NCERT Solutions for Class 12 Hindi Aroh Chapter 8 कवितावली (उत्तर कांड से), लक्ष्मण-मूच्छ और राम का विलाप Easy Solution

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मैं खुद class 12 का टॉपर रह चुका हूं और साथ ही साथ वर्तमान में मैं एक शिक्षक भी हूं। वर्तमान मे, मेरे पास कक्षा 12वीं के काफी विद्यार्थी हैं । जिनको मैं  बारहवीं की तैयारी करवाता हूं । यह पोस्ट को मैं अपने अनुभव से लिख रहा हूं । इस लेख को मैंने CBSE, NIOS, CISCE, ICSE और अन्य राज्य के board  को ध्यान में रखते हुए तैयार किया। 

Table of Contents

NCERT Solutions for Class 12 Hindi Aroh Chapter 8 कवितावली (उत्तर कांड से), लक्ष्मण-मूच्छ और राम का विलाप

कक्षा | Class12th 
अध्याय का नाम | Chapter Nameकवितावली (उत्तर कांड से), लक्ष्मण-मूच्छ और राम का विलाप
कवि | Poetगोस्वामी तुलसीदास ‘ | Goswami Tulsidas
अध्याय संख्या | Chapter number08
अध्याय प्रकार | Chapter typeकविता | POEM
किताब | Bookहिंदी कोर | HINDI CORE
बोर्ड | Boardसभी बोर्ड | All India Board
किताब | Book एनसीईआरटी | NCERT
विषय | Subjectहिंदी | HINDI
अध्ययन सामग्री | Study Materialsप्रश्न उत्तर | Question Answer


गोस्वामी तुलसीदास का जीवन परिचय class 12 | Goswami Tulsidas Biography


रामभक्ति शाखा के ही नहीं, हिन्दी साहित्य के सर्वश्रेष्ठ कवि तुलसीदास हिन्दी के गौरव हैं। श्री रामचन्द्र के चरित्र गायन के बहाने तुलसीदास ने अपना काव्य में भारतीय संस्कृति तथा समाज का संरक्षण उस समय किया जब भारतीय समाज पतन के कगार पर था। 

तुलसीदास के जन्म स्थान को लेकर विद्वानों में मतभेद है। कुछ के अनुसार उनका जन्म स्थान सोरी है तो कुछ अन्य के अनुसार वे बाँदा (उत्तर प्रदेश) जिले के राजापुर गाँव में पैदा हुए थे। 

NCERT Solutions for Class 12 Hindi Aroh Chapter 8 कवितावली (उत्तर कांड से), लक्ष्मण-मूच्छ और राम का विलाप Easy Solution
गोस्वामी तुलसीदास का जीवन परिचय class 12

अमृतलाल नगर ने अपने उपन्यास मानस का हंस, में उनका जन्म विक्रमपुर नामक गाँव में होने की कल्पना की है। किंतु अधिसंख्य विद्वानों ने उनका जन्म 1532 ई. में राजापुर में हुआ माना था। उनके माता-पिता का नाम क्रमशः हुलसी और आत्माराम था। मुनिया नामक दासी ने इन्हें पाला । इनके बचपन का नाम रामबोला था।

तुलसीदास एक कवि, संत, भक्त, दार्शनिक होने के साथ ही समाजसुधारक भी थे। उनकी जीवन-यात्रा शुरू से ही चुनौतीपूर्ण रही। उन्हें अपने सामाजिक जीवन में तमाम विरोधों का सामना करना पड़ा। उनका जीवन चतुर्मुखी से भरा था। 

साहित्य सृजन के क्षेत्र में अनेक बाधाएँ आने . के बाद भी उनके संकल्प ने उनका मार्ग प्रशस्त किया। तुलसीदास की लोकप्रियता का आधार उनकी भक्ति भावना भी है। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से जीवन का सिद्धांतों के प्रतिपादित किया।

महात्मा नरहरि के आश्रम में उन्होंने विद्याध्ययन आरंभ किया तथा काशी में आचार्य शेष सनातन के शिष्यत्व में उन्होंने अनेक विषयों पर गंभीर अध्ययन किया। 

यह भी प्रसिद्ध है कि वे अपनी पत्नी रत्नावली पर बहुत आसक्त थे, जिसने उन्हें बहुत धिक्कारा और रामभक्ति की प्रेरणा दी। पत्नी की भर्त्सना से तुलसी को आत्मग्लानि हुई और वे रामभक्त हो गए। 

तभी उनका कवि-हृदय जागृत हुआ और जीवनपर्यंत वे रामचरित का गायन करते रहे। उनका देहावसान सन् 1623 में काशी में हुआ ।

रचनाएँ-तुलसीदास की निम्नलिखित रचनाएँ प्रमाणित मानी जाती है- कवितावली, गीतावली, रामललानहछू, रामाज्ञा प्रश्न, जानकी मंगल, पार्वतीमंगल, दोहावली, रामचरितमानस, वैराग्य, संदीपनी, बरवै रामायण, विनय पत्रिका, श्री कृष्ण गीतावली आदि।

साहित्यिक विशेषताएँ — तुलसीदास के काव्य का मूल लोकमंगल की भावना है। उन्होंने राम, लक्ष्मण, सीता आदि चरित्रों के माध्यम से आदशों की स्थापना की है। साथ ही, राम का लोकधर्म निर्वाह, भरत का त्याग, लक्ष्मण का भ्रातृ स्नेह, सीता की पतिपरायणता, हनुमान की आराध्य के प्रति अनुरक्ति आदि को तुलसीदास सुदृढ़ समाज के लिए आवश्यक मानते हैं। 

रावण, कुंभकर्ण, शूर्पणखा आदि तमाम तामसिक वृत्तियों के प्रतीक हैं, जिनको अंत में पराजय का सामना करना पड़ा। भाषा-शैली-तुलसीदास का संस्कृत, ब्रज, अवध, आदि भाषाओं पर पूर्ण अधिकार था, किंतु उनका संपूर्ण काव्य व्रज और अवधी में है। माधुर्य, सरलता, सहजता भाव, प्रवणता उनकी भाषा की प्रमुख विशेषताएँ हैं। 

तुलसी ने दोहा, चौपाई, पद आदि सभी प्रचलित छंदों का सफल प्रयोग किया है। उनकी गीति तथा शैली अनूठी है। तुलसी ने प्रबंध (रामचरित्र मानस) तथा मुक्तक (विनय पत्रिका) दोनों प्रकार के काव्यों में लिखा है।


1. कवितावली (उत्तर कांड से ) का सारांश


कवित्त- प्रथम — राम नाम की महिमा का वर्णन करते समय तुलसी कहते हैं कि श्रमजीवी, किसान, व्यापारी, भिखारी, भाट, नौकर, नट, चोर, दूत और बाजीगर सब पेट की खातिर ही ऊँचे-ऊँचे कर्म तथा धर्म करते हैं। पेट की खातिर बेटे-बेटी तक को बेच देते हैं। पेट की यह आग बड़वाग्नि से भी बड़ी है। इसे तो केवल राम-कृपा के बादल ही शांत कर सकते हैं। 

कवित्त-द्वितीय— राम नाम की महिमा का वर्णन करते हुए तुलसी कहते हैं कि हे राम ! मैं आप पर बलिहारी हूँ। मैं आपकी सहायता चाहता हूँ क्योंकि वर्तमान समय में किसान को खेती, भिखारी को भीख, बनिए को व्यापार और नौकर को नौकरी नहीं है। जीविका-विहीन लोग दुखी हैं और एक-दूसरे से कहते हैं कि कहाँ जाएँ और क्या करें ? वेद-पुराण कहते हैं और संसार

में देखा है कि संकट में आप ही कृपा करते हैं। हे दीनबंधु ! रावण ने दुनिया को दबा लिया है। इस पाप-रूपी ज्वाला को देखकर में बहुत दुखी हूँ। 



