक बेहूदगी पर मन मसोस कर रह जाता है। 

यथा किसी महत्त्वपूर्ण व्यक्ति की मृत्यु हो जाने पर दूरदर्शन कक्ष में बैठी समाचार वाचिका अपने संवाददाता से पूछती है जो मृतक के पास खड़ा है दिनेश! अब वहाँ कैसा माहौल है या अब वहाँ के लोग क्या सोच रहे हैं आदि। 

तब झुंझलाहट तो होती ही है। दर्शकों की इसी झुंझलाहट को कविता में वर्णित किया. है। दूरदर्शन के कक्ष में बैठे संवाददाता या कर्मचारी अपने को समर्थ व शक्तिमान समझते है क्योंकि उनकी आवाज को सुनने के लिए सभी दर्शक वाध्य हैं। 

वे अपने बंद कमरे में एक अपंग, अपाहिज को लाकर उससे प्रश्न पूछ कर अपना एक कार्यक्रम तैयार करेंगे। उनको व्यक्ति या उसकी अपंगता से कुछ लेना-देना नहीं है, बल्कि अपने कार्यक्रम की टी. आर. पी. देखनी है। दूरदर्शन पत्रकार अपने स्टूडियो में एक अपाहिज को लाकर इंटरव्यू रिकार्ड कर रहा है। 

पहला प्रश्न आप क्या अपाहिज हैं? दूसरा प्रश्न आप क्यों अपाहिज हैं? तीसरा प्रश्न- आपका अपाहिजपन तो आपको दुख देता होगा? कैमरामैन उसे अपने ढंग से कैमरे में कैद कर रहा है पुनः प्रश्न – तो आपको दुख क्या है? जल्दी बताइए। 

वह बेचारा बोल नहीं पाता तो पुनः प्रश्न आपको अपाहिज होकर कैसा लगता है? फिर पत्रकार स्वयं अभिनय करके पूछता है कि सोचकर, थोड़ी कोशिश करके बताइए क्या ऐसा लगता है। पत्रकार को कार्यक्रम रोचक बनाना है। 

अतः ऐसे-ऐसे प्रश्न पूछे जाएँगे कि वह बेचारा रो पड़ेगा। दर्शक भी उसके रोने की प्रतीक्षा करेंगे। इसके बाद परदे पर एक बड़ी तस्वीर दिखाई देगी जिसकी आँख सूजी हुई होंगी और ओठों से कुछ कहने की

आकुलता दिखेगी। दर्शकों से अनुरोध है कि इसे अपंगता की पीड़ा समझें। पत्रकार की कोशिश है कि अपंग व दर्शक दोनों ही एक साथ रोने लगें। 

कैमरा को बंद कर दिया जाता है क्योंकि अब परदे पर हमारा समय समाप्त क्योंकि परदे पर समय पैसे से मिलता है। अब पत्रकार मुसकरा रहा है क्योंकि एक सामाजिक उद्देश्य से युक्त एक अच्छा कार्यक्रम बन गया है। अपंग व दर्शकों का धन्यवाद। 

वस्तुतः कविता ‘कैमरे में बंद अपाहिज’ द्वारा कवि ने दूरदर्शन पर दिखाये जाने वाले निम्न स्तरीय कार्यक्रम पर प्रहार किया है। शब्दार्थ

CLASS 12 NCERT SOLUTION IN ENGLISHCLASS12 NCERT SOLUTION IN HINDI
Historyइतिहास
Geography भूगोल
Political science राजनीति विज्ञान
English SubjectResult
Hindi SubjectHistory answer keys

कैमरे में बंद अपाहिज काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्या


1.

हम दूरदर्शन पर बोलेंगे 

हम समर्थ शक्तिवान

हम एक दुर्बल को लाएंगे 

एक बंद कमरे में

उससे पूछेंगे तो आप क्या अपाहित हैं? 

तो आप क्यों अपाहिज हैं?

आपका अपाहिजपन तो दुख देता होगा 

देता है?