तुलसी अपने बारे में कहते हैं कि चाहे कोई मुझे घूर्त कहें परमहंस, राजपूत, जुलाहा जो चाहे, वह कहे। मुझे किसी की बेटी से अपने बेटे का विवाह नहीं करना है। अतः किसी की जाति भी नहीं बिगाहूँगा। 

मैं तो रामचंद्र का सेवक हूँ। अतः जिसको जो अच्छा लगे, वह कहे। मुझे तो माँग के खाना और मसजिद में सोना है। न किसी से एक लेना है न तो देना है।


2. लक्ष्मण मूच्छ और राम का विलाप का सारांश


राम-रावण युद्ध अर्थात् राम के लंकाभियान के समय मेघनाथ की शक्ति से लक्ष्मण मूर्च्छित हो जाते हैं। रामचरितमानस के इस प्रसंग में बूटी लेने गए हनुमान की देरी से राम अपने अनुज लक्ष्मण के जीवन के लिए चिंतित हो उठते हैं। 

हनुमान संजीवनी बूटी को पहचानने के कारण पर्वत को लेकर ही जा रहे थे जिसे देखकर किसी अनर्थ की आशंका से भरत ने उनको नीचे उतार लिया था किंतु वास्तविकता सुनकर शीघ्र भेजने की इच्छा से वाण पर पर्वत सहित हनुमान को बैठाकर भेज दिया है। 

दूसरी ओर राम आधी रात बीत जाने पर चिंतित हो उठे। हनुमान के नाम पर अचेतन लक्ष्मण को राम ने अपने हृदय से लगा लिया और विलाप करने लगे कि लक्ष्मण तुम तो ऐसे स्वभाव के हो मुझे कभी दुखी नहीं देख सकते। तुमने मेरे लिए माता-पिता को त्यागकर वन के कष्ट सहना स्वीकार किया। फिर आज जब में व्याकुल हूँ, तब तुम उठते क्यों नहीं ?

राम कहते हैं कि मैं यह जानता कि वन में मेरा तुमसे वियोग होगा, तो पिता के वनगमन के आदेश को ही नहीं मानता। संसार पुत्र, घन, स्त्री, घर-मकान, परिवार तो बार-बार मिल जाते हैं किंतु भाई बार-बार नहीं मिलता। यह सोचकर मैया लक्ष्मण, तुम जाग जाओ।

जैसे पंखों के बिना पक्षी, मणि के बिना सर्प, सूँड के बिना हाथी की स्थिति होती है, वैसी ही तुम्हारे बिना मेरी दशा है। यदि मैं जीवित रहा, तो अयोध्या कैसे जाऊँगा क्योंकि मुझ पर आरोप होगा कि पत्नी की खातिर भाई को खो आया। 

मैं तो पत्नी के अपहरण से उत्पन्न अपयश को भी सहने को तैयार हूँ क्योंकि संसार में नारी का जाना कोई बड़ा अहित नहीं है। में बड़ा कठोर हृदय हूँ कि मैं अपयश और तुम्हारा दुःख दोनों सहन करूँगा। तुम अपनी माँ के प्यारे पुत्र हो । 

अपना हितैषी मानकर उन्होंने तुम्हारा हाथ मेरे हाथ में दिया था। भैया उठकर मुझे सिखाओ कि में माता सुमित्रा को क्या उत्तर दूँगा। इस प्रकार सोचते हुए राम के आँखों से आँसू टपक रहे हैं। शिव पार्वती से कहते हैं कि भगवान मनुष्य के समान विलाप कर रहे हैं।

इतने में ही हनुमान आ गए। राम ने कृतज्ञता प्रकट करते हुए हनुमान को गले लगाया । समस्त सेना प्रसन्न हो उठी। राम ने हनुमान से कहा-वैद्य जी को तुरंत सम्मान सहित उनके घर पहुँचाओ। 

जब लक्ष्मण की मूर्च्छा टूटने का सामाचार रावण को मिला तो वह बहुत दुःखी हुआ । वह परेशान होकर अपने अनुज कुंभकरण के पास गया जिसे अनेक उपायों से जगाया गया। जागने पर कुंभकरण को ऐसा लग रहा था, मानो काल ने शरीर धारण कर लिया हो। कुंभकरण ने रावण से उदासी का कारण पूछा। 

तब रावण ने सीताहरण से लेकर अब तक की कथा सुनाई । रावण ने बताया- भैया, वानरों ने बड़े-बड़े राक्षस योद्धा मार डाले हैं। 

दुर्मुख, देवांतक, मनुष्य भक्षक, अतिकाय, अकंपन तथा महोदर सहित सभी रणधीर वीर रणभूमि में मारे जा चुके हैं। रावण के वचन सुनकर कुंभकरण दुःखी होकर बोला। अरे मूर्ख ! तू जगज्जननी जानकी का अपहरण करने के बाद भी अपना कल्याण चाहता है।


इन्हें भी जानें


चौपाई — चौपाई सम मात्रिक छंद है जिसके दोनों चरणों में 16-16 मात्राएँ होती हैं। चालीस चौपाइयों वाली रचना को चालिस कहा जाता है-यथा तथ्य लोकप्रसिद्ध है । 

दोहा — दोहा अर्धसम मात्रिक छंद है। इसके सम चरणों (दूसरे और चौथे चरण में 11- 11 मात्राएँ होती हैं तथा विषम चरणों (पहले और तीसरे) में 13-13 मात्राएँ होती हैं। इनके साथ अंत लघु वर्ण होता है।

सोरठा — दोहे को उलट देने से सोरठा बन जाता है। इसके सम चरणों (दूसरे और चौथे चरण) में 13-13 मात्राएँ होती हैं तथा विषम चरणों (पहले और तीसरे में) 11-11 मात्राएँ होती हैं । परंतु दोहे के विपरीत इसके सम चरणों (एक और चौथे चरण में अंत्यानुप्रास या तुक नहीं रहती, विषम चरणों (पहले और तीसरे) में तुक होती है।

कवित्त — यह मात्रिक छंद है। इसे मनहरण भी कहते हैं। कवित्त के प्रत्येक चरण में 31- 31 वर्ण होते हैं। प्रत्येक चरण के 16 वें और फिर 15 वें वर्ण पर यति रहती है। प्रत्येक चरण का अंतिम वर्ण गुरु होता है ।

सवैया—चूँकि सवैया वार्णिक छंद है, इसलिए सवैया छंद के कई भेद हैं। ये भेद गणों के संयोजन के आधार पर बनते हैं। इनमें सबसे प्रसिद्ध मत्तगयंद सवैया है इसे मालती सवैया भी कहते हैं। सवैया के प्रत्येक चरण में 23-23 वर्ण होते हैं जो 7 भगण +2 गुरु (23) के क्रम के होते हैं। यहाँ प्रस्तुत तुलसी का सवैया कई भेदों को मिलाकर बनता है । 

कवितावली (उत्तर कांड से) काव्यांश


1. कवितावली (उत्तर कांड से) काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्या एवं शब्दार्थ


किसबी, किसान-कुल, बनिक, भिखारी, भाट, 

चाकर, चपल, नट, चोर, चार चेटकी ।

पेटको पढ़त, गुन गढ़त, चढ़त गिरि, 

अटत गहन-गन अहन, अखेटकी ॥ 

ऊँचे-नीचे करम,धरम-अधरम करि,

पेट ही को पचत, बेचत बेटा-बेटकी 1

‘तुलसी’ बुझाई एक राम घनस्याम ही तें, 

आगि बड़वागितें बड़ी है आगि पेटकी ॥

शब्दार्थ—

किसबी— श्रमजीवी । बनिक व्यापारी भाट चारण चाकर- सेवक । चपल- चंचल। चार—दूत। चेटकी— बाजीगर गढ़त — रचना करना। अटत-घूमना । गहन-गन— दुर्गम वन। अहन—दिन। अखेटकी — शिकार । पचत-मरना। बेटकी पुत्री । बुझाइ -शांत करना। घनस्याम — श्याम मेघ। बड़वागितें-जल की अग्नि। (वाड़वाग्नि) से भी । 

प्रसंग — 

यह पद गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित ‘कवितावली’ (उत्तर कांड से) लिया गया है। इस पद में राम नाम की महिमा का वर्णन किया गया है। 

व्याख्या- 

तुलसी कहते हैं कि पेट की आग वाड़वाग्नि से भी बड़ी है।  इसी आग को शांत करने के लिए श्रमजीवी परिश्रम करता है, किसान खेती करता है, वणिक व्यापार करता है, भिखारी भीख माँगता है, 

चरण आश्रयदाता के गुणों का वर्णन करता है, नौकर स्वामी की सेवा करता है, नट बड़ी तेजी से कला दिखाता है, चोर चोरी करता है, दूत समाचार ले जाता है, बाजीगर अपने हाथ का जादू दिखाता है। 

विद्यार्थी पेट के लिए विद्या पढ़ते हैं, तरह-तरह के उपाय रचते हैं। पेट की खातिर ही लोग पर्वत पर चढ़ते हैं, शिकार की खोज में दुर्गम वनों में विचरते हैं। पेट के लिए अच्छे-बुरे कार्य करते हैं। 

धर्म-अधर्म भी इसी के लिए करते हैं। पेट के लिए ही मरते रहते हैं, यहाँ तक कि अपने बेटा-बेटी को बेच देते हैं, किंतु यह पेट की आग तब भी शांत नहीं होती। इस आग को केवल एक भगवान राम रूप श्याममेघ के द्वारा ही बुझाया जा सकता है।

सौंदर्य-बोध- 

पेट के लिए किए जाने वाले सद्-असद् कार्यों का विस्तृत वर्णन है। भाषा ब है। छंद कवित्त है। अनुप्रास अलंकार का सुंदर प्रयोग है। वास्तव में, यह सत्य है कि संसार के मनुष्य पेट की आग बुझाने में लगे हैं। किंतु यह शांत नहीं हो पाती।


2.कवितावली (उत्तर कांड से) काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्या एवं शब्दार्थ


खेती न किसान को, भिखारी को न भीख, बलि

बनिक को बनिज, न चाकर को चाकरी । 

जीविका बिहीन लोग सीद्यमान सोच बस,

कहैं एक एकन सों ‘कहाँ जाई, का करी ?’

बेदहू पुरान कही लोक बिलोकित,

साँकरे सबै पै, राम ! रावरें कृपा करी ।

दारिद दसानन दबाई दुनी, दीनबंधु !

दूरित दहन देखि तुलसी दहा करी 

शब्दार्थ 

बनिक— वणिक, बनिया । बनिज — व्यापार । चाकर-सेवक। चाकरी- नौकरी। बिहीन — रहित। सीद्यमान – दुःखी । एक एकन— एक-दूसरे से का करी – क्या करें। बिलोकिअत-देखते हैं। साँकरे—संकट रावरें-आपकी। करी की है। दारिद— दारिद्रय, गरीबी। दसानन — रावण दुनी – दुनिया, संसार। दीनबंधु भगवान का विशेषण, दीनों का भाई । दुरित- पाप दहन – आग। हहा करी— कातर होना, दुखी होना।

प्रसंग

यह पद गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित ‘कवितावली’ (उत्तर कांड से) उद्धृत है। इस पद में राम की महिमा का वर्णन किया गया है।

व्याख्या

कवि कहता है कि ऐसा बुरा समय आया है कि किसान काम करना चाहता है। किंतु उसके लिए खेती नहीं है, भिखारी को भीख नहीं मिलती, बनिया का व्यापार नहीं चलता, नौकरी चाहने वाले को नौकरी नहीं मिलती। 

इस प्रकार सभी ओर जीविका-विहीन होने के कारण सब लोग दुखी और शोक के वश होकर एक-दूसरे से कहते हैं कि ऐसी स्थिति में कहाँ जाएँ, क्या करें ? कुछ भी समझ में नहीं आता है। 

वेद और पुराण भी कहता है और लोक में देखा जाता है कि संकट के समय आप ही ने सब पर कृपा की है। हे दीनबंधु ! इस समय तो सब पर संकट है। 

दारिद्रय रूपी रावण ने दुनिया को दबा लिया है और पाप रूपी ज्वाला इतनी बढ़ गई है कि तुलसी अत्यंत कातर भाव से आपसे सहायता के लिए प्रार्थना करता है।

सौंदर्य बोध- 

तत्कालीन समाज का तुलसी ने यथार्थ चित्रण किया है। आज के प्रगतिशील कवि भी इतना यथार्थ वर्णन नहीं कर पा रहे। 

दुनिया की न कहें किंतु आज के भारत पर तो यह छंद पूरी तरह फिट बैठ रहा है। भाषा व्रज है तथा छंद कवित्त है। पूरे छंद में अनुप्रास अलंकार की छटा है।

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3. कवितावली (उत्तर कांड से) काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्या


धूत कहाँ, अवधूत कहाँ, रजपूत कहाँ, जोलहा कही कोऊ । 

काहू की बेटीसों बेटा न ब्याहब, काहूकी जाति बिगार न सोऊ | 

तुलसी सरनाम गुलाम है राम को, जाको रुचै सो कहै कछु ओक 

माँगि के खैबो, मसीत को सोइबो, लैबोको एकु न दैबको दोऊ ||

शब्दार्थ 

धूत-पूर्त, शठ, मक्कार अवधूत वीतराग परमहंस रजपूत-राजपुत्र क्षेत्र जोलहा — जुलाहा । काहू — किसी की। बिगार — बिगाड़ना, खराब करना। सरनाम—प्रसिद्ध । गुलागु— दास ओक—और खैयो— खाना मसीत-मस्जिद (यहाँ देवालय) सोइयो सोना लैयो— सेना दैव—देना । दो-दो । 

प्रसंग – 

यह पद गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित उनके ग्रंथ ‘कवितावली’ (उत्तर कांड है। लिया गया है। इस पद में तुलसी अपनी निस्पृहता का वर्णन कर रहे हैं। 

व्याख्या—

तुलसी कहते हैं कि कुछ लोग मुझे यदि धूर्त कहते हैं अथवा कुछ अवधूत-परमहंस कहते हैं, इस बुराई या बड़प्पन का मुझ पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। कोई उच्च कुलोत्पन्न क्षत्रिय कहें या निम्न कुलोत्पन्न जुलाहा कहे, मुझे इसकी चिंता नहीं है। मेरा कोई बेटा नहीं जिसका विवाह किसी की बेटी से करके उसकी जाति बिगाड़ेगा। तुलसी तो राम के दास के रूप में प्रसिद्ध है। 

अतः जिसको जो अच्छा लगे वह कहे अथवा कुछ और कहे। मैं तो माँग के खाता हूँ, देवालय में रात को सो जाता हूँ। मुझे न तो किसी से कुछ लेना है और न किसी को कुछ देना है। 

सौंदर्य बोध-

भक्त तुलसी वीतरागत्व वर्णित हुआ है। भाषा ब्रज है तथा छंद सवैया है । पूरे छंद में पदमैत्री का सुंदर प्रयोग है। अनुप्रास अलंकार का प्रयोग हुआ है। दास्य भाव है। ‘लेने को एक न देने को दो’ मुहावरे का परिवर्तित रूप प्रयुक्त हुआ है।

लक्ष्मण मुच्छ और राम का विलाप काव्यांश


1.लक्ष्मण मुच्छ और राम का विलाप का काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्या एवं शब्दार्थ