(कैमरा दिखाओ इसे बड़ा बड़ा )

हाँ तो बताइए आपका दुख क्या है 

जल्दी बताइए वह दुख बताइए

बता नहीं पाएगा

सोचिए

बताइए

आपको अपाहिज होकर कैसा लगता है 

कैसा

यानी कैसा लगता है

(हम खुद इशारे से बताएँगे कि क्या ऐसा ? )

सोचिए

बताइए

मोड़ी कोशिश करिए

(यह अवसर खो देंगे ? )

आप जानते हैं कि कार्यक्रम रोचक बनाने के वास्ते 

हम पूछ-पूछ कर उसको रुला देंगे

इंतजार करते हैं आप भी उसके पड़ने

करते हैं

शब्दार्थ 

अपाहिज –अपंग या विकलांग । समर्थ — जिसमें कुछ करने की शक्ति हो । दुर्बल कमजोर इशारे-संकेत कोशिश-प्रयत्न।

प्रसंग

यह पद्यांश ‘कैमरे में बंद अपाहिज’ शीर्षक कविता से लिया गया है। इसके लेखक रघुवीर सहाय हैं। इस अंश में अपाहिज के साक्षात्कार का वर्णन है।

व्याख्या

दूरदर्शन पर बोलने वाले अपने को सब कुछ करने की सामर्थ्य रखने वाला मानते हैं। उनके पास शक्ति है कि दर्शक उनको सुनने के लिए लाचार हैं। दूरदर्शन पत्रकार एक अपाहिज को स्टुडियो के बंद कमरे में लाता है और इस प्रकार के बेहूदे प्रश्न पूछकर कार्यक्रम तैयार करेगा-

तो दया आप अपाहिज हैं? 

तो आप अपाहिज क्यों हैं?

आपका अपाहिजपन आपको दुख देता होगा?

बताइए इस अपाहिजपन से आपको क्या दुख है? अपाहिज बेचारा बोल नहीं पाता। पत्रकार फिर चालू हो जाता है—

जल्दी बताइए।

वह दुख बताइये जो अपाहिजपन से आपको होता है।

अपाहिज अब भी चुप है। पत्रकार फिर पूछता है- आप अपने दुख के बारे में सोचिए ।

अब अपना दुख बताइए।

अपाहिज होकर आपको कैसा लगता है?

कैसा लगता है?

बताइए ना कैसा लगता है?

पत्रकार कहता है कि अच्छा हम आपको संकेतों से बताएँगे कि क्या ऐसा लगता फिर कहना प्रारंभ हो जाते हैं-

तनिक सोचिए 

कुछ बताइए

थोड़ी कोशिश कीजिए

उससे यह भी कहा जाता है— दूरदर्शन पर आने का आपका अवसर हाथ से निकल जाएगा। पत्रकार हमें बता रहा है कि कार्यक्रम को रोचक बनाने के लिए वह अपाहिज से प्रश्न पूछ-पूछ कर रुला कर रहेगा। वह हमसे प्रश्न भले ही नहीं पूछ रहा है किंतु आशा करता है कि हम भी अपाहिज के रोने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

सौंदर्य बोध

कविता छंद विहीन है। भाषा एकदम बोलचाल की है। बहुत ही नूतन व आधुनिक विषय है। कविता में स्वाभाविकता है। 

कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए अपन से जो अपेक्षा की जा रही है, वास्तविकता में ऐसा ही होता है। किसी की पीड़ा के प्रति पत्रकर का व्यवहार संवेदनहीन है। 

टी.यो. पत्रकारों के ऐसे प्रश्नों को देखकर दर्शक को झुंझलाहट होती है। यह कविता टेलीविजन स्टुडियो के भीतर की दुनिया को उजागर कर रही है। वस्तुतः किसी के दुख-दर्द-वेदना को बेचकर कारोबार चलाना नैतिकता का घोर पतन है। 

2.