दोहा

तव प्रताप उर राखि प्रभु जैहउँ नाथ तुरंत । 

अस कहि आयसु पाइ पद बंदि चलेउ हनुमंत ॥1॥ भरत बाहु बल सील गुन प्रभु पद प्रीति अपार । 

मन महुँ जात सराहत पुनि पुनि पवनकुमार ॥2॥ 

उहाँ राम लछिमनहि निहारी । बोले वचन मनुज अनुसारी ॥ 

अर्ध राति गइ कपि नहिं आयउ । राम उठाइ अनुज उर लायक ||1|| 

सकहु न दुखित देखि मोहि काऊ । बंधु सदा तव मृदुल सुभाऊ ॥ 

मम हित लागि तजेहु पितु माता । सहेहु विपिन हिम आतप बाता ॥2॥ 

सो अनुराग कहाँ अब भाई उठहु न सुनि मम बच बिकलाई | 

जौं जनेउ बन बंधु बिछोहू । पितु बचन मनतेक नहिं ओहू ॥3॥ 

शब्दार्थ — 

तब तुम्हारा, आपका। प्रताश यश उर-हृदय राखि- रखकर। जैहठ- जाऊंगा। नाथ स्वामी, मालिक तुरंत – शीघ्र अस—इस तरह आयसु आज्ञा । पाई-पाकर। पद-पैर बंदि-वंदना, प्रार्थना। बाहु—भुजा । प्रीति—प्रेम अपार—अधिक। महुँ-में। सराहत — प्रशंसा करना। पुनि पुनि- बार-बार पवन कुमार- हनुमान ।

वहाँ-वहाँ दूसरी ओर। निहारी-देखकर। मनुज मनुष्य अनुसारी- समान मनुज अनुसारी – मानवोचित । अर्घ — आधी। कपि — बंदर (हनुमान)। आयठ— आया। अनुज — छोटा भाई। उर- हृदय । लायक लगाया।

दुखित – दुखी। मोहि— मुझे। काऊ किस प्रकार बंधु-भाई। मृदुल – कोमल। सुभाऊ- स्वभाव । मम – मेरे । लागि के लिए। तजेहु—त्याग दिए। बिपिन — जंगल। हिम बर्फ, ठंड ।आतप — धूप । बाता— हवा, तूफान। अनुराग बच । बिकलाई — व्याकुलता । जीं — जो जनतेक

यदि जानता। बिछोहू—वियोग । मनते- मानता। ओउस ।

प्रसंग – 

यह पद्यांश गोस्वामी तुलसीदास के जगप्रसिद्ध ग्रंथ ‘रामचरितमानस’ से लिया गया है। ग्रंथ में यह अंश लंकाकांड में है। हनुमाग लक्ष्मण के लिए संजीवनी बूटी लेने गए हैं। भरत से मिलकर वे लंका की ओर लौट रहे हैं। आधी रात बीत चुकी थी। राम चिंतित होकर विलाप कर रहे हैं।

व्याख्या—

हनुमान भरत से कह रहे हैं कि हे स्वामी। हे प्रभो ! मैं आपका प्रताप हृदय में रखकर शीघ्र ही चला जाऊँगा अर्थात् आपकी कृपा से समय रहते लंका पहुँच जाऊँगा। ऐसा कहकर और भरत से आज्ञा पाकर तथा उनके चरणों की वंदना करके हनुमान जी चल दिए।

हनुमान लंका की ओर जा रहे हैं और मन ही मन भरत के बाहुबल, उनके सुंदर स्वभाव, उनके गुण और राम के चरणों में उनके अपार प्रेम की सराहना कर रहे हैं। 

भरत ने हनुमान को पर्वत सहित बाण पर बैठकर श्रीराम के पास भेजा है। अतः हनुमान को भरत की बाहुबल का ज्ञान हो गया था। हनुमान से बीती हुई घटनाओं को सुनकर भरत ने जो दुःख प्रकट किया था।

वायुपुत्र को यह भी प्रभावित कर रहा था। अतः वे मन ही मन भरत की प्रशंसा कर रहे थे। (ये दोनों दोहे हैं) 


चौपाई


1. इधर लंका में युद्धभूमि में बैठे श्रीराम लक्ष्मण जो को देखकर सामान्य मनुष्यों के अनुसार इस प्रकार कहने लगे कि आधी रात बीत चुकी है किंतु हनुमान अभी तक नहीं आए। यह कहकर राम ने अपने छोटे भाई को उठाकर हृदय से लगा लिया । 

2. राम कहने लगे, हे भाई! तुम तो मुझे कभी भी दुखी नहीं देख सकते थे क्योंकि तुम्हारा स्वभाव तो सदा ही बहुत कोमल रहा है। तुमने मेरा ध्यान रखते हुए, मेरे हित के लिए माता-पिता को भी छोड़कर वन आने का निर्णय लिया था और वन में रहते हुए शीत, गरमी, हवा आदि के सब कष्ट सहन किए हैं

3. राम पुनः कहते हैं कि भैया, मेरे प्रति तुम्हारा वह प्रेम अब कहाँ है ? मेरे व्याकुलतापूर्ण वचनों को सुनकर भी उठते क्यों नहीं हो ? यदि मुझे यह पता होता कि वन में भाई से वियोग हो जाएगा अर्थात् तुमको खोना पड़ेगा तो मैं वनगमन के पिता के आदेश को भी नहीं मानता । 

सौंदर्य बोध- 

राम के विलाप का मानवोचित वर्णन बहुत स्वाभाविक है। भाषा अवधी है। प्रथम दो छंद दोहा है। बाद में तीन छंद चीपाई है। करुण रस है। अनुप्रास अलंकार का चाहुल्य है। यथा – बाहुबल, प्रभु पद प्रीति, बोले वचन, दुखित देखि, वच बिकलाई, जो जनतेउँ, वन बंधु ‘बिछोहू । ‘पुनि-पुनि’ में पुनरुक्ति अनुप्रास अलंकार है। रामचरितमानस के कोमल प्रसंगों में से एक यह भी है। यहाँ राम भगवान या अवतार नहीं, अपितु सामान्य मानव है।


2. लक्ष्मण मुच्छ और राम का विलाप का काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्या एवं शब्दार्थ


सुत बित नारि भवन परिवार । होहिं जाहिं जग बारहिं बारा ॥ 

अस विचारि जियाँ जागहु ताता । मिलइ न जगत सहोदर भ्राता ॥4॥ 

जथा पंख बिनु खग अति दीना । मनि विनु फनि करिबर कर हीना ॥ 

अस मम जिवन बंधु बिनु तोही । जौं जड़ दैव जिआवै मोही ॥5॥ 

जैहउँ अवध कवन मुहु लाई । नारि हेतु प्रिय भाइ गँवाई।

बरु अपजस सहतेउँ जग माहीं । नारि हानि विसेष छति नाहीं ॥16॥ 

अब अपलोक मोकु सुत तोरा सहिहि निठुर कठोर डर मोरा ॥ 

निज जननी के एक कुमारा । तात तासु तुम्ह प्रात अधास ॥7॥ 

सौंपेसि मोहि तुम्हहि गहि पानी । सब बिधि सुखद परम हित जानी ॥ 

उत्तरु काह देह तेहि जाई । उठि किन मोहि सिखावह भाई ||5|| 

वहु विधि सोचत सोच बिमोचन । स्रवत सलिल राजिव दल लोचन ॥ 

उमा एक अखंड सोच रहुनाई । नर गति भगत कृपाल देखाई ॥9॥

शब्दार्थ – 

सुत — पुत्र । वित-धन । नारि-स्त्री, पत्नी (यहाँ पर पत्नी अर्थ में)। होहिं – जाते हैं। बारहिं बारा-बार- बार ही। बिचारी—विचार कर। जियँ— मन में। ताता – प्रिय, भाई। सहोदर एक ही माँ की कोख से जनमे धाता भाई जया जैसे। खग-पक्षी। दीन- दरिद्र पनि नागमणि फनिस्प (यहाँ मणि याला साँप) करिबर हावी कर – मम मेरा जिवन जीवन बिन तोही तुम्हारे बिना जड़-कठोर देव-निति । जैहउँ—जाऊँगा। अवध—अयोध्या। कवन कौन-सा । मुहँ —मुख । 