फिर हम परदे पर दिखलाएँगे 

फूली हुई आँख की एक बड़ी तसवीर 

बहुत बड़ी तसवीर 

और उसके होंठों पर एक कसमसाहट भी 

(आशा है आप उसे उसकी अपंगता की पीड़ा मानेंगे) एक और कोशिश दर्शक 

धीरज रखिए

देखिए

हमें दोनों एक संग रुलाने हैं

आप और वह दोनों

(कैमरा बस करो नहीं हुआ रहने दो परदे पर वक्त की कीमत है )

अब मुसकुराएँगे हम आप देखे थे सामाजिक उद्देश्य से युक्त कार्यक्रम

(बस थोड़ी ही कसर रह गई )

धन्यवाद।

शब्दार्थ : 

कसमसाहट— वेचैनी। धीरज धैर्य। कसर रह गई कमी रह गई।

प्रसंग 

यह पद्यांश ‘कैमरे में बंद अपाहिज’ शीर्षक कविता से उद्धृत है। इसके रचयिता रघुवीर सहाय हैं। इस अंश में अपाहिज व दर्शकों को एक साथ रुलाने के लिए किए गए प्रयासों का वर्णन है।

व्याख्या

दूरदर्शन का कार्यक्रम संचालक बता रहा है कि अपाहिज व्यक्ति को बोलने के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से परदे पर एक ऐसे तस्वीर दिखाएँगे जिसकी आँखें रोते-रोते सूज गई हों और उसके होठों पर अपनी बात को कहने की विवश वेचैनी हो। 

वह दर्शकों से निवेदन करता है कि आप धैर्य रखिए। हम ऐसा प्रयास कर रहे हैं कि आप और अपाहिज दोनों एक साथ रोने लगे। वह अपने कैमरा मैन से कहता है कि अब रिकार्डिंग बंद करो, आगे नहीं करना है, दोनों को रुला नहीं पाए। आपने समय दिया, इसके लिए धन्यवाद। क्योंकि समय का भी तो मूल्य है। इसके बाद वह मुस्कराता है और बताता है कि आप सामाजिक उद्देश्य से युक्त कार्यक्रम देख रहे थे। हमें खेद है कि थोड़ी-सी कमी रह गई अर्थात् हम आप

सौंदर्य बोध 

कविता छंद, अलंकार, रस विहीन है। इसकी भाषा वोल-चाल की है काव्य- शिप एकदम नूतन है। दूरदर्शन के फूहड़पन पर करारा व्यंग्य है। दूरदर्शन के ऐसे कार्यक्रम पर सचमुच में रोना ही आता है। वास्तव में, किसी की पीड़ा का मजाक उड़ाना मानवीय मूल्यों का निदर है।


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प्रश्न 1. कविता में कुछ पंक्तियां कोष्ठकों में रखी गई है आपकी समझ से इसका क्या औचित्य है?

उत्तर- इस कविता में निम्न पंक्तियाँ कोष्ठकों में रखी गई हैं—

कैमरा दिखाओ इसे बड़ा बड़ा

हम खुद इशारे से बताएँगे कि क्या ऐसा

यह अवसर खो देंगे 

यह प्रश्न पूछा नहीं जाएगा

आशा है आप उसे उसकी अपंगता की पीड़ा मानेंगे

कैमरा बस करो

नहीं हुआ रहने दो

परदे पर वक्त की कीमत है 

बस थोड़ी ही कसर रह गई।

कार्यक्रम अपाहिज पर तैयार हो रहा है और यह कार्यक्रम दर्शकों को दिखाना है। अतः कार्यक्रम के संचालक को बीच-बीच में बोलना पड़ता है। कार्यक्रम के निर्माण में कोष्ठक में कही। गई बात निर्देश हैं। अतः इनका औचित्य है, किंतु कविता की दृष्टि से इनका कोई औचित्य नहीं है।

प्रश्न 2. कैमरे में बंद अपाहिज करुणा के मुखौटे में छिपी क्रूरता की कविता है-विचार कीजिए।

उत्तर—’कैमरे में बंद अपाहिज’ कार्यक्रम करुणा दिखाने के लिए बनाया जा रहा है। किंतु इसमें करुणा का बनावटी मुखोटा है। उद्देश्य अपने चैनल के लिए एक बिकाऊ कार्यक्रम बनाना है । अपाहिज से जो बेहूदे प्रश्न पूछे गए हैं, उनमें करुणा नहीं क्रूरता है। यथा-

आप क्या अपाहित हैं ? 