लाई–लेकर। गँवाई- खोकर। बरु—चाहे। अपजस—अपयश, कलंक। सहतेउँ—-सहना पड़ेगा। छति—क्षति, हानि। अपलोक — अपयश : सोक दुख: तोरा-तेरा। सहिहि उर- हृदय । निज अपनी जननी जन्म देने वाली माँ। कुमार पुत्र। तासु—उसके। सौपेसि – सहन करेगा। निठुर-निष्ठुर, हृदयहीन । सौंपा था। 

मोहि मुझे। गहि— पकड़कर। पानी— हाथ बिधि— प्रकार, तरह। उतरु काह देहऊँ — क्या उत्तर दूँगा। उठि—उठकर । किन—क्यों ? बहु बिधि – अनेक प्रकार से। सोच विमोचन—-शोक से छुड़ाने वाले श्री राम। स्त्रवत बहना, टपकना। सलिल-जल। राजिव- कमल। दल-पैंखुड़ी। लोचन—नेत्र उमा – पार्वती। एक अद्वितीय अखंड-वियोग रहित । गति – दशा। 

प्रसंग ——

यह पद्यांश गोस्वामी तुलसीदास के जगत्मप्रसिद्ध ग्रंथ ‘रामचरितमानस’ से लिया गया है। यह अंश ग्रंथ के लंकाकांड में संकलित है। इस अंश में मेघनाद की शक्ति लगने के बाद मूच्छित हुए लक्ष्मण को देखकर आधी रात में राम के द्वारा किए गए विलाप का वर्णन है। 

4. राम विलाप करते हुए कह रहे हैं कि पुत्र, धन, स्त्री, घर और परिवार तो संसार में रहते हुए प्राप्त होते रहते हैं और जाते रहते हैं अर्थात् इनके एक बार चले जाने के बाद भी पुनः प्राप्ति संभव है । परंतु संसार में सहोदर भाई बार-बार नहीं मिलता। हृदय में मेरे द्वारा कही गई इस बात विचार करके हे भाई लक्ष्मण ! अब तुम जाग जाओ ।

5. आगे राम कहते हैं कि जिस प्रकार पंख विहीन पक्षी, मणि बिना सर्प और सूंड के बिना श्रेष्ठ गजराज अत्यंत दीन-हीन हो जाते हैं, उसी प्रकार हे भाई । यदि कठोर भाग्य मुझे जीवित रखता है, तो तुम्हारे बिना मेरा जीवन भी ऐसा होगा। आशय यह है कि तुम्हारे अभाव में मेरी पीड़ा पंख रहित पक्षी, मणि रहित सर्प और सूंड रहित हाथी जैसी होगी ।

6. विलाप करते हुए राम कहते हैं कि तुम्हारे अभाव में कौन-सा मुख लेकर अयोध्या जाऊँगा क्योंकि स्त्री के लिए प्रिय भाई को खोने वाले मुझे अपना मुख दिखाने में लज्जा आएगी। मैं इस अपयश को सहना अच्छा समझता हूँ कि राम में वीरता का इतना अभाव है कि वह अपनी पत्नी को भी बैठा किंतु भाई को खोना नहीं चाहता क्योंकि भाई की हानि की अपेक्षा में स्त्री की हानि कोई विशेष क्षति नहीं है । 

7. अब तो हे पुत्र ! मेरा यह निष्ठुर और कठोर हृदय नारी खोने का अपयश और तुम्हारा शोक दोनों ही सहन करेगा । अर्थात् तुम्हारे बिना तो मुझे सीता भी प्राप्त नहीं हो सकती । है । तुम अपनी माता के एक ही पुत्र हो और तुम ही उस माँ के प्राणों के आधार हो अर्थात् तुम्हारे बिना तुम्हारी माँ भी जीवित नहीं रह पाएगी।

8. तुलसी कहते हैं दूसरों को सोच से छुड़ाने वाले श्रीराम अनेक प्रकार से सोचते हैं। उनके कमल की पंखुड़ी के समान सुंदर एवं आकर्षक नेत्रों से दुख के कारण आँसुओं का जल बह रहा हैं । कथावाचक शिवजी पार्वती से कहते हैं कि हे उमा ! श्री रघुनाथ जी अद्वितीय व अखंड परब्रह्म हैं। अपने भक्तों पर कृपा करने वाले भगवान श्रीराम ने अपनी इस स्थिति नर-लीला ही दिखाई है।

सौंदर्य-बोध-

राम विलाप का मानवोचित वर्णन है। इस विलाप में गोस्वामी जी ने कुछ ऐसी.. बातें कहला दी हैं। जिन पर नैतिकवादी लोग नाक-भौं सिकोड़ते हैं। पाठक निर्णय करे कि पत्नी व भाई की तुलना में महत्त्व किसे मिलना चाहिए। 

भाषा अवधी है तथा छंद चौपाई है। रस करुण है। अनुप्रास अलंकार का प्रयोग हुआ है तथा प्रथम पाँच चरण तक राम का विलाप मानवोचित है। 

अंतिम चरण में तुलसी दास ने राम के ईश्वरीय रूप का वर्णन किया है। तुलसीदास के राम जब भी मानववत् व्यवहार करते हैं, तब तुलसी यह स्मरण कराना नहीं भूलते कि राम भगवान हैं। तुलसी के ‘मानस’ की कथा को शिव पार्वती से सुना रहे हैं। अतः ‘उमा’ संबोधन आया है।


सोरठा


प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए बानर निकर 

आइ गयउ हनुमान जिमि करूना महँ बीर रस ॥

शब्दार्थ — 

प्रभु — श्रीराम । प्रलाप – विलाप, दुख प्रकट करना। बिकल – व्याकुल। निकर- समूह आइ गयउ आ गए। जिमि – जिस प्रकार । 

प्रसंग—

यह छंद तुलसीदास के ‘रामचरितमानस’ से उद्धृत है। भगवान श्रीराम लक्ष्मण को देखकर विलाप कर रहे थे कि हनुमान जी बूटी लेकर आ गए। उस समय के वातावरण का वर्णन इस छंद में हुआ है।

व्याख्या-

लक्ष्मण मूच्छा और हनुमान के आने की देरी के कारण प्रभु श्रीराम के विलाप को सुनकर वानरों का समूह भी व्याकुल हो गया था। इतने में ही हनुमान जी संजीवनी बूटी लेकर आ गए। लक्ष्मण के जीवित होने की आशा में वानर समूह में प्रसन्नता जाग उठी। तुलसी दास ने इस भाव परिवर्तन को करुण रस में वीर रस का आगमन माना है। 

सौंदर्य बोध—

भाव-परिवर्तन का अनूठा उदाहरण है। भाषा अवधी है। छंद सोरटा है तथा द्रष्टांत अलंकार है। 


3. लक्ष्मण मुच्छ और राम का विलाप का काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्या एवं शब्दार्थ


हरषि राम भेटेड हनुमान । अति कृतग्य प्रभु परम सुजाना ॥ 

तुरत बैद तब कीन्हि उपाई । उठि बैठे लछिमन हरपाई ॥10॥ 

हृदयँ लाइ प्रभु भेंटेड भ्राता हरषे सकल भालु कपि व्राता ॥ 

कपि पुनि वैद तहाँ पहुँचावा । जेहि बिधि तबहिं ताहि लइ आवा ॥11॥ 

यह वृतांत दसानन सुनेऊ । अति विषाद पुनि पुनि सिर धुनेऊ ॥ 

व्याकुल कुंभकरन पहिं आवा । विविधा जतन करि ताहि जगावा ।।12।। 

जागा निसिचर देखिअ कैसा । मानहुँ कालु देह धरि वैसा ॥ 

कुंभकरन बूझा कहु भाई । काहे तब मुख रहे सुखाई ॥13॥ 

कथा कहीं सब तेहिं अभिमानी । जेहि प्रकार सीता हंरि आनी ॥ 

तात कपिन्ह सब निसिचर मारे । महा महा जोधा संघारे ||14|| 

दुर्मुख सुरपिर मनुज अहाटी । भट अतिकाय अकंपन भारी || 

अपर महोदर आदिक बीरा । परे समर महि सब रनधीर ॥15॥

दोहा

सुनि दसकंधर बचन तब कुंभकरन बिलखान । जगदंबा हरि आनि अब सठ चाहत कल्यान ॥

शब्दार्थ- 

हरषि- – प्रसन्न होकर भेटेउ—भेंट की, मिले। कृतग्य — कृतज्ञ, अहसान मानने वाले। सुजाना- अच्छा, ज्ञानी, समझदार, चतुर। तुरत—तुरंत शीघ्र । कीन्हि — किया । उपाई- उपाय। हृदयँ — हृदय से । सकल- समस्त बाता—समूह झुंड। पुनि — फिर, पुनः । 

तबहिं – तब, उस बार। ताहि—उसे। लइ आवा ले आए थे। बृतांत — समाचार। दसानन रावण। विषाद- दुख। सिर धुनेऊ— सिर पीटने लगा। पहि― के पास। बिबिध – अनेक प्रकार। जतन — उपाय । निसिचर — रात में चलने वाला अर्थात् राक्षस । 

कालु यमराज बैसा बैठा। अभिमानी— गर्वीला रावण हरि आनी— हरण कर लाए। महा महा—बड़े-बड़े। जोधा-योद्धा संघारे-मार डाले। दुर्मुख — कड़वी जबान वाला। सुररिपु— देवशत्रु । मनुज अहारी-नर भक्षक । भट-भारी योद्धा । अपर — दूसरे । 

महोदर — बड़े पेट वाला। आदिक आदि । समर — रणभूमि । महि— भूमि । रनधीरा—युद्ध में अविचल रहने वाला। दसकंधर – रावण। बिलखान —दुखी होकर। जगदंबा – जगत् माता सीता। सठ — दुष्ट ।

प्रसंग—

यह पद्यांश गोस्वामी तुलसीदास के जगत्प्रसिद्ध ग्रंथ ‘रामचरितमानस’ से उद्धृत लक्ष्मण मूर्च्छार्च्छ टूटने के बाद रावण की दशा तथा कुंभकरण से उसके वार्तालाप का इस अंश में वर्णन है। है।

व्याख्या—

10.हनुमान को देखकर राम उठकर उनसे गले लगकर मिले। हनुमान के कार्य को देखकर परम चतुर भगवान श्रीराम अत्यंत की कृतज्ञता का अनुभव कर रहे हैं। तब सुषेण वैद्य ने लक्ष्मण की मूर्च्छा तोड़ने के तुरंत ही उपाय किए और उसी समय प्रसन्न होते हुए उठ बैठे।

11. लक्षमण के उठने पर श्रीराम ने भाई को हृदय से लगा लिया। उस दृश्य को देखकर जाम की सेना के भालू-वानरों के समूह सब हर्षित हो गए । फिर हनुमान जी ने सुषेण वैद्य को उस समय वहाँ पहुँचा दिया जिस प्रकार वे पहले यहाँ लेकर आए थे। 

12. लक्ष्मण मूर्च्छा टूटने की सूचना जब रावण को मिली तब उसने अत्यंत दुखी होकर (यात बार अपना सिर पीट लिया। वह अत्यंत व्याकुल होकर अपने अनुज कुंभकरण के पास गया और तरह-तरह के उपाय कर-करके उसे जगाया ।

13. कुंभकरण सोने से उठकर जगा। उसे देखकर ऐसा लगता था मानो स्वयं कालदेवता ही शरीर धारण करके बैठा हो। कुंभकरण ने अपने भाई रावण से पूछा-हे भाई कहो तो सही, क्या कारण है, तुम्हारे ये मुख क्यों सूख रहे हैं ? 

14. कुंभकरण के पूछने पर उस अभिमानी रावण ने सीता हरण से अब तक की सब कथा सुनाई और बताया कि हे भैया राम की सेना के वानरों ने हमारे सब राक्षस मार डाले । उन्होंने 1 हमारे बुद्धाओं का भी संहार कर डाला ।

15. वानरों के द्वारा मारे गए योद्धाओं में दुर्मुख, देवांतक, नरांतक, भारी योद्धा अतिकाय और अकंपन सहित महोदर आदि दूसरे सभी रणधीर वीर युद्धभूमि में पड़े हुए हैं।


दोहा


रावण से सारा वृत्तांत सुनकर दुखी हुआ कुंभकरण विलखकर कहने लगा- अरे मूर्ख ! जगजननी सीता का अपहरण करके ले आया है और अब तू कल्याण चाहता है अर्थात् अब तेरा हित होना संभव नहीं है।

सौंदर्य-बोध-

लक्ष्मण-मूर्च्छा के टूटने से वानर समूह की प्रसन्नता और रावण की चिंता का स्वाभाविक वर्णन है। भाषा अवधी है। 10 से 15 छंद चौपाई है। अंतिम छंद दोहा है। कुंभकरण ने रावण के कार्य को अनुचित बताया है और सीता को जगतमाता माना है। अनुप्रास अलंकार का सुंदर प्रयोग है तथा पुनरुक्ति प्रकाश एवं उत्प्रेक्षा अलंकार है। ‘अति विषाद पुनि-पुनि सिर धुनेऊ’ में करुण रस है।


NCERT Solutions for Class 12 Hindi Aroh Chapter 8 Questions Answers



कवितावली (उत्तर कांड से) कविता के प्रश्न उत्तर


प्रश्न 1. कवितावली में उद्धत छंदों के आधार पर स्पष्ट करें कि तुलसीदास को अपने युग की आर्थिक विषमता की अच्छी समझ है ।

उत्तर—

तुलसी युग में नायक हैं, लोकनायक हैं। उनको तत्कालीन समाज का ज्ञान है। निरंकुश शासकों के इस युग में किसान, श्रमजीवी, व्यापारी, नौकरी, कलाकार सभी पेट की ज्वाला बुझाने में व्यस्त रहते थे। 

जो जिस व्यवसाय को चाहता था, उसको अवसर नहीं था। भयंकर निर्यनता यी। सब लाचारी और अनुभव करते थे। जाति प्रथा का जोर था। अतः तुलसी ने अपने युग की आर्थिक विषमता का सजीव चित्रण किया है। 

प्रश्न 2. पेट की आग का शमन ईश्वर (राम) भक्ति का मेघ ही कर सकता है-तुलसी का यह काव्य-सत्य क्या इस समय का भी युग-सत्य है ? तर्कसंगत उत्तर दीजिए । 

उत्तर—तुलसी राम भक्त हैं। वह राम नाम की महिमा का वर्णन कर रहे हैं और उसका ईश्वर भक्ति बता रहे हैं। इस समय का युग-सत्य यह नहीं हो सकता। क्योंकि आज का युग धार्मिक नहीं है, आर्थिक है। अर्थ के लिए राम कृपा की नहीं, अपितु संघर्ष की आवश्यकता है। विज्ञापन के द्वारा नई-नई तकनीक से उद्योग-धंधे खड़े करना ही आज की आवश्यकता है।

प्रश्न 3. तुलसी ने यह कहने की जरूरत क्यों समझी ? द्यूत कहाँ, अवधूत कहाँ, राजपूत कही, जोलहा कहाँ कोक / काहू की बेटा से बेटी न व्याहब, काहू की जाति बिगार न सोक । इस सर्वया में काहू के बेटा से बेटी न व्याहव कहते तो सामाजिक अर्थ में क्या परिवर्तन आता ?