क्यों अपाहिज हैं ?

अपाहिजपन दुख देता होगा ?-

दुख क्या है? दुख क्या है ?

अपाहिज होकर कैसा लगता है?

आदि प्रश्नों में कहीं भी करुणा का भाव नहीं है। अपाहिज से कहा जा रहा है कि कोशिश कीजिए, अन्यथा यह अवसर खो देंगे। मानो इस अवसर को पाकर उसका अपाहिजपन दूर हो जाएगा। किसी अपाहिज का अपने स्थार्थ के लिए मजाक बनाना क्रूरता ही है। 

प्रश्न 3. हम समर्थ शक्तिवान और हम एक दुर्बल को लाएँगे पंक्ति के माध्यम से कवि ने क्या व्यंग्य किया है?

उत्तर — दूरदर्शन वाले इस भ्रम में तो रहते ही हैं कि हम समर्थ हैं, शक्तिवान हैं। जिसको चाहें उठा दें और जिसको चाहे गिरा दें। अपनी मान्यताओं एवं धारणाओं को वे श्रोताओं दर्शकों में प्रायः थोपते ही रहते हैं उनके आकलन और अनुमान ऐसे परोसे जाते हैं मानो वे ही सामर्थ्य व शक्ति के स्वामी हैं। अपाहिज तो प्रकृति से ही दुर्बल है। अपनी पीड़ा कहने की सामर्थ्य भीजिसमें न हो, उससे दुर्बल कौन होगा। इसी भाव को इन वाक्यांशों में व्यक्त किया है। 



प्रश्न 4. यदि आपको शारीरिक चुनौती का सामना कर रहे किसी मित्र का परिचय सांगों से करवाना हो तो किन शब्दों में करवाएँगे ?

उत्तर- यदि हमें शारीरिक चुनौती का सामना कर रहे किसी मित्र का परिचय लोगों से काना हो तो हम उससे सहानुभूतिपूर्ण वार्तालाप करेंगे ताकि उसे यह महसूस हो कि हम उसकी डा में आनन्दानुभूति की अपेक्षा उसके दुख-दर्द को समझ कर उसे दूर करने का प्रयास करेंगे। 

इस प्रकार के परिचय से शारीरिक रूप से आशक्त मित्र और लोगों के बीच प्रेम और सौहार्द की ना का विकास हो सकेगा।

प्रश्न 5. सामाजिक उद्देश्य से युक्त ऐसे कार्यक्रम को देखकर आपको कैसा लगेगा ? अपने विचार संक्षेप में लिखें। 

उत्तर—सामाजिक उद्देश्य से युक्त ऐसे कार्यक्रम को देखकर लोगों के मन में प्रेम, सौहार्द, दया, सहानुभूति की भावना का विकास होता है। वे आपस में एक-दूसरे का दूख-दर्द समझ कर उसे दूर करने का प्रयास करने लगते हैं। 

शारीरिक रूप से विकलांग व्यक्ति भी अपने आपको हेय दृष्टि से नहीं देखते हैं। वे भी स्वयं को समाज का एक हिस्सा मानकर सम्मानित सदस्य के रूप में डालने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं।  अतः ऐसे कार्यक्रम देखकर हमें भी बहुत अच्छा लगेगा। 

प्रश्न 6. यदि आप इस कार्यक्रम के दर्शक हैं तो टी.वी. पर ऐसे सामाजिक कार्यक्रम को देखकर एक पत्र में अपनी प्रतिक्रिया दूरदर्शन निदेशक को भेजें। 

उत्तर-

माननीय निदेशक महोदय, 

दूरदर्शन केन्द्र,

नई दिल्ली।

गत रविवार आपके केन्द्र से रात्रि 9.00 बजे प्रसारित किया गया सामाजिक उद्देश्य से परिपूर्ण ‘हमदर्द’ नाटक देखा। वास्तव में यह नाटक शारीरिक और आर्थिक रूप से अक्षम लोगों के लिए वरदान सिद्ध होगा। सम्पन्न लोगों के लिए भी यह नाटक प्रेरणा का स्रोत होगा। मुझे आशा हो नहीं पूर्ण विश्वास है कि आपके केन्द्र से प्रसारित यह नाटक संजीवनी बूटी का काम करेगा। ऐसे कार्यक्रम को देखकर समाज के लोगों में परस्पर प्रेम, सहयोग, दया, करुणा और सौहार्द की भावना का विकास होगा। आशा है कि आप भविष्य में भी ऐसे कार्यक्रमों को प्रसारित करने के प्रति अग्रसर रहेंगे।

भवदीय 

सुरेश कुमार

पालम

दिनांक_______

प्रश्न 7. नीचे दिए गए खबर के अंश को पढ़िए और बिहार के इस बुधिया से एक कनिक साक्षात्कार कीजिए-

उम्र पाँच साल, संपूर्ण रूप से विकलांग और दौड़ गया पाँच किलो मीटर। सुनने में थोड़ा अजीब लगता है, लेकिन यह कारनामा कर दिखाया है पवन ने बिहारी बुधिया के नाम से प्रसिद्ध पवन जन्म से ही विकलांग है। इसके हाथ का पुलवा नहीं है, जबकि पैर में सिर्फ ऐढ़ी ही है। –

पवन ने रविवार को पटना के कारगिल चौक से सुबह 8.40 पर दौड़ना शुरू किया । डाकबंगल्स रोड, तारामंडल और आर. ब्लाक होते हुए पवन का सफर एवं घंटे बाद शहीद स्मारक पर जाकर खत्म हुआ। पवन द्वारा तय की गई इस दूरी के दौरान ‘उम्मीद स्कूल’ के तकरीबन तीन सौ बच्चे साथ दौड़ कर उसका हौसला बढ़ा रहे थे। सड़क किनारे कि यह देखकर हतप्रभ थे कि किस तरह एक विकलांग बच्चा जोश एवं उत्साह के साथ दौड़ता चला जा रहा है।

जहानाबाद जिले का रहने वाला पवन नवरसना एकेडमी, बेउर में कक्षा एक का छात्र है। असल में पवन का सपना उड़ीसा के बुधिया जैसा करतब दिखाने का है। कुछ माह पूर्व बुधिया 65 किलोमीटर दौड़ चुका है। लेकिन बुधिया पूरी तरह से स्वस्थ है जबकि पवन पूरी तरह से विकलांग। पवन का सपना कश्मीर से कन्याकुमारी तक की दूरी पैदल तय करने का है। – 9 अक्तूबर, 2006 हिंदुस्तान से साभार

उत्तर— 

कुसुम– बच्चे तुम्हारा नाम क्या है?

बुधिया– मेरा नाम पवन है। किंतु प्यार से लोग मुझे बुधिया कहते हैं। 

कुसुम – तुम्हें लोग बुधिया क्यों कहते हैं?

बुधिया – शायद इसका कारण मेरा बुधवार के दिन पैदा होना है। 

कुसुम – बच्चे, तुम्हें देखकर तो नहीं लगता कि तुम विकलांग हो ?

बुधिया – लेकिन में पूर्णरूप से विकलांग हूँ यह देख रहे हो न, मेरे दोनों हाथों में पुल नहीं है। मेरे पैरो में पंजे भी नहीं है। मैं केवल एड़ी के सहारे चलता हूँ। 

कुसुम – क्या तुम्हें विकलांग होना स्वयं को बुरा नहीं लगता?