उत्तर- तुलसी की वीतरागत्व को देखकर कुछ लोग उन पर उल्टी-सीधी टीका-टिप्पणी करते थे। उनके ब्राह्मणत्व पर भी अंगुली उठाई जाती थी। अतः उसको यह सब कहना पड़ा। जहाँ तक बेटा से बेटी ब्याहने की बात है, भारतीय समाज में संबंध बेटी के कारण ही माने जाते हैं। आज भी उसे ‘बेटी रोटी के संबंध’ कहते हैं ‘बेटी रोटी’ के नहीं। 

अतः सामाजिक अर्थ परिवर्तन की बात ही नहीं उठती। बेटी वाला जब बेटी देना चाहेगा, विवाह तो तभी होगा और वह अपनी का ध्यान भी रखेगा। बेटा से जिस जाति की लड़की की शादी की जाती है, लकड़ी की जाति पति से निर्धारित होती है। अतः जाति तो तभी बिगड़ सकती है।

प्रश्न 4. धूत कहाँ • वाले छंद में ऊपर से सरल व निरीह दिखाई पड़ने वाले तुलसी भी भीतरी असलियत एक स्वाभिमानी भक्त हृदय की है। इसमें आप कहाँ तक सहमत हैं?

उत्तर—यह छंद वास्तव में तुलसी की भीतरी असलियत एवं स्वाभिमानी भक्त का वर्णन करता है। तुलसी को न तो किसी की आलोचना की चिंता है और न छोटे-बड़े कहने की परवाह है। उसे इस बात पर गर्व है कि मैं राम भक्त के रूप में प्रसिद्ध हूँ और मुझे किसी से कोई अपेक्षा । 

तुलसी साहित्य में अनेक स्थान पर तुलसी का यह स्वाभिमान प्रकट होता है। यथा हम तौ चाकर राम के पटी लिखी दरबार। अब तुलसी का होंगे, नर के मनसबदार ।। आशय स्पष्ट है कि तुलसी सांसारिक उपलब्धियों को नगण्य मानते हैं। 

प्रश्न 5 भ्रातृशोक में हुई राम की दशा को कवि ने प्रभु की नर लीला की अपेक्षा सच्ची मानवीय अनुभूति के रूप में रचा है। क्या आप इससे सहमत हैं ? तर्कपूर्ण उत्तर दीजिए ।

उत्तर—यह सत्य नहीं है कि तुलसी के राम परात्पर ब्रह्म हैं, अवतार हैं कवि ने अनेक स्थान पर उनसे नरलीला करायी है। प्रश्न के अनुसार यह नरलीला नहीं अपितु सच्ची मानवीय अनुभूति का चित्रण है। इससे हमें कोई असहमति नहीं है। 

विचारणीय तो यह है कि इन परिस्थितियों में पड़ा हुआ कोई भी मनुष्य इसके अतिरिक्त और क्या कहता। जिस भाई ने राम की सेवा के लिए माँ-बाप को त्यागकर वन के कष्ट सहने का निर्णय लिया हो, जो राम की सेवा में ही जीवन भर लगा रहा हो, वह भाई उसी राम के कारण मरणासन्न पड़ा है। 

यदि सूर्य के उदित होने से पूर्व उपचार नहीं हुआ तो लक्ष्मण मर जाएगा। ऐसे में अर्ध रात्रि में राम का विलाप सच्ची मानवीय अनुभूति है। यह चिंता स्वाभाविक है कि सीता व लक्ष्मण को खोकर राम अयोध्या किस मुख से जा सकते हैं। माता सुमित्रा को क्या जवाब देंगे? इस आधार पर कह सकते हैं कि हम प्रश्न के मूल रूप में पूर्ण सहमत हैं।

प्रश्न 6.शोकग्रस्त माहौल में हनुमान के अवतरण को करुण रस के बीच वीर रस का आविर्भाव क्यों कहा गया है ?

उत्तर- भारतीय रस- सिद्धांत करुण व वीर रस का समन्वय नहीं मिलता क्योंकि ये दोनों एक-दूसरे के विपरीत है। राम के विलाप व लक्ष्मण की संभावित मृत्यु के आशंकित वातावरण में 1 करुण रस व्याप्त था। अचानक हनुमान संजीवनी सहित आ गए और रात्रि अभी शेष है। अतः वातावरण एकदम प्रसन्नता का हो गया। मौत पर जीवन की विजय में वीर रस ही तो होगा। अतः करुण में वीर रस के अविर्भाव की बात कही गई है। 

प्रश्न 7. जैहऊँ अवघ कवन मुहु लाई । नारि हेतु प्रिय भाई गँवाई ।।

बरु अपजस सहतेंठ जग माहीं । नारि हानि विसेष छति नाहीं ॥

भाई के शोक में डूबे राम के इस प्रलाप वचन में स्त्री के प्रति कैसा सामाजिक दृष्टकोण संभावित है? 

उत्तर – जब दुख की सीमा बढ़ जाती है, तब व्यक्ति के कथन का पूर्वापर संबंध जोड़ना उचित नहीं है। राम की पीड़ा को, परिस्थिति की भयंकरता को यदि अनुभूत कर लिया जाए, तो राम ने कुछ भी अनुचित नहीं कहा है। 

राम ने तो स्त्री को पाने के लिए अपना सब कुछ दाँव • पर लगा दिया है किंतु इस कटु सत्य को झुठलाया नहीं जा सकता कि संबंधों में उपेक्षा का भी महत्त्व होता है। 

यदि कभी ऐसा समय आए कि दोनों में किसी एक को छोड़ना है, तो निर्णय किधर जाएगा, अनुमान लगा लें। अतः राम के इस कथन से स्त्री के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण में कोई परिवर्तन नहीं आएगा।

प्रश्न 8. कालिदास ने रघुवंश महाकाव्य में पत्नी (इंदुमती) के मृत्यु-शोक पर अज तथा निराला की सरोज स्मृति में पुत्री (सरोज) के मृत्यु-शोक पर पिता के करुण उद्गार निकाले हैं। उनसे भ्रातृशोक में डूबे राम के इस विलाप की तुलना करें ।

उत्तर—प्रश्न परीक्षोपयोगी नहीं है क्योंकि रघुवंश महाकाव्य और ‘निराला’ की सरोज स्मृति कविता पाठ्यक्रम में नहीं है। वैसे शोक की स्थिति तीनों स्थानों पर है। अंतर केवल इतना है कि इंदुमती व सरोज की मृत्यु हो चुकी थी। वहाँ क्रमशः पति व पिता के शोक का वर्णन है। लक्ष्मण मूर्च्छित हैं और मृत्यु की आशंका है।

प्रश्न 9. पेट को ही पचत, बेचत बेटा-बेटकी तुलसी के युग का ही आज के युग का भी सत्य है । भुखमरी में किसानों की आत्महत्या और संतानों (खासकर बेटियों) को भी बेच डालने की हृदय विदारक घटनाएँ हमारे देश में घटती रही हैं। वर्तमान परिस्थितियों और तुलसी के युग की तुलना करें।

उत्तर—यह सत्य है कि तुलसी ने अपने युग के जिस सत्य का उद्घाटन किया है, वह आज का भी युग सत्य है। आज किसान आत्महत्या कर रहे हैं। श्रमजीवी औद्योगिक प्रतिष्ठानों के सामने भूखे मर रहे हैं। 

व्यापारी विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का सामना नहीं कर पा रहे हैं। नौकरी की दशा तो इतनी भयानक है कि एक पद के लिए हजारों आवेदन आते हैं। 

दूरदर्शन के सामने अब नट या जादूगर की कला पर कोई ध्यान नहीं देता है। व्यक्तियों ने धर्म-कर्म को त्याग दिया है। तस्करी, अपहरण, लूट, चोरी-डकैती, जालसाजी व्यवसाय बन गए हैं। वास्तव में बेटी-बेटा बेच दिए जाते हैं। 


लक्ष्मण मुच्छ और राम का विलाप कविता के प्रश्न उत्तर


प्रश्न 1. चौपाई का लक्षण तथा उदाहरण दीजिए । 

उत्तर- चौपाई सम मात्रिक छंद है। इसमें चार चारण होते हैं। प्रत्येक चरण में 16-16 मात्राएँ होती हैं। अंत में दीर्घ होना चाहिए। उदाहरण-

सुत बित नारि भवन परिवार ॥

होहिं जग बारहिं बारा ॥ 

अस विचारि जियँ जागहु ताता ।

मिलइ न जगत सहोदर भ्राता ॥

प्रश्न 2. ‘भारत बाहुबल’ का उल्लेख क्योंकर हुआ है ?