बुधिया – लेकिन ऐसा सोचकर स्वयं का शरीर या अंग बदल सकता हूँ। नहीं, मुझे ईश्वर ने जैसा भी शरीर दिया है, उसे मैंने सहर्ष स्वीकार कर लिया है। अब तो मुझे अपना जीवन इसी शरीर के सहारे ही काटना है।

कुसुम – तुम्हें इस दौड़ में शामिल होने की प्रेरणा कैसे मिली? 

बुधिया – यदि मन में उत्साह और सच्ची लगन हो, तो हम जोश और साहस के साथ -निरंतर आगे बढ़ सकते हैं। यही सोचकर मैंने इस दौड़ में शामिल होने का फैसला किया और अब परिणाम आपके सामने है। 

कुसुम – तुम वास्तव में विकलांग और कर्तव्यहीन लोगों के लिए एक आदर्श हो। तुम अपने वास्तविक नाम ‘पवन’ की भाँति ही जीवन में अबाध गति से निरंतर आगे बढ़ते रहोगे। हम सब का आशीर्वाद तुम्हारे साथ है। 


दीर्घ उत्तरीय प्रश्न


प्रश्न 1. किसी अपाहिज की पीड़ा को उजागर करना क्या उचित समझते हैं? यदि नहीं तो क्यों?

उत्तर—अपाहिजपन अभिशाप है। इसकी पीड़ा को वही समझता है जो अपाहिज है। अपाहिज वह है जिसे ईश्वर ने अपने किसी वरदान से वंचित कर दिया है। अर्थात् वह तो ईश्वर के द्वारा मारा हुआ है।

उसके साथ हमारा व्यवहार करुणा, प्रेम, स्नेह, उदारता का होना चाहिए। उसे अपनी कमाई का माध्यम बनाना अनुचित है। ऐसे प्रदर्शनों से अपाहिज में हीनता की भावना और बड़ेगी। कार्यक्रम अपाहियों की हिम्मत अफजाई के होने चाहिए।

प्रश्न 2. अपाहिज से बंद कमरे में प्रश्नकर्ता ने क्या-क्या प्रश्न पूछे ? 

उत्तर — अपाहिज से प्रश्नकर्ता ने बंद कमरे में निम्न प्रश्न पूछे 

तो क्या आप अपाहिज हैं ? तो आप क्यों अपाहिज हैं? 

आपका अपाहिजपन तो दुख देता होगा ? देता है न ?

आपका दुख क्या है ?

जल्दी बताइए वह दुख बताइए।

सोचिए

बताइए 

आपको अपाहिज होकर कैसा लगता है ?

बताइए ?

थोड़ी कोशिश करिए।


लघु उत्तरीय प्रश्न


प्रश्न 1. दूरदर्शन वालों को समर्थ क्यों कहा गया है?

उत्तर— दूरदर्शन वालों के पास मंच है, अपनी बात कहने का अवसर है, व्यापक प्रसारण की सुविधा है। वह राई का पर्वत बना सकते हैं या महत्त्वपूर्ण की उपेक्षा कर सकते हैं। इस आपर पर कवि ने उनको समर्थ कहा है। 

प्रश्न 2.. दुर्बल से क्या आशय है?

उत्तर- दुर्बल का सामान्य अर्थ होता है कमजोर या लाचार जिसको भगवान ने अपंगता का दंड दिया है उससे निर्बल कौन है? अपंग ही दुर्बल है। वह शरीर से लाचार है। अतः कमजोर है। 

प्रश्न 3. अपंगों के प्रति आपकी राय में कैसा व्यवहार होना चाहिए?

उत्तर- अपंग दया के नहीं, अपितु सहानुभूति के पात्र हैं। हमें उनके साथ यह सोच कर व्यवहार करना चाहिए कि यदि हम इनकी जगह होते, तो हम समाज से क्या अपेक्षा करते? 