उत्तर- हनुमान संजीवनी बूटी लेने गए थे ये पर्वत सहित ही संजीवनी लेकर लौट रहे थे। भरत ने किसी आशंका के डर से हनुमान को पर्वत सहित नीचे उतार लिया था, 

किंतु हनुमान से यह सुनकर कि यदि मैं सूर्योदय तक लंका नहीं पहुँचा तो लक्ष्मण जीवित नहीं रहेंगे। तब हनुमान को शीघ्र भेजने के उद्देश्य से भरत ने पर्वत सहित हनुमान को वाण पर बैठाकर लंका, भेज दिया। इस असाधारण बल की हनुमान सराहना कर रहे हैं। 

प्रश्न 3. तुलसी ने अपने को ‘गुलाम है राम कौ’ क्यों कहा है ? 

उत्तर—तुलसी मूलतः भक्त हैं। कविता तो आराध्य के गुणगान का माध्यम है। भक्ति के नी भेद हैं जिनमें से एक दास्यभाव की भक्ति होती है। दास्यभाव की भक्ति में भक्त अपने को दीन, हीन, नीच, पतित मानता है और अपने आराध्य के सम्मुख अपनी हीनता का वर्णन करता है। तुलसी लिखते हैं- राम सी बड़ी कीन, मोसी कौन छोटी। राम सी खरी है कीन, मोसों कोन खोटी।

इस भावना से भावित होकर तुलसी अपने को राम का गुलाम कहते हैं। अन्यत्र भी लिखते हैं- हम तो चाकर राम के। पटी लिखी दरबार।।


लघु उत्तरीय प्रश्न


प्रश्न 1. ‘तुरत बैद तब कीन्ह उपाई’ यह वैद्य कौन था और कहाँ से आया था ? 

उत्तर—यह वैद्य लंका का रहने वाला सुषेण था। लक्ष्मण मूर्च्छा का उपचार के लिए विभीषण ने इसे लाने का सुझाव दिया था। हनुमान इसे लंका से लेकर आए थे। इसने बताया था कि यदि संजीवनी बूटी मिल जाए, तो लक्ष्मण की मूर्च्छा टूट जाएगी किंतु यह औषधि रात-रात में ही सूर्योदय से पूर्व आ जानी चाहिए। हनुमान के आते ही वैद्य जी ने तुरंत उपचार प्रारंभ कर दिया था। 

प्रश्न 2. कुंभकर्ण ने रावण को सठ क्यों कहा है ?

उत्तर – रावण ने कुभंकर्ण को बताया था कि में सीता का अपहरण कर लाया था जिसके कारण राम ने लंका आक्रमण करके हमारे प्रसिद्ध योद्धा मार दिए हैं। 
कुंभकर्ण को राम व सीता की महत्ता का ज्ञान है। अतः वह अपने बड़े भाई को ‘सठ’ तक कह डालता है। रावण पक्ष के सभी संबंधियों-पत्नी मंदोदरी, भाई विभीषण मंत्री माल्यवान, पुत्र प्रहसन आदि सभी ने सीता हरण को अनुचित कहा था।

प्रश्न 3. ‘अस कहि आयसु पाइ पद बंदि चलेउ हनुमंत ।’-काव्य पंक्ति के आधार पर हनुमान की चारित्रिक विशेषताएँ बताइए ।

उत्तर – प्रस्तुत काव्य पंक्ति के आधार पर हनुमान की राम के प्रति सच्ची भक्ति भावना प्रकट होती है। इसी कारण उन्होंने संजीवनी बूटी लाने जाने से पहले राम की अनुमति ली और उनके स्पर्श किए।

महत्त्वपूर्ण काव्यांशों का काव्य-सौंदर्य

सौ अनुराग कहाँ अब भाई ।

उठहु न सुनि मम बच बिकलाई ||

जौं जनतेऊ बन बंधु विछोहू । 

पिता बचन मनतेऊँ नहिं ओहू ॥

सुत बित नरि भवन परिवार ॥

होंहि जाहिं जग बारहिं बारा !! 

अस विचारि जिये जागहु ताता ॥

मिलइ न जगत सहोदर भ्राता ॥ 

भाव-सौंदर्य-

प्रस्तुत काव्यांश ‘आरोह भाग-2′ में संकलित और महाकवि तुलसीदास उत्तर- द्वारा रचित महाकाव्य ‘रामचरितमानस’ से उद्धृत है। लक्ष्मण मूर्च्छा के समय राम क मनुष्य की तरह व्याकुल हो गए। 

वे स्वयं को ही लक्ष्मण-मूर्च्छा (भाई के वियोग) के लिए दोषी मानने लगे। ऐसे समय पर उन्हें पुरानी बातें भी स्मरण हो आई, जब वन गमन के समय उन्होंने लक्ष्मण को साथ ले चलने के लिए मना कर दिया था किंतु पिता दशरथ ने उसे भी वन में साथ ले चलने के विषय में कहा था। पितृभक्त होने के कारण राम ऐसा करने के लिए मना नहीं कर सके। 

किंतु ऐसे समय पर वे सोचते हैं कि यदि मैं पिता के वचनों को नहीं मानता तो शायद यह दिन नहीं देखना पड़ता। इस प्रकार व्याकुल होकर राम लक्ष्मण के वियोग में प्रलाप करते हैं। उनके अनुसार संसार में ऐसा सगा भाई भी नहीं हो सकता जो विपत्तियों में भी भाई का साथ नहीं छोड़ता ।

सौन्दर्य बोध – 

(क) प्रस्तुत काव्यांश में अवधी भाषा का प्रयोग हुआ (ख) चौपाई छंद का सटीक प्रयोग हुआ है। है। 

(ग) ‘वन बंधु बिछोहू’, ‘बारहिं वारा’, ‘जियाँ जागहु’ में वर्णों की आकृति के कारण अनुप्रास अलंकार है ।

(घ) तुकांत शब्दों का प्रयोग किया गया है। करुण रस का प्रयोग हुआ है।


Conclusion


नमस्कार Students, मैंने इस पोस्ट को (Class 12 Hindi Aroh Chapter 8) CBSE, NIOS,  CISCE, ICSE और अन्य राज्य के board के मुताबिक इस पोस्ट को तैयार किया है, तथा भविष्य में जो भी लेटेस्ट अपडेट आएंगी उसके अनुसार यह पोस्ट अपडेट भी होता रहेगा । इसलिए मुझे यह आशा है कि यह पोस्ट आपके लिए काफी जानकारी पूर्ण होगा और आपके परीक्षा के लिए काफी सहायता प्रदान करेगा । तो मेरा आपसे यही आग्रह है कि आप इस लेख को पूरा अवश्य पढ़ें । 


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