अतः हमारा व्यवहार सहयोगात्मक होना चाहिए। उनकी अपंगता को हमें अपने कार्य से दूर करना चाहिए। यथा-अंधा व्यक्ति सड़क पार जाना चाहता है, तो हमें उसे पकड़ कर सड़क पार करानी चाहिए।

महत्त्वपूर्ण काव्यांशों का काव्य-सौंदर्य निम्नलिखित 

1. उससे पूछेंगे तो आप क्या अपाहिज हैं ?

तो आप क्यों अपाहिज हैं ? 

आपका अपाहिजपन तो दुख देता होगा

देता है ?

(कैमरा दिखाओ इसे बड़ा बड़ा ) 

हाँ तो बताइए आपका दुख क्या है 

जल्दी बताइए वह दुख बताइए

बता नहीं पाएगा

उत्तर- भाव-सौंदर्य-

प्रस्तुत काव्यांश द्वारा कवि ‘रघुवीर सहाय ने हमें सामाजिक विडंबना की ओर आकर्षित करने का प्रयास किया है। लोग शारीरिक रूप से विकलांग लोगों के प्रति भी संवेदनशील नहीं हैं। उनकी पीड़ा में भी वे सुखानुभूति करते हैं। 

अपाहिज लोगों से उनके अपाहिजपन के बारे में भी तरह-तरह के प्रश्न पूछे जाते हैं। उनके अपाहिजपन से होने वाले दुख के बारे में पूछा जाता है। 

किंतु अपाहिज व्यक्ति उसे इस कारण प्रकट नहीं करना चाहता क्योंकि उसे पता है कि लोग उसकी पीड़ा को भी जानकर दूर करने का प्रयास नहीं करेंगे बल्कि हँसी-मजाक और मनोरंजन का विषय बना लेंगे। 

शिल्प-सौंदर्य

(क) शुख खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है।

(ख) विभिन्न प्रकार के प्रश्नों (प्रश्न- शैली) के माध्यम से सामाजिक सत्य को उजागर किया गया है।

(ग) ‘बड़ा बड़ा’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।


FAQs


प्रश्न 1. परदे पर वक्त की कीमत है कह कर कवि ने पूरे साक्षात्कार के प्रति अपनापन नजरिया किस रूप में रखा है ? 

उत्तर – साक्षात्कार करने वाले व्यक्ति ने ‘परदे पर वक्त की कीमत है’ कहकर अपने उस दृष्टिकोण को प्रकट कर दिया है जिसमें चैनल पर समय की कीमत है, किसी अपाहिज के दुख-दर्द कोई मूल्य नहीं है। वह यह सिद्ध करता है कि हम अपाहिजों की वेदना के लिए नहीं, अपितु की निरंतरता के लिए कार्यक्रम बनाते हैं।

प्रश्न 4. यदि शारीरिक रूप से चुनौती का सामना कर रहे व्यक्ति और दर्शक, दोनों एक साथ रोने लगेंगे, तो उससे प्रश्नकर्ता का कौन-सा उद्देश्य पूरा होगा? 

उत्तर—यदि शारीरिक रूप से चुनौती का सामना कर रहे व्यक्ति और दर्शक दोनों एक साथ रोने लगेंगे, तो प्रश्नकर्ता सामाजिक उद्देश्य से युक्त जिस कार्यक्रम को बना रहा है, वह अच्छा वन जाएगा और उसके चैनल का एक विकाऊ कार्यक्रम तैयार हो जाएगा।


Conclusion


नमस्कार Students,  मैंने इस पोस्ट को CBSE, NIOS,  CISCE, ICSE और अन्य राज्य के board के मुताबिक इस पोस्ट को तैयार किया है, तथा भविष्य में जो भी लेटेस्ट अपडेट आएंगी उसके अनुसार यह पोस्ट अपडेट भी होता रहेगा । इसलिए मुझे यह आशा है कि यह पोस्ट आपके लिए काफी जानकारी पूर्ण होगा और आपके परीक्षा के लिए काफी सहायता प्रदान करेगा । तो मेरा आपसे यही आग्रह है कि आप इस लेख को पूरा अवश्य पढ़ें । 


